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12 वर्षों बाद जवाबदेही की ऐतिहासिक वापसी और छात्र आंदोलन के सामने सत्ता के झुकने का सच

छात्रों के महासंग्राम ने सत्ता के दंभ को तोड़ा, 12 साल में पहली बार केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा कराकर जवाबदेही तय की और यह साबित कर दिया कि हुक्मरानों के सामने सबसे बड़ा हथियार जनशक्ति है।

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)।12 सालों के लंबे अंतराल के बाद किसी केंद्रीय मंत्री का पद त्यागना भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में एक अभूतपूर्व मोड़ की तरह देखा जा सकता है। इसे जनशक्ति का ऐतिहासिक उभार कहें या चुनावी गणित से उपजा परसेप्शन मैनेजमेंट, पर इसने सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुक्मरानों को यह याद दिला दिया है कि लोकतंत्र में अंतिम मालिक जनता ही होती है। जब जंतर-मंतर की सड़कों पर बिना किसी बड़े राजनीतिक झंडे, बिना किसी कॉर्पोरेट फंडिंग और बिना पक्षपाती मीडिया के टीआरपी एंकरों के देश का युवा वर्ग एकजुट हुआ, तो उसने सत्ता की सबसे मजबूत दीवारों को भी हिलाकर रख दिया। सालों से लाठियां खा रहे, पेपर लीक के दंश से टूट रहे और अपने उज्ज्वल भविष्य की राह में अनिश्चितता का सामना कर रहे विद्यार्थियों ने दिखा दिया कि जब निष्ठा और सत्य की लड़ाई लड़ी जाती है, तो दुनिया की सबसे ताकतवर राजनीतिक मशीनरी को भी झुकना पड़ता है।

धर्मेंद्र प्रधान द्वारा पद से हटने से पूर्व लिखा गया पत्र वास्तव में कोई आत्ममंथन या पश्चाताप का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक विफलताओं को ढकने के लिए लिखी गई एक राजनीतिक सफाई प्रतीत होती है। अपने चार दशकों के ट्रैक रिकॉर्ड और परीक्षा सुधारों का महिमामंडन करते हुए उन्होंने अपनी कमियों को स्वीकार करने के बजाय सारा दोष बाहरी साजिशों और राजनीतिक विरोधियों के मत्थे मढ़ने का प्रयास किया। 22 लाख से अधिक छात्रों के संघर्ष, उनके बर्बाद हुए सालों और मानसिक तनाव पर एक साधारण माफी तक न मांगना यह दर्शाता है कि सत्ता का अहंकार पद त्यागते समय भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। 1997 में स्वयं ओडिशा में पेपर लीक के खिलाफ लाठी खाकर राजनीति का सफर शुरू करने वाले नेता के दौर में जब देश का युवा पुनः वही लाठियां खा रहा हो, तो यह उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कड़वी और दुखद विडंबना बनकर उभरती है।

मोदी सरकार द्वारा 12 वर्षों में पहली बार इस प्रकार का त्वरित निर्णय लेने के पीछे केवल नैतिक आधार नहीं, बल्कि वैश्विक और क्षेत्रीय आंदोलनों से उपजा एक गहरा रणनीतिक भय भी शामिल है। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में युवाओं और छात्रों के नेतृत्व में हुए अनियंत्रित जनआंदोलनों ने सत्ता के तख्तापलट की जो कहानियां लिखी थीं, भारतीय रणनीतिकार उनसे भली-भांति वाकिफ थे। बिना किसी एकल चेहरे या स्पष्ट नेता के जब कोई जनआंदोलन स्वतःस्फूर्त होकर हर राज्य, हर जाति और हर घर तक पहुंच जाता है, तो उसे दबाना या बदनाम करना असंभव हो जाता है। आगामी चुनावों में नए और पहली बार वोट देने वाले युवा मतदाताओं के बीच ‘तानाशाही और संवादहीनता’ के बनते परसेप्शन को ध्वस्त करने के लिए सरकार को न केवल सीधे संवाद का रास्ता चुनना पड़ा, बल्कि अपने एक प्रमुख मंत्री की आहुति देकर उस बढ़ते असंतोष के तूफान को समय रहते रोकना पड़ा।

इस घटनाक्रम ने भारतीय लोकतंत्र में लगभग विलुप्त हो चुके ‘जवाबदेही’ शब्द को पुनः जीवित करने का अत्यंत महत्वपूर्ण काम किया है, जो इस राष्ट्र की व्यवस्था के लिए एक अत्यंत सुखद संकेत है। वर्षों से देश में बड़े-बड़े हादसे, पेपर लीक और प्रशासनिक लापरवाहियां होती रहीं, लेकिन हर बार गाज निचले स्तर के कर्मचारियों या गुमनाम अफसरों पर गिरती थी और नीति निर्माता पूरी तरह सुरक्षित बच निकलते थे। आज पहली बार निर्णय लेने वाली शीर्ष कुर्सी पर बैठे व्यक्ति तक सीधी जवाबदेही का चाबुक पहुंचा है, जिसने आम नागरिकों में यह विश्वास जगाया है कि अहिंसक और संगठित आंदोलन से बड़े से बड़े तंत्र को राह पर लाया जा सकता है। जनता को अब यह स्पष्ट संदेश मिल चुका है कि लोकतंत्र में नेता स्वामी नहीं बल्कि जनसेवक होते हैं, और यदि नीति तथा मंशा में खोट हो तो जनहित के सामने किसी भी सरकार को घुटने टेकने ही पड़ते हैं।

राजनीतिक और परसेप्शन की शतरंज पर देखें तो इस इस्तीफे से जहां जनता को अपनी शक्ति का अहसास हुआ है, वहीं सरकार ने भी चतुर चाल चलते हुए एक बड़ा फायदा अपने नाम कर लिया है। विपक्ष के दबाव में झुकने के बजाय देश के बच्चों और युवाओं की मांग के सामने झुकने का नैरेटिव गढ़कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी छवि को एक कठोर प्रशासक से बदलकर एक संवेदनशील और सुनने वाले अभिभावक के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। एक मंत्री की बलि देकर सरकार ने संसद से लेकर सड़कों तक जल रही उस आग को शांत कर दिया है जो सीधे प्रधानमंत्री पद की साख तक पहुंच सकती थी। हालांकि, इस घटना ने सत्ता के उस अभेद्य कवच में पहली बड़ी दरार भी पैदा कर दी है कि ‘मोदी सरकार कभी झुकती नहीं है’, जिससे भविष्य में अन्य जनमुद्दों पर भी नए आंदोलनों का रास्ता साफ होना स्वाभाविक है।

संस्थागत दृष्टिकोण से देखा जाए तो धर्मेंद्र प्रधान का जाना केवल एक राजनीतिक मरहम है, क्योंकि शिक्षा प्रणाली का असली नासूर यानी एनटीए का जर्जर ढांचा अभी भी पूरी तरह वैसा ही बना हुआ है। जिस एजेंसी के कंधे पर देश के 6 करोड़ से अधिक युवाओं का भविष्य और 270 से अधिक प्रमुख परीक्षाएं कराने की जिम्मेदारी है, वहां नियमित और पक्के कर्मचारियों की संख्या मात्र 24 होना प्रशासनिक खोखलेपन का सबसे नग्न प्रमाण है। पूरी व्यवस्था को आउटसोर्सिंग, ठेकेदारों और निजी एजेंसियों के भरोसे छोड़कर हम केवल मंत्री का चेहरा बदलकर परीक्षा प्रणाली की शुचिता की गारंटी नहीं दे सकते। जब तक एनटीए जैसी संस्थाओं का पुनर्गठन नहीं होता, कठोर कानून केवल कागजों तक सीमित रहेंगे और नया आने वाला शिक्षा मंत्री भी उसी ढर्रे पर चलकर अपनी कुर्सी को खतरे में डालता रहेगा।

इस पूरे घटनाक्रम में देश के मुख्य विपक्षी दलों को भी अपने भीतर गहराई से झांकने और कड़ा आत्ममंथन करने की अत्यंत आवश्यकता है कि जो काम संसद के भीतर वे नहीं कर सके, उसे छात्रों ने सड़क पर कर दिखाया। बीते कई वर्षों से लगातार हो रहे पेपर लीक और युवाओं के उत्पीड़न के मुद्दे को जिस प्रखरता और निरंतरता से उठाया जाना चाहिए था, उसमें विपक्ष के राजनीतिक पैंतरे काफी फीके साबित हुए। जब देश का युवा पुलिस की लाठियां खाकर अपने हक की लड़ाई लड़ रहा था, तब संसद में केवल हंगामे हुए लेकिन सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर करने वाली मजबूत घेराबंदी देखने को नहीं मिली। इस ऐतिहासिक छात्र आंदोलन ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता को चुनौती देने के लिए केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि जनता के वास्तविक मुद्दों के साथ निस्वार्थ भाव से जमीन पर खड़े होने की सच्ची नीयत चाहिए।

अंततः यह जीत जश्न मनाने के साथ-साथ अत्यंत सतर्क रहने का क्षण है, क्योंकि मंत्री का इस्तीफा एक पड़ाव हो सकता है, संपूर्ण व्यवस्थागत सुधार की मंजिल नहीं। इतिहास गवाह है कि जैसे ही आंदोलन समाप्त होते हैं और मीडिया के कैमरे हटते हैं, सरकारें अपने वादों से पीछे हटने लगती हैं और पुरानी कमियां फिर से पनपने लगती हैं। आने वाले महीनों में नए शिक्षा मंत्री का रुख, एनटीए में होने वाले प्रशासनिक बदलाव, पेपर लीक रोधी कानून की व्यापकता और धर्मेंद्र प्रधान के राजनीतिक पुनर्वास पर देश को कड़ी नजर रखनी होगी। यदि केवल चेहरा बदलकर पुरानी नीतियों को ही आगे बढ़ाया गया तो यह इस्तीफा महज एक राजनीतिक तमाशा बनकर रह जाएगा, लेकिन यदि इससे पारदर्शी और मजबूत परीक्षा प्रणाली का निर्माण हुआ, तभी भारत का लोकतंत्र सही मायनों में सशक्त और सुखद कहलाएगा।

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