spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeउत्तराखंडसीएजी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा गंगा सफाई योजना में करोड़ों खर्च फिर...

सीएजी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा गंगा सफाई योजना में करोड़ों खर्च फिर भी प्रदूषण बरकरार

सीएजी की रिपोर्ट ने नमामि गंगे योजना की जमीनी सच्चाई उजागर कर दी, कई स्थानों पर एसटीपी बेकार पड़े, कहीं क्षमता से अधिक सीवेज का दबाव, तो कहीं अशोधित गंदा पानी सीधे गंगा में बहाया जा रहा।

हरिद्वार। देश की सबसे बड़ी और महत्वाकांक्षी नदी संरक्षण परियोजनाओं में शामिल नमामि गंगे कार्यक्रम को लेकर एक गंभीर और चौंकाने वाला सच सामने आया है, जिसने गंगा सफाई अभियान की जमीनी हकीकत पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की वर्ष 2025 की प्रतिवेदन संख्या–2 में उत्तराखण्ड में गंगा संरक्षण से जुड़े कार्यों का विस्तृत परीक्षण करते हुए कई महत्वपूर्ण कमियों और अनियमितताओं को उजागर किया गया है। यह रिपोर्ट 10 मार्च 2026 को सदन के पटल पर प्रस्तुत की गई, जिसमें वर्ष 2018–19 से 2022–23 के बीच नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत किए गए कार्यों की निष्पादन लेखापरीक्षा की गई। इस जांच के दौरान योजनाओं के निर्माण, वित्तीय प्रबंधन, परियोजनाओं के क्रियान्वयन, निगरानी व्यवस्था, पर्यावरणीय मानकों के पालन और अवसंरचना के वास्तविक उपयोग जैसे कई महत्वपूर्ण पहलुओं की गहन समीक्षा की गई। लेखापरीक्षा में यह सामने आया कि गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के उद्देश्य से बनाई गई कई योजनाएं कागजों में तो प्रभावशाली दिखाई देती हैं, लेकिन जमीन पर उनका क्रियान्वयन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाया। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद कई परियोजनाएं अधूरी या अप्रभावी साबित हुईं, जिससे गंगा संरक्षण के लक्ष्य को गंभीर झटका लगा है। इस रिपोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि गंगा जैसी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक महत्व की नदी के संरक्षण के लिए बनाई गई योजनाओं में समन्वय और दीर्घकालिक रणनीति का अभाव रहा है, जिसके कारण अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ सके।

गंगा नदी को स्वच्छ और अविरल बनाए रखने के उद्देश्य से वर्ष 2011 में एक महत्वपूर्ण लक्ष्य निर्धारित किया गया था कि वर्ष 2020 तक गंगा में शहरी क्षेत्रों और औद्योगिक इकाइयों से आने वाले अशोधित अपशिष्ट के प्रवाह को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कई चरणों में योजनाएं बनाई गईं और विभिन्न परियोजनाओं को स्वीकृति भी प्रदान की गई। हालांकि लेखापरीक्षा रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया कि निर्धारित समयसीमा समाप्त हो जाने के बावजूद गंगा बेसिन प्रबंधन योजना का निर्माण ही पूरा नहीं हो सका। लगभग 13 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी राज्य स्तर पर यह योजना तैयार नहीं हो पाना प्रशासनिक तैयारी और समन्वय की गंभीर कमी को दर्शाता है। गंगा के किनारे बसे प्रमुख जिलों—उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, देहरादून और हरिद्वार—में जिला गंगा योजनाओं का निर्माण तक नहीं किया गया। इससे गंगा संरक्षण के प्रयास एक समन्वित ढांचे के तहत आगे नहीं बढ़ सके और कई स्थानों पर प्रदूषण नियंत्रण की पहलें बिखरे हुए रूप में दिखाई दीं। योजना के अभाव में सीवेज प्रबंधन और अन्य अवसंरचनात्मक परियोजनाएं स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं बन सकीं, जिसके कारण गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने का लक्ष्य अधूरा रह गया।

लेखापरीक्षा में सामने आया एक और बड़ा खुलासा यह है कि राज्य के कई शहरों में करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए सीवेज शोधन संयंत्र वास्तविक उपयोग के बिना ही निष्क्रिय पड़े हैं। रिपोर्ट के अनुसार नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कीर्तिनगर, चमोली, श्रीनगर और जोशीमठ जैसे नगरों में कुल 21 एसटीपी का निर्माण किया गया, लेकिन इन संयंत्रों को स्थानीय घरों और सीवरेज नेटवर्क से जोड़ा ही नहीं गया। परिणामस्वरूप ये संयंत्र बनने के बाद भी अपने मूल उद्देश्य को पूरा नहीं कर सके और गंगा में जाने वाले प्रदूषण को रोकने की प्रक्रिया प्रभावित होती रही। जोशीमठ का उदाहरण इस संदर्भ में सबसे अधिक चौंकाने वाला माना गया है, जहां वर्ष 2010 से 2017 के बीच लगभग 42.73 करोड़ रुपये खर्च कर सीवेज अवसंरचना तैयार की गई थी। हालांकि इस पूरी व्यवस्था के बावजूद वहां एक भी घर को सीवरेज नेटवर्क से नहीं जोड़ा गया। इस स्थिति ने परियोजनाओं की योजना निर्माण प्रक्रिया और क्रियान्वयन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब सीवेज संयंत्रों का निर्माण करने के बाद भी घरों को उनसे नहीं जोड़ा जाता, तो यह स्पष्ट संकेत देता है कि योजना बनाते समय स्थानीय आवश्यकताओं और क्रियान्वयन की व्यावहारिक चुनौतियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।

दूसरी ओर लेखापरीक्षा में यह भी पाया गया कि जहां कुछ शहरों में सीवेज शोधन संयंत्र निष्क्रिय पड़े हैं, वहीं कई प्रमुख शहरों में स्थित एसटीपी अपनी निर्धारित क्षमता से कहीं अधिक दबाव झेलने को मजबूर हैं। हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक और पर्यटन स्थलों में सीवेज की मात्रा संयंत्रों की क्षमता से अधिक पाई गई। उदाहरण के तौर पर हरिद्वार में 68 एमएलडी क्षमता वाले एसटीपी में कई बार लगभग 84 एमएलडी तक सीवेज पहुंचता पाया गया। इसी प्रकार ऋषिकेश के चोरपानी स्थित 5 एमएलडी क्षमता वाले एसटीपी में कभी-कभी 17 एमएलडी तक सीवेज का प्रवाह दर्ज किया गया। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि अवसंरचना निर्माण के समय भविष्य की जनसंख्या वृद्धि, पर्यटन गतिविधियों और तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या का समुचित आकलन नहीं किया गया। परिणामस्वरूप कुछ स्थानों पर संयंत्रों पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है, जबकि अन्य स्थानों पर वही संसाधन अनुपयोगी बने हुए हैं। इस प्रकार की असंतुलित योजना व्यवस्था ने गंगा संरक्षण के प्रयासों को कमजोर बना दिया है और प्रदूषण नियंत्रण की प्रक्रिया को अपेक्षित प्रभाव से दूर कर दिया है।

रिपोर्ट में एक बेहद गंभीर तथ्य यह भी सामने आया कि कई स्थानों पर स्थापित सीवेज शोधन संयंत्रों से अशोधित सीवेज सीधे गंगा में प्रवाहित किया जा रहा था। लेखापरीक्षा के अनुसार ऋषिकेश, रुद्रप्रयाग, श्रीकोट, गोपेश्वर और कर्णप्रयाग सहित कई क्षेत्रों में स्थित कुल 12 एसटीपी ऐसे पाए गए, जहां से बिना उपचारित अपशिष्ट जल सीधे गंगा नदी में छोड़ा जा रहा था। इससे गंगा की जल गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह सामने आया कि ऋषिकेश के स्वर्गाश्रम और तपोवन स्थित दो एसटीपी में संचालन एवं रखरखाव के लिए जिम्मेदार ठेकेदार द्वारा जल अधिनियम 1974 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए जानबूझकर अशोधित सीवेज नदी में प्रवाहित किया गया। यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि पर्यावरणीय कानूनों की खुली अनदेखी मानी जा रही है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि परियोजनाओं की निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था पर्याप्त रूप से प्रभावी नहीं रही, जिसके कारण इस प्रकार की गंभीर अनियमितताएं सामने आईं।

गंगा जल की गुणवत्ता को लेकर भी लेखापरीक्षा रिपोर्ट में चिंताजनक तथ्य सामने आए हैं। जांच के दौरान पाया गया कि देवप्रयाग तक गंगा का जल अपेक्षाकृत स्वच्छ स्थिति में था और उसे ‘ए’ श्रेणी में वर्गीकृत किया गया। हालांकि देवप्रयाग से हरिद्वार तक लगभग 93 किलोमीटर की दूरी में जल की गुणवत्ता में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। इस पूरे मार्ग में कुल कोलीफॉर्म की मात्रा लगभग 32 गुना तक बढ़ती पाई गई, जो गंभीर प्रदूषण का संकेत है। परिणामस्वरूप ऋषिकेश और हरिद्वार में गंगा का जल ‘बी’ श्रेणी में पहुंच गया। यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि नदी के मध्य और निचले हिस्सों में प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था प्रभावी नहीं है। गंगा में बढ़ते प्रदूषण का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लाखों श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

लेखापरीक्षा रिपोर्ट में सुरक्षा प्रबंधन से जुड़ी गंभीर कमियां भी सामने आई हैं। रुद्रप्रयाग क्षेत्र में भूस्खलन के कारण एक एसटीपी पूरी तरह नष्ट हो गया, जिससे लगभग 88 लाख रुपये की आर्थिक क्षति हुई। यह घटना दर्शाती है कि परियोजनाओं के निर्माण के दौरान भौगोलिक परिस्थितियों और प्राकृतिक जोखिमों का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया। इसके अलावा एक अन्य स्थान पर एसटीपी की विद्युत प्रणाली में तकनीकी खामियों के कारण एक गंभीर दुर्घटना हुई, जिसमें 28 लोगों को करंट लग गया। इस हादसे में 16 लोगों की मृत्यु हो गई जबकि 12 लोग घायल हो गए। इस घटना ने परियोजना प्रबंधन और सुरक्षा मानकों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से बनाई गई परियोजनाओं में ही सुरक्षा मानकों की अनदेखी हो, तो यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक मानी जाती है।

नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत बनाए गए कई शवदाह गृहों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं पाई गई। रिपोर्ट में बताया गया कि विभिन्न स्थानों पर आधुनिक श्मशान घाटों का निर्माण तो किया गया, लेकिन स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का समुचित आकलन किए बिना ही इनका निर्माण कर दिया गया। परिणामस्वरूप इन शवदाह गृहों का उपयोग बहुत कम या लगभग नगण्य पाया गया। कई स्थानों पर लोग आज भी पारंपरिक तरीके से नदी तट पर लकड़ी की चिताएं जलाना ही पसंद करते हैं। इस कारण से आधुनिक शवदाह गृहों पर खर्च की गई धनराशि अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाई। यह स्थिति दर्शाती है कि किसी भी परियोजना के सफल क्रियान्वयन के लिए स्थानीय समाज की परंपराओं और व्यवहारिक आवश्यकताओं को समझना बेहद जरूरी होता है।

इन सभी कमियों को ध्यान में रखते हुए लेखापरीक्षा रिपोर्ट में राज्य सरकार को 11 महत्वपूर्ण सिफारिशें भी दी गई हैं। इनमें सभी एसटीपी की व्यापक सुरक्षा लेखापरीक्षा कराने, घरों को सीवरेज नेटवर्क से जोड़ने की प्रक्रिया को तेज करने, सेप्टेज के सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था विकसित करने और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली को मजबूत करने जैसे सुझाव शामिल हैं। इसके अतिरिक्त प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की प्रयोगशालाओं को मान्यता दिलाने और गंगा जल की गुणवत्ता की निगरानी प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ बनाने की भी सिफारिश की गई है। इन सुझावों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में गंगा संरक्षण से जुड़े प्रयास अधिक प्रभावी और परिणामकारी साबित हो सकें।

गंगा नदी को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से शुरू किया गया नमामि गंगे कार्यक्रम देश की सबसे बड़ी पर्यावरणीय पहल के रूप में देखा जाता है। हालांकि नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की इस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि योजनाओं की घोषणा और उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है। जब करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद गंगा में अशोधित सीवेज का प्रवाह जारी रहे और जल की गुणवत्ता लगातार गिरती जाए, तो यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता का संकेत नहीं देती, बल्कि यह देश की आस्था और पर्यावरणीय विरासत के साथ गंभीर लापरवाही का प्रतीक भी बन जाती है। गंगा केवल एक नदी नहीं बल्कि करोड़ों भारतीयों की आस्था, संस्कृति और जीवन का आधार है। ऐसे में इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार और संबंधित एजेंसियां इन गंभीर खामियों को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाएंगी या फिर गंगा सफाई की यह महत्वाकांक्षी कहानी केवल योजनाओं और कागजी दावों तक ही सीमित रह जाएगी।

संबंधित ख़बरें
शहर की भीड़भाड़ और बढ़ती बीमारियों के दौर में जब चिकित्सा जगत को नए और भरोसेमंद विकल्पों की तलाश थी, उसी समय काशीपुर से उभरती एक संस्था ने अपनी गुणवत्ता, विशेषज्ञता और इंसानी सेहत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम कर दी। एन.एच.-74, मुरादाबाद रोड पर स्थित “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” आज उस भरोसे का नाम बन चुका है, जिसने अपनी प्रतिबद्धता, सेवा और उन्नत चिकित्सा व्यवस्था के साथ लोगों के दिलों में एक अलग स्थान स्थापित किया है। इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ इलाज का आधार केवल दवा नहीं, बल्कि रोगी की पूरी जीवनशैली, उसकी भावनाओं और उसके व्यवहार तक को समझकर उपचार उपलब्ध कराया जाता है। संस्था के केंद्र में वर्षों से सेवा कर रहे डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा का अनुभव, उनकी अंतरराष्ट्रीय योग्यता और कार्य के प्रति उनका गहरा समर्पण उन्हें चिकित्सा जगत में एक विशिष्ट पहचान देता है। अपनी अलग सोच और उच्च स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था के कारण यह संस्थान न केवल स्थानीय लोगों का विश्वास जीत रहा है, बल्कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले मरीज भी यहाँ भरोसे के साथ उपचार लेने पहुँचते हैं। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” ने NABH Accreditation और ISO 9001:2008 व 9001:2015 प्रमाणपत्र हासिल कर यह साबित कर दिया है कि यहाँ इलाज पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के साथ किया जाता है। संस्थान की दीवारों पर सजे सैकड़ों प्रमाणपत्र, सम्मान और पुरस्कार इस बात के गवाह हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा ने उपचार को केवल पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा की जिम्मेदारी माना है। यही वजह है कि उन्हें भारतीय चिकित्सा रत्न जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। रोगियों के प्रति संवेदनशीलता और आधुनिक तकनीकी समझ को मिलाकर जो उपचार मॉडल यहाँ तैयार हुआ है, वह लोगों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है। संस्थान के भीतर मौजूद विस्तृत कंसल्टेशन रूम, मेडिकल फाइलों की सुव्यवस्थित व्यवस्था और अत्याधुनिक निरीक्षण प्रणाली इस बात को स्पष्ट दिखाती है कि यहाँ मरीज को पूर्ण सम्मान और ध्यान के साथ सुना जाता है। पोस्टर में दर्शाए गए दृश्य—जहाँ डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मानित होते दिखाई देते हैं—उनकी निष्ठा और चिकित्सा जगत में उनकी मजबूत प्रतिष्ठा को और मजबूत बनाते हैं। उनकी विदेशों में प्राप्त डिग्रियाँ—बीएचएमएस, एमडी (होम.), डी.आई.एच. होम (लंदन), एम.ए.एच.पी (यूके), डी.एच.एच.एल (यूके), पीएच.डी—स्पष्ट करती हैं कि वे केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिकित्सा अनुसंधान और उपचार के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। काशीपुर जैसे शहर में आधुनिक विचारों और उच्च गुणवत्ता वाले उपचार का ऐसा संयोजन मिलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। संस्था की ऊँची इमारत, सुगम पहुँच और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित परिसर मरीजों को एक शांत, सकारात्मक और उपचार के अनुकूल माहौल प्रदान करता है। इसी माहौल में रोगियों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली वैज्ञानिक होम्योपैथिक औषधियाँ उनके लंबे समय से चले आ रहे दर्द और समस्याओं को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखती हैं। उपचार के दौरान रोगी को केवल दवा देना ही उद्देश्य नहीं होता, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य पुनर्स्थापन पर यहाँ विशेष ध्यान दिया जाता है। यही वह कारण है कि मरीज वर्षों बाद भी इस संस्थान को याद रखते हुए अपने परिवार और परिचितों को यहाँ भेजना पसंद करते हैं। समाज के विभिन्न समूहों से सम्मान प्राप्त करना, राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों द्वारा सराहना मिलना, और बड़े मंचों पर चिकित्सा सेवाओं के लिए सम्मानित होना—ये सभी तस्वीरें इस संस्था की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को और अधिक उजागर करती हैं। पोस्टर में दिखाई देने वाले पुरस्कार न केवल उपलब्धियों का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा लगातार लोगों की सेहत सुधारने और चिकित्सा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने में जुटे हुए हैं। उनका सरल स्वभाव, रोगियों के प्रति समर्पण और ईमानदारी के साथ सेवा का भाव उन्हें चिकित्सा जगत में एक उल्लेखनीय व्यक्तित्व बनाता है। संपर्क के लिए उपलब्ध नंबर 9897618594, ईमेल drrajneeshhom@hotmail.com और आधिकारिक वेबसाइट www.cureme.org.in संस्थान की पारदर्शिता और सुविधा की नीति को मजबूत बनाते हैं। काशीपुर व आसपास के क्षेत्रों के लिए यह संस्थान विकसित और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बन चुका है जहाँ लोग बिना किसी डर, संदेह या हिचकिचाहट के पहुँचते हैं। बढ़ते रोगों और बदलती जीवनशैली के समय में इस प्रकार की संस्था का होना पूरा क्षेत्र के लिए बड़ी राहत और उपलब्धि है। आने वाले समय में भी यह संस्था चिकित्सा सेवा के नए आयाम स्थापित करती रहेगी, यही उम्मीद लोगों की जुबान पर साफ झलकती है।
स्वच्छ, सुंदर और विकसित काशीपुर के संकल्प संग गणतंत्र दिवस

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!