काशीपुर। राजनीतिक बहसों के वर्तमान दौर में एक ऐसा कथन बार-बार सामने लाया जा रहा है, जिसने इतिहास, विचारधारा और सत्ता की मंशा को एक साथ केंद्र में ला खड़ा किया है। ‘‘हिंदी दैनिक सहर प्रजातंत्र’’ से खास बातचीत में एआईसीसी सदस्य एवं प्रदेश महासचिव अनुपम शर्मा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रचारित किया जा रहा “कांग्रेस को बंद करो” वाला गांधीवादी दावा न तो ऐतिहासिक रूप से पूर्ण सत्य है और न ही उसे उसके मूल संदर्भ में समझने की कोशिश की जाती है। अनुपम शर्मा के अनुसार भारतीय राजनीति में इतिहास अब केवल अतीत का दस्तावेज़ नहीं रह गया है, बल्कि वह एक ऐसा राजनीतिक औजार बन चुका है, जिसके माध्यम से वर्तमान की सियासत को दिशा देने और जनमत को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी का नाम और उनके विचार आज भी समाज में नैतिकता, सत्य और संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक माने जाते हैं, इसलिए उनके कथनों को संदर्भ से काटकर पेश करना राजनीतिक दृष्टि से लाभकारी रणनीति बन गई है। यही कारण है कि गांधी के विचारों को लेकर अधूरे तथ्यों को पूरा सच बनाकर प्रस्तुत करने की कोशिशें लगातार तेज होती जा रही हैं।
अनुपम शर्मा ने कहा कि इतिहास की परतों को जब गंभीरता से खंगाला जाता है, तो वह तस्वीर सामने आती है जो राजनीतिक मंचों से दिए जा रहे नारों से काफी अलग है। ‘‘हिंदी दैनिक सहर प्रजातंत्र’’ से बातचीत में अनुपम शर्मा ने याद दिलाया कि महात्मा गांधी ने 1948 में, आज़ादी के बाद, कांग्रेस की भूमिका को लेकर एक विचार अवश्य रखा था। गांधी का मानना था कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने देश को आज़ादी दिलाने में ऐतिहासिक योगदान दिया और यह लक्ष्य पूरा हो चुका है, इसलिए अब कांग्रेस को सत्ता की राजनीति में उलझने के बजाय लोकसेवा, ग्राम स्वराज, सामाजिक समरसता और नैतिक पुनर्निर्माण के कार्यों में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए। अनुपम शर्मा ने साफ कहा कि गांधी का यह विचार कांग्रेस को समाप्त करने या राजनीतिक जीवन से बाहर करने का आदेश नहीं था, बल्कि संगठन के स्वरूप और भूमिका में परिवर्तन का सुझाव था। इसके बावजूद इस विचार को “कांग्रेस को बंद करने” के रूप में प्रचारित करना इतिहास के साथ चयनात्मक और खतरनाक व्यवहार है, जो लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।
अनुपम शर्मा ने कहा कि आज के राजनीतिक परिदृश्य में यह बहस केवल शब्दों या उद्धरणों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी और सुनियोजित सियासी रणनीति काम करती दिखाई देती है। अनुपम शर्मा ने कहा कि जब भारतीय जनता पार्टी यह प्रचार करती है कि महात्मा गांधी स्वयं कांग्रेस के अस्तित्व के खिलाफ थे, तो इसका उद्देश्य केवल अतीत का हवाला देना नहीं होता। दरअसल यह दावा कांग्रेस की वैचारिक वैधता और नैतिक अधिकार पर प्रश्नचिह्न लगाने का एक प्रयास है। उन्होंने बताया कि इस तरह के बयान आम जनता के बीच एक सरल लेकिन तीखा संदेश छोड़ते हैं कि कांग्रेस न केवल वर्तमान में राजनीतिक रूप से कमजोर है, बल्कि वह अपने ही ऐतिहासिक मार्गदर्शक की सोच से भी भटक चुकी है। उन्होने कहा कि राजनीतिक संचार की भाषा में यह एक ऐसा नैरेटिव है, जो बिना गहन ऐतिहासिक व्याख्या के भी जनमानस पर गहरा प्रभाव डाल देता है, भले ही उसकी ऐतिहासिक सच्चाई अधूरी या भ्रामक क्यों न हो।
अनुपम शर्मा ने कहा कि गांधी के विचारों को सही मायनों में समझने के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें किसी एक राजनीतिक दल के नजरिये से न देखा जाए। ‘‘हिंदी दैनिक सहर प्रजातंत्र’’ से बातचीत में अनुपम शर्मा ने जोर देकर कहा कि महात्मा गांधी सत्ता के केंद्रीकरण और सत्ता की लालसा के कट्टर आलोचक थे, लेकिन वे कभी भी लोकतंत्र या राजनीतिक दलों के अस्तित्व के विरोधी नहीं रहे। गांधी का चिंतन नैतिक राजनीति पर आधारित था, जिसमें सत्ता को साध्य नहीं बल्कि समाज सेवा का साधन माना गया। अनुपम शर्मा ने यह भी कहा कि यदि गांधी आज जीवित होते, तो वे किसी एक दल को नहीं, बल्कि हर उस राजनीतिक शक्ति को कठघरे में खड़ा करते जो सत्ता के अहंकार, नैतिक पतन और जनविरोधी नीतियों की राह पर चलती। ऐसे में गांधी के कथनों को केवल कांग्रेस-विरोधी संदर्भ में पेश करना उनके व्यापक दर्शन और विचारों के साथ गंभीर अन्याय है।
अनुपम शर्मा ने कहा कि राजनीतिक लाभ की दृष्टि से देखा जाए, तो गांधी के नाम का उपयोग हमेशा से अत्यंत प्रभावशाली रहा है और आज भी है। अनुपम शर्मा के अनुसार भारतीय जनता पार्टी द्वारा खुद को गांधी के विचारों के नजदीक दिखाने और कांग्रेस को उसी गांधी के हवाले से घेरने की रणनीति पूरी तरह सुनियोजित है। यह रणनीति उस समय और अधिक असरदार हो जाती है, जब कांग्रेस संगठनात्मक चुनौतियों, और वैचारिक असमंजस के दौर से गुजर रही होती है। “गांधी ने कांग्रेस को बंद करने की बात कही थी” जैसे वाक्य जनसभाओं, सोशल मीडिया और टीवी बहसों में आसानी से दोहराए जा सकते हैं। उनकी सरलता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है, क्योंकि आम नागरिक अक्सर पूरे ऐतिहासिक संदर्भ में जाने की बजाय एक पंक्ति के निष्कर्ष से प्रभावित हो जाता है और वही उसके राजनीतिक नजरिये को आकार देता है।
कांग्रेस के लिए यह पूरा संदर्भ एक गंभीर राजनीतिक चुनौती के रूप में जरूर सामने आता है, लेकिन इसे उसकी वैचारिक कमजोरी के रूप में देखना सही नहीं होगा। हिंदी दैनिक सहर प्रजातंत्र से बातचीत में एआईसीसी सदस्य एवं प्रदेश महासचिव अनुपम शर्मा ने स्पष्ट रूप से कहा कि कांग्रेस को गांधीदृनेहरू विरासत की स्वाभाविक उत्तराधिकारी यूं ही नहीं माना जाता रहा है, बल्कि यह विरासत आज भी पार्टी की वैचारिक रीढ़ बनी हुई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस आज भी महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू की विचारधारा को न केवल संभाले हुए है, बल्कि उसे समय के अनुरूप आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है। अनुपम शर्मा के अनुसार गांधीवादी मूल्यों जैसे सादगी, विकेंद्रीकरण, ग्राम स्वराज, सामाजिक समरसता और नैतिक राजनीति कांग्रेस की कार्यशैली और सोच का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि कांग्रेस ने कभी इन मूल्यों से समझौता नहीं किया और न ही भविष्य में करेगी। परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, कांग्रेस की राजनीति का आधार हमेशा जनकल्याण, लोकतांत्रिक सोच और नैतिक मूल्यों पर ही टिका रहा है और आगे भी उसी रास्ते पर चलता रहेगा।
अनुपम शर्मा ने कहा कि यह पूरा विवाद केवल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच की सियासी टकराहट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र में इतिहास के उपयोग और दुरुपयोग से जुड़ा एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है। शर्मा ने कहा कि आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी महात्मा गांधी का नाम भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा नैतिक संदर्भ बना हुआ है। लगभग हर राजनीतिक दल गांधी को अपने पक्ष में प्रस्तुत करने की कोशिश करता है, लेकिन बहुत कम लोग उनके विचारों की सम्पूर्णता और जटिलता को स्वीकार करने को तैयार दिखाई देते हैं। अक्सर गांधी को सुविधा के अनुसार एक वाक्य, एक उद्धरण या एक प्रतीक तक सीमित कर दिया जाता है। उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विचारों की गहराई पर गंभीर चर्चा कम ही होती है, क्योंकि ऐसी चर्चा तत्काल राजनीतिक लाभ नहीं दिला पाती।

अनुपम शर्मा ने कहते है कि समय के साथ यह प्रवृत्ति और मजबूत हुई है कि इतिहास को वर्तमान की राजनीतिक जरूरतों के अनुसार ढाल लिया जाए। हिंदी दैनिक सहर प्रजातंत्र से बातचीत में अनुपम शर्मा ने कहा कि “कांग्रेस को बंद करो” वाला कथन भी इसी प्रवृत्ति का परिणाम है। यह दावा न तो गांधी के विचारों की पूरी तस्वीर सामने रखता है और न ही भारतीय राजनीति की जटिल वास्तविकताओं को समझने में मदद करता है। यह आधे सच पर आधारित एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव है, जो पूरे लाभ की कोशिश करता है। जब इस तरह के दावे बार-बार दोहराए जाते हैं, तो धीरे-धीरे वे जनमानस में तथ्य की तरह स्थापित होने लगते हैं, जबकि उनकी ऐतिहासिक नींव कमजोर और अपूर्ण होती है।
अनुपम शर्मा ने कहते है कि राजनीतिक विमर्श के इस दौर में यह प्रश्न भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या आज की राजनीति वास्तव में गांधी के मूल्यों पर खरी उतरती है। अनुपम शर्मा ने कहा कि यदि गांधी के विचारों का सच्चे अर्थों में सम्मान करना है, तो सत्ता, संगठन और समाज के बीच संबंधों पर गंभीर पुनर्विचार करना होगा। गांधी ने हमेशा सत्य, अहिंसा और नैतिकता को राजनीति का आधार माना, जबकि आज की राजनीति में अक्सर जीत, संख्या बल, प्रचार और सत्ता को प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे में गांधी का नाम लेना आसान हो गया है, लेकिन उनके रास्ते पर चलना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है। यही विरोधाभास भारतीय राजनीति को लगातार घेरे हुए है और यही कारण है कि गांधी आज भी बहस के केंद्र में बने रहते हैं।
अंततः यह पूरा प्रसंग इस बात की चेतावनी देता है कि इतिहास को केवल राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है। अनुपम शर्मा ने कहा कि यदि महात्मा गांधी का नाम केवल सियासी लाभ के लिए लिया जाता रहेगा, तो सत्य हमेशा नारों और प्रचार के शोर में दबता चला जाएगा। “कांग्रेस को बंद करो” जैसा दावा ऐतिहासिक सत्य से अधिक एक राजनीतिक निर्माण है, जिसे बार-बार दोहराकर वास्तविक मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश की जाती है। असली चुनौती यह है कि क्या आज की राजनीति गांधी के विचारों की ईमानदार व्याख्या और उनके वास्तविक अनुपालन के लिए तैयार है। जब तक इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता, तब तक गांधी भारतीय राजनीति में एक नैतिक प्रेरणा से अधिक एक सियासी हथियार के रूप में इस्तेमाल होते रहेंगे।





