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संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले गूंजी शांति की पुकार और ईरान पर थोपे गए युद्ध की हुई घोर निंदा

भगत सिंह के बलिदान दिवस पर उमड़ा जनसैलाब और वैश्विक साम्राज्यवाद की क्रूरता के खिलाफ गूंजी इंकलाबी आवाज ने आज रामनगर की धरती से युद्ध के विरुद्ध शांति और मानवीय न्याय का एक नया अध्याय लिख दिया है।

रामनगर। देवभूमि उत्तराखंड के रामनगर की फिजाओं में आज देशभक्ति, अंतरराष्ट्रीय एकजुटता और साम्राज्यवाद के खिलाफ आक्रोश का एक ऐसा ज्वार उठा, जिसने न केवल अमर शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत को नमन किया, बल्कि वर्तमान वैश्विक अशांति के बीच शांति का एक शक्तिशाली संदेश भी प्रसारित किया। अमर शहीदों के शहादत दिवस की पूर्व संध्या पर ‘संयुक्त संघर्ष समिति’ के बैनर तले स्थानीय शहीद पार्क में आयोजित ‘युद्ध विरोधी आम सभा’ ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के उन काले और खूनी पन्नों को बेनकाब किया, जो सत्ता की हवस में मासूमों की बलि ले रहे हैं। उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के प्रधान महासचिव प्रभात ध्यानी की अध्यक्षता और जुझारू सामाजिक कार्यकर्ता कैसर राणा के अत्यंत कुशल और ओजस्वी संचालन में आयोजित इस सभा ने अमेरिका और इसराइल के उस विनाशकारी सैन्य गठजोड़ की कड़े शब्दों में भर्त्सना की, जिसने आज ईरान जैसे संप्रभु राष्ट्र को युद्ध की भीषण आग में झोंक दिया है। सभा में उमड़े जनसमूह ने एक स्वर में उस साम्राज्यवादी सोच को ललकारा, जो केवल तेल और गैस के अकूत संसाधनों पर कब्जे के लिए दुनिया भर में नरसंहार करने से भी गुरेज नहीं करती। शहीद पार्क का कोना-कोना आज “इंकलाब जिंदाबाद” और “साम्राज्यवाद का नाश हो” के गगनभेदी नारों से गुंजायमान रहा, जो इस बात का जीवंत प्रमाण था कि भगत सिंह के विचार आज भी उत्तराखंड की क्रांतिकारी मिट्टी में पूरी तरह जीवित और सक्रिय हैं।

सभा के दौरान प्रखर वक्ताओं ने शहीद-ए-आजम भगत सिंह के उन कालजयी और ऐतिहासिक शब्दों को याद किया, जिसमें उन्होंने साम्राज्यवाद को ‘डाकेजनी की एक संगठित और क्रूर व्यवस्था’ करार दिया था। आज शहादत के इतने दशकों बाद भी भगत सिंह के शब्द वैश्विक भू-राजनीति पर शब्दशः चरितार्थ हो रहे हैं। वक्ताओं ने विस्तार से बताया कि इस साल की शुरुआत से ही किस प्रकार अमेरिका ने अपने आर्थिक स्वार्थों और प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए एक भयावह खेल खेला है। पहले वेनेजुएला पर हमला कर वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो एवं उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया गया, और अब वही बर्बरता ईरान के खिलाफ दोहराई जा रही है। यह महज एक युद्ध नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नरसंहार है, जहाँ अमेरिका-इसराइल गठबंधन द्वारा ईरान के घने रिहाईशी इलाकों, स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों पर रात-दिन अंधाधुंध बमबारी की जा रही है। वक्ताओं ने आंकड़ों के साथ बताया कि इस अमानवीय कृत्य में अब तक लगभग दो हजार से अधिक निर्दोष नागरिकों की जान जा चुकी है, जिनमें मासूम स्कूली बच्चियों की संख्या रूह कंपा देने वाली है। इसी बीच ‘पछास’ संगठन से जुड़े भुवन और राज ने जब “मेरा रंग दे बसंती चोला” जैसे अमर जनगीत को अपनी बुलंद और क्रांतिकारी आवाज में गाया, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं और क्रांतिकारियों के प्रति श्रद्धा का भाव और भी गहरा गया।

सभा में मोदी सरकार की वर्तमान विदेश नीति पर भी तीखा और कड़ा प्रहार किया गया। वक्ताओं ने केंद्र सरकार की ‘अत्यधिक अमेरिका परस्ती’ को भारत जैसे गौरवशाली राष्ट्र के लिए शर्मनाक और आत्मघाती बताया। सभा में यह गंभीर सवाल उठाया गया कि जब आज पूरी दुनिया की जागरूक जनता ईरान के बेगुनाह लोगों के साथ खड़ी है और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने बेंजामिन नेतन्याहू को गाजा नरसंहार का मुख्य अपराधी घोषित कर उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है, तब भारत के प्रधानमंत्री मोदी उस ‘घोषित युद्ध अपराधी’ से गले मिल रहे थे। वक्ताओं का स्पष्ट मत था कि ईरान पर हमले से ठीक पहले मोदी और नेतन्याहू की वह गर्मजोशी भरी मुलाकात भारत की गुटनिरपेक्ष छवि और नैतिक गरिमा के खिलाफ है। भारत सरकार की इस संदिग्ध चुप्पी और अमेरिका-इसराइल के प्रति स्पष्ट झुकाव की कड़ी आलोचना करते हुए वक्ताओं ने कहा कि एक ओर हम अपने देश में भगत सिंह की शहादत का ढिंढोरा पीटते हैं, और दूसरी ओर वैश्विक मंच पर उन्हीं साम्राज्यवादी ताकतों के साथ खड़े नजर आते हैं जिनके खिलाफ भगत सिंह ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। सरकार को दो टूक शब्दों में चेताया गया कि उसे अपनी तटस्थता बहाल करनी चाहिए और युद्ध अपराधियों को परोक्ष समर्थन देने के बजाय वैश्विक शांति और न्याय का पक्ष लेना चाहिए।

पिछले तीन हफ्तों से ईरान, खाड़ी देशों और इसराइल के बीच चल रहे इस भीषण युद्ध के सामाजिक, आर्थिक और मानवीय दुष्परिणामों पर चर्चा करते हुए वक्ताओं ने आगाह किया कि यह संघर्ष अब एक अत्यंत विनाशकारी और आत्मघाती चरण में प्रवेश कर चुका है। होरमुज के सामरिक जलडमरूमध्य तक पहुंची इस जंग की लपटों ने तेल और गैस की महत्वपूर्ण रिफाइनरियों और परमाणु केंद्रों तक को अपनी चपेट में ले लिया है, जिससे पूरी दुनिया में ऊर्जा का गंभीर संकट पैदा हो गया है। इस युद्ध की तपिश से भारत भी अछूता नहीं है, जहाँ मध्यम और निम्न वर्ग की रसोई पर इसका सीधा और गहरा असर पड़ा है। भारत में गैस की भारी किल्लत के कारण आम जनता को भीषण गर्मी में लंबी लाइनों में लगने को मजबूर होना पड़ रहा है। ईंधन और ऊर्जा की कीमतों में हुए इस अप्रत्याशित उछाल के कारण स्थानीय होटल, रेस्टोरेंट, छोटे ढाबे और अन्य सूक्ष्म उद्योग दम तोड़ रहे हैं, जिससे हजारों मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है और वे सामूहिक पलायन की ओर अग्रसर हैं। सभा ने इस पूरी वैश्विक तबाही के लिए केवल और केवल अमेरिकी साम्राज्यवाद की वर्चस्वकारी और विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को उत्तरदायी ठहराते हुए मांग की कि इस नरसंहार को वैश्विक दबाव के जरिए तुरंत रोका जाए और दुनिया में “युद्ध नहीं शांति” का नारा बुलंद किया जाए।

इंकलाबी चेतना से ओत-प्रोत इस सभा को संबोधित करने वालों में उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के महासचिव प्रभात ध्यानी, इंकलाबी मज़दूर केंद्र के महासचिव रोहित रुहेला, ‘साइंस फॉर सोसाइटी’ के गिरीश चंद्र, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की तुलसी छिंवाल, और समाजवादी लोक मंच के मुनीष कुमार जैसे दिग्गज वक्ता शामिल रहे। इन सभी प्रखर वक्ताओं ने अपने भाषणों से जनता के भीतर साम्राज्यवाद विरोधी चेतना का संचार किया। इनके साथ ही ‘आइसा’ के सुमित कुमार, ‘पछास’ के राज, लालमणि, संजय रिखाडी, और जगमोहन रावत ने भी क्रांतिकारी गीतों और नारों के माध्यम से माहौल को देशभक्ति के रंग में सराबोर कर दिया। इस ऐतिहासिक अवसर पर जनमुद्दों के प्रति सदैव सजग रहने वाले मनमोहन अग्रवाल, वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी सुमित्रा बिष्ट, फैजल खान, पूर्व सभासद टी के खान, लालता प्रसाद श्रीवास्तव, आनंद सिंह नेगी, भुवन, चिंता राम, आसिफ, किरण आर्य, मेघा, योगेश सती, गोविंद सिंह बिष्ट, प्रभु पाल सिंह, वी एस डंगवाल, उवैद, कमल वर्मा, एडवोकेट पूरन पांडे, और निखिलेश उपाध्याय सहित रामनगर और आसपास के क्षेत्रों से आए बड़ी संख्या में जागरूक नागरिक, महिलाएं और युवा उपस्थित थे। कैसर राणा ने सभा के समापन पर उपस्थित जनसमूह को शपथ दिलाई कि वे शहीदों के सपनों के भारत के निर्माण और विश्व शांति के लिए निरंतर संघर्षरत रहेंगे।

इस सभा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि इसने स्थानीय समस्याओं को वैश्विक संकटों से जोड़कर जनता को यह समझाया कि कैसे एक सुदूर देश में होने वाला युद्ध हमारे चूल्हे-चौके को प्रभावित करता है। वक्ताओं ने यह भी साफ किया कि साम्राज्यवाद केवल सीमाओं का विस्तार नहीं है, बल्कि यह आर्थिक गुलामी का एक आधुनिक रूप है, जिससे निपटने के लिए भगत सिंह के ‘इंकलाबी’ रास्ते पर चलना ही एकमात्र विकल्प है। सभा के अंत में उपस्थित लोगों ने मशालें जलाकर शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और संकल्प लिया कि वे सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद के खिलाफ अपनी आवाज को कभी मध्यम नहीं होने देंगे। रामनगर की इस युद्ध विरोधी सभा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तराखंड के जागरूक लोग केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले अन्यायों के खिलाफ भी उतने ही मुखर और सक्रिय हैं। शहीद पार्क में गूंजी यह आवाज निश्चित रूप से सत्ता के गलियारों तक पहुंचेगी और नीति-निर्धारकों को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने के लिए विवश करेगी। शांति की इस पुकार ने यह साबित कर दिया कि युद्ध कभी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता, और मानवता की रक्षा के लिए साम्राज्यवाद का अंत अनिवार्य है।

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