देहरादून। उत्तराखंड की सियासत के सबसे अनुभवी खिलाड़ी और कांग्रेस के दिग्गज चेहरा माने जाने वाले हरीश रावत का अचानक 15 दिनों के राजनीतिक अवकाश पर जाना राज्य की राजनीति में भूचाल की तरह देखा जा रहा है। देवभूमि के सियासी गलियारों में यह चर्चा आम हो गई है कि आखिर क्या वजह रही जो ‘हरदा’ जैसे ऊर्जावान नेता को आत्ममंथन या नाराजगी के नाम पर सक्रिय राजनीति से दूरी बनानी पड़ी। इसे महज एक विश्राम नहीं बल्कि कांग्रेस के भीतर धधक रही गुटबाजी और वर्चस्व की जंग का एक नया अध्याय माना जा रहा है। राज्य की जनता और पार्टी कार्यकर्ता इस बात से हैरान हैं कि जिस समय विपक्ष को एकजुट होकर सरकार को घेरना चाहिए, उस वक्त कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा अज्ञातवास जैसी स्थिति में है। जानकार बताते हैं कि हरीश रावत की यह खामोशी आने वाले समय में किसी बड़े सियासी तूफान का संकेत हो सकती है, क्योंकि उन्होंने अतीत में भी अपने फैसलों से कई बार पार्टी आलाकमान और विरोधियों को चौंकाया है।
इस पूरे नाटकीय प्रकरण के केंद्र में रामनगर के युवा और प्रभावशाली नेता संजय नेगी का नाम उभरकर सामने आया है, जिनकी घर वापसी को लेकर पार्टी के भीतर तलवारें खिंच गई हैं। विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि संजय नेगी की कांग्रेस में दोबारा ज्वाइनिंग को लेकर जो स्थितियां बनी और जिस तरह से उनके प्रवेश को लेकर खींचतान शुरू हुई, उसने हरीश रावत को मर्माहत कर दिया। बताया जा रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री चाहते थे कि संजय नेगी जैसे जमीनी पकड़ वाले नेता को पार्टी में स्थान मिले, लेकिन संगठन के भीतर ही कुछ वरिष्ठ नेताओं ने इस पर अड़ंगा लगा दिया। यही वह मुख्य बिंदु था जहाँ से विवाद की चिंगारी सुलगना शुरू हुई और अंततः हरीश रावत ने सार्वजनिक रूप से 15 दिनों के लिए राजनीति से दूर रहने का ऐलान कर दिया। यह मामला अब केवल एक नेता की ज्वाइनिंग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने कांग्रेस के सांगठनिक ढांचे और नेतृत्व की निर्णय क्षमता पर भी बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
सियासत की बिसात पर तब एक बेहद दिलचस्प मोड़ आया जब खुद संजय नेगी ने आगे बढ़कर इस गतिरोध को तोड़ने की कोशिश की और हरीश रावत के आवास पर उनसे मुलाकात करने जा पहुंचे। बंद कमरे में हुई इस लंबी और गोपनीय चर्चा के बाद जब संजय नेगी बाहर आए, तो उनके सुर पूरी तरह बदले हुए थे और उन्होंने ‘हरदा’ से अपना अवकाश खत्म करने का भावुक निवेदन किया। संजय नेगी ने मीडिया से मुखातिब होते हुए स्पष्ट कहा कि वह नहीं चाहते कि उनकी वजह से पार्टी के इतने बड़े कद के नेता को मानसिक कष्ट हो या उन्हें राजनीति से किनारा करना पड़े। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वह उत्तराखंड की जनता और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हित में अपनी सक्रियता फिर से बहाल करें। यह मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने यह संदेश दिया कि संजय नेगी स्वयं को विवाद का कारण नहीं बनने देना चाहते और वह पार्टी की मजबूती के लिए किसी भी समझौते को तैयार हैं।
अपने भविष्य के राजनीतिक कदम पर स्थिति स्पष्ट करते हुए संजय नेगी ने बड़ी ही परिपक्वता के साथ गेंद अब कांग्रेस आलाकमान के पाले में डाल दी है। उन्होंने साफ तौर पर ऐलान किया है कि उनकी पार्टी में वापसी को लेकर अब जो भी अंतिम निर्णय लिया जाएगा, वह पूरी तरह से संगठन के शीर्ष नेतृत्व और आलाकमान की मर्जी पर निर्भर होगा। संजय नेगी का कहना है कि वह कांग्रेस के एक अनुशासित सिपाही की तरह काम करना चाहते हैं और यदि पार्टी उनके प्रवेश को लेकर कोई सकारात्मक फैसला लेती है, तो वह उसका तहे दिल से सम्मान करेंगे। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि इस विवाद के कारण पार्टी की छवि को जो नुकसान पहुंच रहा है, उसे रोकना उनकी प्राथमिकता है। उनका यह बयान दर्शाता है कि वह अब सीधे टकराव की बजाय धैर्य और सांगठनिक प्रक्रिया के माध्यम से अपना स्थान वापस पाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, ताकि पार्टी के भीतर का कलह शांत हो सके।
इस विवाद ने कांग्रेस के भीतर की पुरानी गुटबाजी को एक बार फिर से हवा दे दी है, जहाँ हरक सिंह रावत, गोविंद सिंह कुंजवाल और हरीश धामी जैसे कद्दावर नेताओं ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं देकर माहौल को और गरमा दिया है। जहाँ गोविंद सिंह कुंजवाल और हरीश धामी जैसे नेता हरीश रावत को पार्टी का अपरिहार्य स्तंभ बता रहे हैं और उनके बिना कांग्रेस के अस्तित्व को लेकर चिंता जता रहे हैं, वहीं कुछ अन्य नेताओं का मानना है कि पार्टी किसी व्यक्ति विशेष के इर्द-गिर्द नहीं सिमटनी चाहिए। हरीश धामी ने तो यहाँ तक कह दिया कि हरीश रावत के बिना चुनाव मैदान में उतरना आत्मघाती हो सकता है, क्योंकि कार्यकर्ताओं में उनकी लोकप्रियता का कोई विकल्प नहीं है। दूसरी ओर, पार्टी के एक धड़े का तर्क है कि कांग्रेस एक विस्तृत विचार और संगठन है जहाँ सभी की भूमिका तय है, इसलिए व्यक्तिगत फैसलों का असर संस्थागत व्यवस्था पर नहीं पड़ना चाहिए।
इस पूरे सियासी ड्रामे पर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह ने बेहद नपे-तुले शब्दों में अपनी राय रखते हुए मामले को शांत करने की कोशिश की है। प्रीतम सिंह ने कहा कि हरीश रावत को लेकर जो भी बयानबाजी पार्टी के भीतर हो रही है, वह कार्यकर्ताओं और नेताओं की भावनात्मक अभिव्यक्ति मात्र है, जिसे विवाद के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने बड़े ही विश्वास के साथ यह दावा किया कि हरीश रावत पार्टी के अभिभावक समान हैं और वे बहुत जल्द अपना अवकाश समाप्त कर मैदान में लौटेंगे। प्रीतम सिंह के अनुसार, कांग्रेस में हर कोई संगठन की मजबूती का आकांक्षी है और कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाएगा जिससे पार्टी को नुकसान हो। उनका यह बयान पार्टी के भीतर संतुलन बनाए रखने और आलाकमान को यह भरोसा दिलाने की कोशिश माना जा रहा है कि उत्तराखंड कांग्रेस में सब कुछ नियंत्रण में है और मतभेद जल्द सुलझा लिए जाएंगे।
अगर हम संजय नेगी के राजनीतिक सफर पर नजर डालें, तो पता चलता है कि वह रामनगर क्षेत्र के एक प्रभावशाली राजनेता हैं, जो वर्तमान में ज्येष्ठ ब्लॉक प्रमुख के पद पर आसीन हैं और उनकी पत्नी ब्लॉक प्रमुख की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में संजय नेगी का नाम तब चर्चाओं में आया था जब उन्होंने रामनगर सीट से कांग्रेस का टिकट न मिलने पर बगावती तेवर अपनाते हुए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में पार्टी ने महेन्द्र पाल को अपना आधिकारिक उम्मीदवार बनाया था, जिसका संजय नेगी ने कड़ा विरोध किया था। हालांकि निर्दलीय चुनाव लड़ने के कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अच्छी खासी वोट संख्या हासिल कर अपनी ताकत का अहसास जरूर कराया था। इसी अनुशासनहीनता के चलते कांग्रेस ने उन्हें छह साल के लिए निष्कासित कर दिया था, लेकिन अब बदली परिस्थितियों में उनकी वापसी की सुगबुगाहट ने पार्टी के पुराने समीकरणों को हिला कर रख दिया है।
रामनगर सीट का इतिहास हमेशा से ही दिलचस्प रहा है, खासकर 2022 में जब हरीश रावत और रणजीत रावत के बीच इस सीट पर दावेदारी को लेकर भारी रस्साकशी हुई थी। उस वक्त रणजीत रावत खुद को वहां से सबसे प्रबल दावेदार मान रहे थे, लेकिन हरीश रावत ने रणनीतिक तौर पर महेन्द्र पाल के नाम को आगे बढ़ाया था, जिससे रणजीत रावत खेमे में भारी असंतोष पैदा हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि संजय नेगी को भी हरीश रावत के करीबी गुट का माना जाता रहा है, फिर भी टिकट वितरण के समय स्थितियां कुछ और थीं। आज जब संजय नेगी की वापसी की चर्चा चल रही है, तो रणजीत रावत और महेन्द्र पाल दोनों ही नेता एकजुट होकर इसका विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि जिन्होंने चुनाव में पार्टी को नुकसान पहुंचाया, उन्हें इतनी जल्दी वापस लेना वफादार कार्यकर्ताओं का अपमान होगा। अब देखना यह है कि हरीश रावत की चुप्पी और संजय नेगी की सक्रियता आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत को किस दिशा में ले जाती है।





