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यूजीसी नियम 2026 के खिलाफ सामाजिक और शैक्षिक संगठनों का उग्र जनआंदोलन सड़क पर उतरा

शिक्षा में समान अवसर और योग्यता की रक्षा के लिए विभिन्न सामाजिक संगठनों, अधिवक्ताओं, शिक्षाविदों और छात्रों ने एकजुट होकर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन भेजा, चेताया कि यूजीसी का फैसला भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय है।

काशीपुर। गुरूवार को शिक्षा से जुड़े असंतोष की वह तस्वीर उभरकर सामने आई, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि यूजीसी द्वारा लागू किए गए 2026 के नए नियमों को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में गहरी बेचौनी है। “यूजीसी संघर्ष समिति” के बैनर तले सामाजिक और शैक्षिक संगठनों ने एकजुट होकर जिस तरह से अपनी नाराजगी जाहिर की, उसने इस आंदोलन को स्थानीय विरोध से आगे बढ़ाकर व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप दे दिया। रैली का उद्देश्य केवल प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके जरिए महामहिम राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन उपजिलाधिकारी के माध्यम से प्रेषित कर संवैधानिक स्तर पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई गई। रैली में शामिल लोगों का कहना था कि यूजीसी का यह निर्णय शिक्षा की मूल भावना, योग्यता आधारित अवसर और समानता के सिद्धांतों पर सीधा प्रहार करता है। पूरे शहर में नारेबाजी और अनुशासित मार्च के बीच यह संदेश दिया गया कि शिक्षा नीति से जुड़े फैसले बिना व्यापक विमर्श के लागू किए गए तो उनका विरोध सड़क से संसद तक किया जाएगा।

नेतृत्व की भूमिका में एडवोकेट हरि सिंह और संजय चतुर्वेदी आगे रहे, जिनकी अगुवाई में यह रैली व्यवस्थित ढंग से विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए निर्धारित स्थल तक पहुंची। दोनों नेताओं ने प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि यह संघर्ष किसी एक संस्था या समूह का नहीं, बल्कि पूरे समाज की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि यूजीसी द्वारा लागू किए गए नियम 2026 देश की शैक्षणिक संरचना में गंभीर असंतुलन पैदा कर सकते हैं, क्योंकि इनमें न तो जमीनी हकीकत का आकलन किया गया है और न ही शिक्षाविदों, छात्रों व अभिभावकों से पर्याप्त संवाद हुआ है। उनके अनुसार शिक्षा व्यवस्था में बदलाव जरूरी हो सकते हैं, लेकिन ऐसे बदलाव जो समान अवसर और परिश्रम के सिद्धांत को कमजोर करें, उन्हें किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। रैली के दौरान अनुशासन और शांतिपूर्ण प्रदर्शन इस बात का संकेत था कि आंदोलन अपनी बात मजबूती से, लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से रखना चाहता है।

ज्ञापन में रखी गई बातों ने इस आंदोलन की गंभीरता को और रेखांकित किया। समिति ने साफ शब्दों में कहा कि यूजीसी का फैसला संविधान में निहित समानता, योग्यता और अवसर की भावना के विपरीत है। ज्ञापन के अनुसार यह निर्णय न केवल शिक्षकों और विद्यार्थियों को प्रभावित करेगा, बल्कि भविष्य में देश की बौद्धिक क्षमता और शोध संस्कृति पर भी नकारात्मक असर डालेगा। प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि यदि शिक्षा में अवसरों का संतुलन बिगड़ा तो इसका सीधा प्रभाव सामाजिक समरसता पर पड़ेगा। इसी कारण समिति ने इसे केवल शैक्षणिक मुद्दा न मानते हुए राष्ट्रीय महत्व का विषय बताया। वक्ताओं ने यह भी कहा कि इस फैसले को लेकर अब राष्ट्रीय मीडिया और विभिन्न सामाजिक मंचों पर भी बहस तेज हो चुकी है, जिससे यह स्पष्ट है कि असंतोष केवल काशीपुर या उत्तराखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में इसकी गूंज सुनाई दे रही है।

चेतावनी भरे शब्दों में संगठन ने यह भी कहा कि यदि यूजीसी के इस निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो समाज में असंतोष, असुरक्षा और असमानता की भावना और गहराती चली जाएगी। समिति का मानना है कि शिक्षा वह आधार है, जिस पर राष्ट्र का भविष्य टिका होता है, और यदि इसी क्षेत्र में भेदभाव या असंतुलन पैदा हुआ तो उसका असर लंबे समय तक रहेगा। वक्ताओं ने मंच से स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी वर्ग विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य सभी के लिए समान और न्यायपूर्ण अवसर सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि संघर्ष समिति हर उस व्यवस्था के खिलाफ खड़ी होगी, जो मेहनत और योग्यता को दरकिनार कर किसी अन्य आधार पर अवसर तय करने की कोशिश करेगी। इस संदेश के साथ प्रदर्शनकारियों ने यह भरोसा भी दिलाया कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण रहेगा, लेकिन मांगें पूरी होने तक जारी रहेगा।

मांगों के संदर्भ में समिति ने यूजीसी के निर्णय को तत्काल निरस्त करने की प्रमुख मांग रखी। इसके साथ ही शिक्षाविदों की एक नई समिति गठित करने पर जोर दिया गया, जो जनभावनाओं और जमीनी सच्चाइयों को ध्यान में रखते हुए नई व्यवस्था तैयार करे। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि शिक्षा नीति से जुड़े फैसले केवल कागजी आंकड़ों और दफ्तरों की फाइलों के आधार पर नहीं होने चाहिए, बल्कि उन लोगों की राय भी सुनी जानी चाहिए जो प्रत्यक्ष रूप से शिक्षा प्रणाली से जुड़े हैं। रैली में शामिल संगठनों ने एक स्वर में कहा कि यदि सरकार और यूजीसी ने समय रहते इस मुद्दे पर सकारात्मक कदम नहीं उठाए, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि आने वाले दिनों में प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर अन्य संगठनों से संपर्क कर संयुक्त रणनीति बनाई जा सकती है।

सहभागिता के लिहाज से यह प्रदर्शन बेहद व्यापक और विविधतापूर्ण नजर आया। अग्रवाल सभा, क्षत्रिय सभा, पंजाबी सभा, ब्राह्मण सभा, चौहान सभा, बिश्नोई सभा, काशीपुर बार एसोसिएशन, छात्र संघ सहित सवर्ण समाज की अनेक सभाओं की सक्रिय मौजूदगी ने रैली को मजबूती प्रदान की। इन संगठनों के प्रतिनिधियों का कहना था कि शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर समाज को एकजुट होना चाहिए, क्योंकि इसका असर हर परिवार और हर पीढ़ी पर पड़ता है। रैली में शामिल छात्र संगठनों ने विशेष रूप से चिंता जताई कि नए नियमों से छात्रों के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा सकते हैं। बार एसोसिएशन के सदस्यों ने कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो न्यायिक स्तर पर भी इस फैसले को चुनौती दी जा सकती है।

एमपी चौक पर पहुंचने के बाद रैली ने सभा का रूप ले लिया, जहां वक्ताओं ने यूजीसी बिल के विरोध में तीखे शब्दों में अपनी बात रखी। वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को प्रयोगशाला बनाकर बार-बार नए प्रयोग करना छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यूजीसी के नए नियम सामाजिक संतुलन को बिगाड़ सकते हैं और इससे योग्य प्रतिभाओं को नुकसान पहुंचने की आशंका है। सभा के दौरान यह बात बार-बार दोहराई गई कि यदि निर्णय वापस नहीं लिया गया तो संघर्ष समिति चरणबद्ध आंदोलन की राह अपनाएगी। वक्ताओं ने उपस्थित जनसमूह से आह्वान किया कि वे इस मुद्दे को अपने-अपने क्षेत्रों में उठाएं और जनजागरण के माध्यम से सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाएं।

प्रदर्शन में शामिल प्रमुख लोगों की उपस्थिति ने आयोजन को और प्रभावशाली बनाया। संजय चतुर्वेदी, हरीश कुमार सिंह एडवोकेट, मनोज अग्रवाल, गीता चौहान, विमल गुड़िया, राजीव घई, संदीप चतुर्वेदी, अरूण चौहान, सुभाष चंद्र शर्मा, आर सी त्रिपाठी, सुरेश चन्द्र जोशी, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष गिरजेश खुल्वे, उमेश जोशी एडवोकेट, मयंक शर्मा, गौरव गर्ग, जगदीश चंद्र बौड़ाई, सूर्य प्रताप सिंह, मोहन पपनै, मनोज पंत, त्रिलोक अधिकारी, शुभम उपाध्याय एडवोकेट, रवि ढींगरा, प्रकाश खनुलिया, महेश चंद्र शर्मा, पंकज टंडन, अशोक राजपूत, शरद पंत, शंभू लखेड़ा, चंद्र भूषण डोभाल, पंकज पंत, मनोज डोबरियाल, अनिल शर्मा समेत भारी संख्या में लोग मौजूद रहे। सभी ने एकजुटता के साथ यह संदेश दिया कि शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर समाज चुप नहीं बैठेगा।

अंततः आयोजन के समापन पर आयोजकों और सवर्ण समाज के विभिन्न संगठनों ने यह दोहराया कि यह संघर्ष लंबा हो सकता है, लेकिन उद्देश्य स्पष्ट और न्यायपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जब तक यूजीसी के नियम 2026 को वापस लेकर सभी पक्षों की सहमति से नई व्यवस्था नहीं बनाई जाती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। काशीपुर में उमड़ा यह जनसैलाब इस बात का संकेत है कि शिक्षा नीति से जुड़े फैसलों पर अब समाज पहले से कहीं अधिक सजग और सक्रिय है। इस प्रदर्शन ने न केवल स्थानीय प्रशासन का ध्यान खींचा, बल्कि यह भी दिखा दिया कि यदि जनभावनाओं की अनदेखी की गई तो विरोध की आवाज और तेज हो सकती है।

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