भारत(सुनील कोठारी)। भारतीय राजनीति में यदि किसी दल ने बीते एक दशक के दौरान अपनी वैचारिक पहचान को सबसे अधिक प्रभावी ढंग से स्थापित किया है तो वह भारतीय जनता पार्टी है। पार्टी ने राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक विरासत और हिन्दुत्व को अपने राजनीतिक विमर्श का केंद्रीय आधार बनाया है तथा चुनावी राजनीति में इसी वैचारिक रेखा को लगातार मजबूत करने का प्रयास किया है। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भाजपा की लगातार चुनावी सफलता को भी इसी व्यापक राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा जाता है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार वर्ष 2017 से सत्ता में है, जबकि उत्तराखंड ने वर्ष 2022 में उस परंपरा को तोड़ दिया जिसमें हर चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन होता था और पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा को लगातार दूसरी बार शासन का अवसर दिया। दूसरी ओर मध्यप्रदेश में वर्ष 2003 से भाजपा प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनी हुई है। इन राज्यों में पार्टी स्वयं को सुशासन, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों की संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करती रही है। ऐसे समय में जब हाल के दिनों में तीन अलग-अलग राज्यों से मंदिर प्रबंधन, दान व्यवस्था और सत्ता से जुड़े विवाद राष्ट्रीय बहस का विषय बने, तब राजनीतिक गलियारों में यह प्रश्न तेजी से उठने लगा कि क्या इन घटनाओं का प्रभाव केवल प्रशासनिक स्तर तक सीमित रहेगा या फिर यह भाजपा की उस राजनीतिक छवि को भी चुनौती देगा, जिसे वर्षों की रणनीति और चुनावी सफलता के बाद मजबूत बनाया गया है।
सबसे पहले मध्यप्रदेश का घटनाक्रम राजनीतिक बहस के केंद्र में आया। प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से भाजपा का प्रभाव कायम है और इस दौरान शिवराज सिंह चौहान तथा अब मोहन यादव के नेतृत्व में सरकारें बनी हैं। शिवराज सिंह चौहान के लंबे कार्यकाल को अक्सर उनकी सरल सार्वजनिक छवि और प्रशासनिक अनुभव के संदर्भ में याद किया जाता है। राजनीतिक हलकों में कई बार उनके उस पुराने वक्तव्य का भी उल्लेख किया जाता है जिसमें उन्होंने सार्वजनिक जीवन में सादगी और अनावश्यक प्रदर्शन से बचने की सलाह दी थी। इसी पृष्ठभूमि में जब एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्र की खोजी रिपोर्ट में मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार से जुड़ी भूमि खरीद को लेकर प्रश्न उठाए गए, तब विपक्ष ने इसे गंभीर राजनीतिक मुद्दा बना दिया। रिपोर्ट में दावा किया गया कि उज्जैन क्षेत्र में प्रस्तावित विकास परियोजनाओं से पहले कुछ भूमि खरीद हुई, जिस पर बाद में कांग्रेस ने संभावित हितों के टकराव और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए। कांग्रेस नेताओं ने लगातार प्रेस वार्ताओं के माध्यम से सरकार से स्पष्टीकरण की मांग की, जबकि भाजपा ने इन आरोपों को राजनीतिक प्रेरित बताते हुए कहा कि तथ्यों की निष्पक्ष जांच के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। फिलहाल यह विषय राजनीतिक विमर्श और सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बना हुआ है तथा विभिन्न पक्ष अपने-अपने तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मध्यप्रदेश का यह विवाद केवल एक व्यक्ति या एक रिपोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शासन की पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास से जुड़ा व्यापक प्रश्न भी बन गया है। भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगाती रही है तथा स्वयं को अपेक्षाकृत स्वच्छ प्रशासन देने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती रही है। ऐसे में विपक्ष का कहना है कि यदि किसी भी स्तर पर गंभीर आरोप सामने आते हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की आवश्यकता है। दूसरी ओर भाजपा का तर्क है कि मीडिया रिपोर्ट अथवा राजनीतिक आरोप किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध नहीं करते और अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए। यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम पर राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। राजनीतिक विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि वर्तमान समय में किसी भी सरकार की विश्वसनीयता केवल चुनावी सफलता से नहीं बल्कि आरोपों के प्रति उसकी प्रतिक्रिया, जांच की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से भी तय होती है। इसलिए मध्यप्रदेश का यह मामला आने वाले समय में केवल राजनीतिक नहीं बल्कि प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इसी बीच उत्तर प्रदेश से जुड़ा एक अन्य घटनाक्रम देशभर में चर्चा का विषय बना, क्योंकि यह सीधे अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि मंदिर के दान प्रबंधन से जुड़ा हुआ था। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और न्यायालय में प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर यह विषय सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना। आरोप लगाए गए कि मंदिर में प्राप्त होने वाले चढ़ावे के प्रबंधन में अनियमितताओं की आशंका है तथा इस संबंध में कुछ कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई भी की गई। मामले के सार्वजनिक होने के बाद मंदिर प्रबंधन, प्रशासन और राज्य सरकार की भूमिका पर लगातार प्रश्न उठने लगे। राम मंदिर केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकों में से एक माना जाता है। वर्षों तक चले आंदोलन, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और मंदिर निर्माण के बाद यह स्थान करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन चुका है। इसलिए किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता का आरोप सामान्य प्रशासनिक विषय से कहीं अधिक संवेदनशील माना गया। विभिन्न समाचार रिपोर्टों के अनुसार जांच एजेंसियों ने मामले की पड़ताल प्रारंभ की तथा संबंधित प्रक्रियाओं की समीक्षा की जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी प्रश्न खड़ा किया कि इतने बड़े धार्मिक संस्थानों में दान प्रबंधन की प्रणाली कितनी पारदर्शी और आधुनिक होनी चाहिए।
इस पूरे विवाद के राजनीतिक प्रभाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं माने जा रहे। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहचान कानून-व्यवस्था और सख्त प्रशासनिक निर्णयों के कारण बनी है। ऐसे में विपक्ष लगातार यह प्रश्न उठा रहा है कि यदि मंदिर प्रबंधन से जुड़े मामलों में अनियमितताओं के आरोप सामने आते हैं तो सरकार की प्रतिक्रिया उतनी ही कठोर और पारदर्शी होनी चाहिए जितनी अन्य मामलों में देखने को मिलती है। दूसरी ओर भाजपा का कहना है कि कानून अपना कार्य कर रहा है और किसी भी दोषी को केवल उसके पद या पहचान के आधार पर संरक्षण नहीं दिया जाएगा। इस बीच यह मामला न्यायिक प्रक्रिया तक भी पहुंचा और संबंधित जांच एजेंसियों द्वारा आवश्यक कार्रवाई जारी रहने की जानकारी सामने आई। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह विवाद केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर के प्रमुख धार्मिक संस्थानों में वित्तीय प्रबंधन की व्यवस्था पर भी व्यापक चर्चा शुरू कर चुका है। आस्था और प्रशासन के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए तथा श्रद्धालुओं के विश्वास को किस प्रकार सुरक्षित रखा जाए, यही अब इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष माना जा रहा है।
उत्तराखंड से सामने आया तीसरा घटनाक्रम भी कम महत्वपूर्ण नहीं माना गया क्योंकि यह सीधे देश के सबसे प्रतिष्ठित तीर्थस्थलों में शामिल बदरीनाथ धाम से जुड़ा था। चारधाम यात्रा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं बल्कि उत्तराखंड की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवनरेखा भी मानी जाती है। प्रत्येक वर्ष लाखों श्रद्धालु बदरीनाथ और केदारनाथ धाम पहुंचते हैं, जिससे राज्य की पर्यटन अर्थव्यवस्था, होटल व्यवसाय, परिवहन, स्थानीय व्यापार और हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी रहती है। ऐसे में जब एक सामाजिक संगठन भैरव सेना ने प्रेस वार्ता के माध्यम से बदरीनाथ धाम में दान प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल उठाए, तब यह मामला तेजी से सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया। प्रारंभिक स्तर पर श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) की ओर से आरोपों को गंभीरता से स्वीकार नहीं किए जाने की बातें सामने आईं, लेकिन बाद में उपलब्ध रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज की समीक्षा के बाद समिति ने स्वयं पुलिस को सूचना दी। इसके बाद जांच आगे बढ़ी और पुलिस की विशेष जांच टीम ने समिति के कर्मचारी प्रमोद नौटियाल को गिरफ्तार कर न्यायिक प्रक्रिया के तहत अदालत में प्रस्तुत किया। यह पूरा घटनाक्रम इसलिए अधिक संवेदनशील माना गया क्योंकि बीकेटीसी केवल बदरीनाथ और केदारनाथ ही नहीं बल्कि उत्तराखंड के अनेक प्रमुख मंदिरों के प्रशासन, धार्मिक गतिविधियों और सामाजिक सेवाओं का संचालन करती है। इस समिति के माध्यम से धार्मिक दान का उपयोग धर्मशालाओं, भंडारों, शिक्षा, सेवा और अन्य जनकल्याणकारी गतिविधियों में किया जाता है। इसलिए इस घटना ने केवल उत्तराखंड ही नहीं बल्कि देशभर के धार्मिक प्रबंधन तंत्र को अपनी व्यवस्थाओं की समीक्षा करने के लिए प्रेरित किया।
इन घटनाओं के सामने आने के बाद देश के अनेक प्रमुख मंदिर प्रबंधन भी सतर्क दिखाई दिए। आंध्र प्रदेश के तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट ने दान संग्रह, नकदी सुरक्षा, सीसीटीवी निगरानी, डिजिटल रिकॉर्डिंग और कर्मचारियों की जवाबदेही को लेकर अपनी प्रक्रियाओं की समीक्षा की तथा विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए। इसी प्रकार कर्नाटक सरकार ने भी अपने प्रशासनिक दायरे में आने वाले प्रमुख मंदिरों के लिए सुरक्षा और पारदर्शिता संबंधी दिशा-निर्देशों को और मजबूत बनाने की पहल की। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक समय में करोड़ों रुपये के दान का प्रबंधन पारंपरिक व्यवस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जिस प्रकार बैंकिंग व्यवस्था में प्रत्येक लेन-देन का रिकॉर्ड, दोहरी निगरानी, नियमित ऑडिट, डिजिटल ट्रैकिंग और जवाबदेही की स्पष्ट प्रणाली होती है, उसी प्रकार धार्मिक संस्थानों में भी ऐसी व्यवस्थाओं की आवश्यकता महसूस की जा रही है। यदि मंदिरों में प्रतिदिन लाखों रुपये का चढ़ावा प्राप्त हो रहा है तो उसके सुरक्षित संग्रहण, लेखा परीक्षण और उपयोग के लिए आधुनिक तकनीक तथा स्वतंत्र निगरानी प्रणाली विकसित करना समय की मांग है। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता केवल अनियमितताओं को रोकने का माध्यम नहीं बल्कि श्रद्धालुओं के विश्वास को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी उपाय भी है।
देश में मंदिरों के दान प्रबंधन को लेकर समय-समय पर उठे विवाद नए नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध विंध्याचल माता मंदिर में भी अतीत में चढ़ावे के बंटवारे को लेकर कई बार विवाद और हिंसक घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ऐसे उदाहरण यह संकेत देते हैं कि जहां बड़ी मात्रा में नकदी और दान का प्रवाह होता है, वहां मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था का होना अत्यंत आवश्यक है। यही कारण है कि अब धार्मिक संस्थानों में केवल श्रद्धा के आधार पर नहीं बल्कि पेशेवर वित्तीय प्रबंधन, नियमित ऑडिट, सीसीटीवी निगरानी, डिजिटल भुगतान, बारकोड आधारित दान रसीद और स्वतंत्र निरीक्षण जैसी व्यवस्थाओं पर गंभीर चर्चा हो रही है। अनेक प्रशासनिक विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि धार्मिक संस्थानों की पवित्रता बनाए रखने के लिए केवल दोषियों को दंडित करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ऐसी प्रणाली विकसित करनी होगी जिसमें भविष्य में किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता की संभावना न्यूनतम रह जाए। यदि दान देने वाला श्रद्धालु यह विश्वास महसूस करेगा कि उसकी अर्पित राशि पूरी पारदर्शिता के साथ धर्म और समाज के हित में उपयोग हो रही है, तभी मंदिरों की सामाजिक विश्वसनीयता और मजबूत होगी। इसलिए इन घटनाओं ने पूरे देश में धार्मिक संस्थानों के वित्तीय प्रशासन पर नई बहस को जन्म दिया है।
भारत की सांस्कृतिक परंपरा में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं रहे बल्कि वे सामाजिक जीवन के महत्वपूर्ण केंद्र भी रहे हैं। प्राचीन काल से ही बड़े मंदिरों के आसपास नगर विकसित हुए, व्यापार बढ़ा, कला और संस्कृति को संरक्षण मिला तथा शिक्षा और सेवा कार्यों को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारधाम, देशभर में स्थित बारह ज्योतिर्लिंग, इक्यावन शक्तिपीठ और सप्तपुरियों जैसी धार्मिक परंपराओं ने केवल आध्यात्मिक चेतना ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता को भी मजबूत किया। किसी भी बड़े मंदिर के आसपास होटल, परिवहन, प्रसाद, धार्मिक सामग्री, हस्तशिल्प, फूल, स्थानीय बाजार, गाइड सेवा और छोटे व्यवसायों का विशाल नेटवर्क विकसित हो जाता है। यही व्यवस्था आज “मंदिर इको-सिस्टम” के रूप में भी समझी जाती है। इस व्यवस्था से लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। यदि किसी प्रमुख मंदिर की प्रतिष्ठा पर प्रश्न उठते हैं तो उसका प्रभाव केवल मंदिर तक सीमित नहीं रहता बल्कि उससे जुड़े व्यापार, पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और हजारों परिवारों की आजीविका पर भी पड़ सकता है। इसलिए धार्मिक संस्थानों की पारदर्शिता का प्रश्न केवल आस्था तक सीमित नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है।
इसी पृष्ठभूमि में मंदिरों के सरकारी नियंत्रण का विषय भी एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया है। कई हिन्दू संगठन लंबे समय से यह मांग करते रहे हैं कि प्रमुख हिन्दू मंदिरों के प्रशासन और वित्तीय प्रबंधन में सरकारी हस्तक्षेप कम किया जाए तथा उन्हें अधिक स्वायत्तता प्रदान की जाए। उनका तर्क है कि मंदिरों में आने वाला दान धार्मिक और सामाजिक कार्यों पर ही खर्च होना चाहिए तथा प्रबंधन धार्मिक संस्थाओं के हाथ में होना चाहिए। दूसरी ओर कुछ प्रशासनिक विशेषज्ञों का मत है कि जहां सार्वजनिक दान की राशि अत्यधिक हो, वहां पारदर्शिता, ऑडिट और नियामक निगरानी भी आवश्यक है। इसी विषय से संबंधित विभिन्न याचिकाएं वर्षों से न्यायालयों में विचाराधीन हैं। वर्ष 2012 में दायर याचिकाओं से शुरू हुई यह बहस बाद के वर्षों में और व्यापक हुई तथा विभिन्न राज्यों से भी इस प्रकार की मांगें सामने आईं। सर्वोच्च न्यायालय में भी इस विषय पर समय-समय पर सुनवाई होती रही है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में न्यायालय को धार्मिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता के बीच संतुलन स्थापित करने वाला कोई ऐसा मॉडल तलाशना पड़ सकता है जो सभी पक्षों के हितों की रक्षा कर सके। हाल के विवादों ने इस बहस को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है।
राजनीतिक स्तर पर भी इन घटनाओं ने व्यापक प्रतिक्रिया उत्पन्न की है। कांग्रेस ने इन मामलों को आधार बनाते हुए धार्मिक संस्थाओं में अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और व्यापक निगरानी व्यवस्था की आवश्यकता पर बल दिया है। वहीं भाजपा का कहना है कि किसी भी प्रकार की अनियमितता को कानून के दायरे में लाया जाएगा तथा दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई होगी, लेकिन अलग-अलग विषयों को राजनीतिक दृष्टि से जोड़कर देखना उचित नहीं है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह जारी हैं, किंतु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का है। यदि मंदिरों की प्रतिष्ठा और पवित्रता को अक्षुण्ण बनाए रखना है तो केवल विवादों पर प्रतिक्रिया देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि दान प्रबंधन की आधुनिक प्रणाली, नियमित ऑडिट, डिजिटल रिकॉर्ड, स्वतंत्र निगरानी और समयबद्ध जांच जैसी व्यवस्थाओं को स्थायी रूप से लागू करना होगा। वर्तमान घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि धार्मिक संस्थानों की विश्वसनीयता केवल आस्था से नहीं बल्कि पारदर्शी प्रशासन से भी जुड़ी हुई है। आने वाले समय में उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और उत्तराखंड में इन मामलों की जांच, न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक सुधार किस दिशा में आगे बढ़ते हैं, इस पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहेंगी। इतना निश्चित है कि इन घटनाओं ने धर्म, राजनीति, प्रशासन और जनविश्वास के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को पहले से कहीं अधिक गंभीरता के साथ राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।





