नई दिल्ली(सुनील कोठारी)।फरवरी 2025 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और आर्थिक हलचल पैदा कर दी। इस यात्रा के दौरान, वाशिंगटन स्थित वाइट हाउस में जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ बैठक में बैठे थे, तब एक पत्रकार ने ऐसा सवाल किया, जिसने न केवल वहां मौजूद लोगों को चौंका दिया, बल्कि भारत की राजनीति में भी हलचल मचा दी। सवाल ऐसा था जो सीधे तौर पर भारत के भीतर सबसे बड़े विवादास्पद मामलों में से एक से जुड़ा हुआ था। दरअसल उसी समय अमेरिका से एक पत्र भारत सरकार को प्राप्त हुआ, जिसमें अडानी ग्रुप से जुड़े घूस, फ्रॉड और अमेरिकी निवेशकों के पैसे के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया था। इस पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया था कि यदि भारत सरकार ने इस मामले में पहल नहीं की, तो अमेरिकी न्यूयॉर्क अदालत में कानूनी कार्रवाई शुरू की जाएगी। फरवरी 2025 से लेकर जनवरी 2026 के बीच, औपचारिक तौर पर दो बार पत्र लिखे गए, साथ ही 11 बार संवाद भी हुआ, लेकिन भारत के कानून मंत्रालय ने इसे बार-बार लौटा दिया और यह तर्क दिया कि आरोप लगाने की स्थिति अमेरिकी कानूनों के अंतर्गत नहीं बनती, और यह भारत के कानून के अनुसार प्रासंगिक नहीं है।
अमेरिका से भेजे गए पत्र में यह उल्लेख भी किया गया कि 750 मिलियन डॉलर के बॉन्ड ऑफर में अनियमितताओं के कारण अडानी ग्रुप ने घूस के तौर पर अमेरिकी निवेशकों से पैसे प्राप्त किए। इसमें 175 मिलियन डॉलर अमेरिकी निवेशकों से जुटाए गए, जिन्हें कथित तौर पर सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट्स में लगाया गया। भारतीय कानून मंत्रालय ने यह पत्र कई बार लौटाया, तर्क देते हुए कि इसमें न तो आधिकारिक मोहर है और न ही हस्ताक्षर, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि पत्र सही स्रोत से आया है। इन पत्रों के बीच संवाद जारी रहा, लेकिन किसी भी स्थिति में अडानी ग्रुप या गौतम अडानी तक सीधे तौर पर कोई नोटिस नहीं पहुंचा। इसी कारण से अमेरिकी एजेंसियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और मामला न्यूयॉर्क की ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में ले जाया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार नोटिस का जवाब देना और कार्रवाई करना आवश्यक है।
अमेरिका की इस पहल ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों और भारत-अमेरिका के राजनीतिक तालमेल पर कई सवाल खड़े कर दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाइट हाउस में पत्रकार के सीधे सवाल का जवाब देते हुए कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, और व्यक्तिगत मामलों में दो देशों के नेताओं का आमना-सामना होना सामान्य नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हर भारतीय, चाहे कोई भी हो, भारत का हिस्सा है, लेकिन विदेशी कानूनी मामलों में सीधे हस्तक्षेप संभव नहीं है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इस पर रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें उल्लेख किया गया कि प्रधानमंत्री मोदी अपने नागरिकों के मामलों को गंभीरता से लेते हैं, और यदि आरोप गौतम अडानी पर हैं, तो यह उन्हें विशेष रूप से चिंतित करता है।
वास्तव में, फरवरी 2025 में भेजा गया पहला पत्र SEC (सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन) द्वारा था, जिसमें यह कहा गया कि अडानी ग्रुप ने 2020 से 2024 के बीच सोलर पावर प्रोजेक्ट्स के लिए अमेरिकी निवेशकों से 250 बिलियन डॉलर की रिश्वत ली, जो अमेरिकी कानूनों के तहत अपराध है। हालांकि अडानी ग्रुप ने तुरंत इसे बेबुनियाद ठहराया और कहा कि कॉर्पोरेट गवर्नेंस और नियमों का पालन पूर्ण तरीके से हुआ। भारत सरकार ने इसे तकनीकी और कानूनी कारणों से मान्यता नहीं दी। इस पत्राचार की प्रक्रिया के दौरान अमेरिका ने कई बार भारत सरकार को पत्र लिखकर कहा कि कानूनी प्रक्रिया के तहत नोटिस भेजना आवश्यक है। भारत के कानून मंत्रालय ने हर बार तर्क दिया कि मोहर या हस्ताक्षर के बिना किसी भी नोटिस का कानूनी महत्व नहीं बनता।
इस बीच, मीडिया और राजनीतिक विपक्ष ने अडानी और मोदी के बीच रिश्तों को लेकर लगातार सवाल उठाए। राहुल गांधी ने संसद में खुलकर पूछा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कितनी बार अडानी के साथ विदेश यात्रा की, और उनकी यात्रा के तुरंत बाद अडानी ग्रुप ने विदेशी देशों में कॉन्ट्रैक्ट हासिल किए। इस सवाल ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी, क्योंकि यह केवल एक कारोबारी मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़ा हुआ था। राहुल गांधी ने यह भी तर्क दिया कि अडानी ग्रुप का राजनीतिक संरक्षण और मोदी सरकार से नजदीकी सवालों के घेरे में है, और इसलिए कानूनी कार्रवाई में विलंब हो रहा है।
न्यूयॉर्क में हुए पत्राचार और अदालत में दायर की गई पिटीशन के बाद, अडानी ग्रुप की कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखने को मिली। आज की स्थिति में अडानी ग्रीन एनर्जी, अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस, अडानी एंटरप्राइज़, अडानी पोर्ट्स एंड एसजेड, अडानी पावर और अडानी टोटल गैस की कीमतों में लगभग 3.4% से लेकर 14.5% तक की गिरावट दर्ज की गई। एक ही दिन में अडानी की कुल नेटवर्थ में 12.5 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ। इस गिरावट का असर सिर्फ शेयर बाजार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विदेशी निवेशकों और एफआईआई ने भारत से निवेश वापस लेना शुरू कर दिया, जिससे रुपया डॉलर के मुकाबले और कमजोर हुआ।
अमेरिका की इस कानूनी पहल ने अडानी ग्रुप की अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर भी असर डाला। अडानी की कंपनियों के ऑस्ट्रेलिया, इजराइल, बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया, तंजानिया, वियतनाम, और डिफेंस परियोजनाओं में विभिन्न साझेदारों के साथ समझौते हैं। फ्रांस और ब्राजील में भी उनके MOU और प्रोजेक्ट्स हैं। अमेरिका में अडानी ग्रुप के ठोस निवेश और सहयोग ने यह स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी पकड़ मजबूत है, लेकिन अमेरिकी कानूनी कार्रवाई ने इस ताकत में संकट उत्पन्न किया।
भारत के अंदर भी अडानी ग्रुप की आर्थिक शक्ति और उसकी राजनीतिक नजदीकी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने मई 2024 में सार्वजनिक भाषण में संकेत दिया कि विपक्ष अब अंबानी-अडानी का नाम नहीं ले रहा, जिसका अर्थ है कि राजनीतिक वित्त और कॉर्पोरेट संबंधों के बीच गहरा तालमेल स्थापित हो चुका है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत की राजनीतिक सत्ता और बड़े कॉर्पोरेट घरानों के बीच सहयोग कितना महत्वपूर्ण और संवेदनशील है। अडानी ग्रुप की आर्थिक ताकत, बैंकिंग सहयोग और पावर सेक्टर में निवेश इस बात को स्पष्ट करता है कि राजनीतिक संरक्षण के बिना उनका विस्तार मुश्किल है।
अमेरिकी अदालत में भेजे गए लेटर और SEC की कार्रवाई ने यह साफ कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया में अडानी ग्रुप की गतिविधियों पर निगरानी की जा रही है। यदि भारत सरकार ने नोटिस नहीं भेजा, तो प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया और गिरफ्तारी की संभावना पर भी विचार हो सकता है। यह सवाल उठता है कि क्या भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संरक्षण के बिना अडानी ग्रुप पर प्रभावी कानूनी कार्रवाई संभव है। यह मामला केवल एक बिजनेस विवाद नहीं, बल्कि भारत-अमेरिका के बीच राजनीतिक और आर्थिक टकराव का प्रतीक बन चुका है।
अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से देखा जाए, तो अडानी ग्रुप की परियोजनाओं और निवेशों ने अमेरिका समेत कई देशों में उसकी प्रतिष्ठा मजबूत की है। फ्रांस में थेल्स ग्रुप के साथ 70 एमएम एफ जे275 एलजीआर रॉकेट के निर्माण में साझेदारी, ब्राजील में इम्ब्रेयर के साथ C390 मिलेनियम मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का प्रोजेक्ट और इजराइल व यूएई में डिफेंस एवं साइबर टेक्नोलॉजी में सहयोग इस बात को दर्शाता है कि अडानी ग्रुप वैश्विक स्तर पर अपने पैर पसार चुका है। इस स्थिति में अमेरिकी कानूनी कार्रवाई और भारत सरकार की नीति का टकराव एक संवेदनशील स्थिति उत्पन्न कर रहा है।
अमेरिका द्वारा भेजे गए पत्रों और अदालत में दायर की गई पिटीशन ने यह स्पष्ट किया कि निवेशकों के पैसे का दुरुपयोग और घूस की संभावना गंभीर मामला है। भारत के कानून मंत्रालय ने बार-बार इन पत्रों को लौटाया और तर्क दिया कि इस मामले में हस्तक्षेप करना उनका अधिकार नहीं है। लेकिन अमेरिकी अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि नोटिस भेजा जाता है और उसका जवाब नहीं मिलता, तो प्रत्यावर्तन और गिरफ्तारी की कार्रवाई की संभावना रहती है। इस प्रकार, अडानी ग्रुप और भारत सरकार के बीच कानूनी और राजनीतिक संतुलन का सवाल खड़ा हो गया है।
भारत के कॉरपोरेट्स और राजनीतिक सत्ता के बीच के संबंध, अडानी ग्रुप की शक्ति और उसकी अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं ने यह सवाल उठाया है कि क्या अमेरिका भारत को ब्लैकमेल करने की स्थिति में है, और क्या इस मामले में भारत सरकार की चुप्पी और रणनीति आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित करेगी। अडानी ग्रुप का राजनीतिक संरक्षण और आर्थिक शक्ति दोनों ही उसकी अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्थिति को प्रभावित कर रहे हैं।ड़ देखने को मिल सकते हैं, और यह साफ संकेत है कि कुछ बड़ा बदलाव निश्चित रूप से होने वाला है।





