काशीपुर। उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर उबाल तब देखने को मिला, जब कांग्रेस पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी के विधायक उमेश काउ के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए प्रशासनिक स्तर पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। शहर के एसडीएम कार्यालय के बाहर दिन चढ़ते ही सैकड़ों की संख्या में कांग्रेसी कार्यकर्ता एकत्र हुए और उन्होंने महामहिम राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपकर मामले में त्वरित कार्रवाई की मांग की। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में भाजपा विधायक उमेश काउ द्वारा बीते दिनों प्रारम्भिक शिक्षा निर्देशक के कार्यालय में अपने समर्थकों के साथ कथित रूप से की गई अभद्रता और मारपीट का मामला रहा, जिसे लेकर कांग्रेस ने सरकार और सत्ताधारी दल पर सीधा हमला बोला। प्रदर्शन के दौरान नारेबाजी, हाथों में तख्तियां और आक्रोशित तेवर इस बात की गवाही दे रहे थे कि कांग्रेस इस मुद्दे को केवल प्रशासनिक शिकायत तक सीमित रखने के मूड में नहीं है, बल्कि इसे प्रदेशव्यापी राजनीतिक मुद्दा बनाने की तैयारी में है। कार्यकर्ताओं का कहना था कि जिस तरह से एक जनप्रतिनिधि ने शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया, वह न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है बल्कि सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करता है। इसी भावना के साथ ज्ञापन सौंपते समय यह स्पष्ट किया गया कि यदि इस मामले में शीघ्र और सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो कांग्रेस आगे और बड़े आंदोलन का रास्ता अपना सकती है।
एसडीएम कार्यालय के बाहर जुटी भीड़ में मौजूद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा और आरोप लगाया कि प्रदेश में सत्ता के संरक्षण में मनमानी और दबंगई को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि जिस व्यक्ति को जनता ने कानून बनाने के लिए चुना है, वही कानून को हाथ में लेने लगे, तो आम नागरिक और सरकारी अधिकारी खुद को असुरक्षित महसूस करेंगे। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि विधायक उमेश काउ द्वारा प्रारम्भिक शिक्षा निर्देशक के कार्यालय में की गई कथित हरकतें सत्ता के दुरुपयोग का उदाहरण हैं और यह दर्शाती हैं कि सत्ताधारी दल के कुछ जनप्रतिनिधि खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं। इस दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया कि जब घटना सार्वजनिक हो चुकी है और वीडियो तथा प्रत्यक्षदर्शियों के बयान सामने हैं, तब भी अब तक किसी प्रकार की गिरफ्तारी या ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई। उनका कहना था कि सरकार की चुप्पी इस बात का संकेत है कि या तो वह मामले को दबाना चाहती है या फिर दोषियों को बचाने की कोशिश कर रही है। प्रदर्शन में शामिल लोगों ने यह मांग भी रखी कि ऐसे विधायक को सदन से बाहर किया जाना चाहिए, ताकि यह संदेश जाए कि लोकतंत्र में किसी को भी कानून तोड़ने की छूट नहीं है।
कांग्रेस के आक्रामक रुख के बीच प्रदेश की राजनीति को लेकर तीखी टिप्पणियां भी सुनने को मिलीं। कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि भाजपा प्रदेश में वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए हिंदू-मुस्लिम और बुलडोजर जैसी राजनीति को आगे बढ़ा रही है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था जैसे अहम सवालों पर सरकार मौन साधे हुए है। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि जब शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारी ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम शिक्षक और कर्मचारी किस भरोसे अपना काम करेंगे। इसी संदर्भ में कांग्रेस नेताओं ने मुख्यमंत्री की चुप्पी पर भी सवाल उठाया और पूछा कि आखिर प्रदेश के मुखिया इस मामले में अब तक सामने आकर अपना रुख स्पष्ट क्यों नहीं कर रहे हैं। उनका कहना था कि यदि किसी विपक्षी दल का नेता इस तरह की घटना में शामिल होता, तो अब तक उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो चुकी होती, लेकिन सत्ताधारी दल के विधायक होने के कारण मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही न्यायसंगत कार्रवाई नहीं हुई, तो पार्टी सड़कों से लेकर सदन तक संघर्ष तेज करेगी और सरकार को जवाब देने के लिए मजबूर करेगी।
प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने मीडिया से बातचीत करते हुए पूरे मामले को शिक्षा व्यवस्था की गरिमा से जोड़कर देखा। उन्होंने कहा कि प्रारम्भिक शिक्षा निर्देशक के साथ हुई यह घटना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं है, बल्कि यह पूरे शिक्षा विभाग की सुरक्षा और सम्मान पर सीधा प्रहार है। अलका पाल का कहना था कि जिस कार्यालय में बच्चों के भविष्य से जुड़े फैसले लिए जाते हैं, वहां इस तरह की कथित गुंडागर्दी होना बेहद चिंताजनक है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की सरकार प्रदेश में गुंडाराज को बढ़ावा देने का काम कर रही है और सत्ता के संरक्षण में ऐसे कृत्य हो रहे हैं। महानगर अध्यक्ष ने यह भी कहा कि यदि सरकार सच में कानून का राज चाहती है, तो उसे बिना किसी राजनीतिक दबाव के विधायक उमेश काउ के खिलाफ निष्पक्ष जांच करानी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कड़ी से कड़ी सजा दिलानी चाहिए। उन्होंने यह दोहराया कि कांग्रेस किसी भी सूरत में शिक्षा विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की सुरक्षा से समझौता नहीं होने देगी और इस मुद्दे पर लगातार आवाज उठाती रहेगी। उनके अनुसार, यह मामला केवल कांग्रेस बनाम भाजपा का नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का है।
इस पूरे घटनाक्रम ने काशीपुर सहित प्रदेशभर में राजनीतिक हलचल को तेज कर दिया है। स्थानीय स्तर पर जहां कांग्रेस कार्यकर्ता सरकार के खिलाफ लामबंद नजर आ रहे हैं, वहीं आम नागरिकों के बीच भी इस घटना को लेकर चर्चाएं तेज हैं। कई लोग इसे सत्ता और प्रशासन के टकराव के रूप में देख रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक दबाव और दुरुपयोग का उदाहरण बता रहे हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि आज एक शिक्षा अधिकारी के साथ इस तरह का व्यवहार हो सकता है, तो कल किसी अन्य विभाग के अधिकारी भी निशाने पर आ सकते हैं। इसी आशंका के चलते पार्टी ने राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपकर संवैधानिक हस्तक्षेप की मांग की है। ज्ञापन में यह आग्रह किया गया है कि मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित कराई जाए और यह देखा जाए कि क्या जनप्रतिनिधियों द्वारा अपनी सीमाओं का उल्लंघन किया जा रहा है। कांग्रेस का यह भी कहना है कि राज्यपाल को इस विषय में संज्ञान लेकर सरकार से जवाब तलब करना चाहिए, ताकि प्रशासनिक तंत्र में भरोसा बहाल हो सके।
कुल मिलाकर, भाजपा विधायक उमेश काउ के खिलाफ कांग्रेस का यह प्रदर्शन केवल एक दिन का विरोध नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आने वाले समय में बड़े राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं के तेवर और नेताओं के बयान यह संकेत दे रहे हैं कि पार्टी इस मुद्दे को ठंडा नहीं पड़ने देगी। वहीं, भाजपा और सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस प्रतिक्रिया न आना भी कई सवाल खड़े कर रहा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में प्रशासन और सरकार इस मामले पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या वास्तव में वह उन आरोपों पर कार्रवाई करती है, जिन्हें कांग्रेस लगातार उठा रही है। फिलहाल, काशीपुर की सड़कों से उठी यह आवाज राज्य की राजनीति में गूंज बन चुकी है और इसके असर की चर्चा दूर-दूर तक हो रही है।
ज्ञापन सौंपने के दौरान कांग्रेस संगठन की व्यापक और प्रभावशाली मौजूदगी देखने को मिली, जिसने कार्यक्रम को राजनीतिक रूप से और अधिक धारदार बना दिया। इस अवसर पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से लेकर जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं तक की सक्रिय भागीदारी रही। एआईसीसी सदस्य अनुपम शर्मा, महानगर अध्यक्ष अलका पाल और पूर्व अध्यक्ष मुशर्रफ हुसैन की मौजूदगी ने आंदोलन को नेतृत्व की मजबूती प्रदान की। उनके साथ हरीश कुमार सिंह, सुरेश शर्मा जंगी, चंद्रभूषण डोभाल, इंदर सिंह एडवोकेट, उमेश जोशी एडवोकेट और राजेश शर्मा एडवोकेट जैसे अनुभवी चेहरे भी पूरी सक्रियता के साथ शामिल रहे।
नगर निगम से जुड़े प्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी ने भी इस प्रदर्शन को जनसमर्थन की व्यापकता दी। पार्षद राशिद फारूकी, अनीश अंसारी, सरित चतुर्वेदी, सुरेंद्र कुमार बटला, इरशाद गुड्डू, साबिर हुसैन, इरफान गुड्डू, सुशील भटनागर, टिका सिंह सैनी, ताहिर खान और रशीद फारूकी जैसे नामों ने कार्यक्रम में ऊर्जा भरी। इसके अतिरिक्त कुलदीप एरी, मो. आरिफ, मंसूर मंसूरी, विधु शेखर शर्मा, संजय बोहरा, डॉ. रमेश कश्यप, डॉ. करन सिंह पाल, जगदीश पाल, केवल कुमार शर्मा और सौरभ शर्मा एडवोकेट की उपस्थिति ने संगठन की एकजुटता को और मजबूत किया। युवा नेताओं और अधिवक्ताओं की भागीदारी भी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। नजमी अंसारी, जमील अहमद, शुभम उपाध्याय एडवोकेट, शरीम सैफी, जफर मुन्ना, मो. रिजवान, अक्षत मिड्ढा एडवोकेट, विनोद शर्मा होंडा, राकेश यादव, राकेश भगत और शाहनवाज एडवोकेट ने आंदोलन को नई ऊर्जा दी। पूर्व पार्षद फिरोज हुसैन, परम सिद्धू, जाहिद हुसैन, मो. सेफ, अब्दुल समद, अनीस अंसारी, नौशाद उस्मानी एडवोकेट, इलियास माहिगिर, अंकुर दक्ष, वीरेंद्र कुमार और जितेन्द्र सरस्वती की मौजूदगी ने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस का यह विरोध केवल कुछ चेहरों तक सीमित नहीं, बल्कि हर वर्ग और हर पीढ़ी का साझा आक्रोश है। कुल मिलाकर, ज्ञापन सौंपने का यह कार्यक्रम कांग्रेस की संगठित ताकत, राजनीतिक संकल्प और जनसरोकारों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का प्रभावशाली प्रदर्शन बनकर सामने आया।





