काशीपुर। उत्तराखंड की राजनीति और श्रम नीति के क्षेत्र में बुधवार को हुई कैबिनेट बैठक के दौरान लिए गए छह अहम निर्णयों में से एक फैसले ने राज्य में व्यापक चर्चा को जन्म दे दिया है। उत्तराखंड सरकार ने कोविड काल के दौरान बोनस कटौती को लेकर श्रम विभाग द्वारा केंद्र सरकार को भेजे गए पेमेंट ऑफ बोनस संशोधन एक्ट को वापस लेने का निर्णय लिया है। इस विषय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए एआईसीसी सदस्य अनुपम शर्मा ने कहा कि यह फैसला राज्य के श्रमिकों और उद्योग जगत दोनों पर गहरा प्रभाव डालने वाला है। उन्होंने कहा कि कोविड महामारी के समय उद्योगों की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर हो गई थी और कई संस्थानों को अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ा था। ऐसे समय में बोनस भुगतान को लेकर संशोधन का प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन अब इसे वापस लेने से श्रमिकों को तत्काल राहत मिल सकती है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय श्रमिक वर्ग के हित में दिखाई देता है, लेकिन इसके आर्थिक और औद्योगिक प्रभावों को समझना भी आवश्यक है, क्योंकि किसी भी नीति का असर केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं रहता बल्कि उसका प्रभाव पूरे आर्थिक ढांचे पर पड़ता है।
महामारी के दौरान उत्पन्न परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए अनुपम शर्मा ने कहा कि कोविड काल में उद्योगों को उत्पादन में भारी गिरावट, बाजार में मांग की कमी और वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा था। कई उद्योगों के सामने कर्मचारियों का वेतन और बोनस देना चुनौतीपूर्ण हो गया था, क्योंकि उस समय कारोबार लगभग ठप हो गया था। उन्होंने कहा कि श्रम विभाग द्वारा केंद्र को भेजे गए संशोधन प्रस्ताव का उद्देश्य उद्योगों को अस्थायी राहत प्रदान करना था ताकि वे अपने आर्थिक संतुलन को बनाए रख सकें। अब जब सरकार ने इसे वापस लेने का निर्णय लिया है, तो उद्योगों को कर्मचारियों को पूर्ण बोनस देना पड़ सकता है, जिससे उनकी लागत बढ़ने की संभावना है। उन्होंने कहा कि विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्योग अभी तक महामारी से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं और उनके लिए यह निर्णय वित्तीय दबाव का कारण बन सकता है। उनका मानना है कि आर्थिक पुनर्वास की प्रक्रिया अभी जारी है और ऐसे समय में उद्योगों को संतुलित नीति की आवश्यकता है।
औद्योगिक विकास और निवेश की संभावनाओं पर टिप्पणी करते हुए अनुपम शर्मा ने कहा कि बोनस भुगतान से जुड़ी बाध्यता उद्योगों की विस्तार योजनाओं को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि जब किसी उद्योग की लागत बढ़ती है तो उसका सीधा असर उत्पादन और निवेश पर पड़ता है। उनका कहना था कि कई उद्योग भविष्य की योजनाओं को स्थगित कर सकते हैं या अपने खर्च को नियंत्रित करने के लिए नई भर्ती रोक सकते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में औद्योगिक विकास आर्थिक प्रगति का महत्वपूर्ण आधार है और यदि उद्योगों पर वित्तीय दबाव बढ़ता है तो निवेशकों का विश्वास भी प्रभावित हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए, जिससे श्रमिकों को भी लाभ मिले और उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी बनी रहे।
रोजगार के अवसरों पर संभावित असर को लेकर अनुपम शर्मा ने कहा कि यदि उद्योगों पर बोनस भुगतान का अतिरिक्त बोझ पड़ता है तो कंपनियां स्थायी कर्मचारियों की संख्या सीमित कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि कई उद्योग लागत कम करने के लिए ठेका श्रमिकों पर निर्भरता बढ़ा सकते हैं, जिससे युवाओं के लिए स्थायी रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि कंपनियां खर्च नियंत्रित करने के लिए वेतन वृद्धि रोक सकती हैं या कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती कर सकती हैं। उनका मानना है कि रोजगार बाजार में ऐसी परिस्थितियां श्रमिकों की आर्थिक सुरक्षा को प्रभावित कर सकती हैं और इससे सामाजिक असंतुलन की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने कहा कि रोजगार सृजन राज्य के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है और इसके लिए उद्योगों को मजबूत बनाए रखना जरूरी है।
सरकारी नीति और प्रशासनिक दृष्टिकोण पर विचार व्यक्त करते हुए अनुपम शर्मा ने कहा कि सरकार का यह निर्णय श्रमिक हितों को प्राथमिकता देने के उद्देश्य से लिया गया प्रतीत होता है, लेकिन उद्योग जगत की चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यदि उद्योग आर्थिक दबाव के कारण कमजोर होते हैं तो राज्य की औद्योगिक प्रगति प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा कि सरकार को श्रमिकों और उद्योगों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए समन्वित रणनीति तैयार करनी होगी। उनका मानना है कि राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए उद्योगों का सशक्त होना आवश्यक है और इसके लिए सरकार को उद्योगों के लिए सहायक योजनाएं तैयार करनी चाहिए।
सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से बोनस के महत्व को बताते हुए अनुपम शर्मा ने कहा कि बोनस कर्मचारियों के लिए अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण साधन होता है। उन्होंने कहा कि संशोधन एक्ट वापस लेने से श्रमिकों की आय बढ़ सकती है, जिससे उनकी क्रय शक्ति मजबूत होगी और बाजार में खर्च बढ़ने की संभावना है। उन्होंने कहा कि जब कर्मचारियों की आय बढ़ती है तो व्यापारिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलता है और इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि उद्योग आर्थिक दबाव के कारण उत्पादन या रोजगार में कटौती करते हैं तो इसका नकारात्मक प्रभाव राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि आर्थिक संतुलन बनाए रखने के लिए श्रमिक और उद्योग दोनों के हितों को समान रूप से ध्यान में रखना आवश्यक है।
श्रम नीतियों के दीर्घकालिक प्रभावों का उल्लेख करते हुए अनुपम शर्मा ने कहा कि कोविड महामारी ने श्रम व्यवस्था और औद्योगिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि महामारी के दौरान कई उद्योग बंद हो गए और कर्मचारियों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा संशोधन एक्ट वापस लेने का निर्णय श्रमिकों के हित में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है, लेकिन उद्योगों की आर्थिक स्थिरता भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि उद्योग आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं तो रोजगार और निवेश दोनों प्रभावित हो सकते हैं, जिससे राज्य की विकास दर पर असर पड़ सकता है।
भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए अनुपम शर्मा ने कहा कि इस निर्णय के बाद सरकार को उद्योगों के लिए राहत और प्रोत्साहन योजनाओं पर भी विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उद्योगों को मजबूत बनाने के लिए वित्तीय सहायता, कर छूट और निवेश प्रोत्साहन जैसी नीतियां बनाई जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और औद्योगिक विकास के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन यह संतुलन राज्य की आर्थिक प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि उद्योगों को मजबूत बनाकर ही रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं और राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी जा सकती है।
समग्र स्थिति का मूल्यांकन करते हुए अनुपम शर्मा ने कहा कि उत्तराखंड सरकार द्वारा लिया गया यह निर्णय श्रमिक हितों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है, लेकिन इसके प्रभाव उद्योगों और रोजगार क्षेत्र में भी दिखाई देंगे। उन्होंने कहा कि यह आवश्यक है कि सरकार इस फैसले के साथ उद्योगों के लिए सहायक नीतियां भी लागू करे, जिससे आर्थिक संतुलन बना रहे और रोजगार के अवसर प्रभावित न हों। उन्होंने कहा कि राज्य की प्रगति तभी संभव है जब श्रमिक और उद्योग दोनों सशक्त हों और सरकार की नीतियां दोनों वर्गों को समान रूप से लाभ पहुंचाने वाली हों।





