नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। अर्थव्यवस्था की हलचलें अक्सर सुर्ख़ियों में आती हैं और चली भी जाती हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसे फैसले होते हैं जिनकी गूंज सीधे आम आदमी की रसोई, बच्चों की फीस, दवाइयों के बिल और सपनों की सूची तक सुनाई देती है। आने वाले एक साल को लेकर यही सवाल सबसे बड़ा है कि आम नागरिक की जेब का वजन बढ़ेगा या घटेगा। बहुत से लोग यह मानकर चलते हैं कि अंतरराष्ट्रीय समझौते, बजट और सरकारों के फैसले किसी फाइल या संसद तक सीमित रहते हैं, मगर सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। पिछले महज़ दस दिनों में लिए गए तीन बड़े निर्णय—यूरोप के साथ वर्षों से अटकी डील, बजट 2026 और अमेरिका के साथ हुआ नया समझौता—अब यह तय करने जा रहे हैं कि अगले 365 दिन में घर का राशन कितना महंगा होगा, बच्चों की पढ़ाई का खर्च किस दिशा में जाएगा और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में किन चीज़ों पर कटौती करनी पड़ेगी। नौकरीपेशा वर्ग, जिसे अक्सर लगता है कि इन बड़े फैसलों से उसका कोई सीधा नाता नहीं, दरअसल सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाला तबका है। आने वाला साल सिर्फ कमाई का नहीं बल्कि समझदारी, संतुलन और दूरदृष्टि का इम्तिहान है, जहां तरक्की के नए रास्तों के साथ-साथ महंगाई और अनिश्चितताओं की चुनौतियां भी कदमताल करती दिखेंगी।
लंबे इंतज़ार के बाद भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ ऐतिहासिक समझौता अब केवल कूटनीतिक सफलता नहीं रह गया है, बल्कि यह आम उपभोक्ता के लिए एक बड़े आर्थिक बदलाव का संकेतक बन चुका है। बीस साल तक बातचीत की मेज़ पर अटकी यह डील अब ऐसे समय पर सामने आई है जब वैश्विक बाज़ार अस्थिरता से जूझ रहे हैं। इस समझौते को अगर सरल भाषा में समझा जाए तो यह देश के लिए एक बड़े डिस्काउंट कूपन जैसा है, जिसका असर धीरे-धीरे आपकी खरीदारी की टोकरी में दिखेगा। यूरोप से आने वाला जैतून का तेल, विदेशी चॉकलेट, प्रीमियम फूड आइटम और कई लाइफस्टाइल उत्पाद अब पहले की तुलना में कम टैक्स के साथ उपलब्ध होंगे। इसका मतलब यह है कि जो चीजें कभी खास मौकों तक सीमित थीं, वे अब आम परिवार की पहुंच में आ सकती हैं। हालांकि इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है, क्योंकि सस्ते आयात का दबाव देसी उत्पादकों और छोटे कारोबारियों के लिए चुनौती बन सकता है। जिन लोगों की रोज़ी-रोटी स्थानीय उद्योगों से जुड़ी है, उन्हें प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा और कुछ क्षेत्रों में नौकरियों पर भी असर पड़ सकता है।

ऑटोमोबाइल सेक्टर में इस यूरोपीय समझौते का असर सबसे ज़्यादा चर्चा में है। लंबे समय से भारतीय ग्राहक यह सवाल पूछते रहे हैं कि विदेशों में कम कीमत पर मिलने वाली हाईटेक और सुरक्षित कारें यहां इतनी महंगी क्यों हैं। भारी-भरकम टैक्स और आयात शुल्क इसकी बड़ी वजह थे। अब हालात बदलते दिख रहे हैं। यूरोप की उन्नत तकनीक वाली गाड़ियां और उनके सेफ्टी फीचर्स भारत लाना आसान होगा, जिससे भारतीय बाज़ार में सुरक्षा मानकों का स्तर ऊपर जाएगा। जिस टेस्ला कार की कीमत भारत में कभी 60 लाख के आसपास मानी जाती थी, वही विदेशों में 30 लाख के करीब मिलती थी, अब इस अंतर में कमी आने की उम्मीद है। इसका फायदा सिर्फ प्रीमियम कार खरीदारों को ही नहीं, बल्कि बजट सेगमेंट के ग्राहकों को भी मिलेगा, क्योंकि ग्लोबल स्टैंडर्ड की तकनीक धीरे-धीरे सस्ती गाड़ियों तक पहुंचेगी। हालांकि इसका एक नकारात्मक असर यह हो सकता है कि पुरानी और कम सुरक्षित गाड़ियों की रीसेल वैल्यू में गिरावट आए। इलेक्ट्रिक व्हीकल टेक्नोलॉजी के लिए भी यह डील मील का पत्थर साबित हो सकती है, क्योंकि यूरोप की उन्नत ईवी तकनीक भारत में तेज़ी से फैलने का रास्ता साफ कर देगी।
यूरोप के साथ हुए इस समझौते का लाभ केवल उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के छोटे और मध्यम उद्यमियों के लिए भी नए अवसरों के दरवाज़े खोलता है। जैसे ही यूरोपीय बाज़ार भारतीय उत्पादों के लिए अधिक खुला होगा, वैसे ही देश के कोने-कोने में बनने वाले क्वालिटी प्रोडक्ट्स को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने लगेगी। किसी छोटे शहर की खास हस्तकला, किसी ग्रामीण क्षेत्र का पारंपरिक उत्पाद या किसी स्थानीय उद्योग की अनोखी वस्तु अब यूरोप की दुकानों तक पहुंच सकती है। इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा, बल्कि देश में रोज़गार के नए अवसर भी पैदा होंगे। युवाओं के लिए यह संकेत है कि अब केवल बड़े महानगरों में ही नहीं, बल्कि छोटे कस्बों से भी वैश्विक बाज़ार तक पहुंच बनाई जा सकती है। हालांकि इसके लिए गुणवत्ता, पैकेजिंग और अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाना ज़रूरी होगा, जो अपने आप में एक चुनौती भी है और अवसर भी।

अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर दूसरा बड़ा घटनाक्रम अमेरिका के साथ हुआ नया समझौता है, जिसे भारत के सर्विस सेक्टर और मिडिल क्लास प्रोफेशनल्स के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इस डील के तहत भारत की आईटी और दवा कंपनियों के लिए अमेरिकी बाज़ार में काम करना पहले से कहीं ज्यादा आसान होगा। इसका सीधा असर उन शहरों पर दिखेगा जहां तकनीक और फार्मा सेक्टर की रीढ़ बसती है, जैसे बेंगलुरु और नोएडा। यहां काम करने वाले युवाओं की सैलरी, बोनस और करियर ग्रोथ पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है। निवेशकों के लिए भी यह एक राहत भरी खबर है, क्योंकि अमेरिकी बाज़ार के साथ मजबूत जुड़ाव भारतीय पोर्टफोलियो को स्थिरता और मजबूती दे सकता है। शेयर बाज़ार और म्यूचुअल फंड में निवेश करने वालों को लंबे समय में इसके फायदे मिल सकते हैं। हालांकि हर अंतरराष्ट्रीय समझौते की तरह इसमें भी चुनौतियां छिपी हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ करना समझदारी नहीं होगी।
अमेरिका के साथ हुई डील का सबसे संवेदनशील पहलू ऊर्जा से जुड़ा हुआ है। भारत ने इस समझौते के तहत अमेरिका से लगभग 500 बिलियन डॉलर का सामान और ऊर्जा खरीदने का वादा किया है। इसका अर्थ यह है कि आने वाले समय में देश की ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर हो सकती है। कुछ विशेषज्ञ इसे दबाव की राजनीति के रूप में भी देखते हैं, क्योंकि रूस से मिलने वाले सस्ते तेल की हिस्सेदारी कम होकर अमेरिका से आने वाले महंगे तेल पर निर्भरता बढ़ सकती है। इसका सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ने की आशंका है। अगर ईंधन महंगा होता है तो इसका प्रभाव केवल वाहन चलाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ट्रांसपोर्ट महंगा होने से हर चीज़ की कीमत बढ़ेगी। खेत से मंडी और मंडी से घर तक पहुंचने वाली हर वस्तु की लागत में इज़ाफा होगा। ऐसे में एक तरफ जहां करियर और निवेश के मोर्चे पर खुशखबरी है, वहीं दूसरी तरफ आम आदमी की थाली पर दबाव बढ़ने का खतरा भी साफ दिखाई देता है।
घरेलू स्तर पर बजट 2026 ने मिडिल क्लास परिवारों के सामने मिली-जुली तस्वीर पेश की है। इस बजट को कहीं राहत तो कहीं आफत कहा जा रहा है, क्योंकि इसमें खुशी और चिंता दोनों के तत्व मौजूद हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की 17 जरूरी दवाओं को पूरी तरह टैक्स फ्री कर दिया है। इसका सीधा फायदा उन परिवारों को मिलेगा जिनकी आय का बड़ा हिस्सा इलाज में खर्च हो जाता था। अस्पताल के भारी बिलों में दवाइयों का हिस्सा कम होने से लाखों लोगों को राहत मिलेगी। हालांकि रोज़मर्रा की आम बीमारियों की दवाओं पर कोई विशेष टैक्स राहत नहीं दी गई है, जिससे यह सवाल भी उठता है कि आम आदमी की बुनियादी स्वास्थ्य ज़रूरतों पर अभी और ध्यान देने की ज़रूरत है। इसके बावजूद, गंभीर बीमारियों के इलाज को सस्ता बनाना एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, जो लंबे समय में स्वास्थ्य खर्च के बोझ को कुछ हद तक कम कर सकता है।
खानपान और जीवनशैली के मोर्चे पर तस्वीर थोड़ी सख्त नज़र आती है। अगर आप बाहर होटल या रेस्टोरेंट में खाना खाने के शौकीन हैं, तो आने वाला साल आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है। कमर्शियल गैस के दामों में बढ़ोतरी और सर्विस सेक्टर पर बढ़ते टैक्स का असर सीधे खाने-पीने की कीमतों पर पड़ेगा। इसका मतलब यह है कि जो बाहर खाना कभी एक छोटी-सी खुशी हुआ करता था, वह अब एक सोचा-समझा फैसला बन जाएगा। इसी तरह टेलीकॉम सेक्टर में 5G के विस्तार के चलते मोबाइल और ब्रॉडबैंड के बिलों में 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। भले ही डेटा सस्ता और तेज़ हो जाए, लेकिन मासिक खर्च में यह बढ़ोतरी आपकी बचत पर असर डालेगी। डिजिटल कनेक्टिविटी जहां रिश्तों को करीब लाने का जरिया बनेगी, वहीं बजट में एक नई चुनौती भी जोड़ देगी।

बीमा सेक्टर में बजट 2026 ने मिडिल क्लास के लिए राहत की बड़ी खबर दी है। सरकार ने हेल्थ इंश्योरेंस और टर्म इंश्योरेंस पर टैक्स घटाकर इन्हें 15 से 20 प्रतिशत तक सस्ता कर दिया है। इसका मतलब यह है कि अब करोड़ों रुपये का सुरक्षा कवच लेना पहले की तुलना में कहीं आसान हो गया है। आज के दौर में जब बीपी, शुगर और अस्थमा जैसी पुरानी बीमारियां आम हो चुकी हैं, नए प्लान्स का पहले दिन से इन्हें कवर करना बड़ी राहत है। जिन परिवारों के पास अब तक हेल्थ इंश्योरेंस नहीं था, उनके लिए यह समय सबसे उपयुक्त माना जा रहा है। टर्म इंश्योरेंस की बात करें तो जीएसटी में कटौती की वजह से उतने ही प्रीमियम में अब दोगुना कवर मिल सकता है। यह सोचकर ही समझा जा सकता है कि किसी अनहोनी की स्थिति में परिवार को भावनात्मक नुकसान के साथ-साथ आर्थिक संकट से भी बचाया जा सकता है। सही उम्र में लिया गया टर्म इंश्योरेंस जीवनभर के लिए प्रीमियम को लॉक कर देता है, जिससे भविष्य की अनिश्चितताओं से सुरक्षा मिलती है।
नौकरीपेशा वर्ग के लिए टैक्स सिस्टम में किए गए बदलाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। नए टैक्स सिस्टम में स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़ने से हाथ में थोड़ी ज्यादा रकम बचेगी, जो बढ़ती महंगाई के बीच एक छोटी राहत है। इसके साथ ही होम लोन लेने वालों के लिए भी उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है। वैश्विक बाज़ार में स्थिरता और आर्थिक संकेतों के आधार पर आने वाले महीनों में बैंक ब्याज दरों में कटौती कर सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो ईएमआई का बोझ हल्का होगा और घर खरीदने का सपना थोड़ा और सुलभ बन सकता है। निवेश के मोर्चे पर सोने की कीमतों में स्थिरता की संभावना जताई जा रही है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि गहनों के बजाय डिजिटल गोल्ड या सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड में निवेश ज़्यादा समझदारी भरा कदम हो सकता है। इससे मेकिंग चार्ज और स्टोरेज की चिंता से भी छुटकारा मिलता है।

तकनीक और शौक के क्षेत्र में हालांकि तस्वीर थोड़ी महंगी नज़र आ रही है। विदेशी गैजेट्स के पार्ट्स पर ड्यूटी बढ़ने से नया स्मार्टफोन या गेमिंग कंसोल खरीदना जेब पर भारी पड़ सकता है। जो लोग हर साल लेटेस्ट डिवाइस लेने के आदी हैं, उन्हें अब अपनी प्राथमिकताओं पर दोबारा सोचने की ज़रूरत होगी। दूसरी ओर विदेशी यात्रा और बच्चों की पढ़ाई के मामले में एक बड़ी राहत सामने आई है। 10 लाख रुपये से ऊपर की रकम पर टीसीएस की दर 5 प्रतिशत से घटाकर 2 प्रतिशत कर दी गई है। इसका मतलब यह है कि विदेश में पढ़ाई या ट्रैवल की योजना बना रहे परिवारों को सीधे तौर पर बचत का फायदा मिलेगा। मेहनत की कमाई का ज्यादा हिस्सा अब आपके हाथ में रहेगा, जिससे बड़े फैसले लेना थोड़ा आसान हो जाएगा।
कुल मिलाकर आने वाला साल केवल खर्च और कमाई के गणित का नहीं है, बल्कि समझदारी, संतुलन और दूरदृष्टि का साल है। अंतरराष्ट्रीय समझौतों से जहां करियर और व्यापार के नए अवसर पैदा होंगे, वहीं घरेलू बजट आपको अपनी प्राथमिकताओं पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर करेगा। यह समय सिर्फ पैसा कमाने का नहीं, बल्कि उसे सही जगह खर्च करने और भविष्य की सुरक्षा में निवेश करने का है। सरकार ने सेहत और शिक्षा के मोर्चे पर कुछ दरवाज़े खोले हैं, तो वहीं मनोरंजन और तकनीक के क्षेत्र में कुछ लगाम भी लगाई है। अब जिम्मेदारी आम नागरिक की है कि वह इन बदलावों को समझे, अपनी ज़रूरतों और इच्छाओं के बीच संतुलन बनाए और परिवार के वित्त मंत्री की भूमिका निभाते हुए सही फैसले ले। आने वाले 365 दिन यह तय करेंगे कि आपकी जेब हल्की होगी या भारी, और यह काफी हद तक आपकी समझदारी पर निर्भर करेगा।





