भारत(सुनील कोठारी)। भारतीय राजनीति के गलियारों में इस समय एक ऐसा प्रचंड तूफान उठा है, जिसने सत्ता के शीर्ष गुंबदों को हिलाकर रख दिया है और उन आदर्शों पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं जिन्हें कभी अडिग माना जाता था। यह विवाद किसी विपक्षी दल के वार से नहीं, बल्कि उस महिला के तीखे प्रहारों से उपजा है जिसे कभी वर्तमान नेतृत्व का सबसे बड़ा बौद्धिक ढाल माना जाता था। मधु पूर्णिमा किश्वर, जिन्होंने कभी ‘मोदीनामा’ जैसी कालजयी कृति रचकर वर्तमान प्रधानमंत्री की छवि को ‘विकास पुरुष’ के रूप में वैश्विक पटल पर अंकित किया था, आज स्वयं ही उस व्यवस्था के विरुद्ध रणभेरी फूंक चुकी हैं। उनके हालिया साक्षात्कार और सोशल मीडिया पर किए गए सनसनीखेज खुलासों ने न केवल भाजपा के आईटी सेल को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है, बल्कि उन समर्थकों को भी हतप्रभ कर दिया है जो अब तक इन दावों को केवल अफवाह मानते आए थे। यह मामला अब केवल राजनीतिक मतभेद का नहीं रहा, बल्कि इसमें व्यक्तिगत निष्ठा, नैतिक पतन और सत्ता के गलियारों में होने वाली ‘रहस्यमयी’ नियुक्तियों के ऐसे गंभीर आरोप शामिल हैं, जो भारतीय लोकतंत्र की शुचिता को सीधी चुनौती दे रहे हैं।
लेखिका मधु किश्वर का ‘भक्त’ से ‘बागी’ बनने का यह सफर आधुनिक भारतीय राजनीति की सबसे नाटकीय और विवादास्पद घटनाओं में से एक बनकर उभरा है, जिसने सत्ता के भीतर चल रही उठापटक को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। उन्होंने अत्यंत आक्रामक मुद्रा में यह दावा किया है कि प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द रहने वाला जो कुनबा है, उसमें योग्यता की तुलना में ‘निजी समीकरण’ और ‘विशिष्ट पसंद’ को अधिक वरीयता दी गई है, जिससे संघ और पार्टी के पुराने निष्ठावान कार्यकर्ता ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उनके निशाने पर विशेष रूप से वे महिला नेत्रियां और मंत्री हैं, जिन्हें कैबिनेट में ऐसे महत्वपूर्ण विभाग सौंपे गए जिनकी उम्मीद शायद स्वयं उन नेताओं को भी नहीं थी। किश्वर के अनुसार, स्मृति ईरानी जैसी नेताओं का अचानक हुआ राजनीतिक उदय और उन्हें शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार सौंपा जाना, किसी छिपे हुए एजेंडे का हिस्सा प्रतीत होता है। इन आरोपों ने उस दौर की यादें ताजा कर दी हैं जब उनकी शैक्षणिक योग्यता पर उठे सवालों ने पूरे देश में बहस छेड़ी थी, लेकिन इस बार आरोप केवल डिग्री तक सीमित न होकर व्यक्तिगत आचरण की गहराइयों तक जा पहुंचे हैं।

इस पूरे प्रकरण में सबसे विस्फोटक मोड़ तब आया जब मफतलाल पटेल के उस ऐतिहासिक और विवादित पत्र का जिक्र पुनः सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना, जिसने वर्षों पहले भाजपा के लौह पुरुष कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी की चौखट पर दस्तक दी थी। यह पत्र मात्र एक कागज का टुकड़ा नहीं था, बल्कि एक पति की उस बेबसी और चीख का दस्तावेज था जिसने गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के वैवाहिक जीवन और प्रधानमंत्री के साथ उनके संबंधों पर गंभीर लांछन लगाए थे। मफतलाल पटेल ने उस दौर में लालकृष्ण आडवाणी को लिखे अपने पत्र में अत्यंत विचलित करने वाली भाषा का प्रयोग करते हुए यह आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी अब उनकी बात नहीं सुनतीं और वे पूरी तरह से तत्कालीन मुख्यमंत्री के नियंत्रण में हैं। उन्होंने अपनी व्यथा साझा करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि यदि उन्हें उनकी पत्नी वापस नहीं मिली, तो वे मानसिक संतुलन खो देंगे या आत्महत्या कर लेंगे। यह पत्र आज भी उन लोगों के लिए एक हथियार बना हुआ है जो सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के निजी चरित्र और उनकी सार्वजनिक जिम्मेदारियों के बीच के अंतर्संबंधों पर सवाल उठाते हैं।
सत्ता के इस महासंग्राम में मधु किश्वर ने केवल नियुक्तियों पर ही हमला नहीं बोला, बल्कि उन्होंने भाजपा के उस डिजिटल साम्राज्य यानी आईटी सेल की कार्यशैली को भी बेनकाब करने का प्रयास किया है जिसका नेतृत्व अमित मालवीय कर रहे हैं। किश्वर का आरोप है कि यह तंत्र अब केवल विचारधारा के प्रचार-प्रसार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह उन लोगों के चरित्र हनन का एक भयावह औजार बन चुका है जो व्यवस्था के भीतर रहकर सच बोलने का साहस जुटाते हैं। उन्होंने दावा किया कि जब उन्होंने इन विसंगतियों के विरुद्ध आवाज उठानी शुरू की, तो इसी तंत्र ने उन्हें ‘विक्षिप्त’ और ‘गद्दार’ घोषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके अनुसार, यह स्थिति उस ‘भस्मासुर’ की तरह है जो अब अपने ही सृजनकर्ताओं को निगलने पर उतारू है। यह आरोप इसलिए भी गंभीर हो जाते हैं क्योंकि मधु किश्वर ने स्वयं इस वैचारिक तंत्र को खड़ा करने में वर्षों तक अपनी बौद्धिक आहुति दी थी, और आज वही तंत्र उनके विरुद्ध दुष्प्रचार का मोर्चा खोले हुए है, जिससे उनकी मानसिक स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा पर गहरा आघात पहुँचा है।

इस सनसनीखेज न्यूज़ रिपोर्ट का एक और काला पक्ष वह है जिसमें अंतरराष्ट्रीय दबाव, ब्लैकमेलिंग और ‘हनीट्रैप’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर मोदी सरकार की विदेश नीति और आंतरिक निर्णयों को संदेह के घेरे में लाया गया है। हालांकि, इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि या विधिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन मधु किश्वर ने जिस तरह से इन आशंकाओं को हवा दी है, उसने राष्ट्रीय सुरक्षा के जानकारों के बीच एक बेचैनी पैदा कर दी है। उनका तर्क है कि कुछ ऐसे अप्रत्याशित निर्णय लिए गए हैं जो भारतीय हितों के बजाय किसी गुप्त वैश्विक एजेंडे या व्यक्तिगत कमजोरियों के दबाव में प्रतीत होते हैं। राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन आरोपों में एक प्रतिशत भी सच्चाई है, तो यह देश की संप्रभुता के साथ एक बड़ा खिलवाड़ है, और यदि ये निराधार हैं, तो यह प्रधानमंत्री के पद की गरिमा को धूल-धूसरित करने का एक कुत्सित प्रयास है। इस खामोशी के पीछे सरकार की रणनीति क्या है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन जनता के मन में संशय का जो बीज बोया जा चुका है, वह अब एक विशाल वटवृक्ष का रूप ले रहा है।
विधिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारतीय न्यायपालिका का बुनियादी सिद्धांत ‘इनोसेंट अंटिल प्रूवन गिल्टी’ यानी दोष सिद्ध होने तक निर्दोषता की अवधारणा पर टिका है, जिसे स्मृति ईरानी और अन्य आरोपित नेताओं ने हमेशा अपनी ढाल बनाया है। अदालतों ने कई बार इन नेताओं को राहत दी है और आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताकर खारिज किया है, लेकिन मधु किश्वर का तर्क है कि कई बार न्याय की प्रक्रिया को प्रशासनिक प्रभाव से बाधित कर दिया जाता है। वे यह सवाल उठाती हैं कि आखिर क्यों मफतलाल पटेल जैसे व्यक्ति की शिकायतों को उस समय ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और क्यों संघ (RSS) ने इन व्यक्तिगत विवादों पर अपनी आंखें मूंद लीं? उनके अनुसार, संघ की साख उस समय दांव पर लग गई थी जब चरित्र निर्माण की पाठशाला कहे जाने वाले संगठन के भीतर से ऐसे ‘सुसाइड नोट’ जैसे खत बाहर आए थे। इन पत्रों की सत्यता की जांच न होना और उन्हें दबा दिया जाना, उस समय की राजनीतिक मजबूरी थी या किसी गहरे राज को छिपाने की कोशिश, यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है और इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर जवाब मांग रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह भी मानता है कि मधु किश्वर के ये प्रहार उनकी ‘निजी हताशा’ या ‘अपेक्षाओं की पूर्ति न होना’ भी हो सकते हैं, क्योंकि राजनीति में अक्सर पुराने वफादार तब बागी हो जाते हैं जब उन्हें सत्ता में अपेक्षित स्थान नहीं मिलता। लेकिन क्या एक लेखक जिसने वर्षों तक प्रधानमंत्री के समर्थन में कलम चलाई हो, वह केवल हताशा में इतने निचले स्तर के आरोप लगा सकता है? यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है जो आज हर भारतीय के मन में है। किश्वर का कहना है कि उन्होंने जो देखा और महसूस किया, वह उनके जमीर पर बोझ बन गया था और वे अब और अधिक चुप नहीं रह सकती थीं। उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों से जो दूरी बनाई और खुद को एकांतवास में झोंक दिया, उसे वे अपनी ‘सत्य की खोज’ का हिस्सा बताती हैं। यह स्थिति उस व्यक्ति के लिए अत्यंत पीड़ादायक होती है जिसने किसी को भगवान की तरह पूजा हो और बाद में उसे उसके ‘मानवीय दोषों’ के साथ देखना पड़े, जो शायद समाज के लिए स्वीकार्य न हों।
अंततः, यह पूरा घटनाक्रम भारतीय राजनीति के उस स्याह पहलू को उजागर करता है जहाँ सत्ता, संबंध और षड्यंत्र का एक ऐसा त्रिकोण बनता है जिसे भेद पाना आम जनता के लिए असंभव होता है। मफतलाल पटेल का वह पत्र, मधु किश्वर के वर्तमान आरोप और स्मृति ईरानी या अमित मालवीय जैसे किरदारों की इस पूरी पटकथा में भूमिका, अब इतिहास के ऐसे मोड़ पर है जहाँ से पीछे मुड़ना नामुमकिन है। क्या देश की जनता इन सनसनीखेज दावों को केवल ‘सोशल मीडिया की गॉसिप’ मानकर भुला देगी, या फिर इन पर कोई निष्पक्ष जांच की मांग उठेगी? लोकतंत्र में शुचिता और पारदर्शिता की मांग करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, और जब आरोप इतने ऊंचे स्तर से और इतनी करीबी शख्सियत द्वारा लगाए जाएं, तो मौन रहना अपराध की श्रेणी में आता है। यह महाविस्फोट अभी थमा नहीं है, बल्कि इसकी चिंगारियां आने वाले चुनावों और राजनीतिक समीकरणों को झुलसाने की क्षमता रखती हैं, जिससे सत्ता की कुर्सी के नीचे की जमीन खिसक सकती है।





