काशीपुर।काशीपुर की गलियों और मोहल्लों में जलभराव की समस्या कोई नई नहीं है, लेकिन इसके पीछे की असली वजहें अक्सर चर्चा से बाहर रह जाती हैं। बरसों से यह संकट लोगों के जीवन का हिस्सा बना हुआ है, और इसका कारण केवल खराब नालियां या लापरवाह सफाई व्यवस्था नहीं है, बल्कि शहर की वह भूगोलिक और ऐतिहासिक सच्चाई है, जिसे शायद ही किसी ने गंभीरता से समझने की कोशिश की हो। काशीपुर कभी अपने तालों और प्राकृतिक जलाशयों के लिए प्रसिद्ध था। यहां लगभग 19 से 20 बड़े और छोटे ताल मौजूद थे, जो बरसात के पानी को संजोकर भूजल को समृद्ध करते थे। वक्त के साथ ये सभी जलस्रोत मिटा दिए गए, लेकिन उनकी पहचान आज भी शहर के कुछ हिस्सों में मौजूद है। कटोरा ताल, लच्छीबाला ताल और गिरीताल जैसी जगहें इस खोई हुई धरोहर की गवाही देती हैं। असल समस्या तब पैदा हुई जब इन प्राकृतिक धरोहरों पर कब्जा कर, उन्हें पाटकर और प्लाटिंग कर बस्तियां बसा दी गईं, जिनका खामियाजा आज भी स्थानीय लोग भुगत रहे हैं।
लच्छीबाला ताल का उदाहरण इस पूरी कहानी को स्पष्ट करता है। जिसे आज लोग सैनिक कॉलोनी के नाम से जानते हैं, वह कभी शहर का एक प्रमुख ताल था। कई वर्ष पूर्व शहर के एक नामी नेता ने इस ताल का भराव कर इसे प्रॉपर्टी डीलिंग के लिए इस्तेमाल किया। यहां प्लाट काटे गए, लोग आकर्षित होकर इन्हें खरीदते चले गए और देखते ही देखते लगभग 25 से 30 मकान बन गए। लेकिन यह जगह मूल रूप से जलभराव वाला इलाका थी, और यही वजह है कि बरसात के मौसम में यहां पानी का जमाव गंभीर समस्या बन जाता है। सड़क बनाने के लिए जितनी लागत सड़क बिछाने में नहीं आती, उससे कहीं ज्यादा भराव में लग जाती है, जिसके कारण कोई भी ठेकेदार यहां काम करने को तैयार नहीं होता। प्रशासन को कई बार शिकायतें भेजी गईं, लेकिन आज तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला। विडंबना यह है कि ताल की जमीन पर प्लाटिंग और भराव करने वाले नेताओं और डीलरों को कोई जिम्मेदार नहीं ठहराता, जबकि दोष नगर निगम, पार्षद और स्थानीय प्रतिनिधियों पर डाल दिया जाता है।

इसी तरह का हाल कटोरा ताल का भी है, जो बरसों से जलभराव की मार झेल रहा है। इस इलाके में सड़कें तो बनाई गईं, लेकिन निचली सतह के कारण पानी भरने की समस्या अब भी जस की तस बनी हुई है। कटोरा ताल कभी एक बड़ा जलाशय था, जिसे वर्षों पहले भरने की कोशिश की गई, लेकिन भराव आज तक पूरी तरह नहीं हो सका। बरसात में यहां पानी कई दिनों तक जमा रहता है, जिससे राहगीरों और स्थानीय निवासियों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। समस्या की जड़ वही है — ताल की जमीन का अधूरा भराव। पहले के नेताओं और प्रॉपर्टी डीलरों ने सरकारी जमीन पर कब्जा कर वहां बस्तियां बसा दीं, लेकिन भराव का काम अधूरा छोड़ दिया। आज इसका खामियाजा स्थानीय लोगों और नगर निगम को उठाना पड़ रहा है, जबकि असली जिम्मेदार बेखौफ बने हुए हैं।
ये घटनाएं इस बात का सबूत हैं कि बिना सही योजना और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखे, प्राकृतिक जलाशयों को खत्म करने और उन पर निर्माण करने से शहर के लिए लंबे समय तक संकट खड़ा हो सकता है। काशीपुर की प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था पूरी तरह बिगड़ चुकी है, क्योंकि ताल और पोखर बरसात के पानी को रोककर भूजल को पुनर्जीवित करने का काम करते थे। अब जब ये जलस्रोत मिटा दिए गए हैं, तो पानी के बहाव के लिए कोई स्वाभाविक रास्ता नहीं बचा। नतीजा यह है कि बरसात के मौसम में सड़कें और गलियां तालाब में बदल जाती हैं, और लोगों को आने-जाने में भारी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। प्रशासन को इसके लिए घेरने की कोशिश होती है, लेकिन सच्चाई यह है कि जो गलती दशकों पहले नेताओं और डीलरों ने की, उसका बोझ आज की पीढ़ी और वर्तमान प्रतिनिधियों पर डाला जा रहा है।

काशीपुर की जलभराव की समस्या सिर्फ पानी भरने का मामला नहीं है, बल्कि यह शहर के लिए एक चेतावनी है कि अगर शेष बचे प्राकृतिक जलस्रोतों को संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाले समय में हालात और बिगड़ेंगे। गिरीताल जैसे स्थान अभी भी जीवित उदाहरण हैं, जहां अगर समय रहते कोई गलत कदम उठाया गया, तो उसका अंजाम भी लच्छीबाला और कटोरा ताल जैसा ही होगा। जनता के लिए यह जरूरी है कि वह इस मुद्दे को केवल चुनावी बहस का विषय न बनाए, बल्कि स्थायी समाधान के लिए प्रशासन और प्रतिनिधियों पर दबाव डाले। सवाल यह नहीं है कि पानी कहां से आता है, बल्कि यह है कि पानी को निकलने का रास्ता क्यों नहीं है। जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिलेगा और ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक काशीपुर की गलियों में पानी का यह सैलाब हर बरसात में लौटता रहेगा, और इतिहास की इन गलतियों की कीमत आने वाली पीढ़ियां भी चुकाती रहेंगी।



