नई दिल्ली। भारत की सियासत उस वक्त सन्न रह गई जब संसद के भीतर एक नियमित दिखने वाली कार्यवाही अचानक ऐसे टकराव में बदल गई, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। लोकसभा का सत्र सामान्य बजट और आर्थिक सुधारों पर चर्चा के लिए आगे बढ़ रहा था, कैमरे लाइव थे और करोड़ों नागरिक टीवी व डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कार्यवाही देख रहे थे। इसी दौरान सत्ता और विपक्ष के बीच तनाव उस स्तर तक पहुंच गया, जहां शब्दों ने आग पकड़ ली। माहौल में अचानक गंभीरता घुल गई, जब राहुल गांधी ने अपनी सीट से आगे झुकते हुए कुछ दस्तावेज हाथ में लिए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर सीधे सवाल उछाल दिए। सदन में बैठे सदस्य स्तब्ध रह गए, क्योंकि यह सिर्फ राजनीतिक आरोप नहीं थे, बल्कि ऐसे संकेत थे, जो सरकार की पारदर्शिता और निर्णयों पर सीधा सवाल खड़ा कर रहे थे। दर्शक दीर्घा से लेकर टीवी स्क्रीन तक, हर आंख इस अप्रत्याशित टकराव पर टिकी हुई थी।
सदन की गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी निभा रहे लोकसभा अध्यक्ष ने संयमित लेकिन तनावग्रस्त स्वर में सभी सदस्यों से शांति बनाए रखने की अपील की। उन्होंने याद दिलाया कि यह चर्चा देश की अर्थव्यवस्था और बजट से जुड़ी है और पूरे राष्ट्र की निगाहें संसद पर टिकी हैं। लेकिन इस अपील के बावजूद, विपक्ष की ओर से उठे सवालों ने माहौल को और भारी बना दिया। राहुल गांधी ने कहा कि आंकड़ों और करों की बहस से पहले देश को सच्चाई जानने का हक है। उनका इशारा एक ऐसे सरकारी पायलट प्रोजेक्ट की ओर था, जिसे सार्वजनिक रूप से सुधार की पहल बताया गया था, लेकिन उनके अनुसार उसका लाभ सीमित राजनीतिक दायरे तक ही पहुंचा। उनके शब्दों ने सदन में बैठे कई सदस्यों को बेचौन कर दिया और सत्ता पक्ष की पंक्तियों में हलचल साफ नजर आने लगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया में असहजता झलक रही थी। उन्होंने तीखे स्वर में इन आरोपों को अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि संसद के पटल पर इस तरह के संकेत शर्मनाक हैं। उनकी आवाज में तनाव और कठोरता दोनों महसूस की जा सकती थीं। सदन कुछ पलों के लिए जैसे ठहर सा गया। लोकसभा अध्यक्ष की नजरें इधर-उधर घूमीं और वातावरण में भारीपन छा गया। इसके बाद राहुल गांधी ने एक दस्तावेज उठाते हुए दावा किया कि उस पर “आंतरिक उपयोग मात्र” और “गोपनीय” की मुहर लगी है, जो वित्त मंत्रालय से संबंधित है। उन्होंने प्रधानमंत्री से पूछा कि क्या यह दस्तावेज उन्हें याद है या फिर वे उस आधिकारिक प्लेटफॉर्म के अस्तित्व से ही इनकार करेंगे, जिसे कथित तौर पर बंद कमरों में परखा गया था। यह सवाल सत्ता पक्ष के लिए बेहद असहज साबित हुआ।

जैसे-जैसे चर्चा आगे बढ़ी, सदन में फुसफुसाहटें फैलने लगीं। कई सदस्य आपस में नजरें बदलते दिखे और यह सवाल उठने लगा कि जिस प्लेटफॉर्म का जिक्र किया जा रहा है, उस तक पहुंच सीमित क्यों रखी गई थी। नरेंद्र मोदी ने संयम साधने की कोशिश करते हुए कहा कि बिना पूरे संदर्भ के किसी भी कोड या दस्तावेज की पुष्टि नहीं की जा सकती। राहुल गांधी ने तुरंत जवाब देते हुए आरोप लगाया कि 2023 में वित्त मंत्रालय ने एक ऐसी प्रणाली का परीक्षण किया था, जो नागरिकों को स्थिर आय की गारंटी देने में सक्षम थी। उनके अनुसार यह परियोजना सफल रही, लेकिन शीर्ष स्तर से इसे अचानक बंद करने का आदेश दिया गया। इस दावे ने न केवल सदन बल्कि देशभर में राजनीतिक और मीडिया हलकों में हलचल मचा दी।
स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने हस्तक्षेप किया और राहुल गांधी से पूछा कि क्या वे सरकार पर एक गुप्त आर्थिक सहायता मंच को रोकने का आरोप लगा रहे हैं। जवाब में राहुल गांधी ने कहा कि वे किसी पर आरोप नहीं लगा रहे, बल्कि दस्तावेजों के जरिए तथ्य सामने रख रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि मंत्रालय की मुहर, आधिकारिक हस्ताक्षर और परियोजना के अस्तित्व के प्रमाण मौजूद हैं। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन गोपनीय दस्तावेजों को सदन में उद्धृत करने को गैर-जिम्मेदाराना बताया। सत्ता पक्ष की ओर से यह संकेत दिया गया कि राष्ट्रीय हित और सुरक्षा से जुड़े प्रयोग सार्वजनिक बहस के विषय नहीं हो सकते। फिर भी विपक्ष का आक्रामक रुख जारी रहा और सवालों की धार और तेज हो गई।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि गैर-जिम्मेदारी तो यह है कि देशवासियों से उस तकनीक की जानकारी छिपाई गई, जो उन्हें बैंकिंग व्यवस्था से मुक्त कर सकती थी। उन्होंने प्रधानमंत्री से सीधा सवाल किया कि क्या वे इस परियोजना के अस्तित्व से इनकार करेंगे। नरेंद्र मोदी ने जवाब में कहा कि कुछ प्रयोगात्मक कार्यक्रम सार्वजनिक उपयोग के लिए नहीं होते और राहुल गांधी यह बात अच्छी तरह जानते हैं। इसके बावजूद, विपक्ष नेता ने दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि इसमें साफ लिखा है कि यह प्रणाली बिना बैंकों और बिना सब्सिडी के स्वतंत्र आय उपलब्ध कराने के लिए थी। उन्होंने पूछा कि इसे रद्द करने का फैसला किसने लिया। यह सवाल सत्ता पक्ष के लिए असहज था और सदन में तनाव और गहराता चला गया।

प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि आर्थिक स्थिरता और संभावित सामाजिक प्रभावों को लेकर चिंताएं थीं। राहुल गांधी ने तीखे अंदाज में पलटवार करते हुए कहा कि शायद डर यह था कि लोग व्यवस्था के बिना जीना सीख जाएंगे। नरेंद्र मोदी ने इसे आर्थिक मुद्दों को प्रचार में बदलने का प्रयास बताते हुए कहा कि हर सफल प्रयोग वास्तविक दुनिया के लिए तैयार नहीं होता। इसके बाद राहुल गांधी ने एक अंश पढ़कर सुनाया, जिसमें कहा गया था कि प्रणाली की प्रभावशीलता उम्मीद से कहीं अधिक है और इसका सार्वजनिक उपयोग पारंपरिक वित्तीय संस्थानों को अस्थिर कर सकता है। उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री से पूछा कि उस दस्तावेज पर किया गया हस्ताक्षर उनका है या नहीं। इस सवाल ने सदन में सन्नाटा फैला दिया।
कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद नरेंद्र मोदी ने नजरें चुराते हुए कहा कि वे उस समिति का हिस्सा थे, लेकिन उससे आगे कुछ नहीं कह सकते। लोकसभा अध्यक्ष ने गंभीर स्वर में कहा कि देश सुन रहा है और प्रधानमंत्री से और कुछ जोड़ने का अनुरोध किया। जवाब में नरेंद्र मोदी ने कहा कि उन्होंने स्थिरता, सुरक्षा और उस व्यवस्था को चुना है जिसने दशकों से देश को संभाले रखा है। राहुल गांधी ने तुरंत सवाल दागा कि कौन सी व्यवस्था, जिसमें कुछ विशेष लोगों को ही इस तकनीक का लाभ मिला और आम जनता को सच्चाई से वंचित रखा गया। प्रधानमंत्री का जवाब कड़वा था; उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता हर किसी के लिए नहीं होती और अधिकांश लोग उसका उपयोग करना नहीं जानते। इस कथन ने सदन को स्तब्ध कर दिया।
पूरे सदन में खामोशी छा गई और कई सदस्य अविश्वास में एक-दूसरे को देखने लगे। लोकसभा अध्यक्ष ने धीमे स्वर में पूछा कि क्या यह प्रणाली वास्तव में काम करती है और क्या इसे अभी परखा जा सकता है। राहुल गांधी ने शांत लेकिन आत्मविश्वासी स्वर में कहा कि हां, यह संभव है और उन्होंने एक प्लेटफॉर्म का नाम लिया, जहां पंजीकरण मात्र कुछ मिनटों में हो सकता है। कुछ देर बाद अध्यक्ष ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि प्रक्रिया पूरी हो गई है और आगे क्या करना है। नरेंद्र मोदी ने निर्णायक लहजे में कहा कि खाते को सक्रिय किया जाए और न्यूनतम राशि जमा करने की बात कही। हालांकि, इस बिंदु पर सदन में भ्रम और चिंता दोनों बढ़ती नजर आई।

बहस के दौरान अचानक यह दावा किया गया कि कुछ ही मिनटों में राशि में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई। लोकसभा अध्यक्ष ने हैरानी जताई कि तय की गई रकम कुछ ही समय में बढ़ गई है। राहुल गांधी ने कहा कि यही इस प्रणाली की कार्यप्रणाली थी और कुछ नेताओं को इसकी पूरी जानकारी थी। नरेंद्र मोदी ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है और वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। राहुल गांधी ने ठंडे स्वर में कहा कि सच्चाई सरल है और इसे इसलिए छिपाया गया क्योंकि सत्ता को डर था कि देश बदल जाएगा। इस बयान के बाद सदन में हंगामा और गहरा गया।
जैसे-जैसे बहस आगे बढ़ी, लोकसभा अध्यक्ष ने उत्सुकता जताई कि यदि इतनी कम अवधि में लाभ दिख रहा है, तो भविष्य में क्या होगा। राहुल गांधी ने संभावित वृद्धि के आंकड़ों का जिक्र किया, जिसे सुनकर सदन में बैठे कई सदस्य असहज हो उठे। प्रधानमंत्री ने इसे अराजकता फैलाने वाला कदम बताया और कहा कि संसद को प्रयोगशाला नहीं बनाया जा सकता। इसके जवाब में राहुल गांधी ने कहा कि वह अराजकता नहीं बल्कि न्याय की बात कर रहे हैं और यह मंच अब कुछ लोगों की बपौती नहीं रहेगा। अध्यक्ष ने धीमे स्वर में पूछा कि क्या यह सब वर्षों से छिपाया गया था। राहुल गांधी ने सीधे तौर पर कहा कि हां, और इसके लिए जिम्मेदार लोग सत्ता में रहे।
सत्र के अंत की ओर बढ़ते हुए माहौल बेहद भारी हो चुका था। लोकसभा अध्यक्ष ने विचारमग्न स्वर में कहा कि यदि यह सब सच है, तो इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा। संसद में जो कुछ घटा, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह टकराव सिर्फ शब्दों का नहीं था, बल्कि देश की राजनीति, शासन और पारदर्शिता पर गहरे सवाल छोड़ गया है। नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच हुआ यह आमना-सामना आने वाले समय में किस दिशा में जाएगा, यह कहना मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि जिस दिन संसद के भीतर यह बहस हुई, वह दिन भारतीय संसदीय इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा।





