रामनगर(अनीरूध कोठारी)। यह बजट ऐसे समय में सामने आया है जब देश के भीतर उम्मीद और बेचैनी एक साथ सांस ले रही है। संसद के पटल पर जैसे ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने डिजिटल टैबलेट के माध्यम से बजट 2026-27 को पढ़ना शुरू किया, वैसे ही “भविष्योन्मुखी भारत” का एक भव्य सपना शब्दों में ढलने लगा। ₹53.5 लाख करोड़ के विशाल आकार वाले इस बजट ने आंकड़ों की चकाचौंध से लेकर विज़न की ऊँचाइयों तक हर किसी का ध्यान खींचा। इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग को भारत के भविष्य का इंजन बताते हुए सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की कि देश अब केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है। लेकिन इस चमक के पीछे एक ऐसा सन्नाटा भी महसूस किया गया, जो उन करोड़ों परिवारों के दिलों में घर कर गया है, जिनकी रोज़मर्रा की जद्दोजहद इस बजट में कहीं खोती नजर आई। सवाल यह नहीं है कि बजट बड़ा है या छोटा, असली सवाल यह है कि क्या यह आम आदमी की धड़कनों के साथ तालमेल बैठा पाया या नहीं।
सरकार ने इस बजट को विकास की ऊँची उड़ान के प्रतीक के रूप में पेश किया है, जहां पूंजीगत व्यय को आर्थिक कायाकल्प का सबसे मजबूत औजार माना गया है। ₹12.2 लाख करोड़ का कैपेक्स आवंटन इस बात का संकेत देता है कि सरकार का फोकस सड़कों, रेल, बंदरगाहों और डिजिटल नेटवर्क को नई ऊँचाइयों तक ले जाने पर है। नीति निर्माताओं का दावा है कि इस निवेश से रोजगार के अवसर पैदा होंगे, उद्योगों को गति मिलेगी और भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती से खड़ा होगा। मुंबई-पुणे और हैदराबाद-बेंगलुरु जैसे सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की घोषणा को भविष्य की परिवहन क्रांति के रूप में पेश किया गया है, जिससे न केवल यात्रा समय घटेगा बल्कि व्यापार और निवेश को भी रफ्तार मिलेगी। इन घोषणाओं के बीच यह भरोसा भी जताया गया कि भारत अब बिखरे हुए विकास से निकलकर एक संगठित और तेज़ रफ्तार अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ा चुका है।
तकनीकी आत्मनिर्भरता को इस बजट का एक और मजबूत स्तंभ बताया गया है। ‘सेमीकंडक्टर मिशन 2.0’ और ‘बायोफार्मा शक्ति’ जैसी योजनाओं के माध्यम से सरकार ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि भारत केवल कच्चे माल का बाजार नहीं, बल्कि उच्च तकनीक वाले उत्पादों का वैश्विक केंद्र बनना चाहता है। चिप निर्माण, दवा उद्योग और उन्नत जैव-प्रौद्योगिकी में निवेश को राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता से जोड़ा गया है। बजट दस्तावेजों में यह दावा किया गया है कि इन क्षेत्रों में किया गया निवेश आने वाले वर्षों में लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा करेगा। साथ ही यह भी कहा गया कि इससे आयात पर निर्भरता घटेगी और भारत की वैश्विक साख मजबूत होगी। हालांकि, इस बड़े विज़न के बीच यह सवाल भी उभरता है कि क्या इस तकनीकी दौड़ का लाभ समाज के निचले पायदान तक समान रूप से पहुंच पाएगा।
शहरी अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने के लिए टियर-2 और टियर-3 शहरों को ‘इकोनॉमिक हब’ के रूप में विकसित करने का ऐलान किया गया है। प्रति क्षेत्र ₹5,000 करोड़ के प्रावधान के साथ सरकार ने यह संकेत दिया कि अब विकास केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहेगा। छोटे और मध्यम शहरों में उद्योग, स्टार्टअप और सेवाओं के विस्तार से क्षेत्रीय असमानता कम करने का दावा किया गया है। बजट भाषण में यह भी कहा गया कि इससे ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर होने वाले अनियंत्रित पलायन पर रोक लगेगी। स्मार्ट सिटी जैसी योजनाओं के अनुभव को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने डिजिटल बुनियादी ढांचे, आवास और शहरी परिवहन पर विशेष ध्यान देने की बात कही। लेकिन इन वादों के बीच यह चिंता भी सामने आई कि कहीं यह शहरीकरण की दौड़ ग्रामीण भारत की उपेक्षा को और गहरा न कर दे।
राजकोषीय अनुशासन को लेकर सरकार ने इस बजट में खुद को जिम्मेदार और सतर्क दिखाने की कोशिश की है। 4.3% का राजकोषीय घाटा लक्ष्य तय करते हुए यह संदेश दिया गया कि वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के बावजूद भारत अपनी वित्तीय साख से समझौता नहीं करेगा। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों को भरोसा दिलाने के लिए यह आंकड़ा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार का तर्क है कि नियंत्रित घाटा और बढ़ता पूंजीगत व्यय एक संतुलित नीति का प्रमाण है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह अनुशासन आम जनता की कीमत पर हासिल किया जा रहा है, क्योंकि सामाजिक क्षेत्र और कर राहत जैसे मुद्दे पीछे छूटते दिख रहे हैं।
चमकदार घोषणाओं के बीच सबसे तीखी प्रतिक्रिया मध्यम वर्ग की ओर से देखने को मिली है। वर्षों से यह वर्ग बजट के दिन टैक्स राहत की उम्मीद लगाए बैठा रहता है, लेकिन इस बार भी निराशा ही हाथ लगी। इनकम टैक्स स्लैब में किसी तरह का बदलाव न होना और ‘ब्रैकेट क्रीप’ की समस्या को अनदेखा करना कई परिवारों को खल गया है। 6% से अधिक की महंगाई दर के बीच जब वेतन में मामूली बढ़ोतरी होती है, तो लोग अनायास ही ऊँचे टैक्स स्लैब में पहुंच जाते हैं, जबकि उनकी वास्तविक क्रय शक्ति घटती जा रही है। पुरानी टैक्स व्यवस्था को लगभग समाप्त कर नई व्यवस्था में ₹4 लाख की सीमा को जस का तस रखना इस बात का संकेत माना गया कि सरकार ने मध्यम वर्ग की मुश्किलों को गंभीरता से नहीं लिया। स्टैंडर्ड डिडक्शन की मामूली राहत को आलोचकों ने “झुनझुना” करार दिया, जो बढ़ती महंगाई के सामने बेअसर साबित होता है।

निवेशकों और शेयर बाजार से जुड़े लोगों के लिए यह बजट किसी झटके से कम नहीं रहा। फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) पर सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स को बढ़ाकर 0.05% और 0.15% करना सीधे तौर पर ट्रेडिंग लागत को बढ़ाने वाला कदम माना गया। सरकार ने इसे सट्टेबाजी पर लगाम लगाने की कोशिश बताया, लेकिन बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इससे खुदरा निवेशक हतोत्साहित होंगे। जब लेनदेन की लागत बढ़ेगी, तो छोटे निवेशकों के लिए बाजार में टिके रहना मुश्किल होगा। इससे न केवल मार्केट की लिक्विडिटी घटेगी, बल्कि विदेशी निवेश के लिए भारत की आकर्षण क्षमता पर भी सवाल उठेंगे। ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के दावों के बीच यह फैसला कई लोगों को विरोधाभासी लगा है।
ग्रामीण भारत की तस्वीर इस बजट में सबसे धुंधली नजर आई है। मनरेगा (MGNREGA) के लिए ₹86,000 करोड़ का सीमित प्रावधान और 60:40 के फंडिंग अनुपात में राज्यों पर बढ़ता बोझ यह संकेत देता है कि ग्रामीण रोजगार को प्राथमिकता सूची में पीछे धकेल दिया गया है। कृषि मंत्रालय के आवंटन में महंगाई के अनुपात में कोई ठोस वृद्धि न होना भी किसानों के लिए निराशाजनक साबित हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब ग्रामीण मांग कमजोर रहेगी, तो शहरी विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर पर किया गया भारी निवेश टिकाऊ नहीं हो सकता। अन्नदाता की आय बढ़ाए बिना समग्र आर्थिक विकास का सपना अधूरा रह जाएगा।
बजट 2026-27 में एक और बड़ा मुद्दा ‘नए आयकर अधिनियम 2025’ को लेकर उभरा है। सरकार ने 2026 से एक ‘सिंप्लिफाइड’ टैक्स कानून लाने की बात कही है, लेकिन कर विशेषज्ञों के बीच इसे लेकर आशंकाएं गहरी हैं। उनका मानना है कि सरलीकरण के नाम पर नई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। दशकों पुराने अदालती फैसले और मिसालें नई धाराओं के आने से अप्रासंगिक हो जाएंगी, जिससे कर विवाद और मुकदमेबाजी बढ़ने की आशंका है। ‘टैक्स टेररिज्म’ जैसे शब्दों का दोबारा प्रचलन इस चिंता को और गहरा करता है कि कहीं यह बदलाव करदाताओं के लिए नई मुश्किलें न खड़ी कर दे।
इन तमाम पहलुओं के बीच सरकार से सीधे सवाल पूछे जा रहे हैं। क्या बुनियादी ढांचे पर अरबों खर्च करने के बावजूद शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मानवीय निवेशों का अनुपात स्थिर रहना उचित है? क्या विकास का मतलब केवल सड़कें, पुल और रेल लाइनें बनाना है, या फिर इंसानों की गुणवत्ता में निवेश करना भी उतना ही जरूरी है? महंगाई से जूझ रही जनता के लिए बजट में कोई ठोस रोडमैप न होना भी निराशाजनक माना जा रहा है। रसोई गैस, बिजली और खाद की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है, लेकिन राहत के संकेत कहीं नजर नहीं आते।
रोजगार का संकट भी इस बजट के बाद चर्चा के केंद्र में है। स्किलिंग और इंटर्नशिप जैसी योजनाओं के वादों के बावजूद बेरोजगारी के ठोस आंकड़ों से निपटने की रणनीति अस्पष्ट दिखाई देती है। युवा वर्ग के लिए स्थायी और सम्मानजनक रोजगार की कमी एक गंभीर सामाजिक चुनौती बन चुकी है। जब पढ़ा-लिखा युवा सड़कों पर है, तो ‘भविष्योन्मुखी भारत’ का सपना अधूरा सा लगता है। इसके साथ ही ईमानदार टैक्स पेयर की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। न तो उसे पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा मिलती है और न ही कर में राहत, ऐसे में यह भावना गहराती जा रही है कि उसका काम केवल सरकार की बड़ी परियोजनाओं के लिए धन जुटाना भर रह गया है।
समग्र रूप से देखा जाए तो बजट 2026-27 कैपिटल एक्सपेंडिचर का एक भव्य दस्तावेज है, जो भारत की लंबी दूरी की दौड़ के लिए ट्रैक तैयार करता है। लेकिन इस ट्रैक पर दौड़ने वाले धावकों यानी आम आदमी, किसान और मध्यम वर्ग की थकान और दर्द को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। मजबूत अर्थव्यवस्था केवल ऊँचे आंकड़ों से नहीं, बल्कि खुशहाल परिवारों और सशक्त समाज से बनती है। यदि समय रहते टैक्स के बोझ और ग्रामीण संकट का समाधान नहीं किया गया, तो इंफ्रास्ट्रक्चर की यह चमक कुछ गिने-चुने वर्गों के लिए ही सुरक्षित गलियारा बनकर रह जाएगी। बजट ने देश के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या यह कड़वी खुराक भविष्य के बड़े लाभ के लिए जरूरी है, या फिर मध्यम वर्ग के साथ एक और अन्याय? यही बहस आने वाले दिनों में देश की आर्थिक राजनीति की दिशा तय करेगी।





