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उर्वशी दत्त बाली ने बताया परिवार और करियर संतुलन ही सफल नारी की सच्ची पहचान

उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि आधुनिक महिला की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल ऊंचा मुकाम हासिल करना नहीं, बल्कि परिवार, रिश्तों, व्यवसाय और सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन बनाकर हर भूमिका को गरिमा, आत्मविश्वास और समर्पण के साथ निभाना है।

काशीपुर। औद्योगीकरण और आधुनिकता की इस तेज रफ्तार दौड़ में आज देश भर के प्रबुद्ध समाज के भीतर यह यक्ष प्रश्न अत्यंत तीव्रता के साथ बार-बार उछाला जाता है कि एक कामकाजी नारी को अपने स्वर्णिम भविष्य के लिए चमचमाते करियर का चुनाव करना चाहिए अथवा उसे अपने भरे-पूरे कुनबे की सुख-शांति को तरजीह देनी चाहिए। इसी ज्वलंत और बेहद संवेदनशील विषय पर काशीपुर की सुप्रसिद्ध एवं समाजसेविका उर्वशी दत्त बाली ने अपने गहन अनुभवों के आधार पर एक बेहद लीक से हटकर और क्रांतिकारी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है, जो समाज की सोच को एक नई दिशा देने का माद्दा रखता है। उनका स्पष्ट रूप से मानना है कि वर्तमान युग में वास्तविक रूप से कामयाब और गौरवशाली कामकाजी स्त्री केवल वही कही जा सकती है, जो अपनी पेशेवर व्यस्तताओं, सामाजिक सरोकारों और घर-आंगन की गंभीर जिम्मेदारियों के बीच एक अत्यंत सुरुचिपूर्ण व आदर्श संतुलन स्थापित करने की अद्भुत कला में पारंगत होती है। जीवन के उतार-चढ़ावों को बेहद करीब से देखने वाली इस विदुषी महिला ने साफ किया कि करियर और गृहस्थी को कभी भी एक-दूसरे का धुर विरोधी नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि ये दोनों तो एक ही रथ के दो अत्यंत महत्वपूर्ण पहिए हैं जो जीवन को सार्थकता प्रदान करते हैं।

अपने स्वयं के व्यक्तिगत और बेहद प्रेरणादायी जीवन सफर के पन्नों को अत्यंत सादगी के साथ समाज के सामने खोलते हुए उर्वशी दत्त बाली ने इस बात को पूरी शिद्दत से स्वीकार किया कि उन्होंने अपने पूरे जीवन चक्र में सदैव अपने कुनबे और वैवाहिक रिश्तों को ही अपनी सर्वाेच्च प्राथमिकताओं में शीर्ष स्थान पर रखा। उन्होंने न केवल अपने जीवनसाथी के व्यावसायिक उपक्रमों और व्यापारिक गतिविधियों में कंधे से कंधा मिलाकर रात-दिन काम किया, बल्कि इसके साथ ही अपने घर की चारदीवारी के भीतर की समस्त घरेलू व्यवस्थाओं और अपनी लाडली बेटी की परवरिश व उसकी शिक्षा-दीक्षा की गंभीर जवाबदेही को भी अत्यंत कुशलता और ममता के साथ निभाया। इतना ही नहीं, इन तमाम घरेलू और व्यावसायिक व्यस्तताओं के बीच से भी उन्होंने समय निकालकर सामाजिक सरोकारों के क्षेत्र में अपनी बेहद सक्रिय, सशक्त और अर्थपूर्ण भागीदारी निरंतर बनाए रखी, जिसने उन्हें समाज में एक विशिष्ट पहचान दिलाई। जब उनके पतिदेव ने सार्वजनिक जीवन और सक्रिय राजनीति के क्षेत्र में अपने कदम आगे बढ़ाए, तब भी वे एक ढाल की तरह हर कठिन मोड़ पर और हर ऐतिहासिक कदम पर उनके साथ पूरी मजबूती और निष्ठा के साथ खड़ी रहीं। उन्होंने अपने जीवन की किसी भी एक भूमिका या दायित्व को पूरा करने के लिए अपनी किसी दूसरी भूमिका या कर्तव्य की कभी भी अनदेखी अथवा उपेक्षा नहीं की, क्योंकि उनका अटूट विश्वास है कि एक संपूर्ण नारी के रूप में हर किरदार का अपना एक अनूठा और बेहद पवित्र महत्व होता है।

वैवाहिक जीवन के गूढ़ और व्यावहारिक दर्शन को अत्यंत सरल शब्दों में समझाते हुए इस समाजसेविका ने एक बेहद खूबसूरत बात कही कि सात फेरों के बंधन में बंधने के पश्चात एक स्त्री और पुरुष केवल पारंपरिक पति-पत्नी ही नहीं रह जाते, बल्कि वे दोनों जीवन की हर जंग को मिलकर जीतने वाली एक बेहद मजबूत और अटूट टीम में तब्दील हो जाते हैं। जब इस अनूठी टीम के दोनों सम्मानित सदस्य एक-दूसरे की आंतरिक भावनाओं का, उनकी व्यक्तिगत गरिमा का आदर करते हैं और एक-दूसरे के आंखों में तैरने वाले सुनहरे सपनों को हकीकत में बदलने के लिए जी-जान से साथ देते हैं, तभी वह कुनबा भी तरक्की के पथ पर आगे बढ़ता है और उसी से एक आदर्श समाज का निर्माण भी संभव हो पाता है। इस पूरी व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाने और समझौता करने की यह जिम्मेदारी किसी एक पक्ष पर नहीं होती, बल्कि यह दोनों ही तरफ से अत्यंत सहयोगात्मक रूप से और पूरे खुले दिल से की जानी चाहिए। वे इस भ्रामक और रूढ़िवादी धारणा को सिरे से खारिज करती हैं कि एक आत्मनिर्भर अथवा कामकाजी महिला बनने का अनिवार्य अर्थ यह होता है कि उसे अपने सुखी घर-बार की सुख-शांति को पूरी तरह से तिलांजलि दे देनी चाहिए या उसे अपने बच्चों की उपेक्षा करनी चाहिए।

इसी विचार को एक दूसरे और बेहद सकारात्मक दृष्टिकोण से देखते हुए उर्वशी दत्त बाली का यह भी बहुत दृढ़ता के साथ मानना है कि दिन-रात घर की चारदीवारी को अपनी ममता से स्वर्ग बनाने वाली एक समर्पित गृहणी भी किसी भी मायने में कॉर्पाेरेट जगत में काम करने वाली किसी बड़ी कामकाजी महिला से कमतर या छोटी नहीं आंकी जा सकती। दुनिया के हर एक परिवार की आंतरिक और बाहरी परिस्थितियां, उनकी आर्थिक जरूरतें और सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह से भिन्न और अपने आप में अनोखा होता है, यही कारण है कि इस संसार की प्रत्येक नारी अपनी बुद्धिमत्ता और प्राथमिकताओं के आधार पर अपने जीवन का मार्ग स्वयं पूरी स्वतंत्रता के साथ तय करती है। वास्तविक रूप से जीवन की सबसे बड़ी और सच्ची कामयाबी केवल इसी बात में निहित है कि यदि हम अपनी बेहद व्यस्त दिनचर्या के बीच अपने प्यारे परिवार, अपने अमूल्य और नाजुक रिश्तों तथा अपनी आँखों में पलने वाले व्यक्तिगत सपनों के बीच एक अत्यंत सामंजस्यपूर्ण और अटूट संतुलन स्थापित करने में सफल हो जाते हैं। यह संतुलन ही एक महिला के अंतर्मन को असीम शांति प्रदान करता है और उसे समाज में सम्मान दिलाता है।

भारत की सदियों पुरानी और अत्यंत गौरवशाली सनातनी संस्कृति तथा समृद्ध परंपराओं का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए उर्वशी दत्त बाली कहा कि हमारी सभ्यता ने हमें हमेशा से ही संयुक्त परिवार के महत्व, पारस्परिक सहयोग की भावना और एक-दूसरे के प्रति अपनी पवित्र जिम्मेदारियों का निर्वहन करना सिखाया है। उनके व्यक्तिगत जीवन दर्शन में उनका अपना परिवार केवल एक सामाजिक या कानूनी जिम्मेदारी मात्र नहीं है, बल्कि वह उनकी आंतरिक ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत और उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी ताकत बनकर हमेशा उनके साथ रहा है। इसी पारिवारिक शक्ति, अपनों के अगाध प्रेम और बड़ों के आशीर्वाद ने उन्हें हर कठिन परिस्थिति में अपने बड़े से बड़े सपनों को पूरा करने का एक अद्भुत, अटूट और कभी न डगमगाने वाला आत्मविश्वास प्रदान किया है। जब अपनों का साथ होता है, तो दुनिया की कोई भी चुनौती बड़ी नहीं लगती और सफलता के शिखर पर पहुंचना अत्यंत सुगम हो जाता है।

अपने प्रेरणादायी विचारों की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए वे हमेशा इसी एक मूलमंत्र पर अपनी पूरी आस्था रखती हैं कि इंसान के जीवन में सबसे पहले उसका परिवार आना चाहिए, उसके पश्चात उसका करियर और इन दोनों के साथ-साथ समाज के प्रति उसका एक निश्चित उद्देश्य भी समानांतर रूप से चलते रहना चाहिए। जब आपका अपना घर और आपके अपने लोग आपकी सबसे बड़ी रीढ़ की हड्डी और आपका सबसे मजबूत सपोर्ट सिस्टम बनकर आपके पीछे खड़े हो जाते हैं, तब आप दुनिया के किसी भी कठिन से कठिन सपने को बेहद आसानी से हकीकत में तब्दील कर सकते हैं और इसके साथ ही आप समाज की अन्य तमाम नारियों के लिए भी एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं। उर्वशी दत्त बाली अत्यंत आत्मीयता के साथ कहती हैं कि इंसानी जीवन की वास्तविक और सच्ची सफलता केवल वही मानी जा सकती है, जिसमें आपके काम की प्रगति के साथ-साथ आपका पूरा परिवार भी अत्यधिक खुश हो, आपका व्यवसाय भी दिन-दूनी रात-चौगुनी उन्नति करे और आपके इन तमाम निस्वार्थ प्रयासों से समाज के भीतर भी एक बेहद सकारात्मक, रचनात्मक और सुंदर बदलाव धरातल पर साफ दिखाई देने लगे।

नारी जीवन के इस खूबसूरत ताने-बाने को समेटते हुए उन्होंने बेहद तार्किक ढंग से स्पष्ट किया कि परिवार और करियर कभी भी एक-दूसरे की राह के रोड़े या एक-दूसरे के घोर विरोधी नहीं होते, बल्कि इन दोनों के बीच के महीन धागे को बस थोड़ा सा गहराई से और ठंडे दिमाग से समझने की सख्त जरूरत होती है। एक स्त्री को बस अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए अपने पूरे कुनबे की रजामंदी, अपनों का अटूट विश्वास और परिवार की आपसी सहमति को हमेशा अपने साथ लेकर आगे बढ़ने का हुनर आना चाहिए। उनके अनुसार जो महिला इस बेहद नाजुक मगर बेहद मजबूत धागे को बखूबी संभाल लेती है, बस वही इस आधुनिक संसार की एक बेहद सफल, संस्कारी और आदर्श गृहणी के रूप में समाज के सर्वाेच्च पटल पर स्थापित होती है और पूजी जाती है।

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