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अमेरिका व्यापार समझौते पर बढ़ती आशंकाएं भारत के किसानों का भविष्य सवालों में घिरा दिखा

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। भारत-अमेरिका संभावित व्यापार समझौते को लेकर देश के कृषि और दुग्ध क्षेत्र में गहरी चिंता का माहौल बनता दिखाई दे रहा है। हाल ही में सामने आई स्टेट बैंक की एक रिपोर्ट ने इस आशंका को और मजबूत कर दिया है कि यदि भारत अपने डेयरी सेक्टर को अमेरिकी कंपनियों और उत्पादों के लिए खोल देता है तो भारतीय किसानों को लगभग एक लाख करोड़ रुपये तक का नुकसान झेलना पड़ सकता है। रिपोर्ट सामने आने के बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है और संसद परिसर से लेकर किसान संगठनों तक इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। जानकारी के अनुसार, पिछले वर्ष जुलाई के दौरान अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाया था कि वह अपने डेयरी बाजार को विदेशी उत्पादों के लिए खोले, जबकि भारत की ओर से लगातार यह दावा किया जाता रहा है कि दुग्ध क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित रखा जाएगा। हालांकि केवल आश्वासन दिए जाने से विपक्ष और किसान संगठनों की चिंता कम होती नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस के सांसदों ने संसद परिसर में प्रदर्शन करते हुए ‘ट्रैप डील’ लिखे बैनर के साथ विरोध जताया और कहा कि जब तक सरकार इस समझौते की पूरी शर्तें सार्वजनिक नहीं करती, तब तक इस समझौते का जश्न मनाना जल्दबाजी माना जाएगा। विपक्ष का तर्क है कि यदि अमेरिकी डेयरी उत्पाद भारत में बड़े स्तर पर आने लगते हैं तो भारतीय किसानों को कठोर प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा, जिसके लिए अभी कोई स्पष्ट तैयारी दिखाई नहीं दे रही है।

इसी बहस को आगे बढ़ाते हुए ‘डाउन टू अर्थ’ में प्रकाशित सचिन कुमार शर्मा, कमलिनी मुखर्जी और स्वायन नियोगी की रिपोर्ट ने भारत और अमेरिका के कृषि क्षेत्र में मिलने वाली सब्सिडी के बीच विशाल अंतर को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में किसानों को मिलने वाली सरकारी सहायता भारतीय किसानों की तुलना में 122 गुना तक अधिक बताई गई है, जो दोनों देशों की कृषि संरचना के बीच असमानता को स्पष्ट रूप से सामने लाती है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023 में अमेरिका के एक किसान को औसतन 183,488 डॉलर तक की सब्सिडी प्राप्त हुई, जो भारतीय मुद्रा में लगभग डेढ़ से दो करोड़ रुपये के बराबर बैठती है। कपास, चीनी, चावल और कॉफी जैसे उत्पादों पर अमेरिकी किसानों को 50 प्रतिशत से लेकर 215 प्रतिशत तक सरकारी सहायता उपलब्ध कराई जाती है। इसके विपरीत भारत में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत किसानों को सालाना केवल छह हजार रुपये की आर्थिक सहायता मिलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी आर्थिक असमानता के बीच भारतीय किसान अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में अपने दम पर टिक पाने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। यही कारण है कि जैसे ही संभावित व्यापार समझौते की खबर सामने आई, किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग शुरू कर दी कि इस समझौते में कृषि और दुग्ध क्षेत्र को लेकर किन शर्तों पर सहमति बनी है।

सरकार की ओर से इस मुद्दे पर सफाई देते हुए वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में कहा है कि भारत ने वार्ताओं के दौरान अपने संवेदनशील क्षेत्रों विशेष रूप से कृषि और डेयरी सेक्टर के हितों की रक्षा सुनिश्चित की है। उन्होंने बताया कि लगभग एक वर्ष तक चली कई चरणों की बातचीत के बाद दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार समझौते के विभिन्न क्षेत्रों को अंतिम रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की है। दो फरवरी की रात समझौता होने की घोषणा की गई, लेकिन छह फरवरी तक इस समझौते की विस्तृत शर्तें सार्वजनिक नहीं की गईं, जिससे संदेह और बढ़ गया। जब मीडिया और विपक्ष ने समझौते के विवरण के बारे में सवाल पूछे तो पहले यह कहा गया कि डिटेल अभी तैयार की जा रही हैं, फिर बताया गया कि साझा बयान जारी होने में कुछ दिन लग सकते हैं और अंततः यह कहा गया कि मार्च के मध्य तक समझौते पर कानूनी रूप से हस्ताक्षर किए जाएंगे। इसके बाद ही आयात शुल्क में संभावित बदलाव लागू हो पाएंगे। इस बीच एनडीए के सांसदों द्वारा समझौते का ड्राफ्ट सार्वजनिक हुए बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत और सम्मान किए जाने को लेकर भी विपक्ष ने सवाल उठाए और इसे जल्दबाजी में जश्न मनाने की कोशिश बताया।

अमेरिका की ओर से इस समझौते को लेकर दिए जा रहे बयानों ने विवाद को और तेज कर दिया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जुड़े अधिकारियों और प्रेस सचिव ने कहा कि भारत ने अमेरिका से तेल खरीदने और ऊर्जा, परिवहन तथा कृषि उत्पादों सहित कई क्षेत्रों में 500 बिलियन डॉलर तक निवेश करने का वादा किया है। यह बयान सामने आने के बाद यह सवाल उठने लगा कि क्या यह समझौता संतुलित व्यापार की दिशा में है या भारत पर आयात का अतिरिक्त दबाव बढ़ाने वाला है। मीडिया से बातचीत के दौरान पीयूष गोयल ने कहा कि भारत हर वर्ष अमेरिका से लगभग 100 बिलियन डॉलर का सामान खरीदेगा, जिसमें बोइंग विमान और उससे जुड़े इंजन तथा स्पेयर पार्ट्स भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि विमानन क्षेत्र में पहले से दिए गए ऑर्डर और भविष्य की संभावनाओं को मिलाकर यह राशि 70 से 80 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इतनी बड़ी राशि केवल एक सेक्टर में खर्च हो रही है तो यह समझौता कृषि क्षेत्र में अमेरिका को अतिरिक्त लाभ पहुंचाने की संभावना भी बढ़ाता है।

अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिंस के बयान ने इस बहस को और तीखा बना दिया है। उन्होंने कहा कि इस समझौते से अमेरिकी कृषि उत्पादों का भारत के विशाल बाजार में निर्यात बढ़ेगा, जिससे अमेरिका के ग्रामीण इलाकों में आर्थिक प्रवाह तेज होगा। उनके इस बयान को भारत में किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने गंभीरता से लिया और आरोप लगाया कि यदि अमेरिकी किसानों को इस समझौते से लाभ मिल रहा है तो इसका प्रभाव भारतीय किसानों पर नकारात्मक पड़ सकता है। दूसरी ओर भारत के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रेस नोट जारी कर कहा कि कृषि और डेयरी क्षेत्र के हितों से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया गया है और भारत का बाजार ऐसे किसी क्षेत्र के लिए नहीं खोला गया है जिससे किसानों को नुकसान पहुंचे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कोई बड़ी चीज अचानक भारतीय बाजार में प्रवेश नहीं करेगी, जिससे यह सवाल उठने लगा कि क्या कुछ उत्पाद धीरे-धीरे बाजार में प्रवेश कर सकते हैं और उनका असर क्या होगा।

अमेरिका के व्यापारिक प्रतिनिधि जेमिसन ग्रियर ने एक अंतरराष्ट्रीय चैनल से बातचीत में कहा कि भारत ने नट्स, फल, सब्जियां, वाइन और स्पिरिट्स पर आयात शुल्क कम करने या हटाने पर सहमति जताई है, जिससे अमेरिकी किसानों के लिए एक अरब से अधिक उपभोक्ताओं का बाजार खुल सकता है। यह बयान भारत सरकार के दावों से अलग नजर आता है, जहां कहा जा रहा है कि फल और डेयरी सेक्टर पूरी तरह सुरक्षित हैं। हालांकि ग्रियर ने डेयरी, चीनी या चावल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया, लेकिन उनके बयान ने किसानों के बीच भ्रम और चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आयात शुल्क में बड़े पैमाने पर कमी आती है तो भारतीय बाजार में विदेशी उत्पादों की कीमत कम हो सकती है, जिससे घरेलू किसानों को उचित मूल्य मिलने में कठिनाई हो सकती है।

कृषि विशेषज्ञों और किसान संगठनों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते केवल निर्यात बढ़ाने के अवसर ही नहीं लाते बल्कि घरेलू उत्पादन पर दबाव भी बढ़ाते हैं। उदाहरण के तौर पर हाल के वर्षों में अमेरिका से सोयाबीन तेल, कपास और बादाम के आयात में तेजी देखी गई है। इंडियन एक्सप्रेस में हरीश दामोदरन की रिपोर्ट के अनुसार जनवरी से नवंबर के बीच अमेरिका से कृषि उत्पादों के आयात में 34 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई और 2025 में यह आंकड़ा 2.85 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। अगस्त 2025 में जब भारत ने अमेरिका से आने वाले कपास पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क हटाकर शून्य कर दिया था, तो केवल दो दिनों के भीतर कपास की कीमत में लगभग 1100 रुपये की गिरावट दर्ज की गई थी। इससे टेक्सटाइल उद्योग को लाभ मिला, लेकिन कपास उत्पादकों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर फसल बेचनी पड़ी, जिससे कई राज्यों में किसानों ने विरोध प्रदर्शन भी किए।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इसी प्रकार अन्य कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क कम किया गया तो भारत के कई कृषि क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं। पहाड़ी राज्यों के किसान सेब उद्योग को लेकर पहले से ही चिंतित हैं क्योंकि न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ से आयात होने वाले सेबों ने बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ा दी है। यदि अमेरिका को भी कम या शून्य शुल्क पर निर्यात की अनुमति मिलती है तो हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। इसी तरह मक्का, सोयाबीन और चावल जैसे उत्पादों को लेकर भी संभावित जोखिम की चर्चा हो रही है, खासकर तब जब अमेरिका में इन फसलों का उत्पादन बड़े पैमाने पर औद्योगिक उपयोग, विशेष रूप से एथेनॉल उत्पादन के लिए किया जाता है।

वैश्विक व्यापार संगठनों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि विश्व व्यापार संगठन के नियमों के तहत अमेरिका लंबे समय से भारत पर न्यूनतम समर्थन मूल्य और सार्वजनिक भंडारण नीतियों को लेकर दबाव बनाता रहा है। भारत ने अब तक इन नीतियों का बचाव किया है, क्योंकि इनका सीधा संबंध गरीबों को सस्ती दर पर अनाज उपलब्ध कराने से जुड़ा हुआ है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था में बदलाव और अमेरिका की आक्रामक व्यापार नीति के कारण नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े पैमाने पर खाद्यान्न आयात बढ़ता है तो इसका असर ग्रामीण रोजगार पर भी पड़ सकता है, क्योंकि भारत की बड़ी आबादी अभी भी कृषि पर निर्भर है।

इस पूरे विवाद के बीच फ्रांस का उदाहरण भी चर्चा में आया है, जहां विदेशी आयात के कारण डेयरी फार्म बंद होने लगे थे। वहां उपभोक्ताओं ने स्थानीय किसानों को समर्थन देने के लिए दूध की कीमत में मामूली अतिरिक्त भुगतान करना शुरू किया, जिससे डेयरी उद्योग को बचाने में मदद मिली। भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विदेशी उत्पाद सस्ते दाम पर बाजार में आते हैं तो उपभोक्ताओं को यह समझना होगा कि कम कीमत का असर किसानों की आजीविका पर पड़ सकता है। उनका मानना है कि कृषि केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि सामाजिक और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा विषय भी है।

फिलहाल भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की अंतिम शर्तें सार्वजनिक होने का इंतजार किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि किसानों के हित पूरी तरह सुरक्षित रखे गए हैं, जबकि विपक्ष और किसान संगठन स्पष्ट जानकारी की मांग कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह समझौता संतुलित तरीके से लागू किया गया तो निर्यात बढ़ाने के नए अवसर भी खुल सकते हैं, लेकिन इसके लिए किसानों को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना और उन्हें पर्याप्त आर्थिक और तकनीकी सहायता प्रदान करना आवश्यक होगा। आने वाले समय में इस समझौते की वास्तविक शर्तें सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि भारत के कृषि और डेयरी क्षेत्र पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा और क्या यह समझौता देश के किसानों के लिए अवसर साबित होगा या नई चुनौतियां लेकर आएगा।

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