काशीपुर। महानगर कांग्रेस कमेटी की जिला अध्यक्ष अलका पाल के नेतृत्व में कांग्रेसियों ने उपवास रख गांधीवादी तरीके से विरोध व्यक्त किया । स्थानीय गिरीताल मंदिर परिसर में आयोजित इस विशाल और आक्रामक विरोध प्रदर्शन के दौरान समूचा वातावरण राजनीतिक नारों और सरकार विरोधी सुरों से गूंज उठा, जिसने उत्तराखंड की देवभूमि में एक अभूतपूर्व सियासी हलचल पैदा कर दी है। विपक्ष ने सत्ताधारी दल के खिलाफ बेहद गंभीर और तीखे आरोप लगाते हुए सीधे तौर पर मोर्चा खोल दिया है। इस उपवास कार्यक्रम के माध्यम से एकत्रित हुए कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने धार्मिक स्थलों पर हुई कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर शासन-प्रशासन की चूलें हिलाने का संकल्प लिया है। देश की आस्था के सबसे बड़े प्रतीकों पर लगे इन गंभीर लांछनों ने अब एक ऐसा विकराल रूप धारण कर लिया है, जो आने वाले समय में राज्य और देश की राजनीति की दिशा तय करने की पूरी क्षमता रखता है। इस ऐतिहासिक और झकझोर देने वाले सत्याग्रह ने न केवल काशीपुर बल्कि पूरे राज्य के जागरूक नागरिकों का ध्यान अपनी ओर बेहद मजबूती से खींचा है।
इस बड़े राजनैतिक घटनाक्रम के मुख्य आकर्षण और विरोध के केंद्र बिंदु को अगर बारीक नजर से देखा जाए, तो इस विरोध प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य देश के सबसे संवेदनशील और आस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरना था। विपक्ष के दिग्गज नेता इस समय सत्तापक्ष को पूरी तरह से घेरने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। जब अलका पाल जैसी जुझारू और मुखर नेत्री के नेतृत्व में सैकड़ों की तादाद में कांग्रेसी दिग्गज इस पावन स्थल पर धरने पर बैठे, तो यह साफ हो गया कि विपक्ष अब चुप बैठने के मूड में बिल्कुल भी नहीं है। उन्होंने इस पूरे प्रकरण को एक सुनियोजित और बड़े स्तर का घोटाला करार दिया है, जिसमें सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों और उनके वैचारिक संगठनों की मिलीभगत होने का संगीन आरोप लगाया गया है। इस तीखे और बेहद सनसनीखेज मुद्दे ने काशीपुर के शांत वातावरण में एक जबरदस्त सियासी उबाल ला दिया है जिससे स्थानीय प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं।
गिरिताल मंदिर परिसर की पवित्र भूमि इस समय एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक राजनीतिक रणक्षेत्र में तब्दील हो चुकी है, जहां महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को आत्मसात करते हुए विपक्षी नेताओं ने मौन और अन्न त्याग का कठिन मार्ग चुना। इस बेहद गंभीर उपवास के दौरान उपस्थित जनसमूह और पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए जिला अध्यक्ष ने सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी पर हमला बोलते हुए कहा कि जो दल खुद को धर्म और सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा रक्षक और ठेकेदार घोषित करता फिरता है, आज उसी के शासनकाल में देश के सबसे पावन और पूजनीय देवस्थानों की मर्यादा को तार-तार किया जा रहा है। वक्ताओं ने आरोप लगाते हुए कहा कि अयोध्या स्थित प्रभु श्री राम के भव्य और नवनिर्मित मंदिर परिसर से बहुमूल्य चढ़ावे की चोरी होना और साथ ही साथ उत्तराखंड के गौरवशाली बाबा केदारनाथ तथा भगवान बद्रीनाथ धाम में सोने की परतों और विशाल चढ़ावे में बड़े पैमाने पर हेराफेरी के जो मामले सामने आए हैं, वे बेहद शर्मनाक और असहनीय हैं। इन घटनाओं ने पूरी दुनिया में फैले करोड़ों सनातनी भक्तों के अटूट विश्वास और श्रद्धा को गहरी और कभी न भरने वाली चोट पहुंचाई है।
सत्याग्रह के इस मंच से नेताओं ने बेहद आक्रामक अंदाज में इस बात पर जोर दिया कि इन पावन तीर्थ स्थलों में होने वाले महाघोटालों के पीछे भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आर.एस.एस. के शीर्ष स्तर के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष संलिप्तता साफ तौर पर उजागर हो रही है। इस सनसनीखेज दावे ने स्थानीय जनता के बीच एक बहुत बड़ी बहस और विमर्श को जन्म दे दिया है, क्योंकि धर्म से जुड़े इस मामले में हर कोई सच जानना चाहता है। कांग्रेसियों का साफ तौर पर यह कहना है कि जब तक इन समस्त गंभीर और संदेहास्पद घोटालों की निष्पक्ष, पारदर्शी और उच्च स्तरीय न्यायिक जांच नहीं कराई जाती, तब तक उनका यह उग्र और शांतिपूर्ण आंदोलन किसी भी कीमत पर थमने वाला नहीं है। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि वे इस महाभ्रष्टाचार की सच्चाई को जनता की अदालत में ले जाकर ही दम लेंगे और इस मुद्दे पर किसी भी प्रकार का राजनीतिक समझौता या लीपापोती बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस दौरान उपस्थित कार्यकर्ताओं का जोश और आक्रोश देखने लायक था, जो अपनी पार्टी के झंडे थामे पूरी तरह मुस्तैद नजर आ रहे थे।

इस बड़े और व्यापक स्तर पर आयोजित विरोध कार्यक्रम की गूंज और मुख्य एजेंडा सोशल मीडिया और स्थानीय गलियारों में तेजी से प्रसारित हो रहा है, जिसने आम जनता के बीच भी तीव्र कौतूहल और तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा कर दी हैं। उपवास स्थल पर बैठी महिलाओं और युवाओं की भारी भीड़ इस बात का स्पष्ट संकेत दे रही है कि यह आंदोलन केवल एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे आम जनमानस का भी मूक समर्थन प्राप्त हो रहा है। कांग्रेस कमेटी के वक्ताओं ने एक के बाद एक तीखे प्रहार करते हुए सरकार की नीतियों और उसकी कथित भ्रष्टाचार-विरोधी छवि को पूरी तरह से कटघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि जो सरकार ज़ीरो टॉलरेंस का खोखला दावा करती थी, वह आज भगवान के घर में हो रही खुलेआम लूटपाट पर पूरी तरह से मौन साधे बैठी है, जो उसकी नीयत और संलिप्तता पर बहुत बड़ा और गंभीर सवालिया निशान लगाता है। इस गंभीर उपवास ने स्थानीय खुफिया तंत्र और प्रशासन को भी पूरी तरह से चौकन्ना रहने पर मजबूर कर दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम को अगर एक खोजी और निष्पक्ष पत्रकारिता के नजरिए से देखा जाए, तो काशीपुर महानगर कांग्रेस कमेटी द्वारा उठाया गया यह कदम आने वाले चुनावों के मद्देनजर एक बहुत बड़ा और मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष ने इस बार भाजपा को उसी के सबसे मजबूत गढ़ यानी धार्मिक राष्ट्रवाद के पिच पर घेरने की एक बहुत ही सोची-समझी और अचूक बिसात बिछाई है। राम मंदिर, केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे परम पूजनीय और राष्ट्रीय स्तर के संवेदनशील मुद्दों को एक साथ जोड़कर भ्रष्टाचार का आरोप लगाना सत्ताधारी दल के लिए एक बहुत बड़ी और बेहद असहज करने वाली चुनौती बन चुका है। उपवास पर बैठे नेताओं के चेहरों पर झलकता दृढ़ संकल्प और आक्रोश इस बात की गवाही दे रहा था कि वे इस लड़ाई को आखिरी अंजाम तक ले जाने के लिए पूरी तरह से मानसिक रूप से तैयार हैं। इस आंदोलन की गूंज अब राजधानी देहरादून से लेकर दिल्ली के सियासी गलियारों तक साफ तौर पर सुनाई देने लगी है।
आंदोलन के समापन की ओर बढ़ते हुए, जिला अध्यक्ष अलका पाल और उनके प्रमुख सहयोगियों ने एक सुर में यह संकल्प लिया कि यदि सरकार ने तत्काल प्रभाव से इन धार्मिक स्थलों के चढ़ावे और सोने की हेराफेरी के मामलों की स्वतंत्र जांच के आदेश नहीं दिए, तो इस आंदोलन की आग को पूरे उत्तराखंड के कोने-कोने में फैलाया जाएगा। उन्होंने कहा कि देवभूमि की पवित्रता और हमारे आराध्य देवी-देवताओं के सम्मान की रक्षा के लिए कांग्रेस का एक-एक सिपाही अपनी जान की बाजी लगाने से भी पीछे नहीं हटेगा। इस तरह काशीपुर के गिरिताल मंदिर परिसर से शुरू हुआ यह गांधीवादी उपवास अब एक बहुत बड़े और व्यापक जन-आंदोलन का रूप लेता हुआ प्रतीत हो रहा है, जिसने राज्य की वर्तमान व्यस्त राजनीति में एक अभूतपूर्व उबाल और हलचल पैदा कर दी है। आने वाले दिनों में देखना बेहद दिलचस्प और रोमांचक होगा कि सत्ताधारी दल इस बेहद तीखे, सीधे और तीखे राजनीतिक हमले का सामना किस प्रकार करता है और जनता इस पूरे मामले पर अपना क्या अंतिम फैसला सुनाती है।





