नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। मध्य पूर्व की मौजूदा भूराजनैतिक हलचल केवल क्षेत्रीय टकराव भर नहीं रह गई है, बल्कि यह अब वैश्विक शक्ति संतुलन को चुनौती देने वाली अवस्था में प्रवेश कर चुकी है। ईरान की सैन्य क्षमताओं को लेकर उठ रहे सवाल अब केवल इज़राइल या पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वाशिंगटन, बोस्टन और मियामी जैसे अमेरिकी शहरों के नाम पहली बार खुले तौर पर रणनीतिक विमर्श में शामिल किए जाने लगे हैं। यह स्थिति अपने आप में इस बात का संकेत है कि टकराव का दायरा कितना व्यापक हो चुका है। इज़राइल के राष्ट्रपति नेतानु द्वारा बार-बार यह दोहराया जाना कि अगर इज़राइल अस्तित्व की लड़ाई हारता है तो अमेरिका भी सुरक्षित नहीं रहेगा, एक असाधारण और ऐतिहासिक बयान माना जा रहा है। इससे पहले किसी भी इज़राइली नेतृत्व ने इस तरह सभ्यता, यहूदी अस्तित्व और अमेरिकी सुरक्षा को एक ही वाक्य में पिरोकर प्रस्तुत नहीं किया था। यही कारण है कि इस बयान को केवल राजनीतिक दबाव की रणनीति नहीं बल्कि वास्तविक रणनीतिक घबराहट के रूप में देखा जा रहा है, जो इस समय इज़राइल की सोच और नीति को दिशा दे रही है।
वर्तमान संकट की जड़ में वह सवाल है जो अब ज़ोर पकड़ चुका है कि क्या ईरान वाकई उस स्थिति में पहुंच गया है जहां वह इज़राइल के सुरक्षा डोम को भेदने और उससे आगे जाकर अंतरमहाद्वीपीय स्तर की सैन्य क्षमता विकसित करने के करीब है। इज़राइल का अब तक का आत्मविश्वास इसी धारणा पर आधारित रहा है कि उसकी बहुस्तरीय मिसाइल रक्षा प्रणाली किसी भी क्षेत्रीय खतरे को निष्क्रिय कर सकती है। लेकिन हालिया उपग्रह तस्वीरों और खुफिया आकलनों ने इस भरोसे में दरार डाल दी है। इज़राइली सुरक्षा प्रतिष्ठान का दावा है कि जून 2025 में चले 12 दिन के युद्ध के दौरान जिन ईरानी परमाणु और मिसाइल ठिकानों को नष्ट मान लिया गया था, वे अब दोबारा सक्रिय अवस्था में दिखाई दे रहे हैं। सड़कें फिर खुल चुकी हैं, बर्फ हट चुकी है, और जिन संरचनाओं को ध्वस्त समझा गया था वहां नए निर्माण साफ नजर आ रहे हैं। यह केवल पुनर्निर्माण नहीं बल्कि रणनीतिक छलावरण के तहत अंडरग्राउंड मिसाइल सिटी के रूप में विकसित की जा रही नई सैन्य संरचना का संकेत माना जा रहा है।
इसी संदर्भ में ईरान के बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम को लेकर इज़राइल की चिंता और गहरी हो गई है। शहरूद साइट, जिसे कभी ईरानी मिसाइल कार्यक्रम में रुकावट का प्रतीक माना गया था, अब एक बार फिर पूर्ण क्षमता के साथ सक्रिय बताई जा रही है। यहां शेकान और हाइपरसोनिक मिसाइलों के निर्माण की खबरें इज़राइल के लिए खतरे की घंटी साबित हुई हैं। इज़राइली आकलन के अनुसार, जिन 20 मिसाइल स्थलों की पहचान जून 2025 में की गई थी, उनमें से 12 से अधिक पूरी तरह ऑपरेशनल स्थिति में पहुंच चुके हैं। इसका अर्थ यह है कि ईरान न केवल जवाबी हमले की क्षमता बनाए हुए है, बल्कि जरूरत पड़ने पर पहले प्रहार की स्थिति में भी खुद को तैयार कर चुका है। यही कारण है कि नेतानु अब इसे केवल रणनीतिक धैर्य नहीं बल्कि प्रतिरोधक क्षमता की आक्रामक बहाली के रूप में देख रहे हैं।
परमाणु मोर्चे पर स्थिति और भी अधिक संवेदनशील बनती जा रही है। फोर्डो क्षेत्र, जिसे इज़राइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम का केंद्र मानता आया है, वहां 60 प्रतिशत यूरेनियम इनरचमेंट की पुष्टि ने चिंता को और बढ़ा दिया है। भले ही अब तक किसी परमाणु परीक्षण की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई हो, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्तर की इनरचमेंट किसी भी समय हथियार क्षमता में बदली जा सकती है। इज़राइल का तर्क है कि अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय केवल परमाणु बम के परीक्षण तक इंतजार कर रहे हैं, जबकि वास्तविक खतरा इससे बहुत पहले उत्पन्न हो चुका है। इसी कारण नेतानु यह मानने लगे हैं कि कूटनीतिक प्रक्रिया ईरान के लिए केवल समय खरीदने का माध्यम बन गई है, जिससे वह अपने सैन्य और परमाणु ढांचे को और मज़बूत कर सके।
इन तमाम घटनाक्रमों के बीच अमेरिका की भूमिका इज़राइल के लिए सबसे अधिक चिंता का विषय बन गई है। वाशिंगटन द्वारा लगातार कूटनीति को प्राथमिकता देना, मस्कट वार्ता को आगे बढ़ाना और तुर्की को मध्यस्थ की भूमिका सौंपना इज़राइल को यह संदेश दे रहा है कि अमेरिका अब सीधे सैन्य टकराव से बचना चाहता है। स्टीव विटकफ, जो डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत हैं, उनकी गतिविधियां इस बात का संकेत देती हैं कि व्हाइट हाउस फिलहाल ईरान को सैन्य रूप से घेरने के बजाय परमाणु प्रतिबंधों तक सीमित समझौते की राह तलाश रहा है। यही वह बिंदु है जहां इज़राइल और अमेरिका के रास्ते अलग-अलग होते नजर आ रहे हैं। इज़राइल का मानना है कि केवल परमाणु मुद्दे पर बातचीत ईरान की वास्तविक सैन्य शक्ति को अनदेखा करना है, जबकि अमेरिका इसे संघर्ष टालने का व्यावहारिक विकल्प मान रहा है।

तुर्की की भूमिका ने इस समीकरण को और जटिल बना दिया है। अंकारा खुले तौर पर युद्ध के खिलाफ खड़ा दिखाई दे रहा है और उसका तर्क है कि ईरान के साथ 534 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करने के कारण किसी भी सैन्य संघर्ष का सीधा असर तुर्की पर पड़ेगा। शरणार्थियों की संभावित लहर, आर्थिक अस्थिरता और क्षेत्रीय अशांति तुर्की के लिए गंभीर खतरे हैं। क़तर भी इसी दृष्टिकोण का समर्थन कर रहा है और वह कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देने की बात कर रहा है। इसके विपरीत इज़राइल को लगता है कि तुर्की और क़तर की यह नीति ईरान को रणनीतिक राहत प्रदान कर रही है। नेतानु के करीबी सूत्रों का कहना है कि अमेरिका का झुकाव अगर इसी दिशा में बना रहा तो इज़राइल के लिए अकेले कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
इस पृष्ठभूमि में सऊदी अरब का रुख भी उल्लेखनीय बदलाव से गुज़रा है। जनवरी में जहां सऊदी नेतृत्व सैन्य कार्रवाई के खिलाफ था और अपनी जमीन से अमेरिकी विमानों को उड़ान की अनुमति देने से इनकार कर रहा था, वहीं अब प्रिंस खालिद बिन सलमान का बयान इस ओर इशारा करता है कि अगर ईरान पर हमला नहीं हुआ तो मौजूदा सत्ता और अधिक साहसी हो जाएगी। यह बदलाव अचानक नहीं बल्कि क्षेत्रीय संतुलन में हो रहे सूक्ष्म परिवर्तनों का परिणाम माना जा रहा है। अमेरिकी युद्धपोत अब्राहम लिंकन की तैनाती, फाइटर जेट्स और एयर डिफेंस बैटरियों की त्वरित तैनाती इस बात का प्रमाण है कि भले ही अमेरिका कूटनीति की बात कर रहा हो, लेकिन सैन्य विकल्प को पूरी तरह त्यागने के मूड में नहीं है।
ईरान की ओर से भी बयानबाज़ी कम तीखी नहीं रही है। मेजर जनरल अब्दुल रहीम मौसमी ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई का जवाब ऐसा होगा जो दुश्मनों को भारी नुकसान पहुंचाएगा। उनके अनुसार, किसी भी हमले से युद्ध पूरे क्षेत्र में फैल जाएगा और इसके परिणाम किसी के नियंत्रण में नहीं रहेंगे। इसी के साथ ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अगराची ने दोहा में यह साफ कर दिया कि यूरेनियम इनरचमेंट पर कोई समझौता संभव नहीं है और मिसाइल कार्यक्रम पर बातचीत पूरी तरह अस्वीकार्य है। यह बयान सीधे तौर पर अमेरिका और इज़राइल दोनों के लिए चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
इज़राइल के भीतर इस पूरे घटनाक्रम को लेकर जो सबसे बड़ा डर उभरकर सामने आया है, वह उसकी पारंपरिक छवि से जुड़ा हुआ है। दशकों से इज़राइल खुद को इस क्षेत्र में अजेय सैन्य शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता रहा है, जिसकी हर रणनीति के पीछे अमेरिका की अटूट समर्थन की छाया रही है। लेकिन पहली बार उसे यह आशंका सताने लगी है कि अमेरिका का रुख बदल रहा है और वह अब क्षेत्रीय संतुलन को नई तरह से परिभाषित करना चाहता है। नेतानु द्वारा यह कहना कि अगर इज़राइल खत्म हुआ तो अमेरिका भी सुरक्षित नहीं रहेगा, इसी भय की अभिव्यक्ति मानी जा रही है। यह केवल राजनीतिक बयान नहीं बल्कि अमेरिका को चेतावनी देने की कोशिश है कि इज़राइल की अनदेखी अंततः वाशिंगटन को भी भारी पड़ सकती है।
इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखने पर यह स्पष्ट होता है कि मौजूदा संकट किसी एक घटना या फैसले का परिणाम नहीं है। यह दो वर्षों से लगातार उबल रहे क्षेत्रीय संघर्षों, बदलते वैश्विक गठबंधनों और टैरिफ वॉर के बाद उभरे नए शक्ति केंद्रों का स्वाभाविक नतीजा है। रूस और चीन की भूमिका, भारत की रणनीतिक दुविधा, पाकिस्तान का दोहरा रुख और मध्य पूर्व का बंटा हुआ स्वरूप इस संकट को और जटिल बनाते हैं। ईरान इस परिस्थिति को अवसर के रूप में देख रहा है, जबकि इज़राइल इसे अस्तित्व का संकट मान रहा है। अमेरिका इन दोनों के बीच संतुलन साधने की कोशिश में है, लेकिन यही संतुलन अब सबसे बड़ा विवाद बन चुका है। अंततः सवाल केवल इतना नहीं है कि ईरान कितना शक्तिशाली हो चुका है, बल्कि यह भी है कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में कौन सी शक्ति अपने प्रभाव को बनाए रखने में सफल होगी। युद्ध का रास्ता चुनने से अराजकता बढ़ेगी, लेकिन कूटनीति का रास्ता अपनाने से इज़राइल को अपने प्रभाव के क्षरण का डर सता रहा है। यही द्वंद्व इस पूरे संकट का मूल है, जहां हर पक्ष जानता है कि फैसला चाहे जो भी हो, उसके परिणाम दूरगामी और गहरे होंगे।





