देहरादून। संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार गैरोला ने निर्धारित समय प्रातः 9.30 बजे श्री नेपाली संस्कृत उत्तर मध्यमा विद्यालय का औचक निरीक्षण किया। विद्यालय परिसर में प्रवेश करते ही उन्होंने सीधे प्रार्थना सभा में सहभागिता की, जहाँ विद्यार्थियों की अनुशासित उपस्थिति, वेदपाठ और सामूहिक गतिविधियों ने एक सशक्त शैक्षिक वातावरण का परिचय दिया। विद्यालय के प्रधानाचार्य डाँक्टर ओम प्रकाश पूर्वाल, प्रबंधक ललित डंग, ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष कपिल चौपडा तथा समस्त अध्यापकगण ने उनका पुष्पगुच्छ और आत्मीय शब्दों से स्वागत किया। यह अवसर केवल औपचारिक निरीक्षण का नहीं रहा, बल्कि संस्कृत शिक्षा की वर्तमान स्थिति, उसकी दिशा और भविष्य की संभावनाओं पर सार्थक संवाद का मंच भी बन गया। सचिव ने सभा की व्यवस्था, अनुशासन और विद्यार्थियों की सहभागिता को देखकर संतोष व्यक्त किया और कहा कि ऐसे वातावरण में संस्कृत शिक्षा का उद्देश्य और प्रभाव दोनों सशक्त रूप से सामने आते हैं।
सभा को संबोधित करते हुए दीपक कुमार गैरोला ने उत्तराखंड सरकार की उस महत्त्वपूर्ण पहल पर विस्तार से प्रकाश डाला, जिसके अंतर्गत अब संस्कृत विद्यालयों में पूर्व मध्यमा स्तर से ही विज्ञान और गणित जैसे आधुनिक विषयों को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस परिवर्तन का उद्देश्य संस्कृत विद्यार्थियों को मुख्यधारा की प्रतिस्पर्धी शिक्षा से जोड़ना है, ताकि उत्तर मध्यमा अर्थात बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करने वाले छात्र इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा श्रम्म् तथा चिकित्सा शिक्षा की प्रवेश परीक्षा छम्म्ज् में भी आत्मविश्वास के साथ सम्मिलित हो सकें। उनके अनुसार यह कदम संस्कृत और आधुनिक विज्ञान के बीच सेतु का कार्य करेगा और यह धारणा भी बदलेगा कि संस्कृत शिक्षा केवल पारंपरिक विषयों तक सीमित है। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि वे संस्कृत की गहन विद्या के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी विकसित करें, जिससे वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकें।
अपने वक्तव्य में उन्होंने विद्यालय प्रबंधन से एक अभिनव दिशा में आगे बढ़ने का आग्रह भी किया। उन्होंने संस्कृत शिक्षा विभाग द्वारा प्रोत्साहित मंत्र चिकित्सा के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना था कि हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों और संस्कृत शास्त्रों में वर्णित मंत्रों का मानव स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस पर वैज्ञानिक पद्धति से अध्ययन और शोध किया जाना चाहिए। यदि विद्यालय, शिक्षक और विद्यार्थी इस दिशा में गंभीर प्रयास करें तो न केवल रोगियों को लाभ मिल सकता है, बल्कि भारतीय मंत्र परंपरा का वैज्ञानिक प्रमाण भी विश्व मंच पर स्थापित हो सकता है। उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया कि सुनियोजित शोध के माध्यम से मंत्रों की शक्ति को प्रमाणित किया जा सकता है और इससे भारत की सांस्कृतिक धरोहर का गौरव वैश्विक स्तर पर और अधिक बढ़ेगा।

संस्कृत शास्त्रों में निहित प्रज्ञा चक्षु विद्या का उल्लेख करते हुए सचिव ने कहा कि यह विद्या केवल ग्रंथों तक सीमित न रहकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचनी चाहिए। उन्होंने विद्यालय प्रबंधन और प्रधानाचार्य को सलाह दी कि विद्यार्थियों के माध्यम से इस विद्या का प्रचार-प्रसार जन-जन तक किया जाए। उनके अनुसार संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि जीवन को देखने और समझने की एक समग्र दृष्टि है, जो मानव चेतना को विकसित करती है। यदि इस दृष्टिकोण को समाज में व्यापक रूप से अपनाया जाए तो नैतिकता, अनुशासन और बौद्धिक क्षमता का विकास स्वाभाविक रूप से होगा। उन्होंने यह भी कहा कि विद्यालय ऐसे कार्यक्रम और कार्यशालाएँ आयोजित कर सकता है, जिनसे आम नागरिक भी संस्कृत ज्ञान की इस प्राचीन परंपरा से जुड़ सकें और उसका व्यावहारिक लाभ उठा सकें।
विभागीय योजनाओं की जानकारी साझा करते हुए दीपक कुमार गैरोला ने बताया कि संस्कृत शिक्षा विभाग विद्यार्थियों और विद्यालयों के सर्वांगीण विकास के लिए कई योजनाएँ संचालित कर रहा है। उन्होंने द्विभाषी नाम पट्टिका योजना, गार्गी छात्रवृत्ति, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु निःशुल्क कोचिंग तथा संस्कृत ग्राम जैसी योजनाओं का विस्तृत विवरण दिया। उनके अनुसार इन योजनाओं का उद्देश्य न केवल विद्यार्थियों को आर्थिक और शैक्षिक सहायता देना है, बल्कि संस्कृत को दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना भी है। उन्होंने प्रबंधन और शिक्षकों से आग्रह किया कि वे इन योजनाओं की जानकारी विद्यार्थियों और अभिभावकों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाएँ, ताकि अधिक से अधिक लोग इनका लाभ उठा सकें और संस्कृत शिक्षा की ओर आकर्षित हों।
सामाजिक सरोकारों पर बल देते हुए सचिव ने शिक्षकों और प्रबंधन से यह भी आह्वान किया कि विद्यालय के आसपास स्थित मलिन बस्तियों में विशेष शिविर आयोजित किए जाएँ। इन शिविरों के माध्यम से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों के अभिभावकों को शिक्षा के महत्व से अवगत कराया जाए और उन्हें बताया जाए कि सरकार ने उनके बच्चों के लिए डाक्टर भीमराव अम्बेडकर छात्रवृत्ति जैसी योजनाएँ उपलब्ध कराई हैं। उन्होंने कहा कि यदि इन वर्गों के बच्चों को समय पर सही मार्गदर्शन और सहायता मिले, तो वे भी समाज की मुख्यधारा में आकर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं। संस्कृत शिक्षा, जो समता और समरसता का संदेश देती है, इन समुदायों के लिए सशक्तिकरण का माध्यम बन सकती है।

दैनिक शैक्षणिक गतिविधियों में नवाचार की बात करते हुए उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि प्रत्येक दिन कक्षाओं की समाप्ति के उपरांत संस्कृत संभाषण शिविर आयोजित किए जाएँ। उनका मानना था कि भाषा का वास्तविक विकास तब होता है, जब उसका प्रयोग बोलचाल में किया जाए। यदि विद्यार्थी नियमित रूप से संस्कृत में संवाद करेंगे तो उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और भाषा पर उनकी पकड़ भी मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि ऐसे शिविरों से संस्कृत केवल परीक्षा का विषय न रहकर जीवन की भाषा बनेगी। इसके साथ ही उन्होंने छात्रों को यह भी प्रेरित किया कि वे संस्कृत के साथ-साथ कम से कम एक विदेशी भाषा अवश्य सीखें, ताकि वे संस्कृत शास्त्रों के गूढ़ ज्ञान का अनुवाद कर विश्व समुदाय तक पहुँचा सकें।
अपने संबोधन में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि संस्कृत शिक्षा विभाग संस्कृत के विकास और प्रसार के लिए निरंतर प्रयासरत है। सरकार का लक्ष्य है कि संस्कृत शिक्षा आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप हो और इसके विद्यार्थी किसी भी क्षेत्र में पीछे न रहें। उन्होंने विश्वास जताया कि विद्यालयों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के संयुक्त प्रयास से यह लक्ष्य अवश्य प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने प्रार्थना सभा में प्रस्तुत की जा रही गतिविधियों की विशेष सराहना की और कहा कि इससे विद्यार्थियों में अनुशासन, नेतृत्व और सांस्कृतिक चेतना का विकास होता है। उन्होंने सभी छात्रों को उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ दीं और उनसे अपेक्षा की कि वे संस्कृत की गरिमा को बनाए रखते हुए नए आयाम स्थापित करेंगे।
इस अवसर पर विद्यालय परिवार के अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे, जिनमें अनुसूया प्रसाद सुन्दरियाल, शान्ति प्रसाद डंगवाल, वीजेन्द्र मौर्य, कामेश्वर लसियाल, विपिन बहुगुणा, सुभाष चन्द्र डोभाल, हर्षपति धस्माना, पूनम खरोला, प्रियंका सेमवाल, सुभाष प्रसाद नौटियाल सहित विद्यालय के समस्त अध्यापक और कर्मचारी शामिल थे। सभी ने सचिव के विचारों को ध्यानपूर्वक सुना और संस्कृत शिक्षा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने के लिए उनके सुझावों का स्वागत किया। यह निरीक्षण केवल एक प्रशासनिक दौरा नहीं, बल्कि संस्कृत शिक्षा के भविष्य की दिशा तय करने वाला प्रेरणादायी संवाद सिद्ध हुआ, जिसने विद्यालय, शिक्षक और विद्यार्थियों सभी में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार किया।





