- जीबी पंत इंटर कालेज में प्रधानाचार्य कार्यभार को लेकर टकराव गहराया
- सीईओ आदेश के बाद भी प्रधानाचार्य को रोका कालेज प्रबंधन पर सवाल तेज
- जीबी पंत इंटर कॉलेज में प्रधानाचार्य पदभार को लेकर बड़ा प्रशासनिक विवाद
काशीपुर। शैक्षिक गलियों में इन दिनों एक ऐसा विवाद सुर्खियां बटोर रहा है जिसने न केवल शिक्षा विभाग बल्कि स्थानीय समाज को भी चौंका दिया है। पंडित जीबी पंत इंटर कालेज में प्रधानाचार्य पद को लेकर उठा यह टकराव प्रशासनिक आदेशों, प्रबंधन की भूमिका और संस्थागत गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। मुख्य शिक्षा अधिकारी के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कार्यभार ग्रहण न कराए जाने के आरोपों ने पूरे मामले को संवेदनशील बना दिया है। प्रधानाचार्य अजय शंकर कौशिक ने खुलकर कालेज प्रबंधन पर आदेशों की अवहेलना करने का आरोप लगाया है, जबकि प्रबंधन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अपना पक्ष रखा है। घटनाक्रम ने इस प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान के भीतर चल रहे अंतर्विरोधों को सार्वजनिक कर दिया है, जिससे शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और प्रशासनिक अनुशासन पर बहस तेज हो गई है।
मामले की शुरुआत उस समय हुई जब पंडित जीबी पंत इंटर कालेज के प्रधानाचार्य अजय शंकर कौशिक ने मुख्य शिक्षा अधिकारी कुंवर सिंह रावत को एक विस्तृत पत्र भेजकर अपनी व्यथा साझा की। अपने पत्र में उन्होंने उल्लेख किया कि सीईओ के आदेश के अनुपालन में वह 19 फरवरी गुरुवार को विद्यालय परिसर में कार्यभार ग्रहण करने पहुंचे थे। उनका कहना है कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत विद्यालय पहुंचने के बाद उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक दिया गया। आरोप है कि उस समय विद्यालय में मौजूद राजनीति विज्ञान के प्रवक्ता अमित कुमार नारंग ने उन्हें यह कहकर अंदर नहीं आने दिया कि प्रबंधक की ओर से कार्यभार ग्रहण न कराने का निर्देश है। इस घटना को उन्होंने न केवल व्यक्तिगत अपमान बताया, बल्कि इसे शिक्षा विभाग के आदेशों की खुली अनदेखी भी करार दिया।
प्रधानाचार्य अजय शंकर कौशिक का आरोप है कि उन्होंने नियमानुसार दस्तावेजों और आवश्यक औपचारिकताओं के साथ विद्यालय पहुंचकर कार्यभार संभालने की इच्छा जताई थी, किंतु उन्हें प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करने का अवसर ही नहीं दिया गया। उनका कहना है कि विद्यालय परिसर में प्रवेश से रोकना केवल एक प्रशासनिक असहमति नहीं, बल्कि शासन के आदेशों की अवमानना है। उन्होंने अपने पत्र में इस बात पर जोर दिया कि यदि मुख्य शिक्षा अधिकारी के निर्देशों को भी गंभीरता से नहीं लिया जाएगा तो विभागीय अनुशासन का क्या अर्थ रह जाएगा। इस शिकायत के बाद मुख्य शिक्षा अधिकारी कुंवर सिंह रावत ने मामले का संज्ञान लेते हुए कालेज प्रबंधन से स्पष्टीकरण तलब किया और आदेश की अवहेलना पर जवाब मांगा।

दूसरी ओर, कालेज प्रबंधन ने प्रधानाचार्य के आरोपों को आधारहीन बताया है। प्रबंधन का कहना है कि उन्हें मुख्य शिक्षा अधिकारी का पत्र प्राप्त हुआ था, जिसके अनुपालन में उन्होंने प्रधानाचार्य अजय शंकर कौशिक को 25 फरवरी बुधवार को दोपहर दो बजे सभी आवश्यक अभिलेखों के साथ उपस्थित होकर कार्यभार ग्रहण करने हेतु पत्र भेजा है। प्रबंधन का तर्क है कि प्रक्रिया को विधिवत और पारदर्शी तरीके से संपन्न करने के लिए दस्तावेजों की जांच और औपचारिकताओं का पालन आवश्यक है। उनका कहना है कि किसी भी प्रशासनिक कार्यवाही को नियमानुसार पूर्ण करना संस्थान की जिम्मेदारी है और बिना आवश्यक कागजात के कार्यभार हस्तांतरण संभव नहीं था। प्रबंधन ने यह भी संकेत दिया कि 19 फरवरी की घटना को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
घटनाक्रम ने शिक्षा विभाग के भीतर समन्वय और संवाद की कमी को भी उजागर किया है। एक ओर प्रधानाचार्य अजय शंकर कौशिक यह दावा कर रहे हैं कि वह आदेशानुसार कार्यभार ग्रहण करने पहुंचे थे, वहीं दूसरी ओर प्रबंधन का कहना है कि निर्धारित तिथि और समय पर दस्तावेजों के साथ आने की सूचना पहले ही दी जा चुकी थी। इस विरोधाभास ने पूरे मामले को जटिल बना दिया है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि यदि संवाद की प्रक्रिया पारदर्शी और स्पष्ट होती तो यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती। विद्यालय जैसे संवेदनशील संस्थान में प्रशासनिक विवाद का सार्वजनिक होना विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए भी चिंता का विषय बन गया है।
मुख्य शिक्षा अधिकारी कुंवर सिंह रावत की भूमिका इस पूरे विवाद में केंद्रीय मानी जा रही है। उन्होंने आदेश की अवहेलना की शिकायत मिलने के बाद तत्काल प्रबंधन से जवाब मांगा, जिससे यह संकेत मिला कि विभाग मामले को गंभीरता से देख रहा है। शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार, यदि आदेशों की अनदेखी प्रमाणित होती है तो आगे की कार्रवाई भी संभव है। वहीं प्रबंधन का कहना है कि उन्होंने सीईओ के निर्देशों का पालन करते हुए प्रधानाचार्य को निर्धारित तिथि पर बुलाया है और किसी प्रकार की अवहेलना का प्रश्न ही नहीं उठता। इस खींचतान ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर किस स्तर पर संवाद में चूक हुई।

विद्यालय परिसर में हुई कथित घटना को लेकर राजनीति विज्ञान के प्रवक्ता कुमार अमित नारंग का नाम भी चर्चा में है। प्रधानाचार्य के आरोप के अनुसार, उन्होंने ही प्रवेश से रोका और प्रबंधक के निर्देश का हवाला दिया। हालांकि प्रबंधन की ओर से इस संबंध में विस्तृत बयान सार्वजनिक नहीं किया गया है। शिक्षा जगत में यह माना जा रहा है कि यदि किसी कर्मचारी या शिक्षक ने प्रबंधक के निर्देश पर कार्य किया, तो इसकी जिम्मेदारी संस्थागत स्तर पर तय होनी चाहिए। ऐसे मामलों में व्यक्तिगत और संस्थागत जवाबदेही का संतुलन बनाए रखना आवश्यक होता है, ताकि विवाद और न बढ़े।
घटनाओं की श्रृंखला ने काशीपुर के इस प्रतिष्ठित संस्थान की साख पर भी असर डाला है। पंडित जीबी पंत इंटर कालेज लंबे समय से शैक्षिक गुणवत्ता और अनुशासन के लिए जाना जाता रहा है। ऐसे में प्रधानाचार्य और प्रबंधन के बीच सार्वजनिक विवाद ने कई प्रश्नों को जन्म दिया है। अभिभावकों के बीच भी यह चर्चा है कि प्रशासनिक असहमति का सीधा असर विद्यार्थियों के शैक्षणिक वातावरण पर नहीं पड़ना चाहिए। विद्यालय के भीतर चल रही इस तनातनी से शैक्षणिक गतिविधियों की निरंतरता प्रभावित न हो, यह सुनिश्चित करना सभी पक्षों की जिम्मेदारी है।
मामले ने जिस तेजी से तूल पकड़ा है, उससे यह स्पष्ट हो गया है कि यह केवल एक दिन की घटना नहीं, बल्कि संवादहीनता और अविश्वास की परिणति है। प्रधानाचार्य अजय शंकर कौशिक का कहना है कि यदि उन्हें 19 फरवरी को कार्यभार ग्रहण करने से रोका गया, तो यह सीधे-सीधे आदेशों की अनदेखी है। उनका मानना है कि किसी भी सरकारी या अनुदानित संस्थान में विभागीय निर्देश सर्वाेपरि होते हैं और उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी प्रबंधन की होती है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि इस प्रकार की घटनाएं दोहराई जाती हैं तो संस्थागत अनुशासन कमजोर पड़ सकता है। उनके अनुसार, यह केवल व्यक्तिगत अधिकार का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रशासनिक मर्यादा का विषय है।

प्रबंधन की ओर से जारी स्पष्टीकरण में कहा गया है कि उन्होंने सीईओ के पत्र के अनुपालन में प्रधानाचार्य को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया है। 25 फरवरी बुधवार को दोपहर दो बजे सभी अभिलेखों के साथ उपस्थित होने का अनुरोध इसीलिए किया गया, ताकि कार्यभार हस्तांतरण की प्रक्रिया नियमों के अनुरूप संपन्न हो सके। प्रबंधन का तर्क है कि किसी भी पदभार ग्रहण की प्रक्रिया में अभिलेखों का सत्यापन और औपचारिक स्वीकृति आवश्यक होती है। उन्होंने यह भी कहा कि मामले को अनावश्यक रूप से तूल दिया जा रहा है, जबकि वे स्वयं प्रक्रिया को विधिवत पूरा करने के पक्षधर हैं।
शिक्षा विभाग के जानकारों का मानना है कि ऐसे विवादों का समाधान संवाद और पारदर्शिता से ही संभव है। यदि प्रधानाचार्य और प्रबंधन के बीच समन्वय स्थापित हो जाता, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। मुख्य शिक्षा अधिकारी कुंवर सिंह रावत द्वारा स्पष्टीकरण मांगना इस दिशा में पहला कदम माना जा रहा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि 25 फरवरी को क्या स्थिति बनती है और क्या प्रधानाचार्य अजय शंकर कौशिक निर्धारित समय पर कार्यभार ग्रहण कर पाते हैं या नहीं। यदि प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से पूर्ण होती है तो विवाद स्वतः समाप्त हो सकता है, अन्यथा यह मामला उच्च स्तर तक भी जा सकता है।
विद्यालयी वातावरण में प्रशासनिक स्थिरता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। प्रधानाचार्य संस्थान का शैक्षणिक और प्रशासनिक मुखिया होता है, इसलिए उसके पदभार को लेकर अनिश्चितता छात्रों और शिक्षकों दोनों को प्रभावित कर सकती है। अभिभावकों का कहना है कि वे चाहते हैं कि विवाद शीघ्र सुलझे और शिक्षा व्यवस्था सामान्य रूप से संचालित होती रहे। स्थानीय नागरिक भी इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि पंडित जीबी पंत इंटर कालेज क्षेत्र का एक प्रमुख शिक्षण संस्थान है।

आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष कितनी गंभीरता से समाधान की दिशा में कदम बढ़ाते हैं। प्रधानाचार्य अजय शंकर कौशिक की शिकायत, अमित कुमार नारंग का कथित हस्तक्षेप, मुख्य शिक्षा अधिकारी कुंवर सिंह रावत की कार्रवाई और प्रबंधन का स्पष्टीकरणकृइन सभी पहलुओं ने मिलकर इस प्रकरण को बहुस्तरीय बना दिया है। यदि निर्धारित तिथि पर कार्यभार ग्रहण की प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हो जाती है, तो यह संकेत होगा कि प्रशासनिक मतभेदों को संस्थागत ढांचे के भीतर सुलझाया जा सकता है। अन्यथा, यह मामला शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों और संभवतः न्यायिक मंच तक भी पहुंच सकता है।

काशीपुर के शैक्षिक परिदृश्य में उभरा यह विवाद इस बात की याद दिलाता है कि संस्थागत समन्वय और स्पष्ट संवाद कितना आवश्यक है। आदेश, प्रक्रिया और पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाए रखना हर शिक्षण संस्थान की जिम्मेदारी है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या यह टकराव अस्थायी था या फिर किसी बड़े प्रशासनिक बदलाव की भूमिका तैयार कर रहा है। फिलहाल सभी की निगाहें 25 फरवरी की दोपहर पर टिकी हैं, जब यह तय होगा कि प्रधानाचार्य अजय शंकर कौशिक औपचारिक रूप से अपना कार्यभार ग्रहण कर पाते हैं या नहीं, और क्या इस विवाद का पटाक्षेप हो पाता है।





