देहरादून। उत्तराखंड की सियासत के गलियारों में पिछले कई दिनों से चल रही सुगबुगाहट पर आखिरकार विराम लग गया है, जब मुख्यमंत्री ने अपनी कैबिनेट के कुनबे को नया स्वरूप देते हुए विभागों का भारी फेरबदल कर दिया। शासन द्वारा जारी ताजा सूची ने न केवल मंत्रियों के पोर्टफोलियो बदले हैं, बल्कि प्रदेश की भावी राजनीति की दिशा और दशा भी तय कर दी है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला और बड़ा बदलाव स्वास्थ्य महकमे में देखने को मिला है, जहाँ कद्दावर नेता धन सिंह रावत से यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वापस ले ली गई है। सरकार के इस कदम को प्रशासनिक सर्जरी के साथ-साथ एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि स्वास्थ्य जैसा जनसरोकारी विभाग अब प्रदेश के अनुभवी और संकटमोचक माने जाने वाले नेता सुबोध उनियाल के सुपुर्द कर दिया गया है। सचिवालय से लेकर विधानसभा तक इस बदलाव की गूँज सुनाई दे रही है, जिसे मुख्यमंत्री का एक श्मास्टरस्ट्रोकश् माना जा रहा है ताकि आने वाले समय में सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता को नए आयाम दिए जा सकें।
राज्य के सियासी समीकरणों को साधने में माहिर सुबोध उनियाल को अब उत्तराखंड का नया स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया है, जो उनके बढ़ते राजनीतिक रसूख और मुख्यमंत्री के उन पर अटूट विश्वास की तस्दीक करता है। गौरतलब है कि सुबोध उनियाल पहले से ही वन विभाग जैसे भारी-भरकम मंत्रालय को संभाल रहे हैं और उनके पास निर्वाचन, विधायी एवं संसदीय कार्य जैसी महत्वपूर्ण संवैधानिक जिम्मेदारियां भी बरकरार रखी गई हैं। इतने अहम विभागों के साथ अब स्वास्थ्य सेवा का जिम्मा मिलना यह दर्शाता है कि धामी सरकार उन्हें अपनी टीम का सबसे मजबूत स्तंभ मानती है। सुबोध उनियाल की कार्यशैली हमेशा से परिणामोन्मुख रही है और शायद यही वजह है कि विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस राज्य में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की चुनौती उन्हें सौंपी गई है। धन सिंह रावत से विभाग वापस लेना और सुबोध उनियाल को सौंपना, कहीं न कहीं जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की सरकार की एक नई और आक्रामक रणनीति का हिस्सा जान पड़ता है।
यदि सुबोध उनियाल के राजनीतिक सफरनामे पर नजर डालें, तो उनकी जड़ें छात्र राजनीति की उपजाऊ जमीन से जुड़ी हैं, जहाँ उन्होंने उत्तर प्रदेश के मशहूर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अपने नेतृत्व क्षमता को तराशा था। उनकी आधिकारिक राजनीतिक यात्रा कांग्रेस के झंडे तले शुरू हुई थी, जब उन्होंने साल 2002 के विधानसभा चुनावों में पहली बार अपनी पारंपरिक सीट नरेंद्रनगर से चुनावी ताल ठोंकी थी। उस दौर की राजनीति में अपनी पहली ही दस्तक से उन्होंने सबको प्रभावित किया और जीत का परचम लहराकर सदन में प्रवेश किया। वह दौर उनके लिए सीखने और खुद को स्थापित करने का था, जहाँ उन्होंने क्षेत्र की जनता के साथ गहरा जुड़ाव बनाया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की उस बौद्धिक और क्रांतिकारी पृष्ठभूमि ने उन्हें एक ऐसा नेता बनाया जो न केवल फाइलों को समझना जानता है, बल्कि सड़क पर उतरकर जनता की नब्ज टटोलने में भी माहिर है, यही कारण है कि आज वह सत्ता के शीर्ष पर अपनी धाक जमाए हुए हैं।
भारतीय जनता पार्टी में उनका प्रवेश उत्तराखंड की राजनीति का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ, जब साल 2016 के सियासी ड्रामे और उथल-पुथल के बीच उन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़कर कमल का दामन थाम लिया था। इसके तुरंत बाद साल 2017 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने एक बार फिर नरेंद्रनगर की रणभूमि से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और प्रचंड बहुमत के साथ जीत हासिल की। उनकी इसी काबिलियत और वफादारी का इनाम उन्हें तत्कालीन त्रिवेंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में मिला, जहाँ उन्हें पहली बार मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। उस समय उन्हें कृषि, वृक्षारोपण, बागवानी और रेशम विकास जैसे बुनियादी और ग्रामीण आर्थिकी से जुड़े विभाग सौंपे गए थे। कृषि मंत्री के रूप में उन्होंने कई नवाचार किए और किसानों के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाई, जिससे यह साफ हो गया कि वह जिस भी विभाग में जाते हैं, वहां अपनी कार्यक्षमता की अमिट छाप छोड़ देते हैं।
चुनावी राजनीति में अजेय योद्धा की तरह उभरते हुए सुबोध उनियाल ने साल 2022 के विधानसभा चुनावों में भी अपनी लोकप्रियता का लोहा मनवाया और नरेंद्रनगर से तीसरी बार शानदार जीत दर्ज कर हैट्रिक लगाई। वर्तमान धामी सरकार के गठन के समय उन्हें उनकी प्रशासनिक दक्षता को देखते हुए वन विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। लेकिन अब, कैबिनेट विस्तार के बाद हुए ताजा घटनाक्रम में मुख्यमंत्री ने उन्हें स्वास्थ्य विभाग की अतिरिक्त और अति-संवेदनशील जिम्मेदारी देकर उनके कंधों पर बड़ा बोझ डाला है। स्वास्थ्य मंत्रालय संभालना किसी भी नेता के लिए कांटों भरा ताज होता है, विशेषकर उत्तराखंड जैसे राज्य में जहाँ पहाड़ की स्वास्थ्य सेवाएं अक्सर चर्चा और विवादों का केंद्र रहती हैं। सुबोध उनियाल के लिए यह परीक्षा की घड़ी है कि वे कैसे वन विभाग की हरियाली के साथ-साथ प्रदेश के अस्पतालों और चिकित्सा सुविधाओं में भी नई जान फूंक पाते हैं।
इस विभागीय पुनर्गठन ने धन सिंह रावत के समर्थकों को जहाँ थोड़ा मायूस किया है, वहीं सुबोध उनियाल के खेमे में उत्साह की लहर है, क्योंकि स्वास्थ्य मंत्रालय सीधे तौर पर जनता के जीवन को प्रभावित करने वाला विभाग है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धामी सरकार ने यह बदलाव बहुत सोच-समझकर किया है ताकि विभागों में ताजगी लाई जा सके और लंबित योजनाओं को गति दी जा सके। सुबोध उनियाल के पास जो विधायी एवं संसदीय कार्य की जिम्मेदारी है, वह उन्हें सदन के भीतर सरकार का बचाव करने में मदद करती है, और अब स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उन्हें जनता के बीच सरकार की छवि को सुधारने का मौका मिला है। सरकार का यह नया स्वरूप आने वाले निकाय चुनाव और आगामी चुनौतियों के मद्देनजर बेहद अहम है। देखना दिलचस्प होगा कि सुबोध उनियाल अपनी पुरानी कार्यशैली के दम पर स्वास्थ्य महकमे में क्या क्रांतिकारी परिवर्तन लाते हैं और मुख्यमंत्री के भरोसे पर कितना खरा उतरते हैं।
उत्तराखंड के इस नए कैबिनेट ढांचे में सुबोध उनियाल का श्सुपर मिनिस्टरश् के तौर पर उभरना यह संकेत देता है कि आने वाले समय में वे सरकार के सबसे बड़े संकटमोचक की भूमिका निभाएंगे। उनके पास अब न केवल जंगल और जमीन (वन विभाग) को बचाने की चुनौती है, बल्कि प्रदेश के हर नागरिक के जीवन (स्वास्थ्य विभाग) को सुरक्षित करने का संकल्प भी है। सुबोध उनियाल की शख्सियत ऐसी है कि वे ब्यूरोक्रेसी पर पकड़ बनाना जानते हैं और अधिकारियों से काम लेने की कला में निपुण हैं। स्वास्थ्य विभाग में अक्सर होने वाली हड़तालें, डॉक्टरों की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव जैसी समस्याओं से निपटने के लिए एक सख्त और अनुभवी हाथ की जरूरत थी, जो अब उनियाल के रूप में सरकार को मिल गया है। यह फेरबदल धामी सरकार के दूसरे कार्यकाल की एक नई इबारत लिख रहा है, जहाँ प्रदर्शन (च्मतवितउंदबम) ही पद और विभाग का असली पैमाना बन गया है।
कुल मिलाकर, धामी कैबिनेट का यह विस्तार और विभागों का यह बंटवारा केवल मंत्रियों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शासन के इकबाल को बुलंद करने की एक बड़ी कवायद है। सुबोध उनियाल को नई शक्ति और नए दायित्व देकर मुख्यमंत्री ने यह साफ कर दिया है कि उनकी टीम में अनुभव को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी जाएगी। अब नरेंद्रनगर के इस विधायक के पास देहरादून के सचिवालय से लेकर दूरस्थ पहाड़ों के अस्पतालों तक अपनी छाप छोड़ने का सुनहरा अवसर है। प्रदेश की जनता भी टकटकी लगाए देख रही है कि नया स्वास्थ्य मंत्री उनके लिए क्या नई सौगातें लेकर आता है और सरकारी अस्पतालों की सूरत कितनी जल्दी बदलती है। सियासत की इस बिसात पर सुबोध उनियाल ने एक बार फिर अपनी उपयोगिता साबित की है और अब गेंद उनके पाले में है कि वे स्वास्थ्य विभाग को सफलता की किन ऊंचाइयों पर ले जाते हैं।





