गुरुग्राम। ऋषिकुलम गुरुकुल विद्यापीठ उस समय विशेष चर्चा में आ गया, जब उत्तराखंड सरकार के सचिव, संस्कृत शिक्षा, जनगणना एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन दीपक कुमार ने संस्थान का औपचारिक दौरा किया। इस अवसर पर उनका स्वागत पारंपरिक विधि-विधान और गुरुकुल परंपरा के अनुरूप किया गया, जिसमें आचार्यों और छात्रों ने पूरे आत्मीय भाव के साथ उनका अभिनंदन किया। सचिव दीपक कुमार का यह दौरा केवल औपचारिक शिष्टाचार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने गुरुकुल की शैक्षणिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गतिविधियों को गहराई से समझने का प्रयास किया। उन्होंने विद्यार्थियों से प्रत्यक्ष संवाद किया, उनके अध्ययन, दिनचर्या और संस्कृत शिक्षा के प्रति उनके समर्पण को नजदीक से देखा। गुरुकुल परिसर में व्याप्त अनुशासन, साधना और परंपरा के वातावरण ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया, जिसे उन्होंने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का जीवंत उदाहरण बताया।
अपने भ्रमण के दौरान सचिव दीपक कुमार ने गुरुकुल के छात्रों द्वारा प्रस्तुत विभिन्न पारंपरिक विधाओं का अवलोकन किया, जिनमें प्रज्ञा चक्षु, मलखंब, वैदिक मंत्र उच्चारण तथा अन्य पवित्र प्राचीन अभ्यास शामिल थे। इन प्रस्तुतियों में छात्रों की साधना, एकाग्रता और शारीरिक-मानसिक संतुलन स्पष्ट रूप से झलक रहा था। विशेष रूप से प्रज्ञा चक्षु जैसी दुर्लभ और गूढ़ विद्या ने सचिव का ध्यान आकर्षित किया, जिसे देखकर उन्होंने इसे भारतीय ज्ञान परंपरा की अनमोल धरोहर बताया। मलखंब के अभ्यास में छात्रों की शारीरिक क्षमता और अनुशासन देखकर उन्होंने इसकी सराहना की और कहा कि यह केवल व्यायाम नहीं बल्कि आत्मसंयम और साधना का माध्यम भी है। मंत्र उच्चारण के दौरान वातावरण में जो आध्यात्मिक ऊर्जा महसूस हुई, उसने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि ऐसी परंपराएं आधुनिक जीवन में भी संतुलन और शांति प्रदान कर सकती हैं।
इस अवसर पर दीपक कुमार ने स्पष्ट रूप से यह इच्छा व्यक्त की कि गुरुकुलों में संरक्षित ऐसी प्राचीन भारतीय विधाओं को केवल सीमित दायरे में न रखा जाए, बल्कि पूरे भारतवर्ष में इन्हें प्रोत्साहित और प्रसारित किया जाए। उन्होंने कहा कि संस्कृत और उससे जुड़ी पारंपरिक विद्याएं किसी एक राज्य या क्षेत्र की नहीं हैं, बल्कि ये संपूर्ण राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान हैं। सचिव ने इस बात पर जोर दिया कि यदि इन विधाओं को आधुनिक शिक्षा प्रणाली और प्रशासनिक सहयोग के माध्यम से आगे बढ़ाया जाए, तो युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने में बड़ी सफलता मिल सकती है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि उत्तराखंड सरकार इस दिशा में नीतिगत और संस्थागत सहयोग देने के लिए गंभीर है, ताकि संस्कृत आधारित शिक्षा और परंपराएं राष्ट्रीय स्तर पर सशक्त हो सकें।
छात्रों से संवाद करते हुए सचिव दीपक कुमार ने संस्कृत विषय के साथ प्रशासनिक सेवाओं, विशेष रूप से भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस बनने की संभावनाओं पर भी विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने छात्रों को यह समझाने का प्रयास किया कि संस्कृत केवल धार्मिक या शैक्षणिक विषय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तर्क, दर्शन और प्रशासनिक समझ को भी मजबूत बनाती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि संस्कृत के गहन अध्ययन से भाषा की स्पष्टता, निर्णय क्षमता और विश्लेषणात्मक सोच विकसित होती है, जो सिविल सेवा जैसी परीक्षाओं में अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती है। सचिव ने छात्रों को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने और आधुनिक प्रतिस्पर्धाओं का सामना करने के लिए प्रेरित किया, यह कहते हुए कि संस्कृत पृष्ठभूमि होने के बावजूद वे देश के सर्वाेच्च प्रशासनिक पदों तक पहुंच सकते हैं।

दौरे के दौरान उन्होंने कुछ विद्यार्थियों को विशेष रूप से प्रेरित किया कि वे अपनी पारंपरिक विधाओं को इस स्तर तक निखारें कि उन्हें भारत के विभिन्न हिस्सों में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकें। उन्होंने कहा कि प्रज्ञा चक्षु, मलखंब, योग, मंत्र चिकित्सा और अन्य पारंपरिक ज्ञान विधाओं की आज वैश्विक स्तर पर मांग बढ़ रही है। यदि इन विद्याओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक प्रस्तुति के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो यह न केवल रोजगार का माध्यम बन सकती हैं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक साख को भी विश्व मंच पर मजबूत कर सकती हैं। सचिव ने यह भी कहा कि युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए परंपरा और आधुनिकता का संतुलन अत्यंत आवश्यक है।
अपने संबोधन में दीपक कुमार ने केवल संरक्षण तक सीमित न रहकर अनुसंधान और नवाचार पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने प्रज्ञा चक्षु और स्पर्श चिकित्सा जैसी गूढ़ संस्कृत परंपराओं को संरक्षित करने के साथ-साथ उनके वैज्ञानिक और चिकित्सकीय पहलुओं पर शोध करने की आवश्यकता बताई। इसके अलावा मंत्र चिकित्सा जैसे विषयों पर भी गहन अध्ययन और अनुसंधान को प्रोत्साहित किया। उन्होंने गुरुकुल के आचार्यों और छात्रों से आग्रह किया कि वे इन विषयों पर व्यवस्थित शोध कार्य करें, ताकि इनके लाभ और प्रभाव को आधुनिक संदर्भ में प्रमाणित किया जा सके। सचिव का मानना था कि जब प्राचीन ज्ञान को शोध और दस्तावेजीकरण के माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा, तब इसे व्यापक स्वीकृति मिलेगी।
इस क्रम में उत्तराखंड के संस्कृत विश्वविद्यालय एवं संस्कृत संस्थानम के साथ संभावित समझौता ज्ञापन यानी एमओयू पर भी चर्चा हुई। सचिव दीपक कुमार ने संकेत दिया कि यदि इस तरह के संस्थागत सहयोग स्थापित होते हैं, तो गुरुकुलों की गतिविधियों को एक व्यापक मंच मिल सकता है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और गुरुकुलों के बीच सहयोग से पाठ्यक्रम विकास, शोध परियोजनाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को नई दिशा मिलेगी। इस तरह का तालमेल न केवल छात्रों के लिए लाभकारी होगा, बल्कि संस्कृत शिक्षा को संगठित और आधुनिक ढांचे में आगे बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होगा। उन्होंने इस पहल को दीर्घकालिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बताया।
दौरे से पूर्व और पश्चात गुरुकुल के अधिकारियों, आचार्यों और छात्रों ने सचिव दीपक कुमार के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने उनके मार्गदर्शन और सकारात्मक दृष्टिकोण की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के दौरे गुरुकुलों को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान करते हैं। छात्रों ने भी अपने अनुभव साझा किए और कहा कि सचिव से मिला मार्गदर्शन उनके भविष्य के लिए प्रेरणास्रोत बनेगा। गुरुकुल प्रशासन ने इस अवसर को संस्कृत शिक्षा और भारतीय परंपराओं के लिए उत्साहवर्धक बताया। अंत में सचिव दीपक कुमार ने ऋषिकुलम गुरुकुल के आचार्य एवं संचालक को इस पहल के लिए शुभकामनाएं और आशीर्वाद प्रदान किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के संस्थान भारतीय संस्कृति की आत्मा को जीवित रखे हुए हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन सकते हैं। उनके इस दौरे को केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि संस्कृत और गुरुकुल परंपरा के प्रति एक सकारात्मक संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जो शिक्षा, संस्कृति और आत्मनिर्भरता की दिशा में नए रास्ते खोल सकता है।





