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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में उत्तराखंड पंडा-पुरोहित और नेता खड़े हुए

ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ प्रयागराज में हुए विवाद के बाद उत्तराखंड के पंडा-पुरोहितों और नेताओं ने एकजुट होकर उनका समर्थन किया, धर्म परंपरा और मठों के ऐतिहासिक सम्मान की रक्षा की।

हरिद्वार। 18 जनवरी 2026 को देश मौनी अमावस्या मना रहा था और इस पवित्र अवसर पर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक अनचाही और विवादास्पद घटना घटी। उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, गंगा स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे। इस दौरान उनके दल और स्थानीय प्रशासन, जो माघ मेला के तहत गंगा स्नान की सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहा था, के बीच गंभीर मतभेद हो गए। पालकी से उतरने और पैदल स्नान करने के तरीके को लेकर प्रशासन और शंकराचार्य के अनुयायियों में तनाव उत्पन्न हुआ। शंकराचार्य ने इस विवाद को अपमानजनक मानते हुए स्नान करने से इंकार कर दिया, जिससे मामला तूल पकड़ गया। विवाद बढ़ता गया और अब यह उत्तराखंड तक फैल चुका है, जिससे धार्मिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों की भी प्रतिक्रिया सामने आ रही है।

उत्तराखंड की धार्मिक संस्थाओं और प्रमुख पंडों ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के समर्थन में अपनी आवाज बुलंद की है। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य को रोकने और उनके अधिकारों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की घटना ने उत्तराखंड के धार्मिक स्थलों पर कार्यरत पंडों और पुरोहितों को भी हिला कर रख दिया। उत्तराखंड चारधाम पुरोहित महापंचायत के अध्यक्ष सुरेश सेमवाल, बदरीश पंडा समिति बदरीनाथ के अध्यक्ष प्रवीन ध्यानी, ब्रह्मकपाल तीर्थ पुरोहित समिति बदरीनाथ के अध्यक्ष उमेश सती और यमुनोत्री मंदिर समिति के प्रवक्ता पुरुषोत्तम उनियाल ने संयुक्त रूप से शंकराचार्य के समर्थन में बयान जारी किए। इन धार्मिक अधिकारियों ने शंकराचार्य के साथ हुई घटना की निंदा की और इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति पर चिंता व्यक्त की।

यमुनोत्री मंदिर समिति के प्रवक्ता पुरुषोत्तम उनियाल ने कहा कि ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य के साथ जो दुर्व्यवहार हुआ है, वह पूरी तरह निंदनीय है। उन्होंने बताया कि शंकराचार्य महाराज हमारे सनातन धर्म के मार्गदर्शक हैं और जिन्हें पीठाधीश्वर की उपाधि प्राप्त है, उन्हें मौनी अमावस्या के दिन अपनी धार्मिक नीति के अनुसार स्नान करने से रोकना अत्यंत अपमानजनक है। पुरुषोत्तम उनियाल ने कहा कि यह केवल शंकराचार्य के प्रति नहीं, बल्कि पूरे सनातन धर्म के अनुयायियों के प्रति अपमान है। उन्होंने यह भी कहा कि शंकराचार्य की प्रतिष्ठा और सम्मान का हनन किसी भी सनातन धर्मावलंबी को ठेस पहुंचाता है, जिससे धर्म की रीढ़ पर चोट लगती है।

इसी प्रकार, ब्रह्मकपाल तीर्थ पुरोहित समिति के अध्यक्ष उमेश सती ने कहा कि प्रयागराज में शंकराचार्य के साथ जो घटना हुई है, वह दुर्भाग्यपूर्ण और अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए और जो लोग इसके पीछे हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। उमेश सती ने पूरे देशवासियों से अपील की कि वे सनातन धर्म की लोक परंपराओं का नेतृत्व करने वाले ध्वजवाहक शंकराचार्य के समर्थन में सामने आएं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रयागराज में घटी यह घटना केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं है, बल्कि यह हमारी परंपरा और धार्मिक आस्था पर गहरी चोट है।

बदरीनाथ के बदरीश पंडा पंचायत के अध्यक्ष प्रवीन ध्यानी ने कहा कि शंकराचार्य के साथ हुई घटना अत्यंत निंदनीय है और शासन प्रशासन द्वारा उनकी शंकराचार्य पदवी की प्रमाणिकता पूछने और नोटिस भेजने का कार्य पूरी तरह अनुचित है। उनका कहना था कि प्रशासन का मुख्य कर्तव्य घाटों पर व्यवस्था बनाना है, ना कि शंकराचार्य की धार्मिक प्रमाणिकता पर सवाल उठाना। प्रवीन ध्यानी ने जोर देकर कहा कि प्रशासन को केवल परंपराओं को निभाने में सहयोग देना चाहिए और किसी भी तरह से धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

उत्तराखंड चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत के अध्यक्ष सुरेश सेमवाल ने भी शंकराचार्य के साथ हुए दुर्व्यवहार को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि यदि हमारे चार प्रमुख शंकराचार्यों के धार्मिक अधिकारों और सम्मान का पालन नहीं किया जाएगा, तो सनातन धर्म की रक्षा कैसे होगी। उन्होंने चेतावनी दी कि आज जो लोग कह रहे हैं कि हिंदू खतरे में हैं, वही लोग सनातन धर्म को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान हर सनातन धर्मावलंबी का कर्तव्य है और इसे राजनीति की भेंट नहीं चढ़ाया जाना चाहिए।

उत्तराखंड की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेताओं ने भी शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में अपनी प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि जहां-जहां भाजपा की सरकार आती है, वहां उनके खिलाफ जो लोग रहते हैं, उन्हें प्रतिशोध का सामना करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि प्रयागराज में शंकराचार्य के साथ हुई यह घटना पूर्व नियोजित लगती है। शंकराचार्य हर बार अपनी परंपराओं के अनुसार स्नान करने जाते हैं, लेकिन इस बार उन्हें जानबूझकर रोका गया। यह राजनीतिक प्रतिशोध के संकेत के रूप में देखा जा सकता है।

गणेश गोदियाल ने आगे कहा कि शंकराचार्य पूरे सनातन धर्म के मार्गदर्शक हैं और सरकारों को धर्मशास्त्र के अनुसार दिशा देने का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि चाहे भाजपा हो या कांग्रेस, शंकराचार्य राजनीतिक दलों के फैसलों पर मार्गदर्शन देते हैं। इस वजह से भाजपा सरकार इस बात को सहन नहीं कर पाई कि कोई उनके खिलाफ बोले। उन्होंने इस घटना की खुले तौर पर निंदा की और जनता से अपील की कि वे धर्म की रक्षा में खड़े हों।

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत ने भी शंकराचार्य के समर्थन में मौन व्रत रखा। उन्होंने इसे शंकराचार्य को समर्पित किया और कहा कि सनातन धर्म हमेशा उच्च है और सत्ता इसके अनुयायी होती है, ना कि सत्ता सनातन धर्म की। हरीश रावत ने यह भी कहा कि यह मौन व्रत आध्यात्मिक लड़ाई का प्रतीक है और इसे सनातन धर्म की रक्षा के लिए किया गया है।

उत्तराखंड भाजपा इस पूरे विवाद पर असहज नजर आई। भाजपा प्रवक्ता विनोद चमोली ने कहा कि पार्टी शंकराचार्य के विरोध में नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शंकराचार्य का पूर्ण सम्मान किया जाता है और उनके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ। चमोली ने कहा कि प्रयागराज घाट पर कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन ने शंकराचार्य से अनुरोध किया था। उन्होंने यह भी कहा कि शंकराचार्य ने कोई विरोध नहीं किया, लेकिन उनके अनुयायियों ने आपत्ति जताई और विवाद उत्पन्न हो गया।

विनोद चमोली ने शंकराचार्य की प्रमाणिकता पर कहा कि सरकार का इस मामले में कोई हाथ नहीं है और शंकराचार्य की नियुक्ति और हटाने का अधिकार केवल धार्मिक परंपरा के तहत होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा इस मामले में किसी भी तरह से हस्तक्षेप नहीं करेगी और शंकराचार्य का सम्मान सर्वाेपरि है। चमोली ने कहा कि राजनीतिक दलों को धार्मिक मामलों में नहीं पड़ना चाहिए और इसे केवल धार्मिक अधिकारों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

आदि गुरु शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में शंकराचार्य पद की स्थापना की थी और भारत के चारों कोनों में चार प्रमुख मठों की स्थापना की। इन मठों के प्रमुखों को शंकराचार्य कहा जाता है। इनका मुख्य कार्य हिंदू धर्म का संरक्षण, शास्त्रार्थ, मानवता का आध्यात्मिक मार्गदर्शन और वेदों का प्रचार करना है। भारत के चार प्रमुख मठ हैंरू पुरी का गोवर्धन पीठ (पूर्व दिशा), द्वारका का शारदा पीठ (पश्चिम दिशा), उत्तराखंड का ज्योतिर्मठ पीठ (उत्तर दिशा), और कर्नाटक का शृंगेरी शारदा पीठ (दक्षिण दिशा)।

धार्मिक मामलों के जानकार और उत्तराखंड चारधाम पर शोध करने वाले वरिष्ठ स्कॉलर बृजेश सती के अनुसार, शंकराचार्य के असली होने का प्रमाण आज उत्तर प्रदेश में मांगा जा रहा है, लेकिन यह परंपरा सदियों पुरानी है। गुरु परंपरा के तहत ही किसी संन्यासी को शंकराचार्य की उपाधि दी जाती है। उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ पीठ पर 12 सितंबर 2022 को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को 55वें शंकराचार्य के रूप में नियुक्त किया गया था।

18 जनवरी 2026 को मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती गंगा स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे। माघ मेला प्रशासन ने उनकी पालकी को रोक दिया, जिससे शंकराचार्य ने अपना अपमान महसूस किया और स्नान करने से मना कर दिया। उन्होंने धरना देकर स्नान से इनकार किया और वहां से हटने से भी इनकार किया। 19 जनवरी को माघ मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को नोटिस जारी किया और उनकी शंकराचार्य पदवी प्रमाणित करने को कहा।

शंकराचार्य ने 8 पन्नों का जवाब भेजा। इसके बाद 21 जनवरी को प्रशासन ने उन्हें दूसरा नोटिस जारी किया, जिसमें उनके संस्थान के नाम भूमि आवंटन निरस्त करने और आजीवन मेले से प्रतिबंधित करने की बात कही गई। 21 जनवरी को सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने शंकराचार्य से फोन पर संपर्क कर उनका समर्थन किया। योगी सरकार ने कहा कि संन्यासी के लिए राष्ट्र सर्वाेपरि है, व्यक्तिगत संपत्ति या अहंकार नहीं।

22 जनवरी को हरियाणा के सीएम योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए कहा कि कुछ लोग धर्म की आड़ में सनातन धर्म को कमजोर करने की साजिश रच रहे हैं। 23 जनवरी को पांच दिन तक धरने पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की तबीयत अचानक खराब हो गई और उन्होंने पालकी से उतरकर वैन में जाने का फैसला किया।

इस विवाद ने धार्मिक और राजनीतिक दोनों ही स्तरों पर चर्चा छेड़ दी है। उत्तराखंड और प्रयागराज के बीच यह मामला अब तक कई दिनों तक सुर्खियों में रहा है। उत्तराखंड की धार्मिक संस्थाएं, विपक्षी दल और जनता इस घटना को गंभीरता से देख रहे हैं और शंकराचार्य के समर्थन में आगे आए हैं। धर्म और प्रशासन के बीच यह टकराव सनातन परंपरा की रक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती पेश कर रहा है।

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