नई दिल्ली। उत्तराखंड की राजनीति बीते कुछ महीनों में जिस तरह राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बनी है, उसने प्रदेश की छवि और शासन व्यवस्था दोनों को नई चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। शांत, प्राकृतिकस और पर्यटन की पहचान रखने वाला राज्य अब गंभीर घटनाओं और राजनीतिक बहसों के कारण संसद तक चर्चा का विषय बन गया है। हालात ऐसे बने कि विपक्ष ने इन मुद्दों को केवल प्रदेश स्तर तक सीमित नहीं रखा बल्कि देश की सर्वाेच्च लोकतांत्रिक संस्थाओं कृ लोकसभा और राज्यसभा कृ में जोरदार तरीके से उठाया। सरकार के लिए स्थिति असहज तब हुई जब इन घटनाओं को प्रदेश की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला बताया गया। उत्तराखंड लंबे समय तक विकास, प्राकृतिक सौंदर्य और सामाजिक सौहार्द के लिए जाना जाता रहा, लेकिन हालिया घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर किन कारणों से प्रदेश लगातार नकारात्मक खबरों का हिस्सा बनता जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बेरोजगारी, कानून व्यवस्था, संवेदनशील अपराध और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे मुद्दों ने मिलकर राज्य को विवादों के घेरे में ला दिया है, जिससे प्रदेश की राजनीतिक स्थिति नई दिशा में मुड़ती नजर आ रही है।
भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक के मामलों ने उत्तराखंड के युवाओं के सपनों को जिस तरह झकझोर दिया, उसने सरकार और प्रशासन दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं के बीच विश्वास का संकट पैदा कर दिया। खास तौर पर यूकेएसएसएससी से जुड़े मामलों ने राज्य भर में गुस्से का माहौल बना दिया। लाखों अभ्यर्थियों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। शुरुआती दौर में राज्य सरकार ने विशेष जांच दल गठित कर मामले की जांच शुरू करवाई, लेकिन जैसे-जैसे विरोध प्रदर्शन तेज हुआ और विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू किया, तब जांच को और विश्वसनीय बनाने के लिए केंद्र से सीबीआई जांच की सिफारिश की गई। सरकार ने इसे पारदर्शिता की दिशा में उठाया गया कदम बताया, लेकिन विपक्ष ने सवाल उठाया कि यदि शुरुआत से ही भर्ती प्रक्रिया पर सख्त निगरानी होती तो युवाओं को इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तराखंड में बेरोजगारी और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया।

भर्ती घोटालों के बाद राज्य को सबसे ज्यादा झकझोरने वाला मामला अंकिता भंडारी हत्याकांड रहा, जिसने पूरे प्रदेश को भावनात्मक रूप से झकझोर दिया था। यह मामला पहले ही राज्य में संवेदनशील विषय बना हुआ था, लेकिन हालिया महीनों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों ने इसे दोबारा सुर्खियों में ला दिया। मृतका के परिवार और सामाजिक संगठनों ने जांच की निष्पक्षता पर चिंता व्यक्त की और मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की। स्थिति तब और जटिल हो गई जब राजनीतिक दलों के भीतर भी मतभेद सामने आए और सत्ताधारी दल के कुछ नेताओं के बीच बयानबाजी शुरू हो गई। बढ़ते विवाद और जनदबाव के चलते राज्य सरकार ने इस मामले की जांच भी सीबीआई को सौंपने का निर्णय लिया। सत्ता पक्ष ने इसे न्याय सुनिश्चित करने का प्रयास बताया, जबकि विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार केवल जनदबाव के कारण निर्णय ले रही है। इस प्रकरण ने राज्य में महिलाओं की सुरक्षा और प्रशासनिक संवेदनशीलता को लेकर गहरी बहस को जन्म दिया।

प्रदेश की छवि को प्रभावित करने वाली एक अन्य घटना त्रिपुरा की छात्रा एंजेल चकमा की हत्या का मामला रहा, जिसने उत्तराखंड को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया। यह मामला केवल एक छात्रा की मौत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बाहरी राज्यों से आने वाले छात्रों की सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही पर व्यापक बहस का कारण बना। पूर्वाेत्तर राज्यों के नेताओं और सामाजिक संगठनों ने इस घटना को लेकर चिंता व्यक्त की, वहीं सोशल मीडिया पर भी सवालों की बाढ़ आ गई। पुलिस जांच के दौरान चार आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, लेकिन एक आरोपी के फरार होने की खबरों ने प्रशासनिक दक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। विपक्ष ने इस घटना को कानून व्यवस्था की कमजोरी का उदाहरण बताते हुए सरकार को घेरा। इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा संस्थानों में सुरक्षा व्यवस्था और छात्र संरक्षण की आवश्यकता को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना दिया, जिससे प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था पर व्यापक चर्चा होने लगी।

राजधानी देहरादून, जिसे लंबे समय तक शांत और सुरक्षित शहर माना जाता रहा, फरवरी महीने में लगातार हुई पांच हत्याओं के कारण सुर्खियों में रहा। मात्र सोलह दिनों के भीतर हुई इन घटनाओं ने कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। स्थानीय नागरिकों के बीच भय का माहौल बनने लगा और विपक्ष ने सरकार को सुरक्षा व्यवस्था में विफल बताया। इसी दौरान हरिद्वार में गैंगस्टर विनय त्यागी की खुलेआम हत्या और देहरादून में झारखंड से जुड़े अपराधी की हत्या जैसी घटनाओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। राजनीतिक दलों ने इन मामलों को प्रशासनिक नियंत्रण की कमजोरी से जोड़ते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा किया। सरकार का कहना रहा कि प्रत्येक घटना के बाद तत्काल कार्रवाई की गई और पुलिस प्रशासन को जवाबदेह बनाया गया। बावजूद इसके, इन घटनाओं ने यह बहस तेज कर दी कि क्या उत्तराखंड की कानून व्यवस्था पहले जैसी मजबूत बनी हुई है या उसमें गिरावट आ रही है।

राजनीतिक विवादों की सूची में कोटद्वार का बाबा दुकान प्रकरण भी प्रमुख मुद्दा बनकर सामने आया, जिसमें दीपक कुमार उर्फ मोहम्मद दीपक का नाम राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया। यह मामला सांप्रदायिक संवेदनशीलता से जुड़ा होने के कारण तेजी से चर्चा में आया और विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रतिक्रिया दी। इस प्रकरण की गूंज संसद तक सुनाई दी, जहां कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने इसे कानून व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द से जोड़कर सरकार से जवाब मांगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और सांसद राहुल गांधी ने इस मामले को उठाते हुए अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर सवाल उठाए। वहीं लोकसभा में कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने भी इस मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा। फरवरी महीने में यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना रहा और राजनीतिक बहसों का केंद्र बना रहा।

इन घटनाओं के बाद प्रदेश में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया, जिससे राज्य की राजनीतिक स्थिति और अधिक गर्म हो गई। विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा कि सरकार प्रशासनिक नियंत्रण और कानून व्यवस्था बनाए रखने में असफल रही है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष का दावा रहा कि हर मामले में त्वरित कार्रवाई की गई और पारदर्शिता सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि देहरादून से दिल्ली तक चल रही बयानबाजी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तराखंड अब केवल क्षेत्रीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर चुका है। इन घटनाओं ने प्रदेश की राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया है और आने वाले चुनावों में भी इन मुद्दों का प्रभाव देखने को मिल सकता है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने राज्य सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उत्तराखंड की छवि लगातार नकारात्मक होती जा रही है और सरकार राज्य संचालन में पूरी तरह विफल रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि कानून व्यवस्था राज्य गठन के बाद अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है और राजधानी में रहने वाले नागरिकों के बीच भय का माहौल बन चुका है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड हमेशा शांत और सौहार्दपूर्ण राज्य के रूप में जाना जाता रहा, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों ने प्रदेश की पहचान को नुकसान पहुंचाया है। उनके अनुसार प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर होने के कारण अपराध और विवाद बढ़ रहे हैं, जो राज्य के भविष्य के लिए गंभीर संकेत हैं। कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार केवल घटनाओं के बाद प्रतिक्रिया देती है, जबकि आवश्यक है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पहले से ठोस रणनीति बनाई जाए।
सत्तारूढ़ दल की ओर से इन आरोपों का जवाब देते हुए भाजपा विधायक विनोद चमोली ने कांग्रेस पर पलटवार किया और कहा कि विपक्ष अपने शासनकाल को भूलकर केवल राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि यदि राज्य में कोई भी गंभीर घटना होती है तो सरकार और मुख्यमंत्री तुरंत कार्रवाई करते हैं और अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस कोटद्वार जैसे संवेदनशील मामलों को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है, जबकि राज्य की जनता सच्चाई को समझती है। भाजपा नेताओं का दावा है कि सरकार अपराध नियंत्रण और प्रशासनिक सुधार के लिए लगातार कदम उठा रही है और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास किया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति कई जटिल कारणों का परिणाम है, जिसमें बेरोजगारी, सामाजिक असंतोष, प्रशासनिक चुनौतियां और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा शामिल हैं। लगातार सामने आ रही घटनाओं ने राज्य की छवि को प्रभावित किया है, लेकिन साथ ही इन मुद्दों ने प्रशासनिक सुधार और पारदर्शिता की आवश्यकता को भी उजागर किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार और विपक्ष दोनों मिलकर समाधान की दिशा में कार्य करें, तो इन चुनौतियों को अवसर में बदला जा सकता है। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील और सीमावर्ती राज्य के लिए मजबूत प्रशासन और सामाजिक संतुलन बेहद आवश्यक माना जाता है।
प्रदेश की जनता के बीच भी इन घटनाओं को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। एक ओर लोग अपराध और भ्रष्टाचार के मामलों पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई नागरिक सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को सकारात्मक प्रयास मान रहे हैं। सामाजिक संगठनों का कहना है कि राज्य के विकास और शांति बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों को आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर सामूहिक रणनीति अपनानी चाहिए। राज्य के युवाओं और महिलाओं की सुरक्षा, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दे जनता की प्राथमिकताओं में शामिल हैं और इन्हें लेकर ठोस नीति निर्माण की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बनने के बाद उत्तराखंड के सामने अब अपनी सकारात्मक छवि को पुनः स्थापित करने की चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत जैसे क्षेत्रों में राज्य की मजबूत पहचान रही है, जिसे बनाए रखने के लिए कानून व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता को और मजबूत करना होगा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और विपक्ष इन मुद्दों पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देते हैं और प्रदेश की जनता का विश्वास कैसे पुनः हासिल किया जाता है। लगातार बढ़ रही राजनीतिक बहसों ने यह संकेत दे दिया है कि उत्तराखंड की राजनीति आने वाले वर्षों में और अधिक प्रतिस्पर्धी और सक्रिय होने वाली है, जिसमें जनता की अपेक्षाएं और भी बढ़ती दिखाई दे रही हैं।





