काशीपुर(सुनील कोठारी)। गदरपुर में प्रस्तावित शक्ति प्रदर्शन भले ही अंतिम समय पर थम गया हो, लेकिन उससे उठी सियासी तपिश अब पूरे प्रदेश में महसूस की जा रही है। जिस “गदर” की आहट से प्रशासन से लेकर संगठन तक सतर्क हो गया था, वह भौतिक रूप से तो नहीं हुआ, पर उसके राजनीतिक निहितार्थ अब चर्चा के केंद्र में हैं। भारतीय जनता पार्टी के भीतर जिस तरह की गुटबाजी खुलकर सामने आई है, उसने 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर नई आशंकाएं खड़ी कर दी हैं। पार्टी के भीतर उठ रहे सवाल यह संकेत दे रहे हैं कि मामला केवल एक स्थानीय विवाद का नहीं रहा, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन, नेतृत्व की भूमिका और कार्यकर्ताओं के मनोबल से जुड़ता जा रहा है। गदरपुर प्रकरण ने यह भी दिखा दिया कि जमीन पर सक्रिय कार्यकर्ताओं और शीर्ष नेतृत्व के बीच संवाद की कमी किस तरह बड़े राजनीतिक संकट का रूप ले सकती है। यह सवाल अब आम हो चला है कि क्या समय रहते इस असंतोष को नहीं संभाला गया तो उसका सीधा असर आगामी चुनावी समीकरणों पर पड़ेगा।
राजनीतिक गलियारों में सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर है कि आखिर पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व ने इस पूरे घटनाक्रम को किस नजर से देखा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की भूमिका पर लगातार प्रश्नचिह्न लगाए जा रहे हैं। कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच यह चर्चा तेज है कि जब विवाद की जड़ में विधायक अरविंद पांडे की नाराजगी और उनके समर्थकों की बेचौनी थी, तो शीर्ष नेतृत्व ने उनसे संवाद का रास्ता क्यों नहीं चुना। यह भी पूछा जा रहा है कि क्या मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष का उनसे न मिलना किसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था या फिर यह आंतरिक मतभेदों का परिणाम है। संगठन के भीतर यह भावना गहराती जा रही है कि अगर समय रहते समाधान की पहल होती, तो गदरपुर जैसी स्थिति पैदा ही नहीं होती। सवाल यह भी है कि क्या नेतृत्व की चुप्पी ने आग में घी डालने का काम किया।
विधायक अरविंद पांडे को लेकर उठ रही बहस अब केवल पार्टी तक सीमित नहीं रही। आम जनता के बीच भी यह जिज्ञासा है कि वे वास्तव में किसकी लड़ाई लड़ रहे हैं। यदि यह मान लिया जाए कि वे जनता के मुद्दों को लेकर मुखर हैं, तो फिर उनके विरोध में खड़े पार्टी के नेता किस आधार पर असहमति जता रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, यदि पार्टी का यह तर्क है कि अरविंद पांडे व्यक्तिगत या राजनीतिक स्वार्थ के लिए दबाव बना रहे थे, तो फिर उस दिन बिना किसी औपचारिक बुलावे के हजारों लोगों का गदरपुर पहुंचना कैसे समझाया जाए। यह भी एक बड़ा प्रश्न है कि क्या इतनी बड़ी संख्या में जुटी भीड़ स्वतःस्फूर्त थी या फिर यह जनता के भीतर गहरे असंतोष का संकेत थी। इन सवालों ने अरविंद पांडे को लेकर बनी छवि को और जटिल बना दिया है।
गदरपुर की घटना ने पार्टी संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती दूरी को भी उजागर कर दिया है। कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि संगठनात्मक फैसले जमीनी हकीकत से कटकर लिए जा रहे हैं। यही वजह है कि जब कोई नेता स्थानीय स्तर पर आवाज उठाता है, तो उसे “अनुशासनहीनता” के दायरे में डाल दिया जाता है। अरविंद पांडे के मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। पार्टी के भीतर यह चर्चा है कि यदि कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की भावनाओं को समय रहते नहीं सुना गया, तो वे खुद को उपेक्षित महसूस करेंगे। यही उपेक्षा धीरे-धीरे असंतोष में बदलती है और फिर गदरपुर जैसे हालात पैदा होते हैं। यह स्थिति भाजपा जैसे बड़े संगठन के लिए चेतावनी मानी जा रही है।
प्रदेश की राजनीति को करीब से देखने वाले जानकार यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह विवाद अब विधायक और मुख्यमंत्री के बीच की लड़ाई बनकर रह गया है। यदि ऐसा है, तो संगठन की भूमिका कहां है। क्या पार्टी के वरिष्ठ नेता इस पूरे घटनाक्रम से मुंह छुपाए बैठे हैं या फिर वे किसी बड़े राजनीतिक फैसले का इंतजार कर रहे हैं। गदरपुर प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नेतृत्व की चुप्पी कई बार सहमति के रूप में भी देखी जाती है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या वरिष्ठ नेताओं की निष्क्रियता अप्रत्यक्ष रूप से किसी एक पक्ष का समर्थन मानी जा रही है। पार्टी के भीतर इस तरह की चर्चाएं भाजपा की एकजुटता पर सवाल खड़े कर रही हैं।
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में पूर्व सांसद बलराज पासी की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा और जिज्ञासा का विषय बनी हुई है। विधायक अरविंद पांडे सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते रहे हैं और दोनों के बीच लंबे समय से मजबूत और आत्मीय संबंधों की बातें सियासी गलियारों में आम रही हैं। ऐसे में इस संवेदनशील मामले पर बलराज पासी की चुप्पी ने कई तरह की राजनीतिक अटकलों को जन्म दे दिया है। पार्टी के भीतर और बाहर यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह खामोशी किसी रणनीति का हिस्सा है या फिर अप्रत्यक्ष रूप से अरविंद पांडे के प्रति समर्थन का संकेत। राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग इसे बलराज पासी की परिपक्वता से जोड़कर देख रहा है, जहां वे किसी भी पक्ष में खुलकर बयान देकर आग में घी डालने से बचना चाहते हैं। वहीं, कई लोगों का मानना है कि उनका मौन खुद में एक सशक्त संदेश है, जिसने इस पूरे मामले को और ज्यादा रहस्यमय तथा रोचक बना दिया है।
भारतीय जनता पार्टी के भीतर अब यह आशंका तेजी से गहराती जा रही है कि यदि संगठनात्मक स्तर पर चल रही अंदरूनी खींचतान को समय रहते नहीं थामा गया, तो इसका सीधा और गंभीर असर 2027 के विधानसभा चुनावों में देखने को मिल सकता है। पार्टी के रणनीतिकारों को डर है कि गदरपुर जैसा प्रकरण विपक्ष के लिए एक मजबूत राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है। विपक्षी दल पहले ही इस मुद्दे को हवा देकर भाजपा की कथित गुटबाजी और आंतरिक अस्थिरता को जनता के सामने उजागर करने में जुट गए हैं। भाजपा के भीतर से ही कई वरिष्ठ नेताओं की राय है कि अब टालमटोल की राजनीति नुकसानदेह साबित हो सकती है। उनका मानना है कि संगठन को तुरंत पहल करते हुए संवाद, संतुलन और समन्वय का रास्ता अपनाना होगा, अन्यथा यह दबा हुआ असंतोष धीरे-धीरे विस्फोटक रूप ले सकता है। गदरपुर की घटना को महज एक चेतावनी नहीं, बल्कि आने वाले राजनीतिक संकट की झलक के रूप में देखा जा रहा है, जिसे नजरअंदाज करना भारी भूल साबित हो सकती है।
प्रदेश की सियासत में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही बन चुका है कि क्या भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व गदरपुर प्रकरण से कोई ठोस सबक लेगा या नहीं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के सामने अब संगठनात्मक एकता को बनाए रखने की कड़ी परीक्षा खड़ी हो गई है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि नेतृत्व के सामने दो ही रास्ते हैंकृया तो विधायक अरविंद पांडे से सीधे संवाद कर उनके असंतोष के कारणों को समझा जाए, या फिर अनुशासन के नाम पर सख्त कदम उठाकर स्पष्ट संदेश दिया जाए। विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों ही विकल्पों के दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। संवाद का रास्ता अपनाने से संगठन में भरोसा मजबूत हो सकता है, जबकि कठोर रुख अपनाने से भीतर ही भीतर पनप रहा असंतोष और गहराने का खतरा है। पार्टी के अंदरूनी हलकों में यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि यदि नेतृत्व ने समय रहते संतुलित और लचीला रुख नहीं अपनाया, तो यह असंतोष आने वाले चुनावों में गंभीर चुनौती बन सकता है।
इस पूरे मामले पर राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि गदरपुर की घटना केवल एक स्थानीय विवाद भर नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति में भीतर ही भीतर पनप रही उस बेचौनी का संकेत है, जिसे लंबे समय से नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब किसी पार्टी के भीतर संवाद कमजोर पड़ने लगता है और जमीनी कार्यकर्ताओं की आवाज़ शीर्ष नेतृत्व तक नहीं पहुंच पाती, तब ऐसे हालात जन्म लेते हैं। अरविंद पांडे से जुड़ा घटनाक्रम यह दर्शाता है कि संगठनात्मक अनुशासन और जनभावनाओं के बीच संतुलन बनाना अब भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बिना बातचीत के फैसले लेना और चुप्पी साधे रखना कई बार असहमति को और तेज कर देता है। हजारों लोगों की स्वतःस्फूर्त मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि मुद्दा केवल व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि व्यापक जनअसंतोष से जुड़ा हो सकता है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि समय रहते नेतृत्व ने स्थिति को नहीं संभाला, तो यह असंतोष 2027 के चुनावों में गंभीर राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकता है।
अंततः गदरपुर की घटना ने यह पूरी तरह उजागर कर दिया है कि राजनीति में संवाद की अनदेखी कितनी भारी राजनीतिक कीमत वसूल सकती है। हजारों की संख्या में जुटी भीड़, शीर्ष नेताओं की रहस्यमय चुप्पी और संगठन के भीतर साफ दिखती गुटबाजी ने मिलकर ऐसे तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनसे अब भारतीय जनता पार्टी बच नहीं सकती। यह प्रकरण अब केवल एक विधायक या किसी एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रदेश की सियासत की दिशा और दशा को प्रभावित करने वाला बड़ा मुद्दा बन चुका है। कार्यकर्ताओं के मन में उठता असंतोष और जनता के बीच बनती धारणा पार्टी नेतृत्व के लिए गंभीर चुनौती बन रही है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि भाजपा इस “थम गए गदर” से कोई ठोस राजनीतिक सबक लेती है या नहीं। सबसे अहम सवाल यही है कि क्या पार्टी समय रहते भीतर की दरारों को भर पाएगी या फिर यही दरारें भविष्य में बड़े राजनीतिक तूफान की वजह बनेंगी।





