गदरपुर। उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों असाधारण हलचलों से भरी हुई है और इसकी सबसे बड़ी वजह गदरपुर से भारतीय जनता पार्टी के विधायक अरविंद पांडे को लेकर उठा सियासी तूफान है। बीते कई दिनों से उनके बयानों ने न सिर्फ मीडिया बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी जबरदस्त हलचल मचा रखी है। जिस तरह से अरविंद पांडे लगातार संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रख रहे हैं, उसने पार्टी के भीतर असहजता पैदा कर दी है। इसी बीच जिला प्रशासन की ओर से उन्हें अतिक्रमण से जुड़ा नोटिस थमाया गया, जिसने इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक राजनीतिक रंग दे दिया। नोटिस सामने आते ही विपक्ष ने इसे सत्ता का दबाव बताया, जबकि सत्तारूढ़ दल के भीतर भी अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। इस एक घटनाक्रम ने उत्तराखंड की राजनीति में उबाल ला दिया और चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया, जहां हर कोई इसके दूरगामी असर को लेकर कयास लगाने लगा।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच जैसे ही यह खबर सामने आई कि उत्तराखंड बीजेपी के दिग्गज नेता हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत, राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं हरिद्वार से विधायक मदन कौशिक गदरपुर जाने वाले हैं, राजनीतिक हलकों में चर्चाओं की नई लहर दौड़ गई। बताया गया कि तीनों नेता हेलीकॉप्टर से गदरपुर पहुंचकर अरविंद पांडे के आवास पर बैठक करेंगे। इस प्रस्तावित बैठक को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगने लगीं। कुछ लोगों ने इसे संगठन के भीतर मतभेद सुलझाने की कवायद बताया तो कुछ ने इसे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को लेकर दिए गए अरविंद पांडे के बयानों से जोड़कर देखा। सोशल मीडिया पर यह योजना सार्वजनिक होते ही चर्चाओं का दौर तेज हो गया और हर कोई यह जानने को उत्सुक दिखा कि आखिर इस बैठक के पीछे असली मकसद क्या है।
हालांकि, सियासी हलकों में चल रही तमाम चर्चाओं के बीच अचानक यह खबर सामने आई कि गदरपुर में होने वाली यह बहुचर्चित बैठक फिलहाल रद्द कर दी गई है। बताया जा रहा है कि इस मामले में केंद्रीय नेतृत्व ने हस्तक्षेप किया है और उसी के बाद यह फैसला लिया गया कि तीनों वरिष्ठ नेता फिलहाल हरिद्वार में ही रहेंगे। पहले यह कार्यक्रम तय था कि दोपहर लगभग एक बजे त्रिवेंद्र सिंह रावत, अनिल बलूनी और मदन कौशिक हेलीकॉप्टर से गदरपुर के लिए रवाना होंगे, लेकिन ऐन वक्त पर योजना बदल दी गई। इस अप्रत्याशित फैसले ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया। सवाल उठने लगे कि क्या पार्टी नेतृत्व इस पूरे मामले को और तूल पकड़ने से रोकना चाहता है या फिर अंदरूनी स्तर पर कोई और रणनीति तैयार की जा रही है।
राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक, जिस तेजी से अरविंद पांडे से जुड़ा मामला तूल पकड़ रहा था, उसने पार्टी नेतृत्व को सतर्क कर दिया। बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हाल के दिनों में जिस तरह से पूरे प्रकरण ने मीडिया और जनता का ध्यान खींचा, उसे देखते हुए फिलहाल किसी भी तरह की सार्वजनिक बैठक से बचने का निर्णय लिया गया है। उनका कहना था कि गदरपुर दौरे को लेकर फैल रही चर्चाएं पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती थीं। इसलिए यह तय किया गया कि हालात को थोड़ा शांत होने दिया जाए। इस बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया कि मामला सिर्फ एक स्थानीय बैठक तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके राजनीतिक मायने कहीं अधिक गहरे थे।
गौरतलब है कि अरविंद पांडे इन दिनों लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं और इसकी बड़ी वजह काशीपुर के किसान सुखवंत सिंह आत्महत्या मामला है। इस संवेदनशील प्रकरण में अरविंद पांडे ने खुलकर अपनी बात रखी और मामले की सीबीआई जांच की मांग की। उन्होंने जिस बेबाकी से प्रशासनिक कार्रवाई और पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठाए, उसने सरकार और संगठन दोनों को असहज कर दिया। इसके अलावा भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर अरविंद पांडे लगातार बयान दे रहे हैं। उनके इन बयानों को लेकर पार्टी के भीतर यह चिंता बढ़ती जा रही है कि कहीं इससे संगठन की एकजुटता पर असर न पड़े। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही वजह है कि बीजेपी इस पूरे मामले को बेहद सावधानी से संभालना चाहती है।
सुखवंत सिंह आत्महत्या प्रकरण के बाद ही जिला प्रशासन की ओर से अरविंद पांडे को अतिक्रमण हटाने का नोटिस जारी किया गया। इस नोटिस में उनसे कथित अतिक्रमण खाली करने को कहा गया और इसके लिए पंद्रह दिनों का समय दिया गया। नोटिस सामने आते ही राजनीतिक तापमान और अधिक बढ़ गया। अरविंद पांडे ने इसे दबाव की राजनीति बताते हुए साफ कहा कि वह बिना डरे सच बोलते रहेंगे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वह किसी भी कीमत पर पीछे हटने वाले नहीं हैं। इस बयान के बाद उनके समर्थकों में भी उत्साह देखने को मिला, जबकि विरोधी दलों ने इसे सत्ता की तानाशाही करार दिया। इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तराखंड की राजनीति को एक बार फिर गरमा दिया।
इन हालातों के बीच बीजेपी के दिग्गज नेताओं द्वारा गदरपुर में बैठक का प्लान बनाए जाने को कई लोग सियासी संदेश के तौर पर देख रहे थे। माना जा रहा था कि पार्टी नेतृत्व अरविंद पांडे के साथ खड़े होने या फिर उन्हें संयम बरतने का संदेश देने के लिए यह बैठक करना चाहता है। लेकिन बैठक के रद्द होने के बाद अब सवाल यह उठ रहा है कि आगे पार्टी क्या रुख अपनाएगी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि मामला साधारण नहीं है और इसे बेहद संतुलित तरीके से सुलझाने की कोशिश की जा रही है। आने वाले दिनों में यह साफ हो सकता है कि पार्टी संगठन इस पूरे विवाद को किस दिशा में ले जाता है।
यदि अरविंद पांडे के राजनीतिक सफर पर नजर डाली जाए तो वह बीजेपी के एक अनुभवी और सीनियर नेता के रूप में जाने जाते हैं। गदरपुर विधानसभा सीट से विधायक अरविंद पांडे त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं और संगठन में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। उनका जन्म 20 मई 1971 को हुआ और उन्होंने कम उम्र में ही राजनीति में अपनी पहचान बना ली थी। उनकी आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार वर्ष 1997 में वह बाजपुर नगर पालिका के तत्कालीन उत्तर प्रदेश के सबसे कम उम्र के नगर पालिका अध्यक्ष बने थे। यही वजह है कि उन्हें एक जमीनी नेता के तौर पर देखा जाता है। ऐसे में मौजूदा विवाद सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति की दिशा और दशा को प्रभावित करने वाला मुद्दा बनता जा रहा है।





