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उत्तराखंड में रसोई गैस की कालाबाजारी पर धामी सरकार का हंटर और शादियों में अब मचेगा हड़कंप

खाद्य सचिव आनंद स्वरुप के कड़े आदेश से एक घर में दो कनेक्शन वालों पर गिरेगी गाज और भव्य शादी समारोहों के लिए अब केवल दो ही सिलेंडर मिलेंगे जिससे मची है पूरे प्रदेश में खलबली।

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड के ऊर्जावान गलियारों से निकलकर आ रही एक बड़ी खबर ने पूरे प्रदेश के घरेलू चूल्हों से लेकर शादी-ब्याह के शामियानों तक में हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि राज्य सरकार ने ईंधन की आपूर्ति को सुव्यवस्थित करने के लिए एक अभूतपूर्व और बेहद कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। वर्तमान में हालांकि हिमालयी राज्य के भीतर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस जैसी अनिवार्य वस्तुओं की उपलब्धता को लेकर कोई तात्कालिक संकट या किल्लत की स्थिति नहीं है, लेकिन भविष्य की अनिश्चितताओं और संभावित किल्लत को भांपते हुए धामी सरकार ने ‘सतर्कता ही सुरक्षा है’ के मंत्र पर काम करना शुरू कर दिया है। इसी दूरदर्शी सोच के तहत खाद्य आपूर्ति विभाग ने गैस सिलेंडरों के बेजा इस्तेमाल, अवैध भंडारण और काले बाजार की काली परछाई को मिटाने के लिए अपने तेवर सख्त कर लिए हैं, जिससे उन लोगों की रातों की नींद उड़ गई है जो नियमों को ताक पर रखकर गैस का खेल खेल रहे थे। प्रशासन की पैनी नजर अब उन घरों पर है जहां एक ही छत के नीचे जरूरत से ज्यादा कनेक्शन दबाकर रखे गए हैं, और इसी कड़ी में एक घर में दो से अधिक गैस कनेक्शन रखने वाले रसूखदारों या असावधान उपभोक्ताओं के खिलाफ विभाग ने एक व्यापक और आक्रामक जांच अभियान का शंखनाद कर दिया है, जिसका सीधा असर अब धरातल पर दिखाई देने लगा है।

इस पूरे मिशन को धरातल पर उतारने और व्यवस्था में पारदर्शिता का पारद घोलने के पीछे मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य का कोई भी जरूरतमंद उपभोक्ता ईंधन के अभाव में भूखा न रहे और वितरण प्रणाली में सेंधमारी करने वाले तत्वों पर लगाम कसी जा सके। खाद्य विभाग के उच्च पदस्थ सूत्रों और मैदानी अधिकारियों की मानें तो जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य प्रकाश में आया है कि कई रसूखदार और चालाक लोग एक ही परिवार के विभिन्न सदस्यों के नाम पर फर्जी तरीके से या प्रभाव का इस्तेमाल कर एक से अधिक गैस कनेक्शन हासिल कर चुके हैं। विडंबना यह है कि इन घरेलू कनेक्शनों की आड़ में मिलने वाली सस्ती सब्सिडी वाली गैस का उपयोग चूल्हा जलाने के बजाय व्यावसायिक गतिविधियों और अनैतिक लाभ कमाने के लिए किया जा रहा था, जिससे न केवल राजस्व को चपत लग रही थी बल्कि आम जनता की सप्लाई चेन में भी कृत्रिम बाधा उत्पन्न होने का खतरा मंडरा रहा था। खाद्य सचिव आनंद स्वरुप ने इस मामले की गंभीरता को स्पष्ट करते हुए दो टूक शब्दों में कहा है कि एक परिवार के पास निर्धारित कानूनी सीमा से अधिक गैस कनेक्शन पाए जाने की स्थिति में अब किसी भी प्रकार की रियायत नहीं दी जाएगी और सीधे कठोर विधिक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी, ताकि सिस्टम में शुचिता बनी रहे और हर पात्र व्यक्ति को उसका हक मिल सके।

उत्तराखंड के इस नए सरकारी फरमान में सबसे ज्यादा चर्चा और बहस का केंद्र वह फैसला बना है जो देवभूमि की भव्य शादियों और मांगलिक आयोजनों की चमक-धमक से जुड़ा हुआ है, जिसने मेजबानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। खाद्य विभाग द्वारा जारी किए गए नवीनतम और क्रांतिकारी आदेश के मुताबिक, अब उन परिवारों को बड़ा झटका लगा है जो शादी समारोहों में गैस सिलेंडरों की पूरी फौज खड़ी कर देते थे, क्योंकि अब किसी भी बड़े आयोजन के लिए केवल दो गैस सिलेंडर ही आधिकारिक रूप से उपलब्ध कराए जाएंगे। इस आदेश की कड़ाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि आयोजन स्थल पर मेहमानों की संख्या चाहे सैकड़ों में हो या हजारों में, भोजन तैयार करने की पूरी व्यवस्था और प्रबंधन इन्हीं दो सिलेंडरों की मर्यादा के भीतर ही करना होगा। यह निर्णय पहली नजर में भले ही थोड़ा कठोर प्रतीत हो, लेकिन विभाग का तर्क है कि संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और अनावश्यक खपत को रोककर ही हम भविष्य के लिए ऊर्जा की बचत कर सकते हैं, जिससे राज्य की सामूहिक संप्रभुता और आर्थिक सेहत दोनों सुरक्षित रह सकेंगी।

शादी-ब्याह जैसे महत्वपूर्ण आयोजनों में गैस की इस सीमित उपलब्धता को व्यावहारिक बनाने के लिए सरकार ने एक विशेष प्रक्रिया भी निर्धारित की है, जिसके तहत उपभोक्ताओं को अपनी संबंधित गैस एजेंसी से संपर्क कर एक ‘टेम्परेरी कनेक्शन’ यानी अस्थायी संबंध स्थापित करना होगा, जिसके आधार पर ही उन्हें ये दो अतिरिक्त सिलेंडर प्रदान किए जाएंगे। विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था उन लोगों को राहत देने के लिए है जिनके पास बड़े आयोजनों के लिए पर्याप्त ईंधन नहीं होता, लेकिन साथ ही यह उन पर लगाम भी कसेगा जो घरेलू सिलेंडरों को अवैध रूप से शादी समारोहों में झोंक देते थे। यह अस्थायी कनेक्शन प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी होगी और इसका पूरा रिकॉर्ड डिजिटल माध्यम से ट्रैक किया जाएगा, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि एक ही नाम पर बार-बार सिलेंडर आवंटित न हों। इस नियम के लागू होने के बाद अब कैटरर्स और शादी वाले घरों को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों या अधिक कुशल प्रबंधन की ओर रुख करना होगा, क्योंकि प्रशासन अब सिलेंडरों की गिनती को लेकर किसी भी प्रकार की ढिलाई बरतने के मूड में बिल्कुल भी नजर नहीं आ रहा है।

भ्रष्टाचार और कालाबाजारी के खिलाफ छिड़ी इस जंग में खाद्य विभाग ने एक और मोर्चा खोलते हुए यह साफ कर दिया है कि गैस सिलेंडरों की अवैध जमाखोरी करने वाले माफियाओं और ऊंचे दामों पर चोरी-छिपे सिलेंडर बेचने वालों के दिन अब गिनती के रह गए हैं। विभाग की सतर्कता शाखा ने उन होटलों, ढाबों, रेस्तरां और छोटे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की सूची तैयार कर ली है जो नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए धड़ल्ले से नीले व्यावसायिक सिलेंडरों के स्थान पर लाल घरेलू सिलेंडरों का उपयोग कर रहे थे, जो कि न केवल गैरकानूनी है बल्कि एक बड़ा सुरक्षा जोखिम भी है। शासन ने दो टूक चेतावनी जारी की है कि ऐसे किसी भी मामले में पकड़े जाने पर संबंधित प्रतिष्ठान का व्यापारिक लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया जाएगा, भारी-भरकम जुर्माना वसूला जाएगा और जरूरत पड़ने पर संबंधित धाराओं में कानूनी मुकदमा भी दर्ज किया जाएगा। विभाग ने इस मुहिम को जन-आंदोलन बनाने के लिए आम नागरिकों से भी पुरजोर अपील की है कि वे अपने आस-पास होने वाली ऐसी किसी भी संदिग्ध गतिविधि या अवैध भंडारण की गुप्त सूचना तत्काल प्रशासन को दें, ताकि देवभूमि को कालाबाजारी के कलंक से मुक्त कराया जा सके।

सरकार के इन कड़े और क्रांतिकारी कदमों को लेकर उत्तराखंड की वादियों में आम जनता के बीच एक मिली-जुली और काफी रोचक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है, जहां समाज का एक बड़ा वर्ग इसे भविष्य के लिए एक वरदान मान रहा है। प्रबुद्ध नागरिकों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस सख्ती से गैस की बेतहाशा बर्बादी पर लगाम लगेगी, कालाबाजारी करने वाले गिरोह ध्वस्त होंगे और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतिम छोर पर खड़े जरूरतमंद व्यक्ति को समय पर सिलेंडर उपलब्ध हो सकेगा। दूसरी ओर, कुछ लोग इसे व्यावहारिक धरातल पर लागू करने में आने वाली चुनौतियों को लेकर संशय में हैं और उनका कहना है कि यह नियम आम आदमी की स्वतंत्रता और उत्सवों की खुशी में खलल डाल सकता है। विशेष रूप से ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में, जहां शादियों में पूरा गांव उमड़ पड़ता है, वहां केवल दो सिलेंडरों की शर्त को लेकर लोग काफी परेशान हैं और उन्हें डर है कि मेहमानों की आवभगत में कहीं कोई कमी न रह जाए, क्योंकि उत्तराखंड की संस्कृति में अतिथि सत्कार को सर्वोपरि माना जाता है।

स्थानीय निवासियों और हलवाइयों के बीच इस समय सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि सैकड़ों मेहमानों के लिए पकवान तैयार करना सिर्फ दो सिलेंडरों के सहारे कैसे मुमकिन होगा, जबकि एक बड़ी दावत में आमतौर पर ईंधन की खपत कहीं ज्यादा होती है। लोगों का तर्क है कि शादी जैसे संवेदनशील और जीवन के एक बार आने वाले क्षणों में इस तरह की पाबंदियां व्यावहारिक रूप से बड़ी मुसीबतें खड़ी कर सकती हैं और इससे भ्रष्टाचार के नए रास्ते खुल सकते हैं। हालांकि, सरकारी तंत्र का मानना है कि इस नियम के पीछे की मंशा शुद्ध है और यह लोगों को मितव्ययिता तथा संसाधनों के सही नियोजन की सीख देने के लिए जरूरी है, ताकि राज्य की ऊर्जा सुरक्षा के साथ कोई समझौता न हो। जैसे-जैसे यह अभियान आगे बढ़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा कि खाद्य विभाग अपनी इस सख्ती और जनभावनाओं के बीच कैसे संतुलन बिठा पाता है, लेकिन एक बात तो तय है कि उत्तराखंड में अब रसोई गैस का खेल करने वालों के लिए स्थितियां पहले जैसी आसान नहीं रहने वाली हैं।

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