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काशीपुर की बेटी शिखा बिस्ला ने अंतरराष्ट्रीय कला मंच पर संवेदनशील कृतियों से देश का नाम रोशन किया

ग्रेफाइट और चारकोल से सजीव मानवीय भावनाओं को उकेरती प्रदर्शनी ज़िक्र ने नई दिल्ली में दर्शकों और कला समीक्षकों को किया प्रभावित, सामाजिक यथार्थ और अनकही कहानियों को दिया सशक्त वैश्विक मंच पर व्यापक पहचान।

काशीपुर।कला जगत में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराते हुए काशीपुर की बेटी शिखा बिस्ला (शिखा श्योरन) ने देश और विदेश में नगर की पहचान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। अपनी सूक्ष्म दृष्टि और संवेदनशील अभिव्यक्ति के माध्यम से उन्होंने न केवल कला प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया है, बल्कि समाज की अनकही सच्चाइयों को चित्रों में जीवंत रूप देने का दुर्लभ कार्य भी किया है। शिखा की कला में केवल रंगों और रेखाओं का संयोजन नहीं दिखाई देता, बल्कि उसमें जीवन की जटिलताओं, मानवीय भावनाओं और संघर्ष की परतें भी स्पष्ट रूप से झलकती हैं। काशीपुर जैसे शांत शहर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाली शिखा बिस्ला (शिखा श्योरन) की यह उपलब्धि क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है। उनकी कला ने यह साबित किया है कि समर्पण और प्रतिभा के बल पर छोटे शहरों से भी वैश्विक पहचान बनाई जा सकती है। उनकी कलाकृतियों में सामाजिक सरोकारों की गहराई दिखाई देती है, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है और समाज के उन पहलुओं को उजागर करती है जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। उनकी सफलता काशीपुर के सांस्कृतिक गौरव को सशक्त करने वाली एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

शैक्षिक पृष्ठभूमि की बात करें तो शिखा बिस्ला (शिखा श्योरन) ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा काशीपुर स्थित राजकीय कन्या इंटर कॉलेज से पूरी की, जहां से उनकी कलात्मक रुचि ने आकार लेना शुरू किया। विद्यालय के दिनों में ही उन्हें चित्रकला के प्रति गहरी लगाव हो गया था और शिक्षकों के मार्गदर्शन में उन्होंने अपनी प्रतिभा को लगातार निखारा। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने राधे हरि स्नातकोत्तर महाविद्यालय, काशीपुर में प्रवेश लिया, जहां उनके कला के प्रति समर्पण और भी प्रखर हुआ। महाविद्यालयीन वातावरण ने उनकी रचनात्मक सोच को विस्तृत आयाम प्रदान किए और उन्हें सामाजिक विषयों को कलात्मक रूप देने की प्रेरणा मिली। अध्ययन काल के दौरान ही उन्होंने पारंपरिक शैली से हटकर यथार्थवादी चित्रण को अपनाया, जिससे उनकी अलग पहचान बनने लगी। शिखा की शैक्षिक यात्रा केवल डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह उनके व्यक्तित्व और दृष्टिकोण को विकसित करने का आधार बनी। यही कारण है कि उनकी कलाकृतियों में शैक्षिक अनुशासन और सामाजिक समझ का संतुलित समावेश दिखाई देता है, जो उन्हें अन्य कलाकारों से अलग पहचान दिलाता है और उनके रचनात्मक कौशल को विशिष्ट बनाता है।

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में आयोजित उनकी एकल कला प्रदर्शनी ‘ज़िक्र’ ने कला जगत में विशेष उत्सुकता पैदा कर दी है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की ऐनेक्स गैलरी में आयोजित यह प्रदर्शनी दर्शकों के लिए गहन अनुभव प्रस्तुत कर रही है। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन 10 फरवरी 2026 को सायं 5 बजे कला-परिचर्चा के साथ किया गया, जिसमें कला विशेषज्ञों और साहित्य प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। उद्घाटन समारोह के दौरान शिखा बिस्ला (शिखा श्योरन) की कला यात्रा और उनके रचनात्मक दृष्टिकोण पर विस्तृत चर्चा हुई, जिससे प्रदर्शनी का महत्व और भी बढ़ गया। ‘ज़िक्र’ प्रदर्शनी का आयोजन केवल कलात्मक प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवीय अनुभवों की गहरी पड़ताल का मंच भी बन गया है। आयोजन स्थल पर प्रदर्शित प्रत्येक चित्र दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ता दिखाई दे रहा है। कला समीक्षकों का मानना है कि यह प्रदर्शनी समकालीन भारतीय कला की नई दिशा को दर्शाती है, जिसमें समाज के उपेक्षित वर्गों की पीड़ा और संवेदनाओं को प्रमुखता दी गई है। शिखा की यह प्रस्तुति कला के माध्यम से समाज से संवाद स्थापित करने का सशक्त प्रयास मानी जा रही है।

सामान्य दर्शकों के लिए ‘ज़िक्र’ प्रदर्शनी को 11 फरवरी से 17 फरवरी 2026 तक प्रतिदिन प्रातः 11 बजे से सायं 7 बजे तक खुला रखा गया है, जिससे कला प्रेमियों को शिखा बिस्ला (शिखा श्योरन) की रचनात्मक दुनिया को करीब से देखने का अवसर मिल रहा है। प्रदर्शनी में पहुंचने वाले दर्शक केवल चित्रों को देखने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे उन भावनात्मक कहानियों से भी जुड़ जाते हैं जिन्हें कलाकार ने अपनी कला में उकेरा है। प्रदर्शनी स्थल पर विभिन्न आयु वर्ग के दर्शकों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि शिखा की कला व्यापक समाज को प्रभावित कर रही है। अनेक कला प्रेमियों ने उनकी कृतियों को अत्यंत संवेदनशील और विचारोत्तेजक बताया है। दर्शकों का मानना है कि शिखा की कला केवल सौंदर्य बोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की वास्तविकता को दर्शाने वाला प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। प्रदर्शनी के दौरान कई युवा कलाकारों ने भी उनकी शैली से प्रेरणा प्राप्त करने की बात कही है। यह आयोजन भारतीय कला के समकालीन स्वरूप को समझने के लिए महत्वपूर्ण मंच साबित हो रहा है और दर्शकों को सामाजिक सरोकारों के प्रति जागरूक करने का कार्य भी कर रहा है।

प्रदर्शनी ‘ज़िक्र’ की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें ग्रेफाइट पेंसिल और चारकोल माध्यम से निर्मित यथार्थवादी चित्र प्रस्तुत किए गए हैं, जो तकनीकी दक्षता और भावनात्मक अभिव्यक्ति का अद्भुत संयोजन दर्शाते हैं। शिखा बिस्ला (शिखा श्योरन) ने इन माध्यमों का प्रयोग करते हुए चेहरे के सूक्ष्म भावों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उकेरा है। उनकी कलाकृतियों में प्रकाश और छाया का संतुलन इतना सटीक है कि चित्र जीवंत प्रतीत होते हैं। ग्रेफाइट और चारकोल जैसे पारंपरिक माध्यमों को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करना उनकी कलात्मक विशेषता मानी जा रही है। कला विशेषज्ञों का कहना है कि इन माध्यमों में इतनी गहराई और संवेदनशीलता के साथ चित्रण करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य होता है, जिसे शिखा ने उत्कृष्टता के साथ निभाया है। उनके चित्र दर्शकों को केवल दृश्य अनुभव नहीं देते, बल्कि उनमें छिपे भावों को महसूस करने का अवसर भी प्रदान करते हैं। इस शैली ने उनकी कला को विशिष्ट पहचान दिलाई है और उन्हें अंतरराष्ट्रीय कला जगत में प्रतिष्ठित स्थान प्रदान किया है।

मानवीय भावनाओं की गहराई को अभिव्यक्त करना शिखा बिस्ला (शिखा श्योरन) की कला का मूल आधार माना जाता है। उनके चित्रों में चेहरे केवल आकृतियां नहीं रहते, बल्कि वे स्वयं कहानी कहने लगते हैं। प्रत्येक चित्र में भावनाओं की ऐसी परतें दिखाई देती हैं जो दर्शकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती हैं। उनके चित्रों में गरिमा, संघर्ष, सहनशीलता और जीवन के अनुभवों का सशक्त चित्रण दिखाई देता है। कला समीक्षकों के अनुसार शिखा की कृतियां मानव जीवन के उन पहलुओं को सामने लाती हैं, जिन्हें सामान्यतः शब्दों में व्यक्त करना कठिन होता है। उनकी कला दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने की क्षमता रखती है, जिससे चित्रों का प्रभाव लंबे समय तक मन में बना रहता है। उनके चित्रों की विशेषता यह भी है कि वे समाज की वास्तविकताओं को बिना किसी बनावट के प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि उनकी कला को सामाजिक यथार्थवाद की प्रभावशाली अभिव्यक्ति माना जा रहा है और इसे समकालीन कला जगत में महत्वपूर्ण स्थान मिल रहा है।

समाज के उपेक्षित वर्गों को अपनी कला का विषय बनाकर शिखा बिस्ला (शिखा श्योरन) ने अपनी रचनात्मक दृष्टि को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा है। उनके चित्रों में किसानों, ग्रामीण श्रमिकों, महिलाओं और बच्चों की जीवन यात्रा को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। इन वर्गों की कहानियां अक्सर समाज में दिखाई तो देती हैं, लेकिन उनकी पीड़ा और संघर्ष को गंभीरता से नहीं समझा जाता। शिखा ने अपनी कला के माध्यम से इन अनसुनी कहानियों को आवाज देने का प्रयास किया है। उनके चित्र समाज के उस यथार्थ को उजागर करते हैं, जहां मेहनत, संघर्ष और उम्मीद का मिश्रण दिखाई देता है। कला समीक्षकों का मानना है कि उनकी कृतियां समाज के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उनके चित्र दर्शकों को यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि समाज के प्रत्येक वर्ग की अपनी कहानी और संघर्ष होता है, जिसे समझना आवश्यक है। शिखा की यह पहल कला को सामाजिक परिवर्तन के प्रभावशाली माध्यम के रूप में स्थापित करती दिखाई दे रही है।

पिछले तीन वर्षों में शिखा बिस्ला (शिखा श्योरन) ने देशभर में पच्चीस से अधिक सामूहिक कला प्रदर्शनियों में सहभागिता कर अपनी कला यात्रा को निरंतर विस्तार दिया है। विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर उनकी उपस्थिति ने उन्हें कला जगत में विशेष पहचान दिलाई है। इन प्रदर्शनियों के दौरान उनकी कृतियों को कला विशेषज्ञों और दर्शकों दोनों से सराहना मिली है। उनकी कला की विशिष्ट शैली और सामाजिक विषयों पर आधारित दृष्टिकोण ने उन्हें अन्य कलाकारों से अलग पहचान दिलाई है। अनेक कला संस्थानों द्वारा उन्हें सम्मानित किया जा चुका है, जो उनकी प्रतिभा और मेहनत का प्रमाण है। शिखा की कला यात्रा यह दर्शाती है कि निरंतर अभ्यास और समर्पण से कलाकार अपनी पहचान को सशक्त बना सकता है। उनकी उपलब्धियां युवा कलाकारों को यह संदेश देती हैं कि कला के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास और आत्मविश्वास आवश्यक होता है। उनकी सफलता भारतीय कला के वैश्विक विस्तार का प्रतीक भी मानी जा रही है।

‘ज़िक्र’ प्रदर्शनी को शिखा बिस्ला (शिखा श्योरन) की कला यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है, जिसने उनकी रचनात्मक पहचान को नई दिशा दी है। इस प्रदर्शनी के माध्यम से उन्होंने सामाजिक यथार्थवाद की अवधारणा को समकालीन कला के साथ जोड़ा है। उनकी कृतियां यह दर्शाती हैं कि कला केवल सौंदर्य प्रदर्शन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक चिंतन का प्रभावशाली साधन भी हो सकती है। कला समीक्षकों का मानना है कि ‘ज़िक्र’ प्रदर्शनी भारतीय कला में मानव-केंद्रित विषयों की बढ़ती प्रासंगिकता को स्पष्ट करती है। शिखा की कला ने यह सिद्ध किया है कि कलाकार समाज के विभिन्न पहलुओं को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस प्रदर्शनी ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय कला जगत में सशक्त पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और यह उनके रचनात्मक विकास का प्रतीक बनकर उभरी है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना किसी भी कलाकार के लिए चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन शिखा बिस्ला (शिखा श्योरन) ने अपनी प्रतिभा और समर्पण के बल पर यह उपलब्धि हासिल की है। उनकी कला में भारतीय समाज की गहराई और वैश्विक दृष्टिकोण का संतुलित समावेश दिखाई देता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी कृतियों को विशेष सराहना मिल रही है, जिससे भारतीय कला की प्रतिष्ठा भी बढ़ रही है। उनकी सफलता यह दर्शाती है कि भारतीय कलाकार वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान स्थापित करने में सक्षम हैं। शिखा की कला ने यह प्रमाणित किया है कि सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक यथार्थ को कलात्मक रूप में प्रस्तुत करके वैश्विक दर्शकों को प्रभावित किया जा सकता है। उनकी उपलब्धियां भारतीय कला जगत के लिए गर्व का विषय बन चुकी हैं और उन्होंने यह दिखाया है कि कला सीमाओं से परे जाकर लोगों को जोड़ने की क्षमता रखती है।

काशीपुर की बेटी शिखा बिस्ला (शिखा श्योरन) की सफलता नगर के सांस्कृतिक और सामाजिक गौरव को नई पहचान प्रदान कर रही है। उनकी उपलब्धियां स्थानीय प्रतिभाओं को प्रेरित कर रही हैं और यह संदेश दे रही हैं कि छोटे शहरों से निकलकर भी वैश्विक स्तर पर सफलता प्राप्त की जा सकती है। उनकी कला यात्रा केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए गौरव का विषय बन चुकी है। शिखा ने यह साबित किया है कि प्रतिभा, मेहनत और सामाजिक संवेदनशीलता के संयोजन से कला के माध्यम से समाज को नई दिशा दी जा सकती है। उनकी कृतियां आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेंगी और भारतीय कला को वैश्विक मंच पर सशक्त पहचान दिलाने में योगदान देती रहेंगी। उनकी उपलब्धियां यह दर्शाती हैं कि कला केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के विचार और संवेदनाओं को दिशा देने का सशक्त साधन भी है।

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