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हरिद्वार में संतों की रसोई पर संकट गीता कुटीर अन्नक्षेत्र गैस सिलेंडर अभाव से बंदी कगार

तपोवन स्थित गीता कुटीर का दशकों पुराना अन्नक्षेत्र गैस सिलेंडर आपूर्ति रुकने से संकट में, प्रतिदिन हजारों तपस्वी संतों के भोजन पर मंडराया खतरा, प्रबंधन ने प्रशासन से लगाई गुहार समाधान न हुआ तो बड़ा संकट।

हरिद्वार।गंगा तट पर बसी पवित्र नगरी सदियों से आध्यात्मिक साधना, तप और सनातन परंपराओं की जीवंत भूमि रही है। देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु जहां गंगा के पावन जल में आस्था की डुबकी लगाते हैं, वहीं गंगा किनारे बने छोटे-छोटे आश्रमों और झोपड़ियों में हजारों संत-महात्मा एकांत में भगवान का स्मरण करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं। इसी तपोभूमि में तपस्वी संतों की सेवा के लिए स्थापित एक महत्वपूर्ण स्थान है तपोवन स्थित गीता कुटीर, जहां वर्षों से संतों के लिए अन्नक्षेत्र संचालित किया जाता रहा है। यह अन्नक्षेत्र उन संतों के लिए भोजन की व्यवस्था करता है जो गंगा तट पर रहकर भजन, जप, तप और ध्यान में लीन रहते हैं और सांसारिक गतिविधियों से लगभग पूरी तरह दूर रहते हैं। लंबे समय से यह व्यवस्था इतनी व्यवस्थित और निरंतर चलती रही कि हरिद्वार में आने वाले संतों के लिए गीता कुटीर का अन्नक्षेत्र एक भरोसेमंद सहारा बन गया। लेकिन अब यह पवित्र सेवा एक ऐसे संकट के दौर में पहुंच गई है जिसने संत समाज और स्थानीय लोगों दोनों को चिंता में डाल दिया है। गैस सिलेंडर की आपूर्ति अचानक बंद हो जाने के कारण यहां संचालित होने वाली संतों की रसोई ठप होने की कगार पर पहुंच गई है और यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो हजारों तपस्वी संतों के सामने भोजन का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

गंगा तट के आसपास साधना करने वाले संतों के लिए भोजन की व्यवस्था करना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है, क्योंकि अधिकांश संत किसी आश्रम की स्थायी व्यवस्था में नहीं रहते बल्कि छोटी-छोटी कुटियाओं या झोपड़ियों में रहकर आध्यात्मिक साधना करते हैं। इसी कठिनाई को समझते हुए वर्षों पहले संत सेवा की भावना से स्वामी गीतानंद जी महाराज ने तपोवन क्षेत्र में गीता कुटीर की स्थापना की और वहां संतों के लिए अन्नक्षेत्र की शुरुआत की। उनकी भावना यह थी कि हरिद्वार में कोई भी संत भूखा न रहे और भगवान के भजन में लीन साधुओं को भोजन की चिंता से मुक्त रखा जा सके। धीरे-धीरे यह अन्नक्षेत्र इतना महत्वपूर्ण बन गया कि हरिद्वार आने वाले हजारों संतों के लिए यह रोज़मर्रा के भोजन का भरोसेमंद केंद्र बन गया। संतों का कहना है कि इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यहां कभी किसी साधु को खाली हाथ नहीं लौटाया गया। साधना में लीन रहने वाले संतों के लिए भोजन की यह व्यवस्था केवल सेवा नहीं बल्कि एक प्रकार की आध्यात्मिक परंपरा बन गई, जिसने हरिद्वार की धार्मिक संस्कृति को और मजबूत किया।

चार दशक से भी अधिक समय से चल रही इस व्यवस्था का इतिहास बेहद उल्लेखनीय माना जाता है। बताया जाता है कि पिछले लगभग तीस से चालीस वर्षों के दौरान ऐसा एक भी दिन नहीं आया जब गीता कुटीर का अन्नक्षेत्र बंद हुआ हो या संतों को भोजन उपलब्ध न कराया गया हो। प्रतिदिन यहां सैकड़ों ही नहीं बल्कि हजारों संत प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण करते हैं। सुबह से लेकर दोपहर और शाम तक यहां संतों के लिए भोजन की तैयारी चलती रहती है और स्वयंसेवक तथा आश्रम से जुड़े लोग पूरी निष्ठा से इस सेवा में जुटे रहते हैं। यह अन्नक्षेत्र केवल एक रसोई नहीं बल्कि संत सेवा की एक परंपरा है, जिसे हरिद्वार के धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यहां आने वाले संत अक्सर कहते हैं कि गीता कुटीर की रसोई उन्हें यह भरोसा देती है कि चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों, उनके लिए भोजन की व्यवस्था अवश्य होगी। यही कारण है कि वर्षों से हजारों संतों का इस स्थान पर गहरा विश्वास बना हुआ है और वे इसे अपने आध्यात्मिक जीवन का एक महत्वपूर्ण आधार मानते हैं।

कोरोना महामारी के कठिन समय में जब पूरा देश लगभग ठहर सा गया था, तब भी इस अन्नक्षेत्र ने अपनी सेवा परंपरा को नहीं रोका। उस समय जब लॉकडाउन के कारण शहरों में आवाजाही बंद हो गई थी और लोगों को घरों से बाहर निकलना मुश्किल हो गया था, तब गंगा किनारे रहने वाले कई संतों के सामने भोजन की समस्या उत्पन्न होने लगी थी। ऐसे संकट के समय गीता कुटीर के सेवकों ने अलग-अलग स्थानों पर जाकर संतों तक भोजन पहुंचाने का निर्णय लिया। तपोवन मार्ग पर वाहनों के माध्यम से भोजन पैक कर गंगा किनारे स्थित झोपड़ियों और कुटियाओं तक पहुंचाया गया ताकि संतों को भजन और साधना छोड़कर भोजन की तलाश में भटकना न पड़े। इस कठिन दौर में भी सेवा की यह परंपरा निरंतर जारी रही और इसी कारण संत समाज में गीता कुटीर के प्रति सम्मान और विश्वास और अधिक बढ़ गया। कई संतों का कहना है कि जब पूरा देश संकट में था तब भी इस अन्नक्षेत्र ने संतों को भूखा नहीं रहने दिया।

लेकिन अब परिस्थितियां अचानक बदलती दिखाई दे रही हैं। गीता कुटीर के प्रबंधक शिवदास के अनुसार अन्नक्षेत्र की रसोई चलाने के लिए प्रतिदिन लगभग दस गैस सिलेंडरों की आवश्यकता पड़ती है। वर्षों से यह गैस दो अलग-अलग गैस एजेंसियों के माध्यम से नियमित रूप से उपलब्ध कराई जाती रही, जिससे भोजन बनाने की प्रक्रिया में कभी बाधा नहीं आई। हालांकि हाल के दिनों में अचानक गैस एजेंसियों ने सिलेंडरों की आपूर्ति रोक दी है। जब इस बारे में एजेंसियों से संपर्क किया गया तो उनका कहना था कि इस व्यवस्था के संबंध में सरकार या प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं, इसलिए वे गैस सिलेंडर उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं। इस जवाब ने गीता कुटीर प्रबंधन को गहरी चिंता में डाल दिया है, क्योंकि बिना गैस के इतने बड़े स्तर पर भोजन बनाना संभव नहीं है। यदि गैस की आपूर्ति जल्द शुरू नहीं हुई तो रसोई बंद होने की नौबत आ सकती है।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए गीता कुटीर प्रबंधन ने जिला प्रशासन से मदद की गुहार लगाई है। प्रबंधक शिवदास ने बताया कि इस विषय में जिलाधिकारी मयूर दीक्षित और जिला पूर्ति अधिकारी से संपर्क किया गया है और उन्हें पूरी स्थिति से अवगत कराया गया है। अधिकारियों की ओर से मौखिक आश्वासन जरूर दिया गया कि जल्द कोई समाधान निकाला जाएगा, लेकिन अब तक जमीन पर कोई ठोस व्यवस्था सामने नहीं आई है। आश्रम प्रबंधन का कहना है कि वर्तमान में जो गैस स्टॉक बचा हुआ है वह बहुत कम है और यदि नई आपूर्ति नहीं हुई तो एक या दो दिन के भीतर अन्नक्षेत्र को बंद करना पड़ सकता है। यह स्थिति न केवल आश्रम के लिए बल्कि उन हजारों संतों के लिए भी चिंताजनक है जो प्रतिदिन यहां भोजन के लिए आते हैं।

जब यह खबर संत समाज तक पहुंची तो कई संतों ने चिंता और नाराजगी दोनों व्यक्त की। कुछ संतों का कहना है कि यह स्थिति प्रशासनिक उदासीनता का परिणाम है, जबकि कुछ का मानना है कि इसके पीछे राजनीतिक कारण भी हो सकते हैं। कई संतों ने आस्था के साथ यह भी कहा कि भगवान पहले संतों को भोजन कराते हैं और उसके बाद स्वयं ग्रहण करते हैं, इसलिए उन्हें विश्वास है कि यह सेवा बंद नहीं होगी। फिर भी संतों के बीच यह चर्चा लगातार बढ़ रही है कि यदि अन्नक्षेत्र बंद हो गया तो हजारों तपस्वी साधुओं के सामने भोजन का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।

हरिद्वार की आध्यात्मिक परंपरा केवल मंदिरों, घाटों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां गंगा तट पर तपस्या करने वाले संतों और साधुओं की जीवनशैली भी इस नगरी की पहचान का अभिन्न हिस्सा है। सुबह की पहली किरण के साथ ही गंगा किनारे बसे अनेक आश्रमों और कुटियाओं में भजन, ध्यान और जप की ध्वनि सुनाई देती है। इन संतों का जीवन बेहद सादा और संयमित होता है। अधिकांश संत सांसारिक सुख-सुविधाओं से दूर रहकर केवल आध्यात्मिक साधना में लीन रहते हैं। ऐसे संतों के लिए भोजन जैसी मूलभूत आवश्यकता भी कई बार चुनौती बन जाती है, क्योंकि वे नियमित रूप से किसी आय या संसाधन से जुड़े नहीं होते। इसी कारण हरिद्वार में गीता कुटीर जैसे अन्नक्षेत्रों का महत्व और भी बढ़ जाता है। वर्षों से यह स्थान उन संतों के लिए सहारा बना हुआ है जो गंगा किनारे झोपड़ियों या छोटी कुटियाओं में रहकर तपस्या करते हैं। यहां आने वाले संत बताते हैं कि जब वे भजन और ध्यान में लीन रहते हैं तो उन्हें इस बात का भरोसा रहता है कि गीता कुटीर की रसोई से उन्हें भोजन अवश्य मिलेगा। यही विश्वास इस अन्नक्षेत्र को हरिद्वार की धार्मिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनाता है।

वर्तमान संकट के कारण अब वही व्यवस्था डगमगाती हुई दिखाई दे रही है जिसने दशकों तक हजारों संतों को सहारा दिया था। गीता कुटीर के प्रबंधक शिवदास का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में संतों के लिए भोजन बनाना एक विशाल कार्य है और इसके लिए निरंतर गैस सिलेंडरों की आवश्यकता होती है। प्रतिदिन लगभग दस गैस सिलेंडर खर्च हो जाते हैं, जिनकी मदद से सुबह और दोपहर के भोजन की व्यवस्था की जाती है। रसोई में कई स्वयंसेवक और सेवक मिलकर भोजन तैयार करते हैं और फिर संतों को प्रसाद स्वरूप परोसा जाता है। लेकिन जब अचानक गैस एजेंसियों ने सिलेंडर देना बंद कर दिया तो पूरी व्यवस्था संकट में आ गई। आश्रम प्रबंधन के अनुसार पहले कभी ऐसी स्थिति नहीं आई थी जब गैस की आपूर्ति रुकने के कारण रसोई बंद होने की आशंका पैदा हुई हो। इस बार समस्या इसलिए और गंभीर है क्योंकि एजेंसियों का कहना है कि बिना प्रशासनिक दिशा-निर्देश के वे गैस उपलब्ध नहीं करा सकते। यह स्थिति आश्रम प्रबंधन के लिए बेहद असहज है क्योंकि अन्नक्षेत्र की सेवा पूरी तरह दान और सहयोग पर आधारित है, और यदि गैस नहीं मिलेगी तो हजारों संतों के लिए भोजन तैयार करना संभव नहीं होगा।

इस समस्या को हल करने के लिए गीता कुटीर प्रबंधन लगातार प्रशासन से संपर्क कर रहा है। प्रबंधक शिवदास ने बताया कि उन्होंने जिलाधिकारी मयूर दीक्षित से इस विषय में बात की और पूरी स्थिति से अवगत कराया। साथ ही जिला पूर्ति अधिकारी से भी अनुरोध किया गया कि संतों के भोजन की व्यवस्था को देखते हुए गैस सिलेंडरों की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। अधिकारियों की ओर से यह आश्वासन दिया गया कि समस्या का समाधान किया जाएगा, लेकिन अब तक कोई स्पष्ट आदेश या व्यवस्था सामने नहीं आई है। इस कारण आश्रम प्रबंधन की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि यदि अगले कुछ दिनों में गैस सिलेंडर उपलब्ध नहीं हुए तो अन्नक्षेत्र की रसोई को बंद करना पड़ सकता है। यह स्थिति हरिद्वार जैसे धार्मिक नगर के लिए बेहद संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि यहां हजारों संत प्रतिदिन भोजन के लिए इस अन्नक्षेत्र पर निर्भर रहते हैं।

इस संकट की खबर जैसे ही संत समाज में फैली, कई संतों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। कुछ संतों ने चिंता जताते हुए कहा कि यदि अन्नक्षेत्र बंद हो गया तो गंगा तट पर रहने वाले अनेक साधुओं के सामने भोजन की समस्या खड़ी हो जाएगी। कई संतों का कहना है कि वे दिनभर साधना और भजन में व्यस्त रहते हैं और भोजन के लिए गीता कुटीर पर ही निर्भर रहते हैं। ऐसे में यदि यहां की रसोई बंद हो गई तो उन्हें भोजन की व्यवस्था के लिए भटकना पड़ेगा, जो उनके लिए बेहद कठिन होगा। वहीं कुछ संतों ने इस पूरे मामले को लेकर नाराजगी भी जताई और कहा कि यह स्थिति प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है। उनका मानना है कि जिस शहर की पहचान संतों और साधुओं से होती है, वहां संतों के भोजन की व्यवस्था पर संकट खड़ा होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

कुछ संतों ने आस्था के साथ यह भी कहा कि गीता कुटीर की सेवा भगवान की प्रेरणा से चल रही है और अब तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि यहां संतों को भोजन न मिला हो। उनका विश्वास है कि किसी न किसी रूप में इस समस्या का समाधान अवश्य निकलेगा। एक संत ने भावुक होकर कहा कि सनातन परंपरा में यह माना जाता है कि भगवान पहले अपने भक्तों और संतों को भोजन कराते हैं और उसके बाद स्वयं ग्रहण करते हैं। इसलिए उन्हें भरोसा है कि यह सेवा बंद नहीं होगी। हालांकि संतों के बीच यह चर्चा भी बढ़ रही है कि यदि प्रशासन ने जल्द कोई निर्णय नहीं लिया तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

दूसरी ओर गीता कुटीर प्रबंधन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि गैस सिलेंडरों की आपूर्ति शीघ्र शुरू नहीं की गई तो वे संतों के साथ मिलकर जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर बैठने को मजबूर होंगे। प्रबंधन का कहना है कि यदि हजारों संत भोजन के लिए उनके द्वार पर आएंगे और उनके पास भोजन बनाने का साधन नहीं होगा तो वे संतों को लेकर प्रशासन के सामने बैठ जाएंगे। उनका तर्क है कि जब अधिकारी स्वयं संतों की स्थिति देखेंगे तभी शायद इस समस्या की गंभीरता समझ पाएंगे। यह चेतावनी प्रशासन के लिए भी एक चुनौती बन सकती है क्योंकि यदि संत समाज इस मुद्दे पर एकजुट हो गया तो मामला बड़ा रूप ले सकता है।

हरिद्वार जैसे पवित्र शहर में संतों की सेवा को हमेशा से सर्वोच्च स्थान दिया गया है। गंगा तट पर साधना करने वाले संतों को यहां की आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में यदि उनके भोजन की व्यवस्था पर संकट आता है तो यह केवल एक आश्रम की समस्या नहीं रह जाती बल्कि पूरे शहर की धार्मिक मर्यादा से जुड़ा विषय बन जाती है। कई स्थानीय लोग भी इस स्थिति को लेकर चिंतित हैं और उनका कहना है कि प्रशासन को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। उनका मानना है कि जिस शहर में हर दिन लाखों श्रद्धालु आस्था के साथ गंगा स्नान करने आते हैं, वहां संतों की सेवा व्यवस्था को बनाए रखना प्रशासन की भी जिम्मेदारी है।

अब सभी की नजर प्रशासन पर टिकी हुई है कि वह इस संकट का समाधान किस तरह करता है। यदि गैस सिलेंडरों की व्यवस्था जल्द कर दी जाती है तो गीता कुटीर की रसोई पहले की तरह चलती रहेगी और हजारों संतों को भोजन मिलता रहेगा। लेकिन यदि यह समस्या लंबे समय तक बनी रही तो हरिद्वार की धार्मिक व्यवस्था पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि संतों की इस सेवा परंपरा को बचाने के लिए प्रशासन और समाज मिलकर क्या कदम उठाते हैं।

हरिद्वार की पहचान केवल एक धार्मिक शहर के रूप में ही नहीं बल्कि सनातन परंपरा की जीवंत धरोहर के रूप में भी की जाती है। सदियों से यह नगरी साधु-संतों की तपस्थली रही है, जहां देश के विभिन्न हिस्सों से संत आकर गंगा तट पर साधना करते हैं। इन संतों की उपस्थिति ही हरिद्वार को एक अलग आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती है। गंगा के किनारे बनी छोटी-छोटी कुटियाओं और झोपड़ियों में रहने वाले ये तपस्वी संत दिन-रात भगवान के भजन, जप और ध्यान में लीन रहते हैं और सांसारिक मोह-माया से दूर रहकर आध्यात्मिक साधना को अपना जीवन बना लेते हैं। ऐसे संतों के लिए भोजन की व्यवस्था करना हमेशा से समाज और आश्रमों की जिम्मेदारी रही है। यही कारण है कि हरिद्वार में कई स्थानों पर अन्नक्षेत्र संचालित किए जाते हैं, जहां संतों को निःशुल्क भोजन प्रसाद उपलब्ध कराया जाता है। तपोवन स्थित गीता कुटीर का अन्नक्षेत्र भी इसी सेवा परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसने पिछले कई दशकों से हजारों संतों को भोजन उपलब्ध कराकर उनकी साधना में सहयोग दिया है। लेकिन वर्तमान समय में गैस सिलेंडरों की कमी के कारण उत्पन्न संकट ने इस सेवा व्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया है और अब यह प्रश्न उठने लगा है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो संतों के लिए भोजन की व्यवस्था कैसे जारी रखी जाएगी।

गीता कुटीर से जुड़े लोग बताते हैं कि इस अन्नक्षेत्र की स्थापना केवल एक सामाजिक सेवा के रूप में नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक संकल्प के रूप में की गई थी। स्वामी गीतानंद जी महाराज की यह भावना थी कि हरिद्वार में कोई भी संत भूखा न रहे और गंगा तट पर साधना करने वाले तपस्वियों को भोजन के लिए भटकना न पड़े। इसी उद्देश्य से वर्षों पहले इस अन्नक्षेत्र की शुरुआत की गई थी और धीरे-धीरे यह सेवा इतनी व्यापक हो गई कि हर दिन बड़ी संख्या में संत यहां भोजन ग्रहण करने आने लगे। यहां भोजन को केवल खाना नहीं बल्कि प्रसाद माना जाता है, जिसे संत श्रद्धा और आस्था के साथ ग्रहण करते हैं। आश्रम के सेवक बताते हैं कि प्रतिदिन सुबह से ही रसोई में भोजन तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और कई स्वयंसेवक मिलकर इस सेवा में योगदान देते हैं। वर्षों तक यह व्यवस्था इतनी सुचारू रूप से चलती रही कि किसी को यह कल्पना भी नहीं थी कि कभी ऐसा समय आएगा जब गैस सिलेंडरों की कमी के कारण इस अन्नक्षेत्र की रसोई बंद होने की नौबत आ जाएगी।

वर्तमान संकट के कारण गीता कुटीर प्रबंधन की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। प्रबंधक शिवदास का कहना है कि यदि जल्द कोई समाधान नहीं निकला तो संतों के भोजन की व्यवस्था बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा। उनका कहना है कि यह केवल एक रसोई का सवाल नहीं है बल्कि हजारों संतों की दैनिक जीवन व्यवस्था से जुड़ा विषय है। जो संत गंगा तट पर साधना कर रहे हैं, वे अपने भोजन के लिए मुख्य रूप से इसी अन्नक्षेत्र पर निर्भर रहते हैं। यदि यहां भोजन बंद हो गया तो उन्हें भोजन की तलाश में इधर-उधर जाना पड़ेगा, जिससे उनकी साधना और तपस्या दोनों प्रभावित होंगी। यही कारण है कि आश्रम प्रबंधन लगातार प्रशासन से गुहार लगा रहा है कि गैस सिलेंडरों की आपूर्ति जल्द से जल्द शुरू कराई जाए। उनका कहना है कि यदि प्रशासन चाहे तो इस समस्या का समाधान तुरंत किया जा सकता है, क्योंकि यह केवल एक औपचारिक अनुमति और व्यवस्था का प्रश्न है।

इस पूरे घटनाक्रम ने स्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओं के बीच भी चर्चा का विषय बना दिया है। कई लोग इसे हरिद्वार की धार्मिक व्यवस्था से जुड़ा गंभीर मुद्दा मान रहे हैं। उनका कहना है कि जिस शहर की पहचान ही संतों और साधुओं से होती है, वहां यदि संतों के भोजन की व्यवस्था संकट में पड़ जाए तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि प्रशासन को इस विषय में संवेदनशीलता दिखाते हुए तुरंत समाधान निकालना चाहिए। हरिद्वार आने वाले श्रद्धालु भी यह मानते हैं कि संत समाज की सेवा करना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। यदि संत ही भोजन के लिए परेशान होंगे तो यह इस पवित्र नगरी की गरिमा के लिए उचित नहीं होगा। इसलिए समाज के कई लोग भी चाहते हैं कि इस समस्या का समाधान जल्द निकाला जाए और अन्नक्षेत्र की सेवा पहले की तरह जारी रहे।

दूसरी ओर संत समाज के कुछ प्रतिनिधियों ने यह भी कहा है कि यदि प्रशासन ने समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया तो वे इस मुद्दे को लेकर आगे कदम उठाने के लिए मजबूर होंगे। गीता कुटीर प्रबंधन पहले ही यह संकेत दे चुका है कि यदि गैस सिलेंडरों की व्यवस्था नहीं हुई तो संतों के साथ मिलकर जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर बैठना पड़ेगा। उनका कहना है कि जब हजारों संत भोजन के लिए उनके पास आएंगे और उनके पास भोजन बनाने का साधन नहीं होगा तो वे संतों को लेकर प्रशासन के सामने जाएंगे, ताकि अधिकारी स्वयं स्थिति की गंभीरता को समझ सकें। यह स्थिति प्रशासन के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है क्योंकि हरिद्वार में संत समाज की आवाज को हमेशा गंभीरता से लिया जाता है।

अंततः यह पूरा मामला केवल गैस सिलेंडरों की आपूर्ति का नहीं बल्कि हरिद्वार की धार्मिक परंपरा और संत सेवा की व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। गंगा तट पर साधना करने वाले संत इस नगरी की आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक हैं और उनकी सेवा करना समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी मानी जाती है। यदि गीता कुटीर का अन्नक्षेत्र बंद होता है तो यह केवल एक आश्रम की रसोई बंद होने की घटना नहीं होगी बल्कि यह उस परंपरा पर आघात होगा जिसने दशकों तक संतों की सेवा को अपना धर्म माना है। इसलिए अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और संबंधित विभागों पर टिकी हुई हैं कि वे इस संकट का समाधान किस तरह करते हैं। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि गीता कुटीर की रसोई पहले की तरह चलती रहेगी या फिर संतों को भोजन के लिए किसी नई व्यवस्था की तलाश करनी पड़ेगी। हरिद्वार की पवित्र भूमि आज प्रशासन से यही अपेक्षा कर रही है कि वह इस सेवा परंपरा को बनाए रखने के लिए समय रहते उचित कदम उठाए।

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