जसपुर। उत्तराखंड के सीमावर्ती जनपद ऊधम सिंह नगर के जसपुर ब्लॉक में इन दिनों कुदरत का एक ऐसा खौफनाक मंजर देखने को मिल रहा है, जिसने न केवल इंसानी बस्तियों की नींद उड़ा दी है, बल्कि पूरे प्रशासनिक अमले को भी हिलाकर रख दिया है। पतरामपुर और मनोरथपुर जैसे शांत रहने वाले गांवों में आजकल सन्नाटा पसरा हुआ है, लेकिन यह सन्नाटा किसी शांति का प्रतीक नहीं, बल्कि उस जानलेवा दहशत का परिणाम है जो गुलदारों के एक कुनबे ने यहां फैला रखी है। सूरज ढलते ही जब आसमान में लाली बिखरती है, तब इन गांवों की गलियों में सन्नाटा चीखने लगता है और लोग खुद को लोहे की सलाखों वाले दरवाजों के पीछे कैद कर लेते हैं। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि तराई की वह कड़वी हकीकत है, जहाँ अब इंसान और आदमखोर प्रवृत्ति के वन्यजीवों के बीच का संघर्ष अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका है। पतरामपुर के एक रिहायशी मकान के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे ने जब तीन शक्तिशाली गुलदारों को एक साथ चहलकदमी करते हुए कैद किया, तो ग्रामीणों की रूह कांप गई, क्योंकि अमूमन अकेले शिकार करने वाला यह जानवर अब झुंड में दिखाई दे रहा है।
अंधेरा होते ही मनोरथपुर और उसके आसपास के इलाकों में खौफ का सायरन बजने लगता है और लोग हाथ में डंडे और मशालें लेकर अपनी जान की हिफाजत करने को मजबूर हैं। सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैले उन वीडियो क्लिप्स ने क्षेत्र के भय को और अधिक हवा दे दी है, जिनमें तीन-तीन गुलदार किसी शातिर शिकारी की तरह गलियों में शिकार तलाशते नजर आ रहे हैं। मनोरथपुर के निवासियों ने जब अपनी आंखों के सामने इन वन्यजीवों को रिहायशी बाड़ों के पास मंडराते देखा, तो उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर मोबाइल कैमरों में इस मंजर को कैद किया, जो अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने आज से पहले कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी जहाँ गुलदार इतने निडर होकर इंसानी आबादी के बीच घुस आए हों, जिससे यह साफ जाहिर होता है कि अब जंगल और आबादी की लकीर पूरी तरह धुंधली पड़ चुकी है। पालतू जानवरों के अवशेष और उनके लापता होने की खबरें अब इन गांवों के लिए रोजमर्रा का हिस्सा बन गई हैं, जिससे किसानों और पशुपालकों की आर्थिक रीढ़ भी टूटती नजर आ रही है।
तराई पश्चिम वन प्रभाग के अंतर्गत आने वाली पतरामपुर रेंज में गुलदारों का यह जमावड़ा किसी बड़ी अनहोनी की तरफ इशारा कर रहा है, क्योंकि ये शिकारी अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहे। पिछले कुछ हफ्तों के दौरान इन खूंखार दरिंदों ने दर्जनों पालतू कुत्तों को अपना निवाला बना लिया है, जिससे गांवों के सुरक्षा तंत्र की पहली कड़ी ही खत्म हो गई है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि निजामगढ़ जैसे गांव में तीन गुलदारों ने एक साथ धावा बोलकर एक घर के भीतर घुसने का दुस्साहस किया और वहां खूंटे से बंधी एक बेगुनाह बकरी को बेरहमी से अपना शिकार बना लिया। इस घटना ने ग्रामीणों के मन में यह डर बैठा दिया है कि अगर ये शिकारी घर के भीतर घुसकर शिकार कर सकते हैं, तो बाहर सो रहे मासूम बच्चे और बुजुर्ग भी कभी सुरक्षित नहीं रह पाएंगे। वन विभाग के आंकड़ों और सूचनाओं के अनुसार, इन क्षेत्रों में गुलदारों की गतिविधि केवल भोजन की तलाश तक सीमित नहीं है, बल्कि वे अब इंसानी बस्तियों को अपना नया बसेरा बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर मानव-वन्यजीव संघर्ष को न्योता दे रहा है।

वन महकमे की नींद भी अब उड़ चुकी है और उच्चाधिकारियों के निर्देश पर पतरामपुर रेंज की टीम ने प्रभावित इलाकों में सघन गश्त के साथ-साथ कई रणनीतिक स्थानों पर लोहे के मजबूत पिंजरे स्थापित किए हैं। विभाग की इस त्वरित कार्रवाई का असर बीती रात तब देखने को मिला जब बूढ़ाफार्म के इलाके में लगाए गए एक पिंजरे में एक भारी-भरकम और आक्रामक गुलदार फंस गया। जैसे ही ग्रामीणों को इस शिकारी के पकड़े जाने की खबर मिली, वहां लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा, लेकिन पिंजरे के भीतर से आती उस शिकारी की भीषण दहाड़ ने लोगों के पसीने छुड़ा दिए। पिंजरे में कैद होने के बाद भी उस गुलदार की आक्रामकता और उसकी आँखों में झलकता गुस्सा यह बताने के लिए काफी था कि वह कितना खतरनाक साबित हो सकता था। हालांकि, एक शिकारी के पकड़े जाने से ग्रामीणों ने थोड़ी राहत महसूस की है, लेकिन यह राहत केवल क्षणिक है क्योंकि जंगलों की गहराई में अभी भी कई ऐसे शिकारी छिपे हुए हैं जो अगले शिकार की तलाश में घात लगाए बैठे हैं।
तराई पश्चिमी के रेंजर महेश सिंह बिष्ट स्वयं इस पूरी ऑपरेशनल गतिविधि की कमान संभाले हुए हैं और उन्होंने स्पष्ट किया है कि पकड़े गए गुलदार को मेडिकल जांच के बाद सुरक्षित रूप से सघन फॉरेस्ट जोन में छोड़ने की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। महेश सिंह बिष्ट ने मीडिया से मुखातिब होते हुए यह स्वीकार किया कि क्षेत्र में अभी भी कई अन्य गुलदार सक्रिय हैं, जिनकी निगरानी के लिए विभाग ने नाइट विजन कैमरों और पैदल गश्त का सहारा लिया है। उन्होंने ग्रामीणों से बेहद भावुक और सतर्क रहने की अपील करते हुए कहा कि जब तक स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ जाती, तब तक लोग सूर्यास्त के बाद घरों से बाहर न निकलें और बच्चों को अकेले न छोड़ें। रेंजर के अनुसार, वन्यजीवों के व्यवहार में आ रहा यह बदलाव चिंताजनक है और विभाग पूरी कोशिश कर रहा है कि जल्द से जल्द अन्य गुलदारों को भी पिंजरे में कैद कर आबादी से दूर भेजा जाए ताकि जनहानि को टाला जा सके। फिलहाल, जसपुर के इन सरहदी गांवों में डर का साया इतना गहरा है कि हर आहट पर लोग सहम जाते हैं और उनकी नजरें बस वन विभाग की अगली कामयाबी पर टिकी हुई हैं।
जसपुर ब्लॉक के इन प्रभावित क्षेत्रों में सामाजिक और आर्थिक जीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है, क्योंकि खेती-किसानी के काम जो देर शाम तक चलते थे, अब दोपहर में ही बंद कर दिए जाते हैं। पतरामपुर और मनोरथपुर के ग्रामीण अब सरकार से केवल आश्वासन नहीं, बल्कि एक ठोस सुरक्षा कवच की मांग कर रहे हैं ताकि उन्हें इस मौत के साये से हमेशा के लिए आजादी मिल सके। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी शासन-प्रशासन से मांग की है कि प्रभावित क्षेत्रों में स्ट्रीट लाइटों की उचित व्यवस्था की जाए और वन विभाग की टीम की संख्या बढ़ाई जाए ताकि चौबीसों घंटे निगरानी संभव हो सके। हर बीतता दिन इन ग्रामीणों के लिए एक नई परीक्षा की तरह है, जहाँ उन्हें अपनी और अपने मवेशियों की जान बचाने के लिए हर पल चौकन्ना रहना पड़ रहा है। जब तक जंगलों के ये सुल्तान वापस अपने मूल निवास की ओर नहीं लौट जाते, तब तक जसपुर की इन वादियों में दहशत का यह खौफनाक दौर जारी रहने की आशंका है, जो आधुनिक समाज और वन्यजीव संरक्षण के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।





