कर व्यापक चर्चा की। इस मुलाकात में केवल औपचारिक कूटनीतिक संवाद ही नहीं हुआ, बल्कि संस्कृत भाषा को वैश्विक शैक्षणिक विमर्श का हिस्सा बनाने, भारतीय ज्ञान प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों तक पहुंचाने तथा भारत और इंडोनेशिया के बीच प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों को आधुनिक शैक्षणिक साझेदारी में बदलने पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। उत्तराखण्ड सरकार की ओर से इस पहल को संस्कृत के अंतरराष्ट्रीय विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। बैठक के दौरान संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए उत्तराखण्ड में संचालित योजनाओं की जानकारी भी साझा की गई। साथ ही इस बात पर विशेष बल दिया गया कि यदि भारत की प्राचीन ज्ञान परम्परा को वैश्विक मंच पर प्रभावी ढंग से स्थापित करना है तो उसके लिए अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों के साथ सहयोग को मजबूत बनाना समय की आवश्यकता है।
चर्चा के दौरान संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार ने उत्तराखण्ड सरकार द्वारा संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिए जाने के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार संस्कृत को केवल धार्मिक भाषा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, दर्शन, विज्ञान, संस्कृति और सभ्यता की समृद्ध धरोहर के रूप में स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में प्रदेश में संस्कृत के संरक्षण और प्रचार के लिए अनेक अभिनव योजनाएं संचालित की जा रही हैं, जिनका उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री स्वयं संस्कृत को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाने के लिए गंभीरता से कार्य कर रहे हैं और इसी सोच के अनुरूप उत्तराखण्ड संस्कृत शिक्षा के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में अपनी पहचान बना रहा है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता केवल संस्कृत पढ़ाने की नहीं, बल्कि संस्कृत को आधुनिक शिक्षा, शोध, प्रौद्योगिकी और वैश्विक संवाद से जोड़ने की भी है। इसी दृष्टिकोण के साथ राज्य सरकार नई योजनाओं पर कार्य कर रही है ताकि संस्कृत केवल विद्यालयों और विश्वविद्यालयों तक सीमित न रहे, बल्कि विश्वभर के शिक्षाविदों, शोधार्थियों और सांस्कृतिक संस्थानों के बीच अध्ययन और अनुसंधान का महत्वपूर्ण विषय बन सके।
उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में बीते वर्षों के दौरान संस्कृत के प्रचार-प्रसार को लेकर जो प्रयास किए गए हैं, उनके सकारात्मक परिणाम अब राष्ट्रीय सीमाओं से आगे दिखाई देने लगे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के मार्गदर्शन में प्रदेश में संस्कृत शिक्षा को नई दिशा देने के लिए अनेक कार्यक्रम संचालित किए गए हैं और आज विश्व की सबसे प्राचीन तथा प्रभावशाली भाषाओं में शामिल संस्कृत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है। उन्होंने बताया कि उत्तराखण्ड के प्रत्येक जनपद में एक-एक संस्कृत ग्राम की स्थापना की जा चुकी है। इन संस्कृत ग्रामों का उद्देश्य केवल संस्कृत भाषा का शिक्षण नहीं, बल्कि समाज में भारतीय संस्कृति, दर्शन, जीवन मूल्यों और सभ्यतागत परंपराओं के प्रति जागरूकता विकसित करना भी है। उन्होंने कहा कि मात्र एक वर्ष की अवधि में इन संस्कृत ग्रामों ने स्थानीय समुदायों में संस्कृत सीखने के प्रति उल्लेखनीय उत्साह पैदा किया है। इन प्रयासों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग संस्कृत के महत्व को समझ रहे हैं तथा अपनी सांस्कृतिक विरासत से पुनः जुड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में यह पहल संस्कृत के सामाजिक विस्तार का सशक्त माध्यम बनेगी और उत्तराखण्ड इस क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर एक आदर्श मॉडल के रूप में उभरेगा।
संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार ने बैठक के दौरान यह भी बताया कि राज्य सरकार संस्कृत के संस्थागत विकास को और अधिक सुदृढ़ बनाने की दिशा में कार्य कर रही है। इसी उद्देश्य से उत्तराखण्ड में संस्कृत आयोग के गठन की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है। उन्होंने जानकारी दी कि आयोग के गठन को प्रभावी और व्यापक स्वरूप देने के लिए देशभर के विद्वानों, शिक्षाविदों, संस्कृत विशेषज्ञों तथा संबंधित संस्थानों से सुझाव आमंत्रित किए गए हैं। इन सुझावों को विश्व संस्कृत दिवस से पूर्व, 10 अगस्त तक उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय को उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है ताकि सभी महत्वपूर्ण सुझावों का अध्ययन कर आयोग की रूपरेखा तैयार की जा सके। उन्होंने कहा कि आयोग का गठन संस्कृत के संरक्षण, शोध, नवाचार, आधुनिक पाठ्यक्रम निर्माण तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने यह भी विश्वास व्यक्त किया कि यदि इंडोनेशिया के शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों के साथ मजबूत साझेदारी स्थापित होती है तो संस्कृत और भारतीय ज्ञान परम्परा का विस्तार केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एशिया और विश्व के अन्य देशों तक भी इसका प्रभाव पहुंचेगा। साथ ही दोनों देशों के युवाओं को साझा सांस्कृतिक विरासत, नैतिक मूल्यों और प्राचीन सभ्यताओं के ऐतिहासिक संबंधों को समझने का नया अवसर मिलेगा।
बैठक के दौरान भारत और इंडोनेशिया के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। दीपक कुमार ने कहा कि इंडोनेशियाई भाषा में आज भी संस्कृत मूल के अनेक शब्द प्रचलित हैं, जो दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, धार्मिक और सभ्यतागत संबंधों के जीवंत प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल भाषाई समानता नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत की मजबूत पहचान है। उन्होंने स्मरण कराया कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने भी सार्वजनिक रूप से उल्लेख किया था कि इंडोनेशियाई भाषा का लगभग पचास प्रतिशत भाग संस्कृत से प्रभावित है। उनके इस कथन को भारत और इंडोनेशिया के ऐतिहासिक संबंधों का महत्वपूर्ण प्रतीक बताया गया। संस्कृत शिक्षा सचिव ने कहा कि दोनों देशों के बीच हजारों वर्षों से सांस्कृतिक संपर्क, धार्मिक आदान-प्रदान और ज्ञान परम्परा का प्रवाह रहा है। वर्तमान समय में आवश्यकता इस बात की है कि इन ऐतिहासिक संबंधों को आधुनिक शिक्षा, अनुसंधान, भाषा अध्ययन तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से और अधिक मजबूत बनाया जाए, जिससे नई पीढ़ी भी इस साझा विरासत को गहराई से समझ सके।
बैठक के अंत में दीपक कुमार ने इंडोनेशिया गणराज्य के दूतावास के सहयोग से हरिद्वार स्थित उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय तथा उत्तराखण्ड संस्कृत संस्थानम और इंडोनेशिया के विश्वविद्यालयों एवं अन्य शैक्षणिक संस्थानों के बीच संस्कृत, भारतीय ज्ञान प्रणाली, दर्शन, संस्कृति और सभ्यतागत अध्ययन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) संपादित करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि यदि यह पहल साकार होती है तो दोनों देशों के बीच छात्र एवं शिक्षक आदान-प्रदान, संयुक्त शोध परियोजनाएं, अकादमिक संगोष्ठियां, संस्कृत अध्ययन कार्यक्रम तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली पर केंद्रित विशेष पाठ्यक्रम विकसित किए जा सकेंगे। इससे उत्तराखण्ड को संस्कृत शिक्षा के अंतरराष्ट्रीय केंद्र के रूप में नई पहचान मिलने की संभावना भी मजबूत होगी। विश्व संस्कृत दिवस से पूर्व हुई इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक और शैक्षणिक पहल को संस्कृत के वैश्विक प्रसार की दिशा में एक नई शुरुआत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्तावित सहयोग योजनाएं भविष्य में मूर्त रूप लेती हैं तो उत्तराखण्ड न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संस्कृत और भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रमुख केंद्र के रूप में अपनी सशक्त पहचान स्थापित करने में सफल हो सकता है।





