उत्तराखंड(सुनील कोठारी)। केंद्रीय बजट 2026-27 को लेकर देशभर में चर्चा तेज है और सरकार ने इसे अब तक का सबसे बड़ा और महत्वाकांक्षी बजट बताते हुए आर्थिक मजबूती का संदेश देने की कोशिश की है। कुल ₹53.5 लाख करोड़ के आकार वाले इस बजट में सड़क, रेल, शहरी ढांचे और औद्योगिक परियोजनाओं पर बड़े निवेश का दावा किया गया है। पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर ₹12.2 लाख करोड़ तक ले जाने और वित्तीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा गया है, जिसे नीति निर्धारक आर्थिक अनुशासन और विकास के संतुलन के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। कागजों पर ये आंकड़े प्रभावशाली दिखते हैं और राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक गति को रफ्तार देने की तस्वीर भी उभरती है, लेकिन जब इन्हीं प्रावधानों को उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के नजरिए से देखा जाता है तो तस्वीर उतनी उत्साहजनक नहीं दिखाई देती। राज्य के सामाजिक, भौगोलिक और पर्यावरणीय संदर्भ में बजट की प्राथमिकताओं को लेकर असंतोष और सवाल दोनों सामने आ रहे हैं, जिनका असर आने वाले समय में और गहराने की आशंका जताई जा रही है।
राष्ट्रीय मंच से प्रस्तुत किए गए विकास के बड़े लक्ष्यों के बीच उत्तराखंड को लेकर यह भावना उभर रही है कि बजट में उसकी विशिष्ट परिस्थितियों को अपेक्षित महत्व नहीं मिला। विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों का कहना है कि पर्वतीय राज्यों की जरूरतें मैदानी राज्यों से बिल्कुल अलग होती हैं, जहां सीमित भूमि, कठिन भूगोल और पर्यावरणीय संवेदनशीलता विकास की हर योजना को प्रभावित करती है। इसके बावजूद बजट के प्रावधानों में उत्तराखंड के लिए किसी विशेष नीति या अलग वित्तीय सहायता का स्पष्ट संकेत नहीं मिलता। सड़क और रेल के राष्ट्रीय नेटवर्क की बात जरूर की गई है, लेकिन पहाड़ों में इन परियोजनाओं की लागत, जोखिम और दीर्घकालिक असर को ध्यान में रखकर कोई अलग दृष्टिकोण सामने नहीं आया। नतीजतन, मजबूत दिखने वाले राष्ट्रीय आंकड़ों के बीच उत्तराखंड खुद को एक बार फिर हाशिए पर खड़ा महसूस कर रहा है।
बीते कुछ वर्षों का अनुभव बताता है कि उत्तराखंड लगातार आपदाओं की चपेट में रहा है और यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। बादल फटना, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन, सड़कों का बह जाना और पूरे-पूरे गांवों का कटाव अब असामान्य घटनाएं नहीं रहीं। चारधाम मार्ग से लेकर सीमांत क्षेत्रों तक हर मानसून में बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान झेलना पड़ता है, जिससे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित होता है। ऐसे में यह उम्मीद की जा रही थी कि केंद्रीय बजट 2026-27 में उत्तराखंड के लिए कोई विशेष आपदा पुनर्वास पैकेज या जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अलग फंड की घोषणा होगी। हालांकि बजट दस्तावेजों में ऐसी किसी ठोस व्यवस्था का उल्लेख नहीं मिलता, जिससे राज्य में यह सवाल उठ रहा है कि क्या आपदा प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक जरूरतों को गंभीरता से समझा गया है।
लंबे समय से उत्तराखंड में हिमालयी आपदा निधि की मांग उठती रही है, ताकि बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए स्थायी और मजबूत ढांचा तैयार किया जा सके। विशेषज्ञ मानते हैं कि पहाड़ी इलाकों में सड़क, पुल, सुरंग और बस्तियों का निर्माण सामान्य मानकों से अलग होना चाहिए, क्योंकि यहां भूस्खलन और भूगर्भीय अस्थिरता का खतरा हमेशा बना रहता है। इसके बावजूद केंद्रीय बजट में आपदा-रोधी संरचनाओं के लिए अतिरिक्त केंद्रीय सहायता पर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं दिखता। इससे यह आशंका और गहरी हो जाती है कि भविष्य में भी आपदाओं के बाद केवल राहत और मरम्मत के अस्थायी उपाय ही किए जाएंगे, जबकि दीर्घकालिक समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे।
खेती के मोर्चे पर भी उत्तराखंड गंभीर संकट से गुजर रहा है और बजट को लेकर किसानों की निराशा खुलकर सामने आ रही है। पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि की लागत पहले ही मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक है, जहां बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और परिवहन पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। मौसम की अनिश्चितता, ओलावृष्टि और असमय बारिश ने हाल के वर्षों में फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। केंद्रीय बजट 2026-27 में कृषि के लिए राष्ट्रीय स्तर पर योजनाओं की घोषणा जरूर की गई है, लेकिन उत्तराखंड के लिए किसी अलग पहाड़ी कृषि पैकेज का अभाव साफ नजर आता है। न कर्ज माफी की घोषणा हुई, न न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी पर कोई स्पष्ट संकेत दिया गया और न ही पीएम-किसान योजना की सालाना ₹6,000 की राशि में बढ़ोतरी की गई।
किसानों का कहना है कि मौजूदा महंगाई और उत्पादन लागत के सामने पीएम-किसान की सहायता बेहद अपर्याप्त है, जिससे खेती को टिकाऊ बनाना मुश्किल होता जा रहा है। पहाड़ी गांवों में युवाओं का खेती से मोहभंग होना इसी का नतीजा माना जा रहा है, जहां परंपरागत खेती छोड़कर लोग रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। बजट में जैविक खेती, बागवानी और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की बात जरूर की जाती है, लेकिन उत्तराखंड जैसे राज्यों के लिए विशेष प्रोत्साहन और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करने की ठोस रणनीति नजर नहीं आती। इससे यह सवाल और मजबूत होता है कि क्या कृषि नीतियां वास्तव में पहाड़ों की जमीनी सच्चाई से जुड़ी हैं या फिर वे केवल कागजी घोषणाओं तक सीमित हैं।
राज्य की वित्तीय स्थिति भी एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आती है, जिसे केंद्रीय बजट में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। उत्तराखंड सरकार पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है और राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा वेतन और पेंशन के भुगतान में खर्च हो जाता है। इसका सीधा असर विकास कार्यों पर पड़ता है, जहां सीमित संसाधनों के कारण बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसी जरूरतों को पूरा करना कठिन हो जाता है। उद्योगों की कमी और पर्यावरणीय प्रतिबंधों के चलते राज्य के अपने राजस्व स्रोत भी सीमित हैं, जिससे केंद्र से मिलने वाली सहायता पर निर्भरता और बढ़ जाती है। इसके बावजूद केंद्रीय बजट 2026-27 में उत्तराखंड के लिए किसी विशेष वित्तीय राहत या कर्ज पुनर्गठन जैसे विकल्पों पर कोई चर्चा नहीं की गई।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पर्वतीय राज्यों को अलग वित्तीय मॉडल के तहत सहायता नहीं दी गई, तो उनका विकास लगातार बाधित होता रहेगा। उत्तराखंड जैसे राज्य, जहां भौगोलिक परिस्थितियां औद्योगिक विस्तार की संभावनाओं को सीमित करती हैं, वहां केवल सामान्य योजनाओं के भरोसे आर्थिक संतुलन बनाना मुश्किल है। बजट में राज्यों के लिए पूंजीगत व्यय बढ़ाने की बात जरूर कही गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इसका वास्तविक लाभ पहाड़ी क्षेत्रों तक कैसे पहुंचेगा। ऐसे में राज्य सरकार पर कर्ज का दबाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है, जिसका असर अंततः आम जनता पर पड़ेगा।
बेरोजगारी और पलायन उत्तराखंड की सबसे गंभीर समस्याओं में गिने जाते हैं, लेकिन बजट में इन मुद्दों को लेकर ठोस समाधान की कमी महसूस की जा रही है। उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर योजनाएं पेश की गई हैं, परंतु उनका सीधा लाभ पहाड़ी जिलों तक पहुंचना कठिन माना जा रहा है। सीमांत और ऊंचाई वाले इलाकों में रोजगार के अवसर पहले ही बेहद सीमित हैं, जिससे युवा बेहतर भविष्य की तलाश में मैदानी क्षेत्रों और महानगरों की ओर रुख कर रहे हैं। गांवों का खाली होना न केवल सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रहा है, बल्कि सीमा सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है।
युवाओं का कहना है कि यदि पहाड़ों में स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार मॉडल विकसित किए जाएं, तो पलायन को काफी हद तक रोका जा सकता है। पर्यटन, हस्तशिल्प, कृषि आधारित उद्योग और लघु उद्यमों में संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन बजट में इन क्षेत्रों के लिए पहाड़-विशेष योजनाओं की कमी साफ दिखती है। कौशल विकास और स्टार्टअप को बढ़ावा देने की घोषणाएं जरूर की गई हैं, परंतु उनके क्रियान्वयन में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने की कोई स्पष्ट रणनीति सामने नहीं आती। इससे यह आशंका और गहरी हो जाती है कि बेरोजगारी और पलायन की समस्या आने वाले वर्षों में और विकराल रूप ले सकती है।
आर्थिक जानकारों का यह भी कहना है कि केंद्रीय बजट 2026-27 विकास केंद्रित जरूर है, लेकिन इसमें क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की ठोस पहल नहीं दिखती। उत्तराखंड जैसे राज्य, जहां आपदा, खेती और रोजगार तीनों मोर्चों पर संकट गहराया हुआ है, वहां सामान्य नीतियों से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सकते। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि विशेष वित्तीय और नीतिगत सहयोग नहीं दिया गया, तो राज्य की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां और बढ़ेंगी। आपदा प्रबंधन, कृषि सुधार और रोजगार सृजन को एक साथ जोड़कर देखने की जरूरत है, जो मौजूदा बजट में नजर नहीं आती।
समग्र रूप से देखा जाए तो केंद्रीय बजट 2026-27 बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों और मजबूत आंकड़ों की तस्वीर जरूर पेश करता है, लेकिन उत्तराखंड के लिए इसमें ठोस आश्वासन की कमी साफ महसूस की जा रही है। जब तक पहाड़ी राज्यों की अलग जरूरतों को समझकर उनके लिए विशेष नीतियां और वित्तीय सहायता सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक विकास का लाभ समान रूप से नहीं पहुंच पाएगा। पलायन, खेती का संकट और आपदा से जुड़ी समस्याएं उत्तराखंड के सामने पहले से ही गंभीर चुनौती हैं और बजट में इन पर ठोस पहल न होने से भविष्य को लेकर चिंताएं और बढ़ गई हैं।





