काशीपुर। नीति निर्धारण के नाम पर उच्च शिक्षा की आत्मा से छेड़छाड़ के आरोपों के बीच UGC काला कानून 2026 को लेकर देश के शैक्षणिक जगत में उबाल साफ दिखाई देने लगा है। विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और छात्रावासों से निकलती आवाज़ें अब सड़कों तक पहुँच चुकी हैं। इसी कड़ी में UGC बिल संघर्ष समिति के आह्वान पर 05 फरवरी 2026 को जन आक्रोश रैली एवं ज्ञापन कार्यक्रम की घोषणा ने माहौल को और गरमा दिया है। समिति का कहना है कि यह प्रस्तावित कानून शिक्षा में समानता के सिद्धांत को कमजोर करता है और उच्च शिक्षा को वर्ग आधारित भेदभाव की ओर धकेलने वाला साबित हो सकता है। उनका तर्क है कि जिन आदर्शों पर देश की विश्वविद्यालय प्रणाली खड़ी रही है, यह कानून उन्हें धीरे-धीरे खोखला कर देगा। इसी चिंता को लेकर छात्र, शिक्षक और अभिभावक एकजुट होकर लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने की तैयारी में हैं।
सवाल यह उठ रहा है कि क्या शिक्षा का उद्देश्य सबको बराबर अवसर देना है या फिर समाज को वर्गों में बाँटकर डर और असुरक्षा का माहौल बनाना। संघर्ष समिति के अनुसार UGC द्वारा लागू किए जा रहे नए नियम उच्च शिक्षा व्यवस्था को समानता से हटाकर भेदभाव की दिशा में ले जा रहे हैं। विशेष रूप से सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं पर इसके सबसे गंभीर दुष्प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है। उनका कहना है कि नियमों की भाषा और प्रक्रिया ऐसी है, जिससे छात्रों के बीच अविश्वास, भय और मानसिक दबाव बढ़ेगा। शिक्षा का वातावरण जहाँ विचारों की स्वतंत्रता और संवाद का होना चाहिए, वहाँ दमन और संदेह का भाव पैदा होने का खतरा बताया जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में यह बहस तेज हो गई है कि क्या यह कानून वास्तव में सुधार है या फिर एक ऐसा कदम, जो आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर भारी पड़ेगा।
संघर्ष समिति ने विस्तार से उन नुकसानों की ओर ध्यान दिलाया है, जिनका सामना सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं को करना पड़ सकता है। उनके अनुसार डिग्री कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं, अध्यापकों और प्रबंधक वर्ग के साथ जातीय आधार पर भेदभाव की स्थिति उत्पन्न होने की आशंका है, जो उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित कर सकती है। शिक्षा संस्थानों में यदि पहचान और पृष्ठभूमि के आधार पर व्यवहार होने लगे, तो उसका असर केवल अकादमिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आत्मविश्वास और सामाजिक संबंधों पर भी पड़ता है। समिति का दावा है कि इस प्रकार की व्यवस्था छात्रों को भीतर से तोड़ सकती है और शिक्षा को सशक्तिकरण के बजाय दबाव का माध्यम बना सकती है। यही कारण है कि इसे केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने वाला मुद्दा बताया जा रहा है।
एक और गंभीर आपत्ति यह है कि नए नियमों के तहत किसी भी छात्र-छात्रा या अन्य पर शिकायत दर्ज होते ही त्वरित कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो सकती है, भले ही आरोप सिद्ध न हुए हों। संघर्ष समिति का कहना है कि ऐसी व्यवस्था न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। बिना पर्याप्त जाँच के कार्रवाई होने से निर्दोष लोगों को भी गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। शिक्षा संस्थानों में यदि हर शिकायत को अपराध की तरह देखा जाने लगे, तो वहाँ सीखने और सिखाने का माहौल कैसे बचेगा, यह बड़ा सवाल है। समिति का तर्क है कि कानून का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, न कि डर पैदा करना। जल्दबाज़ी में की गई कार्रवाई से न केवल छात्र, बल्कि शिक्षक भी मानसिक तनाव में आ सकते हैं, जिससे शैक्षणिक गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है।
सबसे विवादास्पद बिंदुओं में से एक शिकायतकर्ता की पहचान को पूरी तरह गोपनीय रखने का प्रावधान बताया जा रहा है। संघर्ष समिति के अनुसार इससे झूठी शिकायतों की संभावना कई गुना बढ़ सकती है। यदि पहचान सामने न आए, तो जवाबदेही का अभाव पैदा होगा और व्यक्तिगत रंजिश या गलतफहमी के आधार पर शिकायतें दर्ज होने का खतरा रहेगा। शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता और संवाद की जगह यदि संदेह और भय ले ले, तो उसका सीधा असर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। समिति का कहना है कि शिकायत की प्रक्रिया न्यायपूर्ण और संतुलित होनी चाहिए, ताकि सही मामलों में पीड़ित को न्याय मिले और निर्दोष को सज़ा का डर न सताए। इस प्रावधान को वे शिक्षा व्यवस्था में अविश्वास फैलाने वाला कदम मान रहे हैं।
इसके अलावा विद्यालय और महाविद्यालय परिसरों में भय का वातावरण बनने की आशंका भी जताई जा रही है। संघर्ष समिति का कहना है कि यदि हर समय कार्रवाई और दंड का डर बना रहेगा, तो छात्र-छात्राएँ और अध्यापक स्वतंत्र रूप से विचार व्यक्त करने से कतराने लगेंगे। शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह विचारों के आदान-प्रदान और आलोचनात्मक सोच से आगे बढ़ती है। डर के माहौल में यह सब संभव नहीं हो पाता। समिति का आरोप है कि ऐसे नियमों के जरिए शिक्षण कार्य से ध्यान हटाकर मानसिक दबाव बढ़ाया जा रहा है, जिससे छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो सकता है। वे इसे शिक्षा के मूल उद्देश्य के विपरीत बताते हैं, जहाँ आत्मविश्वास और रचनात्मकता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

गरीब और मध्यम वर्ग के संदर्भ में संघर्ष समिति ने विशेष चिंता जताई है। उनका कहना है कि केस, निलंबन या जेल जैसी स्थितियाँ केवल एक छात्र तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरे परिवार के भविष्य को प्रभावित कर सकती हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह संकट और भी गहरा हो जाता है, क्योंकि उनके पास कानूनी लड़ाई लड़ने या लंबे समय तक पढ़ाई से दूर रहने के साधन नहीं होते। समिति का तर्क है कि शिक्षा समानता का माध्यम होनी चाहिए, न कि ऐसा क्षेत्र जहाँ डर और असुरक्षा का माहौल बनाकर लोगों को पीछे धकेल दिया जाए। उनका कहना है कि यह कानून शिक्षा में समानता नहीं, बल्कि असमानता और अन्याय को जन्म देता है, जो समाज के कमजोर वर्गों के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।
इन्हीं सवालों को सामने रखते हुए संघर्ष समिति ने सरकार से कुछ सीधे और तीखे प्रश्न पूछे हैं। क्या कानून सभी छात्रों के लिए समान नहीं होना चाहिए? क्या सामान्य वर्ग के छात्र भी छात्र नहीं हैं? क्या शिक्षा के स्थान को डर और भय का केंद्र बनाना उचित है? और क्या स्वर्ण छात्र-छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार सही ठहराया जा सकता है? समिति का कहना है कि ये प्रश्न केवल किसी एक वर्ग की चिंता नहीं, बल्कि पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था के भविष्य से जुड़े हैं। यदि आज इन सवालों को अनदेखा किया गया, तो कल इसके दुष्परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ सकते हैं। यही कारण है कि वे सरकार से स्पष्ट जवाब और पुनर्विचार की माँग कर रहे हैं।
संघर्ष समिति ने अपनी माँग को बेहद स्पष्ट शब्दों में रखा है। उनका कहना है कि माननीय प्रधानमंत्री जी स्वर्ण वर्ग का भविष्य बर्बाद न करें और UGC काला कानून को तत्काल वापस लें। समिति के अनुसार यह कानून शिक्षा सुधार के नाम पर लागू किया जा रहा है, लेकिन वास्तव में यह छात्रों के हितों के खिलाफ है। वे चाहते हैं कि सरकार शिक्षाविदों, छात्रों और समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद करे और ऐसे किसी भी प्रावधान को हटाए, जो भेदभाव या डर को बढ़ावा देता हो। समिति का कहना है कि शिक्षा नीति का निर्माण व्यापक सहमति और संवेदनशीलता के साथ होना चाहिए, न कि जल्दबाज़ी में ऐसे निर्णय लेकर, जो लंबे समय तक नुकसान पहुँचाएँ।
इसी माँग को मजबूती से रखने के लिए 05 फरवरी 2026 को जन आक्रोश रैली और ज्ञापन कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार सभी लोग सुबह 10 बजे चौहान सभा भवन पर एकत्र होकर किला मोहल्ला के लिए प्रस्थान करेंगे। इसके बाद उपजिलाधिकारी कार्यालय, काशीपुर में ज्ञापन सौंपा जाएगा। इस कार्यक्रम को शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से आयोजित करने की बात कही गई है, ताकि सरकार तक अपनी बात मजबूती से पहुँचाई जा सके। संघर्ष समिति का दावा है कि यह केवल विरोध नहीं, बल्कि शिक्षा के भविष्य को बचाने की कोशिश है। वे सभी छात्रों, शिक्षकों और जागरूक नागरिकों से इस जन आंदोलन में शामिल होने की अपील कर रहे हैं।
UGC बिल संघर्ष समिति का कहना हे कि इस पूरे आंदोलन के पीछे छिपी भावना केवल किसी एक नियम या अधिसूचना के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस असुरक्षा और बेचैनी की अभिव्यक्ति है, जो आज के छात्र और अभिभावक महसूस कर रहे हैं। समिति का कहना हे कि कई परिवारों को यह डर सताने लगा है कि कहीं शिक्षा का रास्ता उनके बच्चों के लिए संघर्ष और तनाव से भरा न हो जाए। संघर्ष समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि वे किसी टकराव या अव्यवस्था की चाह नहीं रखते, बल्कि बस इतना चाहते हैं कि शिक्षा का माहौल विश्वास, सम्मान और बराबरी पर आधारित रहे। उनका मानना है कि यदि अभी संवाद और समझदारी से फैसले नहीं लिए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ इस खामोशी की कीमत चुकाएँगी। समिति का कहना हे कि इसी भावनात्मक पृष्ठभूमि में यह आवाज़ उठ रही है कि शिक्षा को कानूनों के बोझ से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण से आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर UGC काला कानून 2026 को लेकर उठ रहा यह विरोध केवल एक नियम के खिलाफ आवाज़ नहीं है, बल्कि यह उस दिशा पर सवाल है, जिस ओर देश की उच्च शिक्षा प्रणाली को ले जाया जा रहा है। संघर्ष समिति का कहना है कि यदि समय रहते इस पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो शिक्षा संस्थान ज्ञान के केंद्र के बजाय भय और असुरक्षा के प्रतीक बन सकते हैं। उनका मानना है कि लोकतंत्र में विरोध और संवाद ही बदलाव का रास्ता होता है, और यही वजह है कि वे सड़कों पर उतरकर अपनी बात कह रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार इन चिंताओं को किस गंभीरता से लेती है और क्या शिक्षा में समानता के सिद्धांत को बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।





