नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। चर्चा का विषय बना हुआ है। इस समझौते को दोनों देशों के रिश्तों में एक नए अध्याय के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि यह केवल आयात–निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि रणनीतिक, ऊर्जा और वैश्विक बाजारों से जुड़े कई पहलुओं को एक साथ छूता है। जानकारों के अनुसार, यह समझौता ऐसे समय सामने आया है जब दुनिया आर्थिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और सप्लाई चेन के पुनर्गठन के दौर से गुजर रही है। भारत और अमेरिका की सहमति को इसी पृष्ठभूमि में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है कि दोनों देश अपने व्यापारिक रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करना चाहते हैं। सरकारी हलकों में इसे द्विपक्षीय सहयोग को मजबूती देने वाला कदम बताया जा रहा है, वहीं बाजार और उद्योग जगत इस पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।
सूत्रों के अनुसार भारत और अमेरिका के बीच जिस व्यापार समझौते पर सहमति बनी है, उसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापारिक बाधाओं को कम करना और आपसी कारोबार को बढ़ावा देना है। इस सहमति के तहत अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगाए गए शुल्क में बड़ी कटौती करने का संकेत दिया है। पहले जहां कई भारतीय वस्तुओं पर औसतन लगभग 50 प्रतिशत तक शुल्क लगाया जा रहा था, वहीं अब इसे घटाकर करीब 18 प्रतिशत के स्तर तक लाने की बात सामने आई है। इसे भारतीय निर्यातकों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत हो सकती है। उद्योग विशेषज्ञ मानते हैं कि इस कदम से टेक्सटाइल, फार्मा, इंजीनियरिंग और कुछ उपभोक्ता वस्तुओं को सीधा लाभ मिल सकता है, हालांकि वास्तविक असर समझौते के लागू होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
बताया जा रहा है कि यह समझौता फिलहाल पहले चरण का व्यापार समझौता है, जिसे भविष्य में विस्तार दिया जाएगा। दोनों पक्षों ने यह स्वीकार किया है कि सभी मुद्दों को एक साथ सुलझाना व्यावहारिक नहीं था, इसलिए इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने का रास्ता चुना गया है। पहले चरण में शुल्क, कुछ गैर-शुल्क बाधाओं और सीमित क्षेत्रों पर सहमति बनी है, जबकि बाकी जटिल विषयों पर बाद में बातचीत होगी। सरकारी सूत्रों का कहना है कि आने वाले महीनों में इस समझौते को और व्यापक बनाने के लिए तकनीकी स्तर पर बातचीत जारी रहेगी। इस चरणबद्ध मॉडल को इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे दोनों देशों को अपने-अपने घरेलू हितों और संवेदनशील क्षेत्रों को संतुलित करने का समय मिल सकेगा।
इस व्यापार सहमति का एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद पहलू भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद को धीरे-धीरे कम करने पर सहमति जताना बताया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस से ऊर्जा खरीद को लेकर पहले से ही दबाव बना हुआ है और अमेरिका लंबे समय से इस मुद्दे पर अपनी चिंता जाहिर करता रहा है। समझौते से जुड़े जानकारों के अनुसार, भारत ने किसी तात्कालिक प्रतिबंध की बजाय क्रमिक कमी का संकेत दिया है, ताकि ऊर्जा सुरक्षा पर अचानक असर न पड़े। इसके बावजूद यह शर्त कई विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है, क्योंकि रूस अब तक भारत को अपेक्षाकृत सस्ते दामों पर कच्चा तेल उपलब्ध कराता रहा है। ऐसे में इस बदलाव का असर देश की ऊर्जा लागत और महंगाई पर भी पड़ सकता है।
इस व्यापार समझौते की घोषणा के बाद घरेलू आर्थिक संकेतकों पर भी इसका असर देखने को मिला है। शेयर बाजार में सकारात्मक प्रतिक्रिया दर्ज की गई और कई सेक्टरों में तेजी देखने को मिली। निवेशकों ने इसे भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसे का संकेत माना, जिससे बाजार में उत्साह बढ़ा। इसके साथ ही सोने और चांदी की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव देखा गया, जिसे वैश्विक आर्थिक संकेतों और डॉलर की चाल से जोड़कर देखा जा रहा है। रुपये को भी इस घटनाक्रम से कुछ समर्थन मिला, जिससे विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता का माहौल बना। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि हालांकि शुरुआती प्रतिक्रिया सकारात्मक रही है, लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव समझौते के वास्तविक क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।

सरकारी पक्ष और कई अर्थशास्त्री इस समझौते को भारत–अमेरिका संबंधों में सकारात्मक मोड़ के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि इससे न केवल व्यापार बढ़ेगा, बल्कि तकनीक, निवेश और आपूर्ति श्रृंखला के क्षेत्रों में भी सहयोग को बल मिलेगा। अमेरिका भारत को एक बड़े उपभोक्ता बाजार और उभरती आर्थिक शक्ति के रूप में देखता है, जबकि भारत अमेरिका को निवेश, तकनीक और निर्यात के लिए एक अहम साझेदार मानता है। इस परिप्रेक्ष्य में व्यापार समझौता दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को आर्थिक आधार प्रदान करता है। हालांकि कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि ऐसे समझौतों में संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है, ताकि किसी एक पक्ष के हितों को नुकसान न पहुंचे।
इसके बावजूद इस व्यापार समझौते को लेकर कई सवाल और आशंकाएं भी उठाई जा रही हैं। सबसे बड़ा मुद्दा इसकी पारदर्शिता को लेकर सामने आया है। अब तक समझौते का पूरा और ठोस दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिससे इसकी वास्तविक शर्तों को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है। तारीखें, लागू नियम और विस्तृत प्रावधान अभी सामने नहीं आए हैं। विपक्षी दलों और कुछ नीति विशेषज्ञों का कहना है कि संसद और जनता को इस बारे में पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। इस मुद्दे को लेकर हिंदुस्तान टाइम्स और आजतक जैसे मीडिया संस्थानों में भी सवाल उठाए गए हैं कि बिना पूरी जानकारी के ऐसे बड़े समझौते पर सहमति कैसे दी जा सकती है।
कृषि और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर भी इस समझौते पर चिंता जताई जा रही है। जानकारों का कहना है कि अमेरिका अक्सर अपने कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए बाजार खोलने का दबाव बनाता रहा है। यदि भविष्य के चरणों में इन क्षेत्रों को शामिल किया गया, तो इसका असर भारतीय किसानों और छोटे उत्पादकों पर पड़ सकता है। रेडिट जैसे मंचों पर भी इस विषय को लेकर बहस देखने को मिली है, जहां कई लोगों ने आशंका जताई है कि बिना सुरक्षा उपायों के ऐसे समझौते से घरेलू कृषि कमजोर हो सकती है। हालांकि सरकार का कहना है कि किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा, लेकिन जब तक विस्तृत शर्तें सामने नहीं आतीं, तब तक यह चिंता बनी रहेगी।
ऊर्जा सुरक्षा का सवाल भी इस समझौते के साथ जुड़ा हुआ है। रूस से तेल खरीद कम करने की शर्त को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। रॉयटर्स की रिपोर्टों में यह संकेत दिया गया है कि रूस भारत के लिए लंबे समय से एक भरोसेमंद और किफायती ऊर्जा स्रोत रहा है। ऐसे में किसी एक देश या समूह के दबाव में ऊर्जा नीति में बदलाव करना दीर्घकालिक जोखिम पैदा कर सकता है। भारत की ऊर्जा जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं और ऐसे में विविध स्रोतों से आपूर्ति बनाए रखना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दृष्टि से यह शर्त कई नीति विश्लेषकों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है।
अमेरिकी नीतियों की अस्थिरता भी इस व्यापार समझौते को लेकर उठने वाली एक अहम आपत्ति है। बिजनेस टुडे सहित कई विश्लेषणों में यह कहा गया है कि अमेरिका की व्यापार नीति अक्सर राजनीतिक बदलावों के साथ बदलती रहती है। किसी एक प्रशासन के दौरान हुए समझौते को अगला प्रशासन उसी उत्साह से लागू करे, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। ऐसे में दीर्घकालिक निवेश और व्यापारिक योजनाओं के लिए अनिश्चितता बनी रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को इस पहलू को ध्यान में रखते हुए अपने हितों की सुरक्षा के लिए मजबूत प्रावधान सुनिश्चित करने चाहिए।
इसके अलावा समान प्रतिस्पर्धा का मुद्दा भी इस समझौते के साथ जुड़ा हुआ है। कई उद्योगों पर अभी भी अमेरिका के सेक्शन 232 जैसे शुल्क लागू रह सकते हैं, खासकर स्टील और ऑटो पार्ट्स जैसे क्षेत्रों में। इसका मतलब यह है कि सभी भारतीय उत्पादों को समान अवसर नहीं मिल पाएगा। उद्योग संगठनों का कहना है कि जब तक ऐसे शुल्क पूरी तरह समाप्त नहीं होते, तब तक मुक्त और निष्पक्ष व्यापार की बात अधूरी रहेगी। इस संदर्भ में विशेषज्ञ यह भी इंगित करते हैं कि समझौते के पहले चरण में मिली राहत के बावजूद कई क्षेत्रों को वास्तविक लाभ के लिए आगे की बातचीत पर निर्भर रहना पड़ेगा।
कुल मिलाकर भारत–अमेरिका व्यापार समझौता अवसरों और चुनौतियों दोनों का मिश्रण बनकर सामने आया है। एक ओर जहां यह शुल्क कटौती, बाजार पहुंच और द्विपक्षीय सहयोग के नए रास्ते खोलता है, वहीं दूसरी ओर पारदर्शिता, कृषि सुरक्षा, ऊर्जा नीति और अमेरिकी नीतिगत अनिश्चितता जैसे सवाल भी खड़े करता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आगे के चरणों में भारत अपने घरेलू हितों की कितनी प्रभावी रक्षा कर पाता है। फिलहाल यह साफ है कि यह समझौता केवल एक आर्थिक दस्तावेज नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और रणनीति से जुड़ा एक अहम कदम है, जिसका असर आने वाले वर्षों में और स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।





