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विराट हिंदू सम्मेलन संघ के शताब्दी वर्ष में समाज एकता और पंच परिवर्तन का संदेश

सैनिक कॉलोनी शिवालिक बस्ती में आयोजित जिले के प्रथम हिंदू सम्मेलन में प्रांत कार्यवाह डॉ दिनेश सेमवाल, संतों और सामाजिक प्रतिनिधियों ने हिंदू समाज को संगठित करने, समरसता बढ़ाने और राष्ट्र चेतना मजबूत करने पर विचार रखे।

काशीपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में देशव्यापी स्तर पर सामाजिक जागरण और संगठन की भावना को और अधिक मजबूत करने के उद्देश्य से अभूतपूर्व अभियान चला रहा है। इसी क्रम में पंद्रह जनवरी दो हज़ार छब्बीस से देश भर में एक लाख से अधिक हिंदू सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं, जिनका मूल उद्देश्य हिंदू समाज को एक सूत्र में बांधना, सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करना और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन का संदेश देना है। संघ द्वारा निर्धारित पंच परिवर्तन—व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, पर्यावरणीय और राष्ट्रीय—इन सम्मेलनों का वैचारिक आधार हैं, जिनके माध्यम से समाज को आत्मचिंतन और आत्मनिर्माण की दिशा में प्रेरित किया जा रहा है। यह अभियान केवल एक कार्यक्रम श्रृंखला नहीं, बल्कि शताब्दी वर्ष में संघ की उस दीर्घकालिक सोच का प्रतिबिंब है, जिसके माध्यम से समाज को संगठित, जागरूक और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

इसी व्यापक अभियान के अंतर्गत काशीपुर में जिले के प्रथम हिंदू सम्मेलन की शुरुआत सैनिक कॉलोनी स्थित शिवालिक बस्ती में की गई, जहां सुबह से ही उत्साह और श्रद्धा का वातावरण देखने को मिला। आयोजन स्थल पर बड़ी संख्या में सनातनी महिलाएं और पुरुष एकत्रित हुए, जिन्होंने सम्मेलन को सफल बनाने में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाई। पारंपरिक सांस्कृतिक माहौल, अनुशासन और संगठन की स्पष्ट झलक इस सम्मेलन में दिखाई दी। स्थानीय नागरिकों के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोगों की उपस्थिति ने यह संदेश दिया कि हिंदू समाज अब अपने मूल्यों और पहचान को लेकर सजग हो रहा है। सम्मेलन में शामिल लोगों ने इसे समाज को जोड़ने वाला और सकारात्मक दिशा देने वाला प्रयास बताया, जिससे आने वाली पीढ़ियों में भी सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रभाव का संचार हो सकेगा।

आयोजन में प्रमुख वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत कार्यवाह डॉ दिनेश सेमवाल की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिनके विचारों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग विशेष रूप से उपस्थित हुए। इसके साथ ही उदासीन आश्रम के संत सुपार सिंह, सुरभि बंसल और सृष्टि बंसल आहूजा की उपस्थिति ने सम्मेलन को आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से और अधिक समृद्ध बनाया। कार्यक्रम की अध्यक्षता उजाला हॉस्पिटल के निदेशक डॉ अभिषेक दुबे ने की, जिन्होंने अपने संबोधन में सामाजिक एकता और नैतिक मूल्यों की आवश्यकता पर बल दिया। आयोजन से जुड़े सभी वक्ताओं और अतिथियों ने एक स्वर में कहा कि ऐसे सम्मेलन समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और लोगों को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग बनाते हैं।

काशीपुर जिले में आयोजित इस हिंदू सम्मेलन के संयोजक संजय कुमार ने सम्मेलन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए बताया कि इसका मूल लक्ष्य संपूर्ण हिंदू समाज को एक साथ लाना और आपसी एकता का संदेश देना है। उन्होंने कहा कि समाज में विभिन्न वर्ग, जाति और पृष्ठभूमि के लोग रहते हैं, लेकिन हिंदू सम्मेलन के माध्यम से सभी को एक साझा मंच पर लाकर आपसी संवाद और सहयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। संजय कुमार ने यह भी कहा कि ऐसे आयोजनों से लोगों को एक-दूसरे को समझने का अवसर मिलता है और समाज में व्याप्त दूरी को कम करने में मदद मिलती है। उनका मानना था कि जब समाज संगठित होता है, तभी वह अपने अधिकारों, कर्तव्यों और राष्ट्रहित के मुद्दों पर एकजुट होकर आगे बढ़ सकता है।

सम्मेलन के दौरान वक्ताओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति और उसके सामाजिक योगदान पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। इस अवसर पर यह बताया गया कि संघ की विशिष्ट और अभिनव कार्यशैली, जिसे “शाखा पद्धति” के नाम से जाना जाता है, ने समाज में वैचारिक परिवर्तन की मजबूत नींव रखी है। इस पद्धति के माध्यम से संघ ने अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभक्ति के मूल्यों को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने का कार्य किया है। वक्ताओं ने कहा कि शाखा पद्धति केवल शारीरिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्तित्व निर्माण, सामाजिक दायित्व और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का एक प्रभावी माध्यम है, जिसने दशकों से समाज को दिशा देने का काम किया है।

मीडिया से बातचीत करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत कार्यवाह डॉ दिनेश सेमवाल ने संघ की सौ वर्षों की यात्रा और उसके सामाजिक प्रभाव पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा भी था जब स्वयं को हिंदू कहना लोगों के लिए संकोच और लज्जा का विषय माना जाता था, लेकिन निरंतर प्रयासों और सामाजिक कार्यों के माध्यम से संघ ने इस मानसिकता को बदलने का कार्य किया है। आज हिंदुत्व का विचार, हिंदू संगठन और अनुशासन के साथ संगठित हिंदू समाज देश के कोने-कोने में मजबूती से स्थापित हो चुका है। उन्होंने कहा कि यह परिवर्तन अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे संघ की तपस्या, धैर्य और निरंतर सेवा भावना का योगदान है, जिसने समाज में आत्मविश्वास और गर्व की भावना को पुनर्स्थापित किया है।

डॉ दिनेश सेमवाल ने अपने वक्तव्य में यह भी कहा कि संघ की यह यात्रा लगभग सौ वर्षों में पूरी हुई है और यह एक सतत साधना का परिणाम है। उन्होंने बताया कि संघ ने कभी भी तात्कालिक लाभ या लोकप्रियता के लिए काम नहीं किया, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन को अपना लक्ष्य बनाया। इसी कारण आज समाज में संघ के विचारों की स्वीकार्यता बढ़ी है और लोग अपने सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक हुए हैं। उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य किसी वर्ग विशेष का नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज का उत्थान है, जिसमें सेवा, समर्पण और राष्ट्रहित सर्वोपरि हैं।

आगे बोलते हुए प्रांत कार्यवाह ने बताया कि अब संघ “समाज परिवर्तन” के व्यापक लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहा है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शहरी क्षेत्रों के वार्डों से लेकर ग्रामीण अंचलों की न्याय पंचायतों और मंडलों तक संगठित कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के हर वर्ग तक पहुंचने और उन्हें संगठन से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हिंदू सम्मेलन इसी सोच का हिस्सा हैं, जिनके जरिए प्रत्येक घर तक हिंदुत्व की भावना, उसके संस्कार और पंच परिवर्तन के विचारों को पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।

डॉ दिनेश सेमवाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पंच परिवर्तन केवल नारे नहीं हैं, बल्कि जीवन में उतारे जाने वाले सिद्धांत हैं। व्यक्तिगत स्तर पर आत्मअनुशासन और नैतिकता, पारिवारिक स्तर पर संस्कार और एकता, सामाजिक स्तर पर समरसता और सहयोग, पर्यावरणीय स्तर पर प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रभक्ति और कर्तव्यबोध—इन सभी पहलुओं को अपनाकर ही समाज सशक्त बन सकता है। उन्होंने कहा कि हिंदू सम्मेलनों के माध्यम से इन मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाया जाएगा, ताकि हिंदुत्व केवल विचार न रहकर जीवन पद्धति के रूप में स्थापित हो सके।

सम्मेलन में उपस्थित संतों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपने विचार साझा किए और समाज में नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना पर जोर दिया। उदासीन आश्रम के संत सुपार सिंह ने कहा कि आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक जिम्मेदारी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और जब समाज अपने मूल्यों को समझता है, तभी वह सही दिशा में आगे बढ़ता है। सुरभि बंसल और सृष्टि बंसल आहूजा ने भी महिलाओं की भूमिका, परिवार की मजबूती और सामाजिक समरसता के महत्व पर अपने विचार रखे। उनके वक्तव्यों ने सम्मेलन में उपस्थित महिलाओं और युवाओं को विशेष रूप से प्रेरित किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे उजाला हॉस्पिटल के निदेशक डॉ अभिषेक दुबे ने अपने संबोधन में कहा कि समाज का स्वस्थ रहना केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक, नैतिक और सामाजिक स्वास्थ्य भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हिंदू सम्मेलन जैसे आयोजनों से समाज में सकारात्मक सोच और सहयोग की भावना विकसित होती है, जो किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए अनिवार्य है। डॉ अभिषेक दुबे ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम समाज को जोड़ने और राष्ट्रहित के लिए एकजुट करने का कार्य करते हैं।

पूरे सम्मेलन के दौरान अनुशासन, संगठन और सहभागिता की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दी। आयोजन स्थल पर स्वयंसेवकों की सक्रिय भूमिका रही, जिन्होंने व्यवस्था से लेकर अतिथियों के स्वागत तक हर जिम्मेदारी को कुशलता से निभाया। उपस्थित लोगों ने इस आयोजन को प्रेरणादायक बताया और कहा कि ऐसे सम्मेलन समाज में नई ऊर्जा और सकारात्मक दृष्टिकोण का संचार करते हैं। कार्यक्रम के समापन पर यह संकल्प लिया गया कि हिंदू समाज की एकता, समरसता और राष्ट्रहित के लिए ऐसे प्रयास निरंतर जारी रहेंगे और अधिक से अधिक लोगों को इस अभियान से जोड़ा जाएगा।

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