उत्तराखंड संस्कृत संस्थानम द्वारा आयोजित षोडश संस्कार प्रयोगात्मक प्रशिक्षण कार्यशाला का आज अत्यंत गरिमामय एवं पारंपरिक वातावरण में विधिवत समापन हुआ। कार्यक्रम का आयोजन भारतीय संस्कृति, परंपरा और वैदिक जीवन पद्धति के संरक्षण तथा प्रसार के उद्देश्य से किया गया था। समापन समारोह में संस्कृत शिक्षा विभाग के सचिव दीपक कुमार गैरोला मुख्य रूप से उपस्थित रहे। वहीं टपकेश्वर महादेव मंदिर के महंत श्री 108 कृष्णागिरी जी महाराज ने आध्यात्मिक उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। कार्यक्रम की अध्यक्षता उत्तराखंड राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कंडवाल ने की तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में न्यायमूर्ति यू.सी. ध्यानी उपस्थित रहे। इस अवसर पर विद्वानों, आचार्यों, प्रशिक्षकों तथा बड़ी संख्या में प्रशिक्षुओं की उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की। समापन समारोह में भारतीय संस्कृति के मूल स्वरूप, वैदिक परंपरा और जीवन को संस्कारित बनाने वाले षोडश संस्कारों की महत्ता पर विस्तार से विचार व्यक्त किए गए।
समारोह को संबोधित करते हुए अतिथियों ने कहा कि भारतीय संस्कृति की आत्मा उसके संस्कारों में निहित है। षोडश संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि मानव जीवन को पवित्र, अनुशासित और संतुलित बनाने की एक वैज्ञानिक व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के जन्म से लेकर जीवन के विभिन्न चरणों तक इन संस्कारों के माध्यम से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। संस्कार व्यक्ति को नैतिकता, कर्तव्यनिष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व की शिक्षा देते हैं। वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि आधुनिक समय में जब जीवन शैली तेजी से बदल रही है, तब इन संस्कारों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को इन परंपराओं से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि समाज संस्कारों की परंपरा को समझे और उसे अपनाए, तो सामाजिक जीवन अधिक संतुलित, नैतिक और समृद्ध बन सकता है।
संस्कृत शिक्षा विभाग के सचिव दीपक कुमार गैरोला ने अपने संबोधन में कहा कि इस प्रकार की प्रयोगात्मक प्रशिक्षण कार्यशालाएँ संस्कृत और भारतीय परंपरा के संरक्षण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने कहा कि केवल पुस्तकीय ज्ञान पर्याप्त नहीं होता, बल्कि संस्कारों को व्यवहारिक रूप से समझना भी उतना ही आवश्यक है। इस कार्यशाला में प्रतिभागियों को विधि-विधान, मंत्रोच्चारण और संस्कारों की प्रक्रिया का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया, जिससे वे समाज में इन परंपराओं को सही रूप में स्थापित कर सकेंगे। उन्होंने प्रशिक्षुओं से आह्वान किया कि वे इस प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान और अनुभव को समाज तक पहुँचाने का कार्य करें। उन्होंने कहा कि जब समाज में संस्कारों की परंपरा मजबूत होगी, तभी भारतीय संस्कृति का वास्तविक स्वरूप सुरक्षित रह सकेगा और आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों से जुड़ी रहेंगी।

अपने संबोधन में गैरोला ने यह भी बताया कि उत्तराखंड संस्कृत शिक्षा विभाग द्वारा संस्कृत शिक्षा के विकास और प्रसार के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विभाग के अंतर्गत संस्कृत संस्थानम, संस्कृत विश्वविद्यालय और संस्कृत शिक्षा निदेशालय मिलकर अनेक योजनाएँ संचालित कर रहे हैं। उन्होंने बालिकाओं के लिए संचालित गार्गी छात्रवृत्ति योजना, अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थियों के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर छात्रवृत्ति योजना, संस्कृत विद्यालयों में गणित और विज्ञान विषय की शुरुआत जैसी योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इन प्रयासों का उद्देश्य संस्कृत शिक्षा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना है ताकि संस्कृत के विद्यार्थी भी भविष्य में जेईई और नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग ले सकें। उन्होंने कहा कि संस्कृत शिक्षा को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ जोड़ना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने आगे कहा कि राज्य सरकार द्वारा प्रत्येक जिले में एक संस्कृत ग्राम विकसित करने की योजना पर भी कार्य किया जा रहा है, जिससे संस्कृत भाषा का व्यवहारिक प्रयोग बढ़े। इसके अतिरिक्त संस्कृत विषय से सिविल सेवा की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए निःशुल्क आईएएस कोचिंग की व्यवस्था भी की जा रही है। श्री गैरोला ने बताया कि संस्कृत भाषा को आधुनिक तकनीक से जोड़ते हुए संस्कृत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी कार्य किया जा रहा है। साथ ही संस्कृत संभाषण शिविरों का आयोजन कर आम जनमानस को संस्कृत बोलने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। उन्होंने भविष्य की योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि मंत्र चिकित्सा, प्रज्ञा चक्षु विद्या और वैदिक मानस योग जैसी अनेक योजनाओं पर भी विभाग द्वारा गंभीरता से कार्य किया जा रहा है, जिससे संस्कृत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को आधुनिक समाज तक पहुँचाया जा सके।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उत्तराखंड राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कंडवाल ने कहा कि षोडश संस्कार भारतीय जीवन दर्शन का महत्वपूर्ण आधार हैं। उन्होंने कहा कि ये संस्कार व्यक्ति को केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक रूप से भी परिपक्व बनाते हैं। उन्होंने कहा कि संस्कारों के माध्यम से व्यक्ति के भीतर अनुशासन, जिम्मेदारी और सामाजिक कर्तव्य की भावना विकसित होती है। कुसुम कंडवाल ने इस प्रकार की प्रशिक्षण कार्यशालाओं को समाज के लिए अत्यंत उपयोगी बताते हुए कहा कि इससे नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और परंपराओं की सही जानकारी मिलती है। उन्होंने आयोजकों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और लोगों को अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूक करते हैं।
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को उपनयन, वेदारंभ, चूड़ाकर्म, विद्यारंभ, विवाह और समावर्तन जैसे विभिन्न संस्कारों का विस्तृत एवं प्रयोगात्मक प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षकों ने इन संस्कारों की विधि-विधान, मंत्रोच्चारण और उनके पीछे छिपे वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक महत्व की भी विस्तार से जानकारी दी। समापन समारोह में प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए तथा सभी अतिथियों और प्रशिक्षकों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम के संयोजक सुभाष जोशी, सहसंयोजक एवं नोडल अधिकारी मनोज शर्मा, आचार्य विशाल मणि भट्ट, आचार्य पंकज, आचार्य अंकित बहुगुणा, महाकाल सेवा समिति के अध्यक्ष रोशन राणा, विनय प्रजापति, श्री गुरु राम राय लक्ष्मण संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. शैलेंद्र प्रसाद डंगवाल, डॉ. मनीष भंडारी, डॉ. मुकेश खंडूरी, आसाराम, रितु कौशिक और इंदु सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन भारतीय संस्कृति के संरक्षण और प्रसार के संकल्प के साथ हुआ।





