- कॉलेज की ‘प्रोसेसिंग’ ने छीना छात्रों का हक और दो सालों से मिल रहे केवल आश्वासन
- अंधेरे में भविष्य और अधर में डिग्री और राधे हरि कॉलेज में शिक्षा तंत्र फेल
- राजभवन की देरी या कॉलेज की सुस्ती और कौन लेगा छात्रों के आर्थिक नुकसान की जिम्मेदारी
- फीस पूरी और छात्रवृत्ति शून्य और राधे हरि कॉलेज के प्रबंधन पर गंभीर लापरवाही के आरोप
- यूनिवर्सिटी और कॉलेज की आपसी खींचतान में बर्बाद हो रहा सैकड़ों बीएड छात्र-छात्राओं का कीमती साल
काशीपुर। शिक्षा के नाम पर भरोसा करके भविष्य गढ़ने आए विद्यार्थियों के सपनों पर जब अनिश्चितता की परछाईं पड़ जाए, तो वह केवल एक संस्थान की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर देती है। काशीपुर स्थित राधे हरि स्नातकोत्तर महाविद्यालय में संचालित बीएड पाठ्यक्रम से जुड़ा मामला इन दिनों ठीक इसी तरह की चिंता और आक्रोश को जन्म दे रहा है। यहां अध्ययनरत छात्र-छात्राओं का कहना है कि उनका भविष्य आज अधर में लटका हुआ है, क्योंकि एक ओर जहां उन्हें पिछले दो वर्षों से छात्रवृत्ति नहीं मिल पाई है, वहीं दूसरी ओर बीएड विभाग की मान्यता और आवश्यक मानक समय पर पूरे न होने की बात सामने आ रही है। विद्यार्थियों का आरोप है कि जब किसी संस्थान के पास पाठ्यक्रम संचालन से जुड़ी सभी औपचारिक स्वीकृतियां और मान्यताएं स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं थीं, तो फिर प्रवेश प्रक्रिया क्यों शुरू की गई। उनका कहना है कि यह स्थिति न केवल मानसिक तनाव का कारण बन रही है, बल्कि आर्थिक रूप से भी छात्र-छात्राओं पर भारी बोझ डाल रही है, क्योंकि उन्हें नियमित रूप से फीस जमा करनी पड़ रही है, जबकि सरकारी छात्रवृत्ति का लाभ नहीं मिल पा रहा।
कॉलेज परिसर में पढ़ने वाले कई विद्यार्थियों ने खुलकर अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि बीएड में प्रवेश के समय उन्हें यह भरोसा दिलाया गया था कि सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार पूरी हैं और समय पर छात्रवृत्ति भी प्राप्त हो जाएगी। लेकिन जब छात्र-छात्राओं ने समाज कल्याण विभाग की छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किया, तो उन्हें यह जानकर झटका लगा कि विभागीय मानकों और संबद्धता से जुड़ी कुछ औपचारिकताएं पूरी नहीं होने के कारण उनका आवेदन आगे नहीं बढ़ पाया। छात्रों का कहना है कि यदि शुरुआत में ही उन्हें इस तरह की स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी दे दी जाती, तो वे किसी अन्य विकल्प पर विचार कर सकते थे। लेकिन अब दो साल बीत जाने के बाद वे न तो पढ़ाई छोड़ सकते हैं और न ही भविष्य को लेकर आश्वस्त महसूस कर पा रहे हैं। कई छात्राओं ने यह भी बताया कि छात्रवृत्ति न मिलने के कारण उन्हें घरवालों से अतिरिक्त आर्थिक मदद लेनी पड़ रही है, जिससे परिवार पर भी दबाव बढ़ गया है।
छात्र-छात्राओं का आक्रोश केवल मौखिक शिकायतों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कई बार महाविद्यालय प्रशासन, प्राचार्य और विभाग प्रभारी से मुलाकात कर अपनी समस्याएं सामने रखीं। इसके अलावा लिखित रूप में भी आवेदन दिए गए, लेकिन उनका आरोप है कि हर बार केवल आश्वासन ही मिला, ठोस समाधान नहीं। विद्यार्थियों का कहना है कि जब उन्होंने लगातार सवाल उठाए, तब जाकर उन्हें यह जानकारी मिली कि बीएड विभाग की संबद्धता और मान्यता से जुड़ी फाइलें समय पर पूरी प्रक्रिया से नहीं गुजर पाईं। इस खुलासे के बाद छात्रों के मन में यह सवाल और गहरा हो गया कि आखिर जब मान्यता और संबद्धता ही स्पष्ट नहीं थी, तो प्रवेश लेकर छात्रों के भविष्य के साथ यह जोखिम क्यों लिया गया। उनका कहना है कि यह केवल प्रशासनिक देरी का मामला नहीं है, बल्कि शिक्षा के नाम पर छात्रों के साथ किया गया एक गंभीर खिलवाड़ है, जिसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
इस पूरे विवाद के बीच जब महाविद्यालय प्रशासन की ओर से पक्ष रखा गया, तो उन्होंने छात्रवृत्ति न मिलने के पीछे प्रक्रियागत देरी को मुख्य कारण बताया। विभागीय प्रतिनिधि के अनुसार, बीएड विभाग में प्रवेश के बाद छात्रों को जिला समाज कल्याण विभाग के माध्यम से छात्रवृत्ति दी जाती है, लेकिन इसके लिए विश्वविद्यालय से संबद्धता और मान्यता का प्रमाणपत्र समय पर जारी होना अनिवार्य होता है। प्रशासन का कहना है कि महाविद्यालय की ओर से विश्वविद्यालय में पैनल की प्रक्रिया समय पर पूरी कर दी गई थी और आवश्यक दस्तावेज भी जमा कर दिए गए थे। इसके बाद फाइल विश्वविद्यालय से आगे भेजी गई, जहां से इसे राजभवन तक पहुंचना था। इसी स्तर पर प्रक्रिया में अत्यधिक देरी हुई, जिसके चलते छात्रवृत्ति पोर्टल की समय सीमा समाप्त हो गई और छात्रों को लाभ नहीं मिल सका। प्रशासन का तर्क है कि समाज कल्याण विभाग का पोर्टल एक निश्चित अवधि के लिए ही खुला रहता है और यदि उस दौरान मान्यता प्रमाणपत्र उपलब्ध न हो, तो आवेदन स्वतः निरस्त हो जाता है।
महाविद्यालय प्रशासन का यह भी कहना है कि पिछली बार संबद्धता प्रमाणपत्र जारी होने में लगभग ग्यारह महीने का समय लग गया था, जबकि सामान्य परिस्थितियों में यह प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी हो जानी चाहिए। इस देरी का खामियाजा सीधे तौर पर छात्रों को भुगतना पड़ा। विभागीय प्रतिनिधि के अनुसार, वर्तमान सत्र में भी उन्होंने नवंबर महीने में ही पैनल की प्रक्रिया पूरी कर ली थी और फाइल विश्वविद्यालय में जमा करा दी गई थी। नवंबर, दिसंबर, जनवरी और फरवरी बीत जाने के बाद जब विश्वविद्यालय से संपर्क किया गया, तो यह जानकारी मिली कि फाइल हाल ही में ही राजभवन भेजी गई है। प्रशासन का कहना है कि इस स्तर पर देरी उनके नियंत्रण से बाहर है, क्योंकि पैनल कराने और फाइल जमा करने के बाद आगे की प्रक्रिया विश्वविद्यालय और राजभवन के स्तर पर होती है।
हालांकि, छात्रों का कहना है कि प्रशासन की यह दलील उनकी परेशानियों को कम नहीं करती। उनका सीधा सवाल है कि जब यह पहले से पता था कि मान्यता और संबद्धता की प्रक्रिया लंबी और अनिश्चित है, तो फिर प्रवेश लेने से पहले इस जोखिम के बारे में स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी गई। विद्यार्थियों का तर्क है कि यदि महाविद्यालय को यह अंदेशा था कि राजभवन से प्रमाणपत्र आने में महीनों लग सकते हैं, तो या तो प्रवेश प्रक्रिया रोकी जानी चाहिए थी या फिर छात्रों को लिखित रूप में पूरी स्थिति से अवगत कराया जाना चाहिए था। छात्र-छात्राओं का यह भी कहना है कि वर्तमान में दूसरे वर्ष की मान्यता को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है, जिससे उनकी डिग्री की वैधता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इस अनिश्चितता ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाला है, क्योंकि वे न तो पूरी तरह से पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर पा रहे हैं और न ही भविष्य की योजनाएं बना पा रहे हैं।
इस पूरे मामले में एक और गंभीर पहलू यह है कि छात्रवृत्ति न मिलने के बावजूद छात्रों से नियमित रूप से फीस जमा कराई जा रही है। कई छात्रों ने बताया कि उन्होंने अपनी सीमित आर्थिक स्थिति के बावजूद कर्ज लेकर या पारिवारिक संसाधनों पर निर्भर होकर फीस जमा की है, इस उम्मीद में कि छात्रवृत्ति मिलने पर उन्हें राहत मिलेगी। लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी जब कोई समाधान नहीं निकला, तो उनका भरोसा डगमगाने लगा है। छात्र-छात्राओं का कहना है कि बीएड जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम में फीस पहले से ही अधिक होती है और यदि छात्रवृत्ति न मिले, तो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए पढ़ाई जारी रखना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि कई छात्र इस समय पढ़ाई छोड़ने या किसी अन्य विकल्प की तलाश करने पर भी मजबूर हो रहे हैं, जो उनके करियर के लिए घातक साबित हो सकता है।
महाविद्यालय प्रशासन की ओर से यह भी कहा गया कि प्रवेश प्रक्रिया में उनकी कोई गलती नहीं है, क्योंकि नियमों के अनुसार पैनल कराने के बाद प्रवेश दिया जा सकता है और आगे की स्वीकृति विश्वविद्यालय और राजभवन के स्तर पर निर्भर करती है। प्रशासन का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय और राजभवन में कार्य तेजी से हो जाए, तो ऐसी समस्याएं पैदा ही न हों। उनका यह भी तर्क है कि यदि हर बार मान्यता प्रमाणपत्र आने तक प्रवेश रोक दिया जाए, तो शैक्षणिक सत्र प्रभावित होगा और छात्रों का एक पूरा साल बर्बाद हो सकता है। लेकिन छात्रों का कहना है कि सत्र बचाने के नाम पर उनके पूरे भविष्य को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। उनका मानना है कि शिक्षा संस्थानों की पहली जिम्मेदारी छात्रों के हितों की रक्षा करना है, न कि केवल प्रशासनिक औपचारिकताओं को पूरा करना।
इस विवाद ने उच्च शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी बहस छेड़ दी है। सवाल यह उठ रहा है कि जब विश्वविद्यालय और राजभवन जैसे उच्च स्तरों पर फाइलें महीनों तक लंबित रहती हैं, तो उसका असर सीधे तौर पर छात्रों पर क्यों पड़ता है। छात्र-छात्राओं का कहना है कि वे न तो विश्वविद्यालय की प्रक्रियाओं को नियंत्रित कर सकते हैं और न ही राजभवन की कार्यप्रणाली को समझ सकते हैं, लेकिन नुकसान अंततः उन्हीं का हो रहा है। इसी कारण वे मांग कर रहे हैं कि या तो विशेष व्यवस्था कर उन्हें छात्रवृत्ति का लाभ दिलाया जाए, या फिर उनकी फीस में राहत दी जाए, ताकि वे आर्थिक दबाव से कुछ हद तक मुक्त हो सकें। कुछ छात्रों ने यह भी कहा कि यदि समय रहते समाधान नहीं निकला, तो वे उच्च स्तर पर शिकायत दर्ज कराने और आंदोलन का रास्ता अपनाने पर मजबूर होंगे।
वर्तमान समय में काशीपुर का यह प्रकरण शिक्षा जगत में गहन चर्चा और चिंता का विषय बना हुआ है। राधे हरि स्नातकोत्तर महाविद्यालय के बीएड पाठ्यक्रम में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं की समस्या को अब केवल एक कॉलेज तक सीमित मानने के बजाय, इसे उस व्यापक खामी के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें प्रशासनिक सुस्ती, प्रक्रियागत विलंब और पारदर्शिता की कमी का सीधा असर विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ता है। छात्र-छात्राओं का कहना है कि वे पिछले दो वर्षों से अनिश्चितता में जी रहे हैं, जहां न तो छात्रवृत्ति का लाभ मिल पाया और न ही मान्यता को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सकी। लगातार फीस जमा करने के बावजूद भविष्य को लेकर भरोसे की कमी ने उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से परेशान कर दिया है। अब विद्यार्थियों की निगाहें प्रशासन और कॉलेज प्रबंधन पर टिकी हैं कि वे इस गंभीर संकट पर स्पष्ट जवाब दें और ठोस कदम उठाएं, ताकि शिक्षा के नाम पर पैदा हुई यह असमंजस की स्थिति समाप्त हो सके।
कॉलेज प्रबंधन के सामने इस पूरे मामले में तीन ऐसे गंभीर सवाल खड़े होते हैं, जिनका जवाब अब तक छात्रों को स्पष्ट रूप से नहीं मिल पाया है और यही वजह है कि असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। सबसे पहला और सबसे अहम प्रश्न यह है कि जब बीएड पाठ्यक्रम की मान्यता और विश्वविद्यालयीय संबद्धता समय पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी, तब फिर छात्र-छात्राओं को प्रवेश क्यों दिया गया और किस भरोसे उनका भविष्य दांव पर लगाया गया। दूसरा बड़ा सवाल यह उठता है कि छात्रवृत्ति न मिलने की संभावित स्थिति से छात्रों को पहले ही लिखित रूप में अवगत क्यों नहीं कराया गया, ताकि वे समय रहते कोई वैकल्पिक निर्णय ले सकें और आर्थिक दबाव से बच सकें। तीसरा और सबसे संवेदनशील प्रश्न यह है कि पिछले दो वर्षों से लगातार मानसिक तनाव, आर्थिक बोझ और अनिश्चितता झेल रहे छात्रों के भविष्य और हुए आर्थिक नुकसान की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा। इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि यह मामला केवल प्रशासनिक चूक है या शिक्षा के नाम पर गंभीर लापरवाही।
इस प्रकरण ने न केवल संबंधित कॉलेज, बल्कि पूरी उच्च शिक्षा व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षा को करियर निर्माण का मजबूत आधार माना जाता है, लेकिन जब संस्थागत स्तर पर ही स्पष्टता और जवाबदेही का अभाव दिखे, तो सबसे अधिक नुकसान विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है। इस मामले में छात्र-छात्राएं अब यह मांग कर रहे हैं कि शासन और विश्वविद्यालय स्तर पर हस्तक्षेप कर स्थिति को जल्द स्पष्ट किया जाए, ताकि उनकी डिग्री, छात्रवृत्ति और भविष्य से जुड़ी आशंकाओं का समाधान हो सके। साथ ही यह भी अपेक्षा की जा रही है कि भविष्य में इस तरह की परिस्थितियां दोबारा न बनें, इसके लिए प्रवेश प्रक्रिया, मान्यता और छात्रवृत्ति से जुड़ी सभी औपचारिकताओं को समयबद्ध और पारदर्शी बनाया जाए। यदि समय रहते ठोस निर्णय नहीं लिए गए, तो यह विवाद और गहराता जा सकता है, जिसका असर न केवल छात्रों पर बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर भी पड़ेगा।





