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रामनगर विधानसभा को मिल सकता कैबिनेट मंत्री धामी मंत्रिमंडल विस्तार से बढ़ी उम्मीदें

धामी सरकार के विस्तार में पांच नए चेहरों की एंट्री तय मानी जा रही, क्षेत्रीय संतुलन साधने की बड़ी कवायद, रामनगर से दीवान सिंह बिष्ट का नाम चर्चा में।

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में आज का दिन बेहद अहम मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि लंबे समय से प्रतीक्षित धामी मंत्रिमंडल का विस्तार अब वास्तविकता का रूप लेने जा रहा है। आगामी वर्ष 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यह कदम न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। प्रदेश की सियासत में पिछले कई महीनों से इस विस्तार को लेकर चर्चाओं और अटकलों का दौर जारी था, जो अब जाकर निर्णायक स्थिति में पहुंचा है। आज राजभवन में आयोजित कार्यक्रम में पांच नए चेहरों को मंत्री पद की शपथ दिलाई जा सकती है, जिससे सरकार के स्वरूप और रणनीति में नया संतुलन देखने को मिलेगा। खास बात यह है कि इस विस्तार में विभिन्न क्षेत्रों, वर्गों और राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए चयन किए जाने की संभावना जताई जा रही है, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि सरकार चुनावी दृष्टिकोण से पूरी तरह सक्रिय हो चुकी है।

राजनीतिक गलियारों में जिन संभावित नामों की चर्चा सबसे अधिक हो रही है, उनमें राजपुर से विधायक खजानदास, नैनीताल से सरिता आर्य, रुड़की से प्रदीप बत्रा, देवप्रयाग से विनोद कंडारी और रामनगर से दीवान सिंह बिष्ट का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है। खासकर रामनगर विधानसभा क्षेत्र के लिए यह खबर और भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यदि दीवान सिंह बिष्ट को मंत्रिमंडल में स्थान मिलता है, तो यह क्षेत्र पहली बार कैबिनेट स्तर पर प्रतिनिधित्व हासिल कर सकता है। इससे न केवल क्षेत्रीय विकास को गति मिलने की उम्मीद है, बल्कि स्थानीय राजनीति में भी एक नई दिशा देखने को मिल सकती है। हालांकि अभी तक इन नामों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सूत्रों के अनुसार यही पांच चेहरे आज शपथ ले सकते हैं। इस संभावित सूची ने राजनीतिक हलकों में उत्सुकता और चर्चा दोनों को बढ़ा दिया है।

दरअसल, धामी सरकार के गठन के समय से ही मंत्रिमंडल के कुछ पद रिक्त चले आ रहे थे, जिन्हें भरने की मांग लगातार उठती रही है। वर्ष 2022 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद जब सरकार बनी थी, तब मुख्यमंत्री सहित कुल सात मंत्रियों ने शपथ ली थी, जबकि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार मंत्रियों की संख्या अधिक हो सकती थी। इसके बाद समय-समय पर परिस्थितियां बदलती गईं और रिक्त पदों की संख्या बढ़ती चली गई। परिवहन मंत्री चंदन रामदास के निधन के बाद एक पद और खाली हो गया, वहीं वित्त मंत्री प्रेम चंद अग्रवाल के इस्तीफे के बाद एक और स्थान रिक्त हो गया। इस प्रकार कुल मिलाकर पांच मंत्री पद लंबे समय से खाली पड़े थे, जिन्हें भरने की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही थी। अब जब इन पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू हो रही है, तो इसे प्रशासनिक मजबूती के साथ-साथ राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।

मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर यह भी माना जा रहा है कि सरकार इस अवसर का उपयोग विभिन्न सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने के लिए कर रही है। भाजपा संगठन पहले ही यह संकेत दे चुका है कि आगामी चुनावों में महिलाओं, युवाओं और विभिन्न वर्गों को विशेष प्राथमिकता दी जाएगी। ऐसे में यह संभावना जताई जा रही है कि नए मंत्रियों के चयन में इन सभी पहलुओं का विशेष ध्यान रखा गया है। इसके अलावा जातीय संतुलन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और राजनीतिक अनुभव जैसे कारकों को भी ध्यान में रखा गया है, ताकि सरकार को व्यापक जनसमर्थन मिल सके। यह विस्तार केवल रिक्त पदों को भरने का औपचारिक कदम नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य आगामी चुनावों में पार्टी की स्थिति को मजबूत करना है।

उत्तराखंड की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखें तो वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 70 में से 47 सीटें जीतकर दूसरी बार सरकार बनाई थी। हालांकि पिछली बार की तुलना में सीटों की संख्या कुछ कम रही, लेकिन फिर भी पार्टी ने स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की। वहीं कांग्रेस को 19 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। अब जब चुनाव में लगभग एक वर्ष का समय शेष है, तो सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं। इसी क्रम में धामी सरकार का यह मंत्रिमंडल विस्तार एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो आने वाले चुनावी परिदृश्य को प्रभावित कर सकता है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि भाजपा अब चुनावी मोड में पूरी तरह सक्रिय हो चुकी है।

संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार किसी भी राज्य में मंत्रिपरिषद की कुल संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती, जबकि न्यूनतम संख्या 12 होना अनिवार्य है। उत्तराखंड में 70 विधानसभा सीटें हैं, जिसके अनुसार यहां अधिकतम 12 मंत्री हो सकते हैं। वर्तमान में मुख्यमंत्री सहित केवल सात मंत्री कार्यरत हैं, जिससे पांच पद रिक्त हैं। यही कारण है कि अब इन पदों को भरकर सरकार अपने प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने जा रही है। नए मंत्रियों के शामिल होने से न केवल विभागों का बेहतर संचालन संभव होगा, बल्कि सरकार की कार्यक्षमता में भी वृद्धि होगी।

राजभवन में होने वाला शपथ ग्रहण कार्यक्रम इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र बिंदु रहेगा, जहां सभी की नजरें नए मंत्रियों के नामों और उनके विभागों पर टिकी रहेंगी। यह भी देखा जाएगा कि सरकार किन चेहरों को आगे लाकर किस प्रकार का संदेश देने की कोशिश कर रही है। खासकर रामनगर विधानसभा क्षेत्र को लेकर चल रही चर्चाओं ने इस विस्तार को और भी रोचक बना दिया है। यदि दीवान सिंह बिष्ट को मंत्री बनाया जाता है, तो यह क्षेत्रीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है और इससे स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरण भी बदल सकते हैं।

अंततः यह कहा जा सकता है कि धामी मंत्रिमंडल का यह विस्तार केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, जो आने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। पांच नए चेहरों की संभावित एंट्री से सरकार को नई ऊर्जा मिलेगी और वह अपने शेष कार्यकाल में अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेगी। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आखिरकार किन चेहरों को मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी जाती है और यह निर्णय उत्तराखंड की राजनीति को किस दिशा में ले जाता है।

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