देहरादून। उत्तराखंड वन विभाग लंबे समय से जिस गंभीर प्रशासनिक संकट से जूझ रहा है, अब उससे उबरने की एक नई उम्मीद दिखाई देने लगी है। राज्य के वनों की सुरक्षा, वन्यजीव संरक्षण और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण की जिम्मेदारी संभालने वाला यह विभाग वन क्षेत्राधिकारियों की भारी कमी के कारण दबाव में है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए विभागीय स्तर पर एक अहम प्रस्ताव तैयार किया गया है, जिसके तहत उप वन क्षेत्राधिकारियों यानी डिप्टी रेंजरों को क्षेत्रीय इकाइयों का प्रभार सौंपने की योजना बनाई गई है। यदि राज्य सरकार इस प्रस्ताव को हरी झंडी दे देती है, तो न केवल वन इकाइयों के संचालन में सुधार आएगा, बल्कि वर्षों से लंबित प्रशासनिक दिक्कतों को भी काफी हद तक दूर किया जा सकेगा। विभागीय सूत्रों के अनुसार यह कदम मौजूदा हालात में एक व्यावहारिक समाधान के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि रेंजरों की तत्काल उपलब्धता संभव नहीं दिख रही है और जंगलों की निगरानी किसी भी सूरत में कमजोर नहीं होने दी जा सकती।
प्रदेश में वन क्षेत्राधिकारी को इकाई स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी माना जाता है, जिनके कंधों पर जंगलों की सुरक्षा से लेकर प्रशासनिक निर्णयों तक की बड़ी जिम्मेदारी होती है। वन अपराधों पर रोक, अवैध कटान की निगरानी, वन्यजीवों की सुरक्षा, मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति में त्वरित कार्रवाई और कर्मचारियों के प्रबंधन जैसे तमाम अहम कार्य इन्हीं के निर्देशन में होते हैं। लेकिन वर्तमान परिदृश्य यह है कि उत्तराखंड वन विभाग में स्वीकृत पदों की तुलना में कार्यरत रेंजरों की संख्या बेहद कम है। इस कमी का सीधा असर जमीनी स्तर पर दिखाई दे रहा है, जहां कई वन इकाइयां या तो अस्थायी व्यवस्था के भरोसे चल रही हैं या फिर अतिरिक्त प्रभार के सहारे किसी तरह प्रबंधन किया जा रहा है। ऐसे में विभागीय कार्यकुशलता और संरक्षण प्रयासों पर सवाल उठना स्वाभाविक है, जिसे लेकर विभाग भी अब गंभीरता से समाधान तलाश रहा है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति की गंभीरता और स्पष्ट हो जाती है। उत्तराखंड में वन क्षेत्राधिकारियों के कुल 308 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 180 अधिकारी ही कार्यरत हैं। इसका अर्थ है कि 128 पद लंबे समय से रिक्त पड़े हुए हैं। इतने बड़े पैमाने पर पदों का खाली होना किसी भी संवेदनशील विभाग के लिए चिंता का विषय है, खासकर ऐसे राज्य में जहां घने वन क्षेत्र, राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और वन्यजीवों की समृद्ध जैव विविधता मौजूद है। रेंजरों की कमी के चलते कई इकाइयों में निगरानी कमजोर पड़ रही है और प्रशासनिक निर्णयों में भी देरी हो रही है। विभागीय अधिकारियों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका नकारात्मक असर वन संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा दोनों पर पड़ सकता है, जिसे किसी भी कीमत पर टाला जाना जरूरी है।
मौजूदा हालात में प्रदेश की 15 से अधिक वन इकाइयां दोहरे प्रभार के सहारे संचालित हो रही हैं। कई स्थानों पर एक ही वन क्षेत्राधिकारी को दो-दो इकाइयों की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है, जिससे कार्यभार अत्यधिक बढ़ गया है। परिणामस्वरूप, न तो किसी एक क्षेत्र पर पूरी तरह से ध्यान दिया जा पा रहा है और न ही निगरानी व्यवस्था उतनी प्रभावी रह पा रही है, जितनी होनी चाहिए। कुछ इकाइयों में तो स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां स्थायी रेंजर की तैनाती ही नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में वन अपराधों पर नियंत्रण, वन्यजीवों की सुरक्षा और प्रशासनिक कामकाज में लगातार बाधाएं सामने आ रही हैं। विभागीय स्तर पर यह महसूस किया जा रहा है कि दोहरे प्रभार की व्यवस्था लंबे समय तक कारगर नहीं रह सकती और इसका स्थायी समाधान निकालना जरूरी है।
नियमों के अनुसार, उप वन क्षेत्राधिकारी यानी डिप्टी रेंजर को भी आवश्यकता पड़ने पर इकाई प्रभार सौंपा जा सकता है। हालांकि, पूर्व में राज्य सरकार के एक निर्देश के कारण इस व्यवस्था को लागू नहीं किया जा सका था। पहले भी ऐसे प्रयास किए गए थे, लेकिन मामला न्यायालय तक पहुंच गया, जिसके बाद सरकार को पीछे हटना पड़ा। उस समय इस फैसले को लेकर कई तरह की कानूनी और प्रशासनिक आपत्तियां सामने आई थीं। नतीजतन, डिप्टी रेंजरों को इकाई प्रभार देने की योजना ठंडे बस्ते में चली गई। लेकिन समय के साथ हालात और अधिक चुनौतीपूर्ण होते चले गए और अब विभाग के सामने यह विकल्प फिर से एक व्यावहारिक समाधान के रूप में उभरकर सामने आया है।
वर्तमान संकट को देखते हुए अब उत्तराखंड वन विभाग ने दोबारा इस दिशा में पहल की है। प्रमुख वन संरक्षक और हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स रंजन कुमार मिश्रा ने राज्य सरकार को एक विस्तृत सुझाव भेजा है, जिसमें रेंजरों की भारी कमी का हवाला देते हुए उप वन क्षेत्राधिकारियों को इकाई प्रभार सौंपने की सिफारिश की गई है। विभाग का तर्क है कि डिप्टी रेंजर मैदानी स्तर पर अनुभवी होते हैं और वन प्रबंधन की बारीकियों से अच्छी तरह परिचित रहते हैं। ऐसे में उन्हें अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपकर कई इकाइयों में व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सकता है। अब इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय राज्य सरकार को लेना है, जिस पर पूरे विभाग की निगाहें टिकी हुई हैं।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, समस्या इसलिए भी गंभीर बनी हुई है क्योंकि हाल ही में प्रत्यक्ष भर्ती के माध्यम से नियुक्त 32 नए वन क्षेत्राधिकारी फिलहाल प्रशिक्षण प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। इन अधिकारियों को छह माह के प्रशिक्षण के बाद ही मैदानी क्षेत्रों में तैनात किया जा सकेगा। जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक रेंजरों की कमी बनी रहना तय है। इस कारण विभाग को अंतरिम व्यवस्था के तौर पर वैकल्पिक समाधान अपनाने की जरूरत महसूस हो रही है। डिप्टी रेंजरों को इकाई प्रभार सौंपने का प्रस्ताव इसी सोच का परिणाम है, ताकि प्रशिक्षण पूरा होने तक वन इकाइयों का संचालन प्रभावित न हो और संरक्षण कार्य सुचारु रूप से चलते रहें।
यदि राज्य सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो इसके कई सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं। सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि वर्षों से खाली चल रही या दोहरे प्रभार पर निर्भर इकाइयों को स्थायी प्रशासनिक नेतृत्व मिल सकेगा। इससे निर्णय प्रक्रिया तेज होगी और जमीनी स्तर पर निगरानी मजबूत होगी। साथ ही डिप्टी रेंजरों को भी बड़ी जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिलेगा, जिससे उनका प्रशासनिक अनुभव बढ़ेगा और भविष्य में विभाग के लिए एक मजबूत नेतृत्व तैयार हो सकेगा। विभागीय सूत्रों का मानना है कि इससे कर्मचारियों के मनोबल में भी वृद्धि होगी और कार्य संस्कृति में सुधार आएगा।
समग्र रूप से देखा जाए तो उत्तराखंड वन विभाग का यह प्रस्ताव न केवल वर्तमान संकट का समाधान निकालने की दिशा में एक अहम कदम है, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक व्यावहारिक पहल भी है। जंगलों की सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी तरह की ढिलाई राज्य के पर्यावरणीय संतुलन के लिए घातक साबित हो सकती है। ऐसे में डिप्टी रेंजरों को इकाई प्रभार सौंपने का निर्णय यदि लागू होता है, तो यह विभागीय व्यवस्था को नई मजबूती देगा। अब सबकी नजरें राज्य सरकार के फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि उत्तराखंड के वनों की सुरक्षा व्यवस्था को यह बहुप्रतीक्षित राहत कब और कैसे मिलती है।





