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मिडिल ईस्ट के बारूद पर पीएम मोदी की महा-चेतावनीः क्या विश्व युद्ध की दहलीज पर खड़ी है मानवता?

क्या पश्चिम एशिया का सुलगता बारूद और पीएम मोदी की कूटनीतिक बिसात, वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ने और तीसरे विश्व युद्ध के खौफनाक मंजर का आखिरी आगाज़ है? अब फैसला मानवता के हाथ!

भारत(सुनील कोठारी)। पश्चिम एशिया की तपती रेत आज केवल सूरज की गर्मी से नहीं, बल्कि मिसाइलों और रॉकेटों की भीषण आग से सुलग रही है, जिसने पूरी दुनिया को एक ऐसे अनचाहे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहाँ से वापसी का रास्ता बेहद संकरा और खतरनाक नजर आता है। हमास और इजरायल के बीच शुरू हुई यह खूनी रंजिश अब केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने लेबनान के हिजबुल्लाह, यमन के खूंखार हूतियों और अब सीधे तौर पर ईरान जैसे शक्तिशाली मुल्क को भी अपनी लपेट में ले लिया है, जिससे वैश्विक शांति का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। इस महा-संकट के बीच भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कूटनीतिक रुख और उनके द्वारा समय-समय पर दिए गए बयानों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक नई हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि मोदी का यह दृष्टिकोण महज एक औपचारिक वक्तव्य नहीं बल्कि आने वाले विनाशकारी समय की एक गंभीर चेतावनी और भारत की सुविचारित रणनीति का एक सजीव दस्तावेज माना जा रहा है। वर्तमान की इस विस्फोटक स्थिति का यदि हम बारीकी से पोस्टमार्टम करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी की चिंताएं बेवजह नहीं हैं और आने वाले दिनों की आहट विश्व व्यवस्था के लिए कतई शुभ संकेत नहीं दे रही है, जिसे समझना आज हर वैश्विक नागरिक के लिए अनिवार्य हो गया है।

7 अक्टूबर, 2023 की वह काली सुबह जब हमास के लड़ाकों ने इजरायल की अभेद्य मानी जाने वाली सुरक्षा दीवार को लांघकर निर्दाेष नागरिकों पर कहर बरपाया, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया के उन प्रथम कतार के नेताओं में शामिल थे जिन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के इसे एक बर्बर आतंकवादी हमला करार देते हुए अपनी संवेदनाएं व्यक्त की थीं। हालाँकि, भारत का यह रुख केवल एक तरफा सहानुभूति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जैसे-जैसे युद्ध का दायरा बढ़ा और गाजा की गलियों में निर्दाेष बच्चों और महिलाओं की चीखें सुनाई देने लगीं, भारत की विदेश नीति में एक अद्भुत श्रणनीतिक संतुलनश् (ैजतंजमहपब ठंसंदबम) का उदय हुआ जो आतंकवाद और मानवता के बीच एक महीन लकीर खींचता है। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट संदेश दिया कि आतंकवाद के प्रति भारत की नीति हमेशा श्जीरो टॉलरेंसश् की रहेगी, लेकिन साथ ही उन्होंने फिलिस्तीनी नागरिकों के प्रति मानवीय संवेदनाओं को भी सर्वाेच्च प्राथमिकता दी, जिसके फलस्वरूप भारत ने युद्ध की विभीषिका के बीच टनों के हिसाब से मानवीय सहायता सामग्री गाजा भेजी। यह भारत की उस संतुलित कूटनीति का प्रमाण है जहाँ हम एक तरफ आतंकवाद का डटकर विरोध करते हैं, तो दूसरी तरफ श्टू-स्टेट सॉल्यूशनश् की वकालत करते हुए इजरायल और फिलिस्तीन के बीच स्थाई शांति और सह-अस्तित्व का सपना देखते हैं।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक मंचों से पूरी दृढ़ता के साथ यह कहते हैं कि ष्यह युद्ध का युग नहीं हैष्, तो उनके इन चंद शब्दों के पीछे एक गहरी चेतावनी और आने वाले भीषण आर्थिक संकट का एक स्पष्ट खाका छिपा होता है जो दुनिया की नींद उड़ाने के लिए पर्याप्त है। मिडिल ईस्ट को दुनिया की ऊर्जा का दिल कहा जाता है और यदि यह क्षेत्र ईरान और इजरायल के बीच एक पूर्णकालिक और सीधे महायुद्ध की आग में झोंका गया, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था का ताश के पत्तों की तरह ढहना लगभग तय माना जा रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो ऐसे किसी भी सीधे टकराव की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में $100 प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को बहुत पीछे छोड़ सकती हैं, जिससे भारत जैसे विशाल ऊर्जा आयात करने वाले राष्ट्रों में महंगाई का एक ऐसा सुनामी आ सकता है जिसे संभालना किसी भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा, लाल सागर (त्मक ैमं) के रास्ते में हूतियों द्वारा किए जा रहे निरंतर हमलों ने पहले ही व्यापारिक जहाजों के रूट को बदलकर हजारों मील लंबा कर दिया है, जिससे न केवल माल ढुलाई की लागत बढ़ी है बल्कि पूरी वैश्विक सप्लाई चेन में एक ऐसा अवरोध पैदा हो गया है जिसका सीधा असर आम आदमी की रसोई और उसकी जेब पर पड़ना शुरू हो चुका है।

इस युद्ध की आग केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया के जनमानस को दो ऐसे वैचारिक और धार्मिक धड़ों में बांट रही है जो आने वाले समय में सामाजिक समरसता के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की सबसे बड़ी चिंता यह है कि मिडिल ईस्ट की यह अस्थिरता वैश्विक स्तर पर कट्टरवाद और चरमपंथ को एक नई ऊर्जा प्रदान कर सकती है, जिसका परोक्ष असर भारत की आंतरिक सुरक्षा और हमारे हजारों साल पुराने सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ सकता है। यह युद्ध अब महज हथियारों की जंग नहीं रहा, बल्कि यह एक प्रोपेगेंडा युद्ध में तब्दील हो चुका है जहाँ सोशल मीडिया के जरिए दुनिया भर में नफरत का जहर घोला जा रहा है, जिससे युवा पीढ़ी के दिग्भ्रमित होने का खतरा बढ़ गया है। यदि ईरान और इजरायल का तनाव एक सीधे युद्ध में बदलता है, तो यह केवल दो देशों की लड़ाई नहीं होगी, बल्कि इसमें अमेरिका और पश्चिमी देशों का इजरायल के साथ आना और रूस-चीन का ईरान के प्रति झुकाव दुनिया को श्तीसरे विश्व युद्धश् के मुहाने पर खड़ा कर देगा, जो मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी साबित हो सकती है।

मौजूदा संकट में भारत की भूमिका और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति केवल एक दर्शक की नहीं, बल्कि एक सक्रिय श्विश्व मित्रश् और श्मध्यस्थश् (डमकपंजवत) के रूप में उभरकर सामने आई है जो दुनिया के दोनों पक्षों से संवाद करने की क्षमता रखता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों और संयुक्त राष्ट्र (न्छ) में हमेशा श्डी-एस्केलेशनश् यानी तनाव को कम करने और संयम बरतने की पुरजोर वकालत की है ताकि हथियारों की गूंज के बीच कूटनीति के दरवाजे पूरी तरह से बंद न हो जाएं। भारत के लिए इस युद्ध का एक बड़ा रणनीतिक नुकसान श्भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियाराश् (प्डम्ब्) जैसे महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का भविष्य धुंधला होना भी है, जिसे पीएम मोदी ने वैश्विक व्यापार की नई लाइफलाइन के रूप में देखा था। इस कॉरिडोर की सफलता के लिए इजरायल और सऊदी अरब जैसे देशों के बीच सामान्य संबंधों का होना एक अनिवार्य शर्त है, लेकिन वर्तमान युद्ध ने इस सपने को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है, जिससे भारत की आर्थिक रणनीतियों को एक बड़ा झटका लगा है। इसके साथ ही, मिडिल ईस्ट में बसे करीब 90 लाख भारतीय कामगारों की सुरक्षा और उनकी आजीविका मोदी सरकार के लिए एक अग्निपरीक्षा जैसी है, क्योंकि इन भारतीयों द्वारा भेजा जाने वाला रेमिटेंस भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयानों और कूटनीतिक सक्रियता में एक ऐसी श्गंभीरताश् साफ झलकती है जो संकेत दे रही है कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था (ळसवइंस व्तकमत) पूरी तरह से अपने पतन की ओर बढ़ रही है। पहले यूक्रेन और अब मिडिल ईस्ट के मोर्चे पर भड़की इस भीषण आग ने संयुक्त राष्ट्र (न्छ) जैसी वैश्विक संस्थाओं की अक्षमता को दुनिया के सामने नग्न कर दिया है, जिससे यह साबित हो गया है कि ये संस्थाएं अब बड़े युद्धों को रोकने में पूरी तरह विफल रही हैं। आने वाले समय में केवल तेल और ऊर्जा ही नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा का भी एक विकराल संकट पैदा हो सकता है, क्योंकि युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्ग असुरक्षित हो गए हैं और अनाज की आपूर्ति बाधित होने का खतरा मंडरा रहा है। प्रधानमंत्री का यह संदेश कि ष्शांति केवल युद्ध की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि न्याय और विकास की उपस्थिति हैष्, दरअसल उन महाशक्तियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो अपने हितों के लिए दुनिया को बारूद के ढेर पर धकेल रही हैं, क्योंकि यदि अब भी बातचीत की मेज पर नहीं लौटा गया, तो होने वाले नुकसान की भरपाई आने वाली कई पीढ़ियों तक संभव नहीं हो पाएगी।

विस्तृत विश्लेषण का निचोड़ यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोण न तो केवल एक चेतावनी है और न ही केवल एक राजनीतिक रणनीति, बल्कि यह एक शुद्ध यथार्थवादी नजरिया (त्मंसपेजपब ।चचतवंबी) है जो दुनिया को आईना दिखाने का काम कर रहा है। आने वाले दिन निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण और अंधकारमय नजर आ रहे हैं क्योंकि कूटनीति की कोमल भाषा को अब टैंकों और मिसाइलों के शोर ने दबा दिया है, जिससे शांति की गुंजाइश हर बीतते दिन के साथ कम होती जा रही है। भारत आज एक ऐसे पुल की भूमिका निभा रहा है जो पश्चिम के आधुनिक लोकतंत्रों और खाड़ी देशों के पारंपरिक इस्लामिक जगत के बीच संवाद की आखिरी कड़ी बना हुआ है ताकि किसी भी तरह इस महाविनाश को टाला जा सके। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिया गया श्संकट का संकेतश् दरअसल वैश्विक नेतृत्व के लिए एक श्वेक-अप कॉलश् है कि यदि वे अब भी अपनी हठधर्मिता से बाज नहीं आए, तो इतिहास उन्हें एक ऐसे समय के लिए याद रखेगा जब मानवता के पास बचने के तमाम मौके थे लेकिन उसने युद्ध के उन्माद को चुनना ज्यादा बेहतर समझा।

इस पूरे घटनाक्रम में भारत की श्टाइटरोप वॉकश् यानी रस्सी पर चलने जैसी कठिन कूटनीति यह सुनिश्चित करने में जुटी है कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए विश्व शांति के प्रति अपनी जिम्मेदारी को कैसे निभाया जाए। प्रधानमंत्री मोदी की वैश्विक नेताओं के साथ निरंतर टेलीफोनिक बातचीत और कूटनीतिक सक्रियता इस बात का प्रमाण है कि भारत इस संकट को केवल दूर से देख नहीं रहा, बल्कि इसे सुलझाने के लिए पर्दे के पीछे से भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। लेकिन सवाल वही बना हुआ है कि क्या इजरायल का प्रतिशोध और ईरान का प्रतिरोध मिलकर दुनिया को एक ऐसे अंधेरे कुएं में धकेल देंगे जहाँ से रोशनी की कोई किरण नजर नहीं आएगी? भारत की चेतावनी स्पष्ट है कि विकास के पहिये को चलाने के लिए शांति की पटरी का होना अनिवार्य है, अन्यथा यह युद्ध केवल सीमाओं को नहीं बदलेगा बल्कि मानवता के भविष्य को ही राख कर देगा, और यही वह कड़वा सच है जिसे समझने में जितनी देरी होगी, तबाही का मंजर उतना ही खौफनाक होता जाएगा। आने वाले समय की अनिश्चितता को देखते हुए भारत ने अपनी रक्षा और आर्थिक नीतियों को भी श्प्लान-बीश् की तर्ज पर ढालना शुरू कर दिया है ताकि किसी भी आपात स्थिति में देश की 140 करोड़ जनता की सुरक्षा और समृद्धि पर आंच न आने पाए, जो मोदी सरकार की दूरदर्शिता को दर्शाता है।

अतरू यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मिडिल ईस्ट की यह आग आज जिस मुकाम पर है, वहाँ से एक छोटी सी चिंगारी भी पूरे ग्रह को वैश्विक युद्ध की ज्वाला में स्वाहा कर सकती है। प्रधानमंत्री मोदी का श्विश्व मित्रश् वाला संकल्प आज वैश्विक राजनीति की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है, जहाँ नफरत की जगह संवाद और युद्ध की जगह विकास को केंद्र में रखने की आवश्यकता है। आने वाले दिन संघर्षों से भरे हो सकते हैं, लेकिन भारत की यह अडिग रणनीति उम्मीद जगाती है कि शायद कोई रास्ता निकल आए जो मानवता को इस विनाशकारी संकट से उबार सके। वैश्विक समुदाय को अब यह तय करना होगा कि वे मोदी की इस चेतावनी को गंभीरता से लेकर शांति की ओर कदम बढ़ाते हैं या फिर इतिहास के पन्नों में एक और महायुद्ध की विभीषिका दर्ज कराने के लिए तैयार रहते हैं, जिसका अंजाम किसी के लिए भी सुखद नहीं होगा। प्रधानमंत्री की यह दूरगामी सोच और संकट के संकेतों को पहचानने की अद्भुत क्षमता ही आज भारत को विश्व पटल पर एक विश्वसनीय और जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करती है, जो केवल अपने लिए नहीं बल्कि पूरी वसुधैव कुटुंबकम की भावना के साथ विश्व कल्याण की कामना करता है।

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