काशीपुर। उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जनपद के काशीपुर नगर में आज बसंत बिहार क्षेत्र स्थित श्री सिद्धेश्वर मंदिर का परिसर रंग, उल्लास और पारंपरिक सांस्कृतिक छटाओं से सराबोर नजर आया, जब बड़ी संख्या में महिलाओं ने सामूहिक रूप से होली पर्व को पारंपरिक अंदाज में मनाया। मंदिर प्रांगण में एकत्रित महिलाओं ने ढोलक, मंजीरा और तालियों की गूंज के बीच होली के पारंपरिक गीतों और भजनों पर नृत्य कर वातावरण को भक्तिमय और उत्सवी बना दिया। इस अवसर पर महिलाओं के चेहरों पर उत्साह, आत्मीयता और सांस्कृतिक गौरव की झलक साफ दिखाई दी। मंदिर परिसर में रंगों की हल्की बौछार, गुलाल की खुशबू और लोकगीतों की मधुर धुनों ने ऐसा माहौल रचा, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति को भारतीय परंपरा और लोकसंस्कृति की गहराई से जोड़ दिया। आयोजन पूरी तरह पारिवारिक, मर्यादित और सांस्कृतिक मूल्यों से ओतप्रोत रहा, जिसमें हर आयु वर्ग की महिलाओं ने सहभागिता कर होली के वास्तविक अर्थकृप्रेम, सौहार्द और सामाजिक एकताकृको जीवंत किया।
बसंत बिहार स्थित इस धार्मिक स्थल पर आयोजित होली मिलन कार्यक्रम में महिलाओं ने विशेष रूप से पारंपरिक परिधान पहनकर अपनी सांस्कृतिक पहचान को और भी सशक्त रूप में प्रस्तुत किया। रंग-बिरंगी साड़ियों, सलवार-सूट और आभूषणों से सजी महिलाओं ने जब भजनों और होली गीतों पर सामूहिक नृत्य किया, तो मंदिर प्रांगण में एक अनोखी छटा देखने को मिली। गीतों के बोलों में राधा-कृष्ण की लीलाओं, भक्तिभाव और सामाजिक समरसता का संदेश स्पष्ट रूप से झलक रहा था। ढोलक की थाप पर ताल मिलाती महिलाओं ने लोक परंपराओं को जीवंत करते हुए यह दिखाया कि आधुनिकता के इस दौर में भी हमारी सांस्कृतिक विरासत कितनी जीवंत और प्रासंगिक है। कार्यक्रम के दौरान किसी प्रकार की अशालीनता या अव्यवस्था देखने को नहीं मिली, बल्कि पूरा आयोजन अनुशासन, मर्यादा और धार्मिक आस्था के साथ संपन्न हुआ, जिससे यह आयोजन समाज के लिए एक सकारात्मक उदाहरण बनकर उभरा।

श्री सिद्धेश्वर मंदिर परिसर में हुए इस आयोजन ने यह भी स्पष्ट किया कि त्योहार केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जुड़ाव और सामूहिक चेतना को मजबूत करने का सशक्त जरिया भी हैं। महिलाओं ने होली गीतों के माध्यम से आपसी भाईचारे, प्रेम और सद्भाव का संदेश दिया। गीतों में जहां एक ओर रंगों की मस्ती थी, वहीं दूसरी ओर भक्ति और श्रद्धा की गहराई भी दिखाई दी। कई गीतों में सामाजिक कुरीतियों से दूर रहने और आपसी सम्मान बनाए रखने की सीख भी निहित थी। इस दौरान महिलाओं ने एक-दूसरे को गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं दीं और मंदिर में मौजूद देवी-देवताओं के समक्ष सुख-समृद्धि और शांति की कामना की। पूरे कार्यक्रम के दौरान वातावरण इतना सकारात्मक और ऊर्जावान रहा कि वहां मौजूद हर व्यक्ति इस सांस्कृतिक उत्सव का हिस्सा बनता चला गया।
काशीपुर शहर में इस तरह के पारंपरिक आयोजनों का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि ये नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं। कार्यक्रम में मौजूद कई महिलाओं ने बताया कि इस प्रकार के आयोजन उन्हें अपने बचपन की याद दिलाते हैं, जब होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि गीत-संगीत, भक्ति और सामाजिक मेलजोल का उत्सव हुआ करती थी। मंदिर परिसर में गूंजते होली गीतों ने मानो समय को कुछ पलों के लिए थाम दिया और हर किसी को पुराने लोकजीवन की ओर लौटा दिया। महिलाओं ने नृत्य के साथ-साथ एक-दूसरे के साथ अपने अनुभव साझा किए और सामूहिक रूप से त्योहार मनाने की खुशी को महसूस किया। इस आयोजन ने यह भी साबित किया कि महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को नई ऊर्जा और गरिमा मिलती है।
उत्सव के दौरान सुरक्षा और व्यवस्था का भी विशेष ध्यान रखा गया, जिससे कार्यक्रम शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हो सका। मंदिर प्रबंधन और स्थानीय महिलाओं के आपसी सहयोग से पूरा आयोजन बिना किसी अव्यवस्था के आगे बढ़ता रहा। कार्यक्रम में आए श्रद्धालुओं ने भी अनुशासन बनाए रखा और परंपराओं का सम्मान किया। होली गीतों और भजनों के बीच मंदिर की घंटियों की मधुर ध्वनि वातावरण को और अधिक आध्यात्मिक बना रही थी। गुलाल की हल्की-हल्की फुहार और फूलों की पंखुड़ियों ने उत्सव को और भी सौम्य रूप दिया। कई महिलाओं ने इस अवसर पर यह भी कहा कि इस तरह के पारंपरिक आयोजन समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और मानसिक शांति प्रदान करते हैं, जो आज के तनावपूर्ण जीवन में अत्यंत आवश्यक है।
आज के इस आयोजन ने यह संदेश भी दिया कि त्योहारों को शालीनता और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जाए तो वे समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं। श्री सिद्धेश्वर मंदिर में महिलाओं द्वारा मनाई गई होली ने यह साबित किया कि भक्ति और उत्सव एक-दूसरे के पूरक हैं। नृत्य, गीत और भजन के माध्यम से महिलाओं ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया और सामूहिक आनंद का अनुभव किया। कार्यक्रम के अंत में सभी ने एक-दूसरे को होली की शुभकामनाएं दीं और भविष्य में भी ऐसे आयोजनों को निरंतर आयोजित करने की इच्छा जताई। इस आयोजन ने काशीपुर के सांस्कृतिक जीवन में एक और सुंदर अध्याय जोड़ते हुए यह दिखाया कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाकर त्योहारों को किस तरह सार्थक बनाया जा सकता है।

अंततः बसंत बिहार स्थित श्री सिद्धेश्वर मंदिर में महिलाओं द्वारा पारंपरिक विधि से मनाई गई यह होली केवल रंग, गुलाल और गीतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इस आयोजन ने काशीपुर की सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक सौहार्द और भारतीय लोकपरंपराओं की गहरी जड़ों को भी प्रभावी रूप से सामने रखा। भक्ति भाव, उल्लास और मर्यादा के साथ संपन्न हुए इस कार्यक्रम ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि जब त्योहार संस्कारों और परंपराओं के अनुरूप मनाए जाते हैं, तो वे समाज को जोड़ने, आपसी प्रेम बढ़ाने और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने का कार्य करते हैं। महिलाओं की सक्रिय और अनुशासित भागीदारी ने इस आयोजन को विशेष पहचान दी, जहां सामूहिक गीत-संगीत और नृत्य के माध्यम से उत्सव को गरिमामय स्वरूप प्रदान किया गया। इस होली मिलन ने यह सिद्ध किया कि लोकसंस्कृति आज भी जीवंत है और समाज को एक सूत्र में बांधने की क्षमता रखती है। आने वाले समय में यह आयोजन लोगों के लिए प्रेरणा बनेगा और यह याद दिलाएगा कि हमारी सांस्कृतिक विरासत आज भी उतनी ही प्रासंगिक, मजबूत और सामाजिक एकता की संवाहक है।





