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रहस्यों की जननी माँ बाल सुंदरी का वो अद्भुत दरबार जहाँ झुक गया था औरंगजेब

शक्ति और चमत्कार की पावन स्थली उस दिव्य धाम की अनसुनी दास्तान जहाँ 52 शक्तिपीठों की असीम ऊर्जा का वास है और जिसके आगे मुग़ल सल्तनत की अकड़ भी श्रद्धा के समंदर में विलीन हो गई।

काशीपुर। उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर जनपद की कोख में समाई काशीपुर की यह पावन और ऐतिहासिक धरा महज़ एक शहर का भूगोल नहीं है, बल्कि यह वह रूहानी सरज़मीं है जहाँ के ज़र्रे-जर्रे में चमत्कारों की गूँज सुनाई देती है और जहाँ का इतिहास सतयुग के पौराणिक काल से लेकर मुग़ल सल्तनत के दौर तक की दास्तानों को खुद में समेटे हुए खड़ा है। देवभूमि के प्रवेश द्वार पर बसी इस जादुई नगरी का सबसे तेजस्वी केंद्र माँ बाल सुंदरी देवी मंदिर है, जिसे जनमानस में चैती मंदिर के नाम से भी पुकारा जाता है, और यह वह शक्तिपीठ है जिसकी आभा मात्र से ही भक्तों के कष्ट काफूर हो जाते हैं। हिमालय की तलहटी में स्थित इस पावन दरबार की महिमा इतनी निराली है कि यहाँ आने वाला हर शख्स श्रद्धा के उस समंदर में गोते लगाने लगता है जहाँ आस्था और विज्ञान के बीच की महीन रेखा भी धुंधली पड़ जाती है। इस अद्भुत शक्तिपीठ की अनसुनी कहानियाँ आज भी शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं को समान रूप से विस्मित कर देती हैं, क्योंकि यहाँ की हर शिला और हर वृक्ष अपनी एक अनोखी गाथा सुनाता है जो न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे भारतवर्ष के गौरवशाली अतीत का सजीव प्रमाण प्रस्तुत करती है।

सनातन धर्म की गहराइयों में छिपे रहस्यों को टटोलें तो माँ सती के आत्मदाह के पश्चात जब महादेव उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब ब्रह्मांड के संतुलन को बनाए रखने हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया था, जिसके फलस्वरूप माँ सती के अंग 52 विभिन्न स्थानों पर गिरे और उन्हीं में से एक अत्यंत पावन स्थान यह काशीपुर की धरती बनी। पौराणिक वृत्तांतों के अनुसार, यहाँ माँ सती की ‘बाईं भुजा’ का पतन हुआ था, जिसके कारण इसे विश्व के 52 शक्तिपीठों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ और तब से यह स्थान नारी शक्ति की साक्षात ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। इस मंदिर की सबसे विस्मयकारी और अनूठी विशेषता यह है कि यहाँ के गर्भगृह में किसी शिल्पकार द्वारा तराशी गई कोई पारंपरिक प्रतिमा स्थापित नहीं है, बल्कि एक विशाल प्राकृतिक शिला पर स्वयं माँ की भुजा की आकृति कुदरती तौर पर उभरी हुई है। भक्तगण सदियों से इसी पाषाण शिला को माँ का साक्षात स्वरूप मानकर पूजते आ रहे हैं और यह शिला आज भी उतनी ही जीवंत प्रतीत होती है जितनी कि सतयुग के समय रही होगी, जो भक्तों के अंतर्मन में श्रद्धा का ज्वार पैदा कर देती है।

इतिहास की परतों के नीचे दबी एक ऐसी दास्तान भी यहाँ मौजूद है जो मुग़ल शासक औरंगजेब की कट्टरता को भी ईश्वरीय शक्ति के आगे नतमस्तक कर देती है, क्योंकि जहाँ तलवारें और शासन विफल हो गए, वहाँ माँ बाल सुंदरी की ममता ने अपना चमत्कार दिखाया था। इतिहास गवाह है कि औरंगजेब अपनी हिंदू विरोधी नीतियों के लिए जाना जाता था, परंतु जब उसकी प्रिय बहन जहाँआरा एक ऐसी जानलेवा बीमारी की चपेट में आई जिसका इलाज दुनिया के नामचीन हकीमों के पास भी नहीं था, तब नियति ने अपना खेल दिखाया और माँ बाल सुंदरी ने एक अलौकिक छोटी कन्या का रूप धारण कर जहाँआरा को साक्षात दर्शन दिए। माँ ने आदेश दिया कि यदि इस प्राचीन मंदिर का पुनः निर्माण और सम्मान किया जाए तो वह पूर्णतः स्वस्थ हो जाएगी, और हुआ भी वही—जहाँआरा की सेहत में रातों-रात सुधार होने लगा। अपनी बहन के जीवन की रक्षा होते देख औरंगजेब ने तुरंत इस मंदिर के जीर्णोद्धार का आदेश दिया, जिसकी गवाही आज भी मंदिर के ऊपर बने वे तीन गुंबद देते हैं जिनकी वास्तुकला किसी मस्जिद की याद दिलाती है, जो सांप्रदायिक एकता और माँ की सर्वव्यापी सत्ता का एक बेमिसाल उदाहरण है।

शक्तिपीठ परिसर के भीतर ही प्रकृति का एक ऐसा करिश्मा आज भी खड़ा है जो वनस्पति विज्ञान के तमाम दावों को झुठलाता हुआ अध्यात्म की विजय गाथा गाता है और वह है यहाँ का प्राचीन एवं रहस्यमयी कदम का पेड़, जो अपनी बनावट के कारण दुनिया भर में चर्चा का विषय बना रहता है। यह वृक्ष बाहर से देखने पर किसी भी सामान्य पेड़ की तरह लहलहाता और हरा-भारा दिखाई देता है, परंतु इसका भीतरी हिस्सा पूरी तरह से खोखला है, जिसके पीछे की कहानी किसी रोमांचक फिल्म के दृश्यों से कम नहीं लगती। जनश्रुतियों के अनुसार, वर्षों पूर्व एक सिद्ध महात्मा की चुनौती को स्वीकार करते हुए यहाँ के पांडा (पुजारी) ने अपनी मंत्र शक्ति और तपोबल से इस विशाल पेड़ को क्षण भर में सुखाकर निर्जीव कर दिया था और फिर चमत्कारिक जल के छींटों से उसे पुनः नया जीवन प्रदान किया। तब से यह पेड़ अपनी उसी विचित्र और रहस्यमयी स्थिति में खड़ा है, जो इस बात का साक्षात प्रमाण है कि यदि भक्ति और साधना सच्ची हो तो सूखी लकड़ियों में भी जीवन का संचार किया जा सकता है, जिसे देख आज भी लोग दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं।

काशीपुर की इस पावन भूमि पर आयोजित होने वाला वार्षिक चैती मेला केवल एक व्यापारिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत की सांस्कृतिक पहचान और उन ऐतिहासिक किरदारों की आवाजाही का गवाह रहा है जिनके नाम से कभी प्रशासन थर-थर कांपता था। पुराने समय में जब घोड़ों की सवारी प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती थी, तब यहाँ घोड़ों का ‘नखासा बाजार’ सजता था, जहाँ अरबी नस्ल के बेहतरीन घोड़ों की बोलियाँ लगा करती थीं और उनकी गर्जना से पूरा इलाका गूंज उठता था। इस मेले की सबसे रोचक और सनसनीखेज सच्चाई यह है कि मशहूर बाग़ी सुल्ताना डाकू और बाद के दौर में चंबल की पहचान बनी फूलन देवी भी अपनी पहचान छिपाकर यहाँ गुप्त रूप से बेहतरीन नस्ल के घोड़े खरीदने आते थे। उन दुर्दांत बागियों के लिए भी माँ का यह दरवार इतना पवित्र था कि वे यहाँ बिना किसी हिंसा के केवल श्रद्धा और व्यापार के उद्देश्य से पहुँचते थे, साथ ही उस दौर में बरेली और झारखंड की बनी मजबूत लाठियों का क्रेज इतना अधिक था कि लोग दूर-दराज से अपनी सुरक्षा के लिए उन्हें खरीदने यहाँ खिंचे चले आते थे।

आस्था के इसी महाकुंभ के बीचों-बीच स्थित है मोतेश्वर महादेव का वह मंदिर, जिसे साक्षात शिव का निवास स्थान माना जाता है और जहाँ की ऊर्जा किसी भी अशांत मन को शांति के सागर में डुबोने की क्षमता रखती है। महाभारत कालीन इस शिवलिंग की मोटाई और इसकी भव्यता इतनी अधिक है कि इनका नामकरण ही ‘मोटेश्वर’ के रूप में हुआ, जो अपनी तरह का एक अत्यंत दुर्लभ और विशाल शिवलिंग है जिसे देखकर श्रद्धा का भाव स्वतः ही जागृत हो जाता है। स्कंद पुराण जैसे पवित्र ग्रंथों में इस शिवलिंग की महत्ता का विस्तार से वर्णन मिलता है, जहाँ इसे भगवान शिव का ’12वां उप-ज्योतिर्लिंग’ स्वीकार किया गया है, जो इस क्षेत्र की धार्मिक महत्ता को सातवें आसमान पर ले जाता है। ऐसी प्रबल धार्मिक मान्यता है कि जो भी पुण्यात्मा हरिद्वार के पवित्र गंगा तट से पैदल कांवड़ लाकर यहाँ पूरी निष्ठा के साथ मोतेश्वर महादेव पर जल अर्पित करती है, उसे जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिलकर सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है, यही कारण है कि सावन और महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर यहाँ भक्तों का एक ऐसा सैलाब उमड़ता है जिसे संभालना प्रशासन के लिए भी चुनौती बन जाता है।

काशीपुर का यह आध्यात्मिक परिक्षेत्र केवल हिंदू समाज की आस्था तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह तराई क्षेत्र की विशिष्ट बुक्सा जनजाति की कुलदेवी माँ बाल सुंदरी के रूप में उनके जीवन का आधार स्तंभ भी है। गदरपुर, रामनगर, बाजपुर और आसपास के तमाम तराई इलाकों से बुक्सा समुदाय के लोग आज भी अपनी प्राचीन परंपराओं को जीवित रखते हुए यहाँ विशेष ‘चिरागी पूजा’ के लिए उमड़ते हैं, जो उनकी संस्कृति और माँ के प्रति अटूट प्रेम का प्रतीक है। इसके ऐतिहासिक पक्ष की मजबूती का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सातवीं शताब्दी में महान चीनी यात्री ह्वेनसांग ने जब भारत का भ्रमण किया था, तब उन्होंने अपनी डायरी में इस वैभवशाली स्थान का उल्लेख ‘गोविषाण’ के नाम से किया था, जो इसके प्राचीन महानगरीय स्वरूप की पुष्टि करता है। आधुनिक समय में इस मेले की भव्यता और जनमानस की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए साल 2018 से स्थानीय प्रशासन ने इसकी कमान संभाल ली है, जिससे अब यह उत्सव और भी सुव्यवस्थित एवं सुरक्षित तरीके से संपन्न होता है, जो काशीपुर की आन-बान और शान को पूरी दुनिया में फैला रहा है।

काशीपुर के प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिवक्ता और बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष धर्मेंद्र तुली का मानना है कि माँ बाल सुंदरी देवी का मंदिर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि इस समूचे क्षेत्र की चेतना और न्याय का सर्वाेच्च शिखर है। वे बड़ी संवेदनशीलता के साथ कहते हैं कि जब समाज में न्याय की उम्मीदें धुंधली पड़ने लगती हैं, तब माँ का यह दरबार ही वह अंतिम शरणस्थली बचता है जहाँ हर पीड़ित को मानसिक शांति और संबल प्राप्त होता है। उनके अनुसार, जिस प्रकार एक अधिवक्ता सत्य की रक्षा के लिए संघर्ष करता है, उसी प्रकार माँ बाल सुंदरी युगों-युगों से सत्य और धर्म की रक्षा कर रही हैं। यह शक्तिपीठ काशीपुर की सांस्कृतिक धड़कन है, जहाँ पहुँचते ही मनुष्य का अहंकार शून्य हो जाता है और अटूट विश्वास का उदय होता है। तुली के अनुसार माँ के बाल रूप के दर्शन मात्र से ही जीवन के कठिन से कठिन विवाद सुलझ जाते हैं और भक्त को वो दिव्य समाधान प्राप्त होता है जो किसी भी सांसारिक न्यायालय की कल्पना से परे है।

अत: यदि आप भी जीवन की भागदौड़ से थककर किसी ऐसी जगह की तलाश में हैं जहाँ प्रकृति का सौंदर्य और ईश्वर का चमत्कार एक साथ मिल सके, तो उत्तराखंड के काशीपुर स्थित इस जादुई दरबार में हाजिरी लगाना आपके लिए एक जीवन बदलने वाला अनुभव हो सकता है। माँ बाल सुंदरी का यह बाल स्वरूप इतना मनमोहक और शक्तिवान है कि कहते हैं यहाँ सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है और बिगड़े हुए काम भी माँ की एक कृपा दृष्टि से पल भर में बन जाते हैं। इस समाचार लेख का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं बल्कि आपको उस दिव्य अनुभूति से परिचित कराना है जो काशीपुर की इस पावन माटी में रची-बसी है और जिसे महसूस करने के लिए आपको स्वयं यहाँ आकर इन रहस्यों का साक्षी बनना होगा। अगली बार जब भी आपके कदम उत्तराखंड की वादियों की ओर बढ़ें, तो इस 52 शक्तिपीठों में से एक अत्यंत दुर्लभ धाम की यात्रा करना न भूलें, क्योंकि यहाँ की हवाओं में आज भी माँ की ममता और महादेव का आशीर्वाद निरंतर बहता रहता है जो हर भक्त को निहाल कर देता है।

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शहर की भीड़भाड़ और बढ़ती बीमारियों के दौर में जब चिकित्सा जगत को नए और भरोसेमंद विकल्पों की तलाश थी, उसी समय काशीपुर से उभरती एक संस्था ने अपनी गुणवत्ता, विशेषज्ञता और इंसानी सेहत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम कर दी। एन.एच.-74, मुरादाबाद रोड पर स्थित “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” आज उस भरोसे का नाम बन चुका है, जिसने अपनी प्रतिबद्धता, सेवा और उन्नत चिकित्सा व्यवस्था के साथ लोगों के दिलों में एक अलग स्थान स्थापित किया है। इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ इलाज का आधार केवल दवा नहीं, बल्कि रोगी की पूरी जीवनशैली, उसकी भावनाओं और उसके व्यवहार तक को समझकर उपचार उपलब्ध कराया जाता है। संस्था के केंद्र में वर्षों से सेवा कर रहे डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा का अनुभव, उनकी अंतरराष्ट्रीय योग्यता और कार्य के प्रति उनका गहरा समर्पण उन्हें चिकित्सा जगत में एक विशिष्ट पहचान देता है। अपनी अलग सोच और उच्च स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था के कारण यह संस्थान न केवल स्थानीय लोगों का विश्वास जीत रहा है, बल्कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले मरीज भी यहाँ भरोसे के साथ उपचार लेने पहुँचते हैं। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” ने NABH Accreditation और ISO 9001:2008 व 9001:2015 प्रमाणपत्र हासिल कर यह साबित कर दिया है कि यहाँ इलाज पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के साथ किया जाता है। संस्थान की दीवारों पर सजे सैकड़ों प्रमाणपत्र, सम्मान और पुरस्कार इस बात के गवाह हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा ने उपचार को केवल पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा की जिम्मेदारी माना है। यही वजह है कि उन्हें भारतीय चिकित्सा रत्न जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। रोगियों के प्रति संवेदनशीलता और आधुनिक तकनीकी समझ को मिलाकर जो उपचार मॉडल यहाँ तैयार हुआ है, वह लोगों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है। संस्थान के भीतर मौजूद विस्तृत कंसल्टेशन रूम, मेडिकल फाइलों की सुव्यवस्थित व्यवस्था और अत्याधुनिक निरीक्षण प्रणाली इस बात को स्पष्ट दिखाती है कि यहाँ मरीज को पूर्ण सम्मान और ध्यान के साथ सुना जाता है। पोस्टर में दर्शाए गए दृश्य—जहाँ डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मानित होते दिखाई देते हैं—उनकी निष्ठा और चिकित्सा जगत में उनकी मजबूत प्रतिष्ठा को और मजबूत बनाते हैं। उनकी विदेशों में प्राप्त डिग्रियाँ—बीएचएमएस, एमडी (होम.), डी.आई.एच. होम (लंदन), एम.ए.एच.पी (यूके), डी.एच.एच.एल (यूके), पीएच.डी—स्पष्ट करती हैं कि वे केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिकित्सा अनुसंधान और उपचार के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। काशीपुर जैसे शहर में आधुनिक विचारों और उच्च गुणवत्ता वाले उपचार का ऐसा संयोजन मिलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। संस्था की ऊँची इमारत, सुगम पहुँच और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित परिसर मरीजों को एक शांत, सकारात्मक और उपचार के अनुकूल माहौल प्रदान करता है। इसी माहौल में रोगियों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली वैज्ञानिक होम्योपैथिक औषधियाँ उनके लंबे समय से चले आ रहे दर्द और समस्याओं को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखती हैं। उपचार के दौरान रोगी को केवल दवा देना ही उद्देश्य नहीं होता, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य पुनर्स्थापन पर यहाँ विशेष ध्यान दिया जाता है। यही वह कारण है कि मरीज वर्षों बाद भी इस संस्थान को याद रखते हुए अपने परिवार और परिचितों को यहाँ भेजना पसंद करते हैं। समाज के विभिन्न समूहों से सम्मान प्राप्त करना, राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों द्वारा सराहना मिलना, और बड़े मंचों पर चिकित्सा सेवाओं के लिए सम्मानित होना—ये सभी तस्वीरें इस संस्था की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को और अधिक उजागर करती हैं। पोस्टर में दिखाई देने वाले पुरस्कार न केवल उपलब्धियों का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा लगातार लोगों की सेहत सुधारने और चिकित्सा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने में जुटे हुए हैं। उनका सरल स्वभाव, रोगियों के प्रति समर्पण और ईमानदारी के साथ सेवा का भाव उन्हें चिकित्सा जगत में एक उल्लेखनीय व्यक्तित्व बनाता है। संपर्क के लिए उपलब्ध नंबर 9897618594, ईमेल drrajneeshhom@hotmail.com और आधिकारिक वेबसाइट www.cureme.org.in संस्थान की पारदर्शिता और सुविधा की नीति को मजबूत बनाते हैं। काशीपुर व आसपास के क्षेत्रों के लिए यह संस्थान विकसित और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बन चुका है जहाँ लोग बिना किसी डर, संदेह या हिचकिचाहट के पहुँचते हैं। बढ़ते रोगों और बदलती जीवनशैली के समय में इस प्रकार की संस्था का होना पूरा क्षेत्र के लिए बड़ी राहत और उपलब्धि है। आने वाले समय में भी यह संस्था चिकित्सा सेवा के नए आयाम स्थापित करती रहेगी, यही उम्मीद लोगों की जुबान पर साफ झलकती है।
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