नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। वर्तमान समय में भारत जिस राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक दौर से गुजर रहा है, उसने सत्ता, विपक्ष और आम नागरिक—तीनों को एक असहज प्रश्न के सामने खड़ा कर दिया है। देश के भीतर संसद से लेकर सड़कों तक और देश के बाहर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जिस तरह की बहसें खुलकर सामने आ रही हैं, वह यह संकेत देती हैं कि परिस्थितियां सामान्य नहीं हैं। जब संसद के भीतर ही शोर, आरोप और जवाबी हमले तेज हो जाएं, और अंतरराष्ट्रीय संदर्भों का हवाला देकर देश की नीतियों पर सवाल उठने लगें, तो स्वाभाविक है कि जिम्मेदारी तय करने की मांग उठे। इस पूरे परिदृश्य में एक तथ्य निर्विवाद है कि इस समय देश की सत्ता की बागडोर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों में है। ऐसे में यदि भारत की आर्थिक नीतियों, विदेश नीति, व्यापारिक समझौतों और रणनीतिक फैसलों पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो जवाबदेही भी उसी दिशा में जाती है। संसद के भीतर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जिस तरह इन मुद्दों को एक सूत्र में पिरोते हुए उठाया, उसने न केवल सत्ता पक्ष को असहज किया बल्कि देश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया। यह बहस केवल आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की दिशा को लेकर गहरे सवाल खड़े कर रही है।
संसद के भीतर बजट चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने जो कहा, वह सामान्य राजनीतिक बयानबाजी से कहीं आगे जाता दिखाई दिया। उन्होंने यह दावा किया कि भारत के 140 करोड़ नागरिकों का भविष्य एक व्यापक समझौते के तहत दांव पर लगा दिया गया है। यह बयान केवल भावनात्मक नारा नहीं था, बल्कि तथ्यों और दस्तावेजों के हवाले से रखी गई दलील के रूप में सामने आया। उनका यह कहना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को “सरेंडर” कर दिया है, सत्ता पक्ष के लिए सबसे असहज क्षणों में से एक बन गया। राहुल गांधी ने यह स्पष्ट किया कि यह किसी व्यक्ति विशेष का आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि भारत के किसानों, इंजीनियरों, एमएसएमई सेक्टर, औद्योगिक ढांचे और आर्थिक भविष्य को एक साथ जोखिम में डालने का मामला है। उनका तर्क था कि राजनीतिक सत्ता इस समय ऐसे दबावों में है, जहां समझौते करने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं बचा है। यही कारण है कि यह बहस केवल संसद तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रशासनिक और सुरक्षा एजेंसियों की सक्रियता भी अचानक बढ़ती दिखाई दी।
इसी पूरे घटनाक्रम के बीच दिल्ली पुलिस, प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय की अचानक सक्रियता ने कई नए सवाल खड़े कर दिए। जिस समय संसद के भीतर सरकार की नीतियों और फैसलों पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे थे, उसी समय पूर्व सेना प्रमुख नरवाने की किताब “फोर स्टार ऑफ डेस्टिनी” को लेकर एफआईआर दर्ज की जाती है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह कार्रवाई महज संयोग है या इसके पीछे कोई गहरी रणनीति छिपी है। किताब को रक्षा मंत्रालय से अनुमति न मिलने का हवाला देते हुए आईटी एक्ट और फिर सेक्शन 61 के तहत आपराधिक साजिश की बात सामने लाई जाती है। पेंग्विन रैंडम हाउस को नोटिस थमाया जाता है और मामला तेजी से आगे बढ़ता है। इस पूरी प्रक्रिया ने यह संकेत दिया कि अब मामला केवल एक किताब या प्रकाशक तक सीमित नहीं रहेगा। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि अगला कदम राहुल गांधी की ओर बढ़ सकता है, क्योंकि संसद के भीतर उन्होंने जिन मुद्दों को उठाया, वे सीधे सत्ता के शीर्ष और कॉर्पोरेट तंत्र के गठजोड़ की ओर इशारा करते हैं।
राहुल गांधी ने संसद में अपनी बात रखते हुए जिन तीन बड़े मुद्दों को केंद्र में रखा, उन्होंने सरकार की विदेश और आर्थिक नीति की बुनियाद पर ही सवाल खड़े कर दिए। उनका कहना था कि अमेरिका के साथ हुई डील में भारत की ऊर्जा नीति, डेटा सुरक्षा, मुद्रा स्थिरता और कृषि हितों को गंभीर रूप से कमजोर किया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इंडिया गठबंधन सत्ता में होता, तो किसी भी परिस्थिति में ऐसी शर्तों पर समझौता स्वीकार नहीं किया जाता। उनका तर्क था कि भारत का डेटा, भारत की ऊर्जा जरूरतें, भारत की सुरक्षा संरचना और भारत का आर्थिक ढांचा किसी भी सूरत में विदेशी शक्तियों के हवाले नहीं किया जा सकता। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि जिस तरह से यह समझौता हुआ है, वह केवल एक राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी को नहीं दर्शाता, बल्कि उस दबाव को उजागर करता है जिसके तहत देश की नीतियां तय की जा रही हैं। यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी एक स्पष्ट संदेश देता है कि भारत की राजनीति के भीतर इस डील को लेकर गहरी असहमति मौजूद है।
आर्थिक सर्वे का हवाला देते हुए राहुल गांधी ने सरकार की नीतियों की बारीकियों को सामने रखने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि बजट से ठीक पहले पेश किए गए आर्थिक सर्वे में वैश्विक भू-राजनीतिक संकट, अमेरिकी डॉलर की स्थिति और भारत की ऊर्जा चुनौतियों का स्पष्ट उल्लेख है। इसके बावजूद जो बजट पेश किया गया और जो समझौते किए गए, वे उस सर्वे की सिफारिशों से मेल नहीं खाते। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इस समय भारतीय मुद्रा एशियाई देशों में सबसे कमजोर स्थिति में है और डॉलर के मुकाबले ऐसा दबाव पहले कभी नहीं देखा गया। राहुल गांधी के अनुसार, अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था और डॉलर को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है, और भारत को इस संघर्ष में एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि वित्त मंत्री और वाणिज्य मंत्री इस स्थिति से भली-भांति परिचित हैं, फिर भी नीतिगत फैसले उसी दिशा में लिए जा रहे हैं जो भारत के दीर्घकालिक हितों के खिलाफ जाते हैं।

ब्रिक्स और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा व्यवस्था को लेकर उठे सवालों ने इस बहस को और गहरा कर दिया। राहुल गांधी ने याद दिलाया कि अक्टूबर 2024 में कज़ान में हुई ब्रिक्स बैठक में डॉलर के विकल्प के रूप में वैकल्पिक मुद्रा की चर्चा हुई थी। इसके बाद जैसे ही डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में आए, उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके कुछ ही महीनों बाद फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अमेरिका दौरा और 500 बिलियन डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य पर सहमति, कई सवाल खड़े करता है। अमेरिका की ओर से जारी फैक्ट शीट में यह उल्लेख कि भारत अमेरिका से बड़े पैमाने पर खरीदारी करेगा, यह संकेत देता है कि यह डील एकतरफा लाभ की ओर झुकी हुई है। राहुल गांधी ने यह सवाल उठाया कि जब भारत ब्रिक्स जैसे मंचों पर वैकल्पिक आर्थिक व्यवस्था की बात कर रहा है, तो फिर अमेरिका के साथ ऐसे समझौते क्यों किए जा रहे हैं जो उसी डॉलर आधारित व्यवस्था को मजबूत करते हैं।
डाटा, ऊर्जा और कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर राहुल गांधी की आपत्तियां इस बहस का केंद्र रहीं। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में डेटा ही असली ताकत है, और भारत के 140 करोड़ नागरिकों का डेटा बिना किसी ठोस सुरक्षा व्यवस्था के विदेशी कंपनियों को सौंप देना राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है। इसी तरह ऊर्जा के सवाल पर उन्होंने कहा कि भारत की तेल और गैस जरूरतों को लेकर निर्णय भारत के लोगों के हित में होने चाहिए, न कि किसी बाहरी दबाव में। कृषि क्षेत्र को लेकर उन्होंने अमेरिकी फैक्ट शीट का हवाला देते हुए कहा कि भारत में अमेरिकी कृषि उत्पादों पर शून्य प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रस्ताव देश के किसानों के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। दालों, सोयाबीन तेल, शराब और अन्य खाद्य उत्पादों के आयात से घरेलू कृषि और एमएसएमई सेक्टर पर गंभीर असर पड़ेगा।
टेक्सटाइल उद्योग को लेकर उठाए गए सवालों ने भी सरकार की नीति पर सवालिया निशान लगा दिया। राहुल गांधी ने कहा कि अमेरिका की फैक्ट शीट में स्पष्ट किया गया है कि भारतीय टेक्सटाइल के लिए वहां कोई खास जगह नहीं है, क्योंकि बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों को शून्य या बेहद कम टैरिफ का लाभ मिल रहा है। भारत का टेक्सटाइल उद्योग 18 प्रतिशत टैरिफ के साथ उस बाजार में कैसे प्रतिस्पर्धा करेगा, यह सरकार को स्पष्ट करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि टेक्सटाइल जैसे रोजगार-प्रधान क्षेत्र को कमजोर करना करोड़ों लोगों की आजीविका को खतरे में डालने जैसा है। यह सवाल केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है।
एप्सटीन फाइल और अमेरिकी अदालतों में चल रहे मामलों का जिक्र करते हुए राहुल गांधी ने सत्ता और कॉर्पोरेट गठजोड़ की ओर सीधा इशारा किया। उन्होंने कहा कि इन फाइलों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आया है, जिसे बाद में दबाने की कोशिश की गई। साथ ही अनिल अंबानी और हरदीप पुरी जैसे नामों का जिक्र करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि यदि आरोप इतने गंभीर हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं होती। उनका यह कहना कि अनिल अंबानी जेल में क्यों नहीं हैं, सत्ता के लिए बेहद असहज स्थिति पैदा कर गया। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका में अडानी समूह के खिलाफ चल रहे मामले केवल एक कारोबारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे भाजपा की वित्तीय संरचना तक जाते हैं। यह आरोप संसद के भीतर खुलकर लगाया जाना अपने आप में अभूतपूर्व था।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राहुल गांधी को बोलने से रोकने की कोशिशों और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को एक साथ जोड़कर देखा जा रहा है। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान उन्हें बोलने का मौका न देना, फिर बजट चर्चा के दौरान दस्तावेजों को सदन के पटल पर रखने से रोकना, यह सब संकेत देता है कि सरकार इस बहस को किसी भी कीमत पर सीमित रखना चाहती है। जब संसदीय कार्य मंत्री ने राहुल गांधी से आरोपों को प्रमाणित करने की मांग की और उन्होंने तुरंत दस्तावेज पेश करने की बात कही, तब स्पीकर की ओर से हस्तक्षेप किया जाना भी कई सवाल खड़े करता है। यह स्थिति दर्शाती है कि सरकार और संसद की कार्यप्रणाली के बीच एक असहज संतुलन बन चुका है।

अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में भारत की स्थिति भी इस बहस का अहम हिस्सा रही। क्वाड, एससीओ और ब्रिक्स जैसे मंचों पर भारत की भूमिका को लेकर राहुल गांधी ने कहा कि वर्तमान नीतियां देश को विरोधाभासी स्थितियों में खड़ा कर रही हैं। एक ओर भारत अमेरिका के साथ खड़ा दिखाई देता है, तो दूसरी ओर चीन और रूस के नेतृत्व वाले मंचों पर भी सक्रिय है। रूस की ओर से अमेरिका पर आर्थिक हथियार के रूप में व्यापार और मुद्रा का इस्तेमाल करने के आरोप, और भारत को लेकर उसकी चिंताएं, इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बनाती हैं। राहुल गांधी ने यह सवाल भी उठाया कि यदि भारत और चीन मिलकर अपने बाजार और डेटा की ताकत को एक दिशा में इस्तेमाल करें, तो वैश्विक शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।
अंततः यह बहस केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी के बीच की राजनीतिक टकराव नहीं रह जाती, बल्कि यह भारत के भविष्य की दिशा को लेकर एक व्यापक विमर्श बन जाती है। क्या वर्तमान नीतियां देश को आत्मनिर्भर बनाने की ओर ले जा रही हैं, या फिर उसे वैश्विक दबावों के आगे झुकने के लिए मजबूर कर रही हैं—यह सवाल अब संसद के बाहर भी गूंजने लगा है। एनडीए के सहयोगी दलों की भूमिका, चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार की राजनीतिक गणनाएं, और इंडिया गठबंधन की वैकल्पिक दृष्टि—इन सबके बीच भारत की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। आने वाला समय तय करेगा कि यह बहस केवल शब्दों तक सीमित रहती है या फिर नीतियों में वास्तविक बदलाव का कारण बनती है।





