spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeउत्तराखंडधर्म के नाम पर सियासत का सच मर्यादा से सत्ता तक बदलते...

धर्म के नाम पर सियासत का सच मर्यादा से सत्ता तक बदलते भारत की कड़वी तस्वीर

आस्था, नैतिकता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर उठते गंभीर सवालों के बीच यह विश्लेषण बताता है कि कैसे राजनीतिक स्वार्थ, नारों की राजनीति और धार्मिक प्रतीकों के बढ़ते इस्तेमाल ने सामाजिक चेतना, संवाद और मानवीय मर्यादाओं को गहरे संकट में डाल दिया है।

भारत(सुनील कोठारी)। आधुनिक राजनीति और सत्ता के गलियारों में धर्म को हथियार बनाने की होड़ पर आज देश के प्रबुद्ध समाज ने एक तीखा और गंभीर प्रहार किया है। वर्तमान समय में वैचारिक शून्यता और नारों के शोर के बीच मर्यादा की परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। जानकारों का कहना है कि जो लोग खुद को एक विशेष विचारधारा का संवाहक बताते हैं, वे वास्तव में किसी परम शक्ति को स्थापित करने नहीं, बल्कि जनभावनाओं का दोहन कर राजसिंहासन तक पहुँचने का मार्ग तलाश रहे थे। जनसमुदाय को केवल एक वोट बैंक और भीड़ के रूप में देखा गया, जिसका उपयोग जयघोष की गूँज पैदा करने के लिए किया गया। इस पूरी राजनीतिक बिसात पर जब गहराई से विचार किया जाता है, तो स्पष्ट होता है कि श्रद्धा के केंद्र कभी भी इस सत्तालोभी योजना का हिस्सा थे ही नहीं। वह पावन चेतना तो आज भी शबरी की झोपड़ी, केवट की नाव, भरत की लंबी प्रतीक्षा और हनुमान की अटूट निष्ठा में जीवंत है, जिसे महलों के वैभव से कभी नहीं बांधा जा सका।

बाजारवाद और आधुनिक प्रचार तंत्र ने समाज की सोचने-समझने की शक्ति को इस कदर कुंद कर दिया है कि अब केवल विवेकहीन नारों की गूँज सुनाई देती है। जब धर्म का व्यवसायीकरण हो जाता है, तब मर्यादा और आत्मिक शांति के स्थान पर केवल बड़े-बड़े कट-आउट, चमचमाते माइक, और कैमरों की चकाचौंध मुख्य मंच पर काबिज हो जाती है। विश्लेषकों का मानना है कि इस भयंकर कोलाहल में वह मूल सौम्य आवाज़ कहीं दबकर रह गई है, जो कभी मानवीय मूल्यों का आधार हुआ करती थी। भव्य निर्माण कार्यों के दावों के बीच जब यह सवाल उठता है कि क्या मानव के भीतर का मन भी सुधर पाया है, तो उत्तर में केवल एक रहस्यमयी खामोशी या फिर से वही पुराना शोर मिलता है। दीपों की कतारों से शहर तो जगमगा उठे, लेकिन इंसानी दिलों के भीतर पसरा हुआ अंधकार और ईर्ष्या का भाव आज भी वैसा ही बना हुआ है, जो हमारी सामूहिक प्रगति पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

इतिहास की किताबों को बदलने और नए दावों को पेश करने की इस रेस में वर्तमान की कड़वी हकीकत को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है। आज समाज में असहमति जताने वाले हर प्रबुद्ध नागरिक से यह तीखा और विभाजनकारी सवाल पूछा जाता है कि वह उस परम सत्ता के पक्ष में है या विपक्ष में, जो अपने आप में बेहद हास्यास्पद और विचित्र है। कोई भी दिव्य शक्ति किसी एक दल, झंडे, चेहरे या राजनीतिक संगठन की बपौती कैसे हो सकती है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का कण-कण है। वह शक्ति तो तब भी उतनी ही गरिमामय थी जब वह राजमहल के ऐशो-आराम को त्यागकर जंगलों की खाक छान रही थी, और तब भी वैसी ही रही जब उसके पास कोई मुकुट या राजसिंहासन नहीं था। आज के दौर में वैचारिक संवाद पूरी तरह दम तोड़ चुके हैं, और उनकी जगह केवल अंधभक्ति और ध्रुवीकरण ने ले ली है, जिससे समाज का ताना-बाना बिखर रहा है।

सच्ची मर्यादा कभी भी ईंट, पत्थरों या भव्य निर्माणों से नहीं आंकी जा सकती, बल्कि इसका सीधा संबंध मनुष्य के आचरण, व्यवहार और उसकी ईमानदारी से होता है। भव्य शिखरों से कहीं अधिक ऊँचा स्थान मानवीय विश्वास का होता है, और यह विश्वास किसी भय या डराने-धमकाने से नहीं, बल्कि एक पूरी तरह स्वतंत्र और निर्भीक मन से पैदा होता है। जब किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जायज सवाल पूछना एक बहुत बड़ा अपराध मान लिया जाए, तो समझ लेना चाहिए कि सत्ता के पास मौजूद उत्तर बेहद कमजोर और खोखले हो चुके हैं। जब तार्किक बहसों पर अंधाधुंध नारे भारी पड़ने लगें, तो यह स्पष्ट संकेत है कि देश में केवल भीड़ का आकार बढ़ा है, लेकिन एक जागरूक और संवेदनशील समाज का पतन हो चुका है। जब परमेश्वर के पवित्र नाम का सहारा लेकर इंसान को ही छोटा और प्रताड़ित किया जाने लगे, तो वहाँ अध्यात्म नहीं, बल्कि केवल अहंकार और घमंड का बोलबाला होता है।

परम चेतना की वास्तविक परिभाषा किसी चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा बनना, भाषणों की लोकलुभावन पंक्तियाँ तैयार करना या किसी पीआर एजेंसी की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा होना कतई नहीं है। वह तो वास्तव में उस पावन क्षण का नाम है जब असीमित शक्ति और अधिकार होने के बावजूद एक इंसान पूरी विनम्रता के साथ केवल न्याय का मार्ग चुनता है। जब किसी से प्रतिशोध लेना पूरी तरह संभव हो, फिर भी मनुष्य अपने भीतर की करुणा को जगाकर क्षमा को प्राथमिकता देता है, वही असली दिव्यता है। आज के इस दौर में पत्थरों के ऊंचे-ऊंचे ढांचे खड़े करना और नारे लगाना तो बेहद आसान काम है, लेकिन अपने चरित्र को मर्यादा के सांचे में ढालना और वैचारिक शुद्धता को बनाए रखना सबसे कठिन चुनौती बन गया है। आज संकट किसी और का नहीं, बल्कि हमारी खुद की गिरती हुई नैतिक सीमाओं और बिकते हुए मानवीय मूल्यों का है।

वैश्विक बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के इस आधुनिक दौर में जब अध्यात्म की मूल आत्मा को ही विज्ञापनों और ब्रांडिंग के जरिए बेचने का कुत्सित प्रयास होने लगे, तो यह मान लेना चाहिए कि समाज का नैतिक पतन अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका है। आज की इस चकाचौंध भरी व्यवस्था में जहाँ हर संवेदना बिकाऊ हो चुकी है, वहाँ परम सत्ता की ओट में केवल व्यक्तिगत स्वार्थों की रोटियाँ सेंकी जा रही हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि जब तक आम नागरिक नारों के इस कृत्रिम सम्मोहन से बाहर निकलकर आचरण की शुद्धता, आपसी भाईचारे और व्यवस्था से तीखे सवाल पूछने की अपनी लोकतांत्रिक हिम्मत को दोबारा वापस नहीं लाएगा, तब तक यह शोर केवल बढ़ता ही जाएगा। आज इतिहास के पन्नों को पलटने से ज्यादा जरूरत वर्तमान की जर्जर हो चुकी सामाजिक व्यवस्था को सुधारने की है। जब तक शबरी की झोपड़ी में रहने वाले शोषितों को न्याय नहीं मिलता, जब तक केवट की नाव जैसे हाशिए पर खड़े समाज को सम्मान नहीं मिलता, और जब तक हनुमान जैसी निश्छल सेवा भावना हर नागरिक के भीतर नहीं जागती, तब तक पत्थरों के ऊंचे शिखर केवल खोखले वैभव का प्रतीक मात्र बने रहेंगे, जिसके पीछे की कड़वी हकीकत हमेशा देश को कचोटती रहेगी।

संबंधित ख़बरें
स्वच्छ, सुंदर और विकसित काशीपुर के संकल्प संग गणतंत्र दिवस

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!