काशीपुर। उत्तराखंड की पावन धरती पर देवभूमि की संस्कृति के रंग बिखेरते ऐतिहासिक चैती मेले की गूंज इस बार कुछ अलग ही संदेश लेकर आई है, जिसने आधुनिकता की चकाचौंध में खोते जा रहे अभिभावकों को एक नई सोच के साथ मंथन करने पर मजबूर कर दिया है। शहर के प्रतिष्ठित संस्थान डी बाली ग्रुप की संरक्षिका और विदुषी समाजसेविका उर्वशी दत्त बाली ने वर्तमान पीढ़ी के विकास और मेलों की महत्ता पर अपने जो विचार रखे हैं, वे किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के हृदय को झकझोरने के लिए पर्याप्त हैं। उन्होंने बड़े ही मर्मस्पर्शी और भावनात्मक लहजे में इस बात पर प्रकाश डाला कि क्यों कंक्रीट के जंगलों और डिजिटल स्क्रीन के बीच पल रहे बच्चों के लिए मिट्टी की सोंधी खुशबू वाले इन पारंपरिक मेलों का हिस्सा बनना अनिवार्य है। उर्वशी दत्त बाली का मानना है कि हम वास्तव में बहुत ही सौभाग्यशाली हैं कि हमारी इस काशीपुर की भूमि पर चैती मेले जैसे भव्य आयोजन होते हैं, जो केवल शोर-शराबे या भीड़ का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि हमारी सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक वैभव की जीवंत पहचान हैं। यह मेला मनोरंजन के सीमित दायरे से कहीं ऊपर उठकर हमें अपनी जड़ों से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है, जहाँ समय के साथ हो रहे बदलावों के बीच भी हमें धरातल पर हो रही वास्तविक मेहनत और जीवन के असली संघर्ष की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है।
आज के इस भागदौड़ भरे युग में जहाँ ऊँची अट्टालिकाओं, महँगी लग्जरी गाड़ियों और फाइव स्टार होटलों की कृत्रिम दुनिया को ही सफलता का पैमाना मान लिया गया है, वहाँ उर्वशी दत्त बाली ने बच्चों के मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए एक नई राह सुझाई है। उन्होंने अभिभावकों को संबोधित करते हुए अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि हम अपने बच्चों को सुख-सुविधाओं के अम्बार तो दे रहे हैं, लेकिन क्या हम उन्हें जीवन की कड़वी और सच्ची हकीकत से रूबरू करवा पा रहे हैं? मेले का मैदान वह पाठशाला है जहाँ किसी किताबी ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि यहाँ आकर बच्चे अपनी आँखों से देखते हैं कि सीमित संसाधनों और अभावों के बीच भी किस प्रकार बड़े सपने देखे जा सकते हैं। उर्वशी दत्त बाली के अनुसार, चैती मेला वह स्थान है जहाँ बच्चे यह सीखते हैं कि मेहनत और हुनर के दम पर कैसे अभावों की बेड़ियों को तोड़ा जा सकता है और कामयाबी के शिखर तक पहुँचा जा सकता है। यहाँ का हर कोना, हर शिल्पकार और हर छोटा व्यापारी एक नई सोच और एक नई दिशा का जीवंत उदाहरण पेश करता है, जो बच्चों के कोमल मस्तिष्क पर गहरी और सकारात्मक छाप छोड़ता है।
शिक्षण और संस्कारों की परिभाषा को एक नए धरातल पर ले जाते हुए उर्वशी दत्त बाली ने यह स्वीकार किया कि अक्सर हम बड़ों को लगता है कि हम बच्चों को सिखा रहे हैं, लेकिन मेलों के माहौल में स्थिति इसके ठीक उलट होती है। उन्होंने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में कहा कि सच तो यह है कि मेले में घूमने आए ये नन्हे-मुन्ने बच्चे हमें भी जीवन के सबसे बड़े सबक सिखा जाते हैं, जिनमें अटूट हौसला, असीम संतोष और हर कठिन परिस्थिति में मुस्कुराते हुए आगे बढ़ने का जज्बा शामिल है। मेले की भीड़ में एक गुब्बारे के लिए मचलते बच्चे या एक छोटे से खिलौने में खुशियाँ ढूँढने वाले बचपन को देखकर हमें यह समझ आता है कि खुशी बाहरी सुख-सुविधाओं में नहीं बल्कि मन की संतुष्टि में होती है। उर्वशी दत्त बाली ने समाज के हर वर्ग और हर अभिभावक से यह पुरजोर अपील की है कि वे अपने बच्चों का हाथ पकड़कर उन्हें काशीपुर के इस चैती मेले में अवश्य लेकर आएं। उनका मानना है कि यहाँ आकर बच्चे सिर्फ हवाई सपने देखना ही नहीं सीखेंगे, बल्कि उन सपनों को हकीकत की जमीन पर उतारने का वह कठिन रास्ता भी पहचानेंगे जो केवल श्रम और समर्पण से ही तय किया जा सकता है।
सांस्कृतिक चेतना के इस आह्वान में उर्वशी दत्त बाली ने एक बहुत ही मनोवैज्ञानिक तथ्य की ओर इशारा किया कि बच्चों को हर बात उपदेश देकर या डांटकर नहीं समझाई जा सकती, क्योंकि बहुत सारी गूढ़ बातें बच्चे केवल अवलोकन मात्र से समझ लेते हैं। मेले की रंगत, वहाँ की परंपराएं, और प्राचीन रीति-रिवाज बच्चों के मन में जिज्ञासा पैदा करते हैं कि आखिर ये मेले क्यों लगते हैं, इनकी शुरुआत कब हुई थी और इनके आयोजन के पीछे की धार्मिक या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है? इस प्रक्रिया में वे अनजाने ही अपनी गौरवशाली भारतीय संस्कृति और धार्मिक विरासत के अनमोल ज्ञान से परिचित हो जाते हैं, जो किसी भी एयर-कंडीशन्ड क्लासरूम में मिलना असंभव है। उर्वशी दत्त बाली की यह मार्मिक अपील केवल एक मेले के लिए निमंत्रण नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ी को अपनी मिट्टी से जोड़े रखने का एक बड़ा संकल्प है, ताकि वे अपनी जड़ों को पहचानते हुए भविष्य के आसमान में लंबी उड़ान भर सकें। डी बाली ग्रुप की डायरेक्टर का यह दृष्टिकोण आज के समाज में एक नई चेतना का संचार कर रहा है, जो हमें याद दिलाता है कि जीवन की असली खूबसूरती और शिक्षा फाइव स्टार लग्जरी में नहीं, बल्कि हमारी परंपराओं के खुले आसमान के नीचे लगने वाले इन मेलो में छिपी है।





