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कुर्सी पर बैठे हुक्मरानों से कहीं बड़ी है जनता की ताकत जिसने झुका दिया सत्ता का अहंकार

छात्रों के अटूट जज़्बे, 20 जुलाई के बर्बर लाठीचार्ज और सोनम वांगचुक के 26 दिनों के ऐतिहासिक अनशन के आगे झुकी हुकूमत; गोदी मीडिया का प्रोपेगैंडा ध्वस्त कर युवाओं ने रचा इंकलाब का नया इतिहास।

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। कुर्सी पर बैठे हुक्मरानों से कहीं बड़ी और बुलंद होती है इस देश की महान जनता की ताकत। भारत के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में कुछ क्षण ऐसे ऐतिहासिक दर्ज हो जाते हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को यह सबक सिखाते हैं कि जब-जब अहंकारी सत्ता जनता की जायज़ आवाज़ और युवाओं के रुंदन को अनसुना करने का दुस्साहस करती है, तब-तब इसी देश की पावन सड़कों से इंकलाब का वो प्रचंड बवंडर उठता है जो बड़े से बड़े हुक्मरानों के सिंहासन को उखाड़ फेंकता है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का पद से शर्मनाक इस्तीफा महज एक साधारण प्रशासनिक फेरबदल या राजनीतिक उठापटक नहीं है; यह भारत के करोड़ों संघर्षशील विद्यार्थियों, शोषित युवाओं और सत्य के मार्ग पर अडिग खड़े सत्याग्रहियों की अनवरत तपस्या, बलिदान और अनुशासित संघर्ष की ऐतिहासिक और गूंजायमान विजय है। इस अभूतपूर्व जन-आंदोलन ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक बार फिर इस शाश्वत सत्य को स्थापित कर दिया है कि सत्ता के नशे में चूर नेताओं की क्रूर ताकत के आगे बेबस जनता और उसके न्यायप्रिय युवाओं का अटूट आत्मबल हमेशा भारी पड़ता है।

बीते लंबे समय से देश का प्रतिभावान छात्र समुदाय भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र की नाकामी, परीक्षाओं में होती योजनाबद्ध धांधलियों और धड़ल्ले से लीक होते पर्चों की वजह से निराशा के गहरे अंधकार में धकेला जा रहा था। यह केवल एक परीक्षा का पर्चा लीक होने का साधारण मामला नहीं था, बल्कि यह भारत के उन लाखों मेधावी और मध्यमवर्गीय युवाओं के सपनों, उनकी रातों की नींद, वर्षों की खून-पसीने से सींची गई कठोर मेहनत और उनके गरीब माता-पिता के असीम त्याग पर सीधा और कायरतापूर्ण प्रहार था। देश के सुदूर गांवों, कस्बों और संकरे कमरों में 14-14 घंटे पढ़ाई करने वाले निष्ठावान युवा जब परीक्षा केंद्रों तक उम्मीदें लेकर पहुंचते थे और अचानक उन्हें पता चलता था कि भ्रष्ट तंत्र और शिक्षा माफियाओं ने उनकी वर्षों की तपस्या का चंद रुपयों के लिए सौदा कर लिया है, तो उनका विश्वास पूरी तरह टूट जाता था। परंतु इस बार देश का स्वाभिमानी युवा शांत बैठने वाला नहीं था; उन्होंने हताशा को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाकर सड़कों पर महासंग्राम छिड़ दिया।

सत्य और न्याय की इस धर्मयुद्ध जैसी लड़ाई में 20 जुलाई का दिन भारत के इतिहास में एक अत्यंत काले लेकिन स्वर्णिम संघर्ष के रूप में दर्ज हो गया। 20 जुलाई को जब देश के कोने-कोने से आए हज़ारों शांतिप्रिय विद्यार्थी अपने मौलिक अधिकारों और सुरक्षित भविष्य की मांग लेकर संसद की ओर रुख कर रहे थे, तब सत्ता के दंभ में डूबे हुक्मरानों ने उनकी करुण पुकार सुनने के बजाय उन पर क्रूर पुलिसबल और बर्बर लाठीचार्ज का नंगा नाच करवाया। सड़कों पर अहिंसक रूप से मार्च निकाल रहे निहत्थे और बेकसूर छात्रों पर पुलिस की भारी लाठियां बरसाई गईं, पानी की बौछारें छोड़ी गईं और कई होनहार विद्यार्थियों के शरीर को लहूलुहान कर दिया गया। सत्ता तंत्र को यह मुगालता था कि 20 जुलाई का वह बर्बर लाठीचार्ज इन युवाओं के हौसलों को पस्त कर देगा और वे डरकर अपने घरों को लौट जाएंगे, लेकिन वे भूल गए थे कि यह भगत सिंह और महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर चलने वाली निर्भीक पीढ़ी है। उस लाठीचार्ज ने छात्रों के आक्रोश में घी का काम किया और युवाओं के संकल्प को और अधिक अडिग बना दिया।

जब देश का होनहार युवा अपने न्यायसंगत अधिकारों और भविष्य की रक्षा के लिए सड़कों पर खून बहा रहा था, तब सत्ता में बैठी पूरी भारतीय जनता पार्टी की लॉबी, उसके आईटी सेल और बिकाऊ गोदी मीडिया ने मिलकर इन निर्दाेष छात्रों के खिलाफ एक बेहद घिनौना और नीच षड्यंत्र रचा। अपने ही देश के देशवासी और मीडिया चौनल, जिन्हें युवाओं की आवाज बनना चाहिए था, वे दिन-रात टीवी चौनलों पर बैठकर इन देशभक्त विद्यार्थियों को श्राष्ट्रविरोधीश्, श्टुकड़े-टुकड़े गैंगश् और श्अराजक तत्वश् साबित करने का अथक प्रयास करते रहे। सत्ता को बचाने के लिए गोदी मीडिया ने दिन-रात झूठ की फेक्ट्रियां चलाईं और छात्रों के पवित्र आंदोलन को बदनाम करने के लिए पूरा जोर लगा दिया। लेकिन इन कायरतापूर्ण हमलों, झूठे नैरेटिव और चरित्र-हनन की साजिशों के बावजूद देश का युवा अपनी जगह से एक इंच भी पीछे नहीं हटा। युवाओं के अटूट राष्ट्रप्रेम, सत्यनिष्ठा और न्यायप्रिय संघर्ष के आगे गोदी मीडिया का हर प्रोपेगैंडा ताश के पत्तों की तरह ढह गया और जनता ने इन बिकाऊ जमातों को पूरी तरह खारिज कर दिया।

जब दिल्ली की सड़कों पर बेकसूर छात्रों का खून बह रहा था, तब लद्दाख की बर्फीली वादियों से निकले महान शिक्षाविद, पर्यावरणविद और त्याग की प्रतिमूर्ति सोनम वांगचुक ने इस महाआंदोलन को नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान की। देश के युवाओं के उज्ज्वल भविष्य और शिक्षा प्रणाली के समूल सुधार के समर्थन में सोनम वांगचुक ने 26 दिनों की ऐतिहासिक और अनवरत भूख हड़ताल की घोषणा कर दी। 26 दिनों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए एक महान तपस्वी की भांति अपने शरीर को तपाने वाले वांगचुक के इस आत्म-बलिदान ने संपूर्ण भारतवर्ष की सुप्त अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया। परंतु इस जन-आंदोलन की प्रचंड लहर से घबराई कायर सरकार ने सोनम वांगचुक को गैर-कानूनी तरीके से पुलिस की हिरासत में ले लिया। जिस महान व्यक्तित्व ने अपना पूरा जीवन देश की सेवा और नवाचार में समर्पित कर दिया, उसे सलाखों के पीछे धकेल दिया गया, लेकिन यह दमनकारी कदम सत्ता की ताबूत में अंतिम कील साबित हुआ और पूरे देश में जनाक्रोश की एक ऐसी ज्वाला भड़की जिसे शांत करना मुमकिन नहीं था।

जनता के भयंकर जन-आक्रोश, सोनम वांगचुक के 26 दिनों के तपस्वी उपवास और देश भर के छात्रों के तूफानी आंदोलन के आगे अंततः सत्ता का गगनचुंबी अहंकार चकनाचूर होकर गिर पड़ा और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से त्यागपत्र देने पर मजबूर होना पड़ा। 20 जुलाई के बर्बर लाठीचार्ज से लेकर सोनम वांगचुक की अवैध गिरफ्तारी तक, हुक्मरानों ने इस आंदोलन को कुचलने और दबाने के जितने भी दमनकारी जतन किए थे, वे सभी जनता के प्रचंड आक्रोश के आगे तिनके की तरह बह गए। धर्मेंद्र प्रधान का यह इस्तीफा केवल एक मंत्री का हटना नहीं है, बल्कि यह उस क्रूर मानसिकता की निर्णायक हार है जो यह समझती थी कि देश के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करके कोई भी गद्दी पर सुरक्षित बैठा रह सकता है। यह ऐतिहासिक जीत उन सभी 300 से अधिक घायल विद्यार्थियों के बहते खून का हिसाब है, उन अनगिनत माता-पिता की तपस्या की जीत है और सोनम वांगचुक के उस निष्काम त्याग का प्रतिफल है जिसने पूरे देश को एक सूत्र में पिरो दिया।

इस समूचे जन-आंदोलन की सबसे भव्य और प्रेरणादायक बात यह रही कि तंत्र की तमाम उकसावे की कार्रवाइयों, कायरतापूर्ण लाठीचार्ज और गैर-कानूनी गिरफ्तारियों के बावजूद देश के अनुशासित युवाओं ने हिंसा का मार्ग कभी नहीं चुना। छात्रों का परिश्रम केवल बंद कमरों में किताबों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने अपने अटूट समर्पण, अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प से यह साबित कर दिया कि अहिंसा और अनुशासन के बल पर दुनिया की सबसे शक्तिशाली तानाशाह हुकूमत को भी घुटने टेकने पर मजबूर किया जा सकता है। तपती कड़कती धूप में सड़कों पर डटे रहकर, भूखे पेट रातों को गुजारकर और पुलिस की गाड़ियों की परवाह न करते हुए इन मेधावी विद्यार्थियों ने जिस राष्ट्रीय परिपक्वता का परिचय दिया है, वह भारत के स्वर्णिम भविष्य का जीवंत प्रमाण है। यह ऐतिहासिक क्रांति केवल एक इस्तीफे पर खत्म नहीं होती, बल्कि उसने आने वाली तमाम सरकारों को चेतावनी दे दी है कि भारत का जागरूक युवा अब अपने अधिकारों के साथ कोई समझौता बर्दाश्त नहीं करेगा।

आज संपूर्ण भारतवर्ष में जश्न का माहौल है और काशीपुर से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर तक, तथा लद्दाख की चोटियों से लेकर कन्याकुमारी के तटों तक केवल एक ही हुंकार गूंज रही है कि लोकतंत्र में जनता की शक्ति ही सर्वाेच्च होती है। सोनम वांगचुक का चट्टान जैसा अडिग रुख, 20 जुलाई की लाठियां सहकर भी न झुकने वाले हमारे महान छात्र और देश के हर नागरिक का अटूट समर्थनकृइन सबने मिलकर एक ऐसा अध्याय लिख दिया है जिसे आने वाले इतिहास में सुनहरे अक्षरों से उकेरा जाएगा। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भारत के युवाओं के अदम्य साहस और सच्चाई की सबसे बड़ी नैतिक विजय के रूप में सदा याद रखा जाएगा। इस अभूतपूर्व महा-संग्राम ने देश के अंतिम व्यक्ति के दिल में यह विश्वास पुनः जगा दिया है कि जब-जब सत्ता अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर जनता का दमन करेगी, तब-तब यही जनता अपनी प्रचंड शक्ति का प्रदर्शन कर तानाशाहों का तख्तापलट कर देगी और जीत हमेशा सत्य, न्याय और भारत की जनता की ही होगी।

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