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वन ग्रामों के अधिकारों के लिए रामनगर में पदयात्रा में हरीश रावत ने किया समर्थन

रामनगर। वन ग्रामों को राजस्व गांव का दर्जा देने की मांग एक बार फिर तेज हो गई, जब बड़ी संख्या में ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने पदयात्रा निकालकर अपनी आवाज बुलंद की। इस पदयात्रा में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, रामनगर ब्लॉक प्रमुख मंजू नेगी, ज्येष्ठ ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी, पूर्व दर्जा राज्य मंत्री पुष्कर दुर्गापाल सहित कई गांवों से आए दर्जनों ग्रामीण शामिल हुए। ग्रामीणों ने अपने हाथों में बैनर और तख्तियां लेकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और वन ग्रामों को राजस्व गांव बनाए जाने की मांग को जोरदार तरीके से उठाया। प्रदर्शनकारियों ने “धामी सरकार होश में आओ” और “वन ग्रामों को मालिकाना हक दो” जैसे नारे लगाते हुए सरकार से जल्द निर्णय लेने की मांग की। पदयात्रा के दौरान ग्रामीणों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला और बड़ी संख्या में महिलाएं, युवा और बुजुर्ग इस आंदोलन में शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि लंबे समय से वन ग्रामों के निवासी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन अब तक उनकी मांगों पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। यही कारण है कि अब उन्हें सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

डिग्री कॉलेज से शुरू हुई यह पदयात्रा रामनगर शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए तहसील परिसर तक पहुंची, जहां ग्रामीणों और नेताओं ने प्रशासन को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। पदयात्रा के दौरान शहर के कई हिस्सों में लोगों ने इस आंदोलन का समर्थन भी किया और ग्रामीणों की मांगों को जायज बताया। तहसील परिसर पहुंचने के बाद प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों को लेकर जोरदार तरीके से आवाज उठाई और कहा कि वन ग्रामों को राजस्व गांव का दर्जा देना अब समय की मांग बन चुका है। पदयात्रा में शामिल ग्रामीणों का कहना था कि दशकों से वे लोग इस उम्मीद में जी रहे हैं कि एक दिन उन्हें अपनी जमीनों पर मालिकाना हक मिलेगा, लेकिन हर बार उनकी उम्मीदें अधूरी रह जाती हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को चाहिए कि वह जल्द से जल्द निर्णय लेकर वन ग्रामों के निवासियों को राजस्व गांव का दर्जा दे, ताकि उन्हें कानूनी अधिकार मिल सकें और उनके जीवन में स्थिरता आ सके।

इस अवसर पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी पदयात्रा में शामिल होकर ग्रामीणों के संघर्ष को समर्थन दिया। मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि आज सरकार गरीबों की जमीनों के साथ अन्याय कर रही है। उनका कहना था कि जिन लोगों ने वर्षों से इन क्षेत्रों में रहकर अपनी जिंदगी बनाई है, उन्हें अधिकार देने के बजाय उनकी जमीनों को ही विवादों में उलझाया जा रहा है। हरीश रावत ने आरोप लगाया कि आपदा पीड़ितों और भूमिहीन लोगों को जमीन देने की बजाय उनकी जमीनों को खुर्द-बुर्द किया जा रहा है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि पहले एक स्पष्ट सोच थी, जिसके तहत मालधन, बिंदुखत्ता और रामनगर के पुछड़ी जैसे क्षेत्रों में गांव बसाए गए थे। उस समय यह समझ थी कि जिन लोगों के पास रहने के लिए जमीन नहीं है, उन्हें बसाकर उन्हें स्थायी जीवन दिया जाए। लेकिन आज उस सोच को आगे बढ़ाने के बजाय उसे भुला दिया गया है, जिससे हजारों परिवार असमंजस और असुरक्षा की स्थिति में जीने को मजबूर हैं।

आंदोलन के दौरान हरीश रावत ने कहा कि वन ग्रामों को राजस्व गांव बनाने की मांग किसी एक राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के अस्तित्व से जुड़ा हुआ विषय है। उन्होंने कहा कि यह केवल जमीन का सवाल नहीं बल्कि उन हजारों परिवारों के भविष्य का प्रश्न है, जो दशकों से इन क्षेत्रों में रह रहे हैं। उनका कहना था कि यदि इन लोगों को मालिकाना हक नहीं दिया गया तो उनके जीवन में स्थायी असुरक्षा बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि इसी भावना के साथ वह रामनगर पहुंचे हैं और ग्रामीणों के संघर्ष में सहभागी बने हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक वन ग्रामों के निवासियों को उनके अधिकार नहीं मिल जाते, तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे पर ग्रामीणों के साथ खड़ी रहेगी और उनकी आवाज को सरकार तक पहुंचाने का हर संभव प्रयास करेगी।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने यह भी याद दिलाया कि उनकी सरकार के कार्यकाल में वन ग्रामों को राजस्व गांव बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई थी। उन्होंने बताया कि 26 दिसंबर को मंत्रिमंडल में एक प्रस्ताव लाया गया था, जिसमें भूमि की 12 श्रेणियों को वर्गीकृत करते हुए कई गांवों को मालिकाना हक देने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि उस प्रस्ताव में इंदिरा गांव, हरिराम आर्य गांव सहित पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक के कई गांवों को शामिल किया गया था। उद्देश्य यह था कि वर्षों से बसे हुए लोगों को कानूनी अधिकार प्रदान किए जाएं और उनके जीवन में स्थिरता लाई जा सके। लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बदलने के बाद इस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया गया और उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। उन्होंने कहा कि यदि उस समय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया होता तो आज हजारों परिवारों को राहत मिल चुकी होती।

पदयात्रा का नेतृत्व कर रहे ज्येष्ठ ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी ने भी इस दौरान ग्रामीणों की समस्याओं को विस्तार से रखा। उन्होंने कहा कि रामनगर विधानसभा क्षेत्र में लगभग 24 वन ग्राम हैं और इन गांवों के निवासी लंबे समय से राजस्व गांव का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं। लेकिन अब तक उनकी आवाज को गंभीरता से नहीं सुना गया। संजय नेगी ने कहा कि कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन वन ग्रामों की समस्या जस की तस बनी हुई है। उन्होंने कहा कि इन गांवों में रहने वाले लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं, क्योंकि उन्हें राजस्व गांव का दर्जा नहीं मिला है। इससे उन्हें सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाओं को प्राप्त करने में भी कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि ग्रामीणों को मजबूर होकर पदयात्रा के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद करनी पड़ रही है।

राजनीतिक आरोपों के बीच संजय नेगी ने लोकसभा चुनाव के दौरान किए गए वादों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चुनाव के समय सांसद अनिल बलूनी ने वन ग्रामों को राजस्व गांव बनाने का वादा किया था। उस समय ग्रामीणों को उम्मीद थी कि चुनाव जीतने के बाद इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे। लेकिन डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी स्थिति में कोई ठोस बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर वह वादा कहां गया, जो चुनाव के दौरान किया गया था। उन्होंने कहा कि जनता ने भरोसा करके वोट दिया था, इसलिए अब सरकार और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है कि वे अपने वादों को पूरा करें। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि सरकार ने जल्द निर्णय नहीं लिया तो ग्रामीणों का आंदोलन और तेज हो सकता है।

आंदोलन के दौरान यह भी मांग उठाई गई कि अतिक्रमण के नाम पर जिन गरीब लोगों को हटाया गया है, उन्हें उसी स्थान पर मालिकाना हक दिया जाए। इस विषय पर हरीश रावत ने कहा कि आज अतिक्रमण के नाम पर गरीबों को हटाया जा रहा है, जबकि बड़े पूंजीपतियों को उत्तराखंड की जमीनें आसानी से उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति बेहद चिंताजनक है और इससे प्रदेश के गरीब लोगों के भविष्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उनका कहना था कि सरकार को चाहिए कि वह गरीबों और भूमिहीन लोगों के अधिकारों की रक्षा करे और उन्हें उनके निवास स्थानों पर ही मालिकाना हक प्रदान करे। उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने ऐसा नहीं किया तो यह अन्याय लंबे समय तक नहीं चलेगा और जनता इसका विरोध करेगी।

अंत में हरीश रावत ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि यदि वन ग्रामों को राजस्व गांव का दर्जा देने की मांग पर जल्द फैसला नहीं लिया गया तो कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को लेकर व्यापक आंदोलन शुरू करेगी। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल रामनगर या कुछ गांवों की नहीं बल्कि पूरे उत्तराखंड के भविष्य से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी वन ग्रामों के निवासियों के साथ खड़ी है और उनके अधिकारों के लिए सड़क से लेकर सदन तक संघर्ष करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में जनता की आवाज सबसे महत्वपूर्ण होती है और यदि सरकार उस आवाज को अनसुना करती है तो जनता को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ता है।

पदयात्रा के समापन पर ग्रामीणों ने प्रशासन को ज्ञापन सौंपते हुए मुख्यमंत्री से जल्द निर्णय लेने की मांग की। ज्ञापन में कहा गया कि वन ग्रामों को जल्द से जल्द राजस्व गांव का दर्जा दिया जाए और जिन लोगों को अतिक्रमण के नाम पर हटाया गया है, उन्हें उसी स्थान पर पुनः बसाकर मालिकाना हक दिया जाए। ग्रामीणों ने कहा कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया तो आने वाले समय में आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। उन्होंने कहा कि वन ग्रामों के निवासियों का यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक उन्हें उनका अधिकार नहीं मिल जाता।

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