उत्तराखंड(सुनील कोठारी)। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सत्ता के गलियारों में जो गतिरोध देखा जा रहा है, वह केवल विपक्ष की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि बीजेपी के भीतर की गहरी असहमति और नाराज़गी का परिणाम है। जो नेता कल तक एकजुट दिखाई देते थे, आज वही अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक हितों को लेकर अलग रुख अपनाते दिख रहे हैं। भाजपा की मौजूदा सरकार पर सवाल उठाने की यह प्रक्रिया केवल सामान्य आलोचना नहीं है, बल्कि संकेत है कि कुछ बड़े बदलाव की तैयारी चल रही है। गढ़वाल और कुमाऊं दोनों ही क्षेत्रों से बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता इस समय सक्रिय रूप से धामी सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। इस तरह की अंदरूनी हलचल चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल सकती है। पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, सांसद अनिल बलूनी, हरिद्वार के विधायक मदन कौशिक, और बिशन सिंह चुफाल जैसे नेताओं की गतिविधियाँ इस समय विशेष ध्यान का केंद्र बनी हुई हैं।
उत्तराखंड की सियासत में हमेशा चुनाव से पहले कुछ घटनाएं और बयान सामने आते रहे हैं, लेकिन इस बार मामला और जटिल दिखाई दे रहा है। बीजेपी के भीतर कई नेता, जो गढ़वाल से आते हैं, गढ़वाल के अंदर और बाहर दोनों ही क्षेत्रों में नाराज़गी के संकेत दे रहे हैं। इन नेताओं की गतिविधियों का केंद्र केवल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उनके इर्द-गिर्द बनने वाली नई रणनीतियों और गठबंधन को लेकर भी लगातार चर्चाएं हैं। उदाहरण के तौर पर, गदरपुर से विधायक अरविंद पांडे की हालिया गतिविधियाँ और उनके द्वारा उठाए गए सवाल पार्टी संगठन के भीतर हलचल पैदा कर रहे हैं। अरविंद पांडे ने किसान हत्या मामले में CBI जांच की सिफारिश की, भूमि विवादों पर अपनी राय रखी, और पार्टी की नीतियों पर असहमति जताई। ऐसे कई मामले हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि पार्टी के भीतर कुछ बड़े नेता अब खुलकर अपनी स्थिति और प्रभाव बनाए रखने की दिशा में सक्रिय हैं।
बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, सांसद अनिल बलूनी, और अन्य नेता गदरपुर में हुई घटनाओं को लेकर अपने कदमों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण कर रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दौरे और स्थानीय नेताओं की उपस्थिति इस पूरे सियासी परिदृश्य को और भी महत्वपूर्ण बना देती है। यह दौरा केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि पार्टी के भीतर राजनीतिक संतुलन और नेताओं के प्रभाव को देखने का एक अवसर भी था। इस दौरान कई वरिष्ठ नेताओं ने अपनी दूरी बनाए रखी, जिससे पार्टी में हलचल और बढ़ गई। विशेष रूप से अनिल बलूनी और त्रिवेंद्र सिंह रावत जैसे नेता, जो केंद्रीय नेतृत्व में अपनी पकड़ रखते हैं, उनके कदमों को लेकर अलग-अलग अटकलें सामने आईं। गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों के नेताओं के बीच यह संतुलन आने वाले विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
अरविंद पांडे की नाराज़गी केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं है, बल्कि यह पार्टी संगठन और मुख्यमंत्री के प्रति असहमति का भी संकेत देती है। उन्होंने कई मौकों पर पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर अपनी राय व्यक्त की है और CBI जांच की मांग की, भूमि विवादों पर सवाल उठाए, और संगठन की रणनीति पर भी विवाद किया। इस तरह की असहमति अब केवल गढ़वाल क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि कुमाऊं मंडल में भी धीरे-धीरे फैल रही है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह स्थिति धामी सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है। यदि पार्टी के अंदर इस तरह की सक्रियता और गुटबंदी बनी रहती है, तो आने वाले चुनावों में इसका असर निश्चित रूप से पड़ेगा। यह सिर्फ व्यक्तिगत विरोध नहीं है, बल्कि भविष्य के राजनीतिक समीकरणों को लेकर रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है।
उत्तराखंड बीजेपी में वर्तमान समय में गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों से कई बड़े नेता सक्रिय हैं। गढ़वाल मंडल के नेता अपनी पकड़ बनाने में जुटे हैं, जबकि कुमाऊं के नेता नाराज़गी जताते हुए अलग गठबंधन बनाने की तैयारी में हैं। इन सबका उद्देश्य केवल मुख्यमंत्री धामी को चुनौती देना नहीं है, बल्कि पार्टी में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करना भी है। इस समय बीजेपी के भीतर यह गुटबंदी काफी स्पष्ट दिख रही है। हाल ही में गदरपुर में हुई घटनाओं और अरविंद पांडे की गतिविधियों ने इस बात को और अधिक स्पष्ट कर दिया कि पार्टी के अंदर बड़ी राजनीतिक हलचल जारी है। वरिष्ठ नेताओं के कदम, उनकी मुलाकातें और दूरी बनाने की रणनीतियाँ इस पूरे परिदृश्य को और पेचीदा बना रही हैं।

बीजेपी के भीतर इस समय कुछ बड़े नेताओं की केंद्रीय भूमिका और स्थानीय राजनीति में उनकी पकड़ भी महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बनी हुई है। अनिल बलूनी, जो लंबे समय तक केंद्रीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं, अब उत्तराखंड में अपनी अलग राजनीतिक भूमिका बनाने की तैयारी कर रहे हैं। उनके कदम और निर्णय भविष्य में मुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के तौर पर चर्चा का केंद्र बन सकते हैं। वहीं त्रिवेंद्र सिंह रावत और मदन कौशिक जैसे वरिष्ठ नेता भी पार्टी संगठन और स्थानीय नेताओं को अपने प्रभाव में लेने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इस तरह की अंदरूनी हलचल चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक वातावरण को पूरी तरह बदल सकती है।
इस समय पार्टी के भीतर नाराज़ नेताओं की संख्या और उनकी गतिविधियाँ भविष्य की रणनीति को लेकर संकेत देती हैं। यदि गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों के नेताओं की सक्रियता बनी रहती है, तो आने वाले चुनावों में इसका असर निश्चित रूप से दिखाई देगा। अरविंद पांडे जैसे नेता, जो पार्टी की नीतियों और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते रहे हैं, उनके साथ अन्य नेता भी जुड़ सकते हैं। इस प्रकार, पार्टी के अंदर गुटबंदी केवल व्यक्तिगत मतभेद नहीं, बल्कि भविष्य की सियासी योजना का हिस्सा है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह पूरी प्रक्रिया BJP के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है, और आने वाले चुनावों में इसका असर स्पष्ट दिखाई देगा। उत्तराखंड की राजनीति में हमेशा यह देखा गया है कि मुख्यमंत्री पद की संभावनाएँ केवल वर्तमान मुख्यमंत्री पर निर्भर नहीं करतीं। कई बार जिन नेताओं का नाम सबसे अधिक चर्चा में होता है, वे वास्तव में मुख्यमंत्री नहीं बनते। इसके बजाय वे नेता, जो संगठन और पार्टी में संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं, अक्सर इस पद पर पहुंचते हैं। प्रवीण सिंह रावत और अनिल बलूनी जैसी व्यक्तियों की सक्रियता और उनका संगठनात्मक प्रभाव इस समय चर्चा का मुख्य विषय है। चुनाव से ठीक पहले बीजेपी के भीतर इस तरह की हलचल और गुटबंदी संकेत देती है कि कुछ बड़ा बदलाव निश्चित रूप से होने वाला है।
अरविंद पांडे की नाराज़गी, केंद्रीय नेतृत्व और पार्टी संगठन के साथ उनकी स्थिति, और अन्य वरिष्ठ नेताओं की सक्रियता उत्तराखंड बीजेपी के भविष्य की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएगी। यह स्पष्ट है कि आने वाले चुनाव में पार्टी को केवल विपक्ष से ही नहीं, बल्कि अपने अंदरूनी मतभेदों और गुटबंदी से भी निपटना होगा। गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों के नेताओं की गतिविधियाँ, उनके बयान और रणनीतियाँ पूरे चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकती हैं। इस प्रकार, उत्तराखंड की राजनीतिक परिदृश्य में आगामी समय में कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
इस पूरी स्थिति का महत्व केवल वर्तमान मुख्यमंत्री धामी तक सीमित नहीं है। पार्टी के भीतर संतुलन बनाए रखने के लिए वरिष्ठ नेताओं और केंद्रीय नेतृत्व द्वारा किए जा रहे कदम भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन कदमों से यह तय होगा कि आने वाले चुनाव में किस नेता की स्थिति मजबूत होगी और कौन सा चेहरा मुख्यमंत्री पद के लिए उपयुक्त ठहर सकता है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस समय बीजेपी उत्तराखंड को प्रयोगशाला की तरह देख रही है, और पिछले चुनावों के अनुभव इस बात को प्रमाणित करते हैं कि चुनाव से ठीक पहले पार्टी के भीतर हलचल और गुटबंदी सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
उत्तराखंड बीजेपी के भीतर चल रही इस हलचल और अंदरूनी राजनीतिक गतिविधियों का असर केवल पार्टी और सरकार तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर सीधे जनता, चुनावी रणनीति और पार्टी के भीतर संतुलन पर भी पड़ेगा। गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों से सक्रिय नेताओं की भूमिकाएँ, उनके कदम और रणनीतियाँ भविष्य में किसी भी बड़े राजनीतिक बदलाव की दिशा तय कर सकती हैं। इस प्रकार, आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति में कई बड़े और अहम मोड़ देखने को मिल सकते हैं, और यह साफ संकेत है कि कुछ बड़ा बदलाव निश्चित रूप से होने वाला है।





