उत्तराखण्ड(सुुनील कोठारी)। दिल्ली के सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक ऐसी अभूतपूर्व और शक्तिशाली हलचल मची है, जो आने वाले समय में देवभूमि उत्तराखंड की पूरी राजनीतिक तस्वीर और भूगोल को बुनियादी तौर पर बदलकर रख देने वाली है। विश्वसनीय सूत्रों और राजनीतिक गलियारों में छनकर आ रही खबरों के अनुसार, केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार महिला आरक्षण कानून में एक बड़ा और क्रांतिकारी संशोधन विधेयक (Amendment Bill) लेकर आने की अंतिम तैयारी में है। इस अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले बिल को आगामी बजट सत्र के दौरान संसद के दोनों सदनों में पेश किए जाने और पूरी ताकत के साथ पारित करवाए जाने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी सरकार की यह कोशिश केवल महिला सशक्तिकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ा चुनावी और प्रशासनिक गणित छिपा हुआ है, जो देश के परिसीमन की दिशा को हमेशा के लिए बदल देगा। यदि यह बिल अपनी वर्तमान परिकल्पना के साथ कानून की शक्ल अख्तियार कर लेता है, तो इसका सबसे बड़ा और सीधा धमाका उत्तराखंड जैसे महत्वपूर्ण हिमालयी राज्य में देखने को मिलेगा।
उत्तराखंड के संदर्भ में यह बदलाव किसी बड़े सियासी चमत्कार से कम नहीं होगा, क्योंकि वर्तमान में यहाँ की जो पाँच लोकसभा सीटें हैं, वे नए प्रस्तावित फॉर्मूले और परिसीमन के आधार पर बढ़कर सीधे आठ हो सकती हैं। यह तीन सीटों का इजाफा केवल एक संख्यात्मक वृद्धि नहीं है, बल्कि यह राज्य के भीतर सत्ता के केंद्रों, क्षेत्रीय दबदबे और चुनावी समीकरणों का एक ऐसा पुनर्निर्माण है, जो आने वाले दशकों तक उत्तराखंड की राजनीति की दिशा और दशा तय करेगा। इस संभावित विस्तार से न केवल नए चेहरों को अपनी किस्मत आजमाने का सुनहरा अवसर मिलेगा, बल्कि स्थापित राजनेताओं के लिए भी अपने सुरक्षित किलों को बचाए रखना एक बहुत बड़ी और टेढ़ी चुनौती बन जाएगा। पूरे प्रदेश में इस बात को लेकर एक अलग ही रोमांच और कौतूहल का माहौल है कि आखिर ये नई सीटें कहाँ बनेंगी और किन जिलों का भूगोल कटेगा या जुड़ेगा। यह एक ऐसी राजनीतिक बिसात बिछने जा रही है, जहाँ हर मोहरा बहुत सोच-समझकर चला जाएगा, क्योंकि दिल्ली की सत्ता में उत्तराखंड की भागीदारी अब और भी अधिक वजनदार होने वाली है।
इस पूरे महा-परिवर्तन के पीछे जो फार्मूला काम कर रहा है, उसे गहराई से समझना हर उस व्यक्ति के लिए जरूरी है जो उत्तराखंड की मिट्टी और राजनीति से जुड़ा है। चर्चाओं और आंतरिक रणनीतियों के आधार पर यह संकेत मिल रहे हैं कि राज्य की राजधानी देहरादून के नाम से एक बिल्कुल नई और स्वतंत्र लोकसभा सीट का सृजन किया जा सकता है। वर्तमान में देहरादून जिला दो अलग-अलग लोकसभा क्षेत्रों में बंटा हुआ है, लेकिन नए खाके में इसे एक सशक्त और एकीकृत सीट के रूप में पहचान मिलने की पूरी उम्मीद है। इस प्रस्तावित देहरादून लोकसभा सीट के भीतर देहरादून जिले के शहरी और ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ टिहरी जिले का वह महत्वपूर्ण हिस्सा भी समाहित किया जा सकता है, जो भौगोलिक और प्रशासनिक रूप से अभी भी इससे जुड़ा हुआ है। देहरादून और टिहरी का यह नया संगम एक ऐसा हाई-प्रोफाइल चुनावी क्षेत्र तैयार करेगा, जहाँ विकास, पर्यटन और शहरीकरण के मुद्दे सबसे ऊपर रहेंगे। यह सीट न केवल उत्तराखंड की सबसे विकसित सीटों में शुमार होगी, बल्कि यहाँ का मतदाता पूरे राज्य की राजनीतिक नब्ज को नियंत्रित करने की क्षमता रखेगा।
कुमाऊं मंडल के तराई और भाबर क्षेत्रों में भी इस नए परिसीमन की बयार बहुत ही तेज़ी और तीव्रता के साथ चलने वाली है, जहाँ वर्तमान की नैनीताल और उधम सिंह नगर की विशाल संयुक्त सीट को दो स्पष्ट और अलग-अलग हिस्सों में विभाजित करने की व्यापक योजना है। वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था में नैनीताल और उधम सिंह नगर जिले मिलकर एक ही विशाल लोकसभा क्षेत्र का निर्माण करते हैं, जिससे अक्सर प्रशासनिक दूरियां और क्षेत्रीय उपेक्षा की शिकायतें बनी रहती हैं। लेकिन मोदी सरकार के नए फॉर्मूले के तहत उधम सिंह नगर को एक बिल्कुल नई, स्वतंत्र और शक्तिशाली लोकसभा सीट के रूप में नई पहचान मिल सकती है। इस विभाजन के बाद नैनीताल सीट का स्वरूप भी पूरी तरह से नया और विस्तारित होगा, जिसमें अल्मोड़ा और चंपावत के कुछ सामरिक और भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्सों को जोड़कर इसे एक संतुलित आधार प्रदान किया जाएगा। उधम सिंह नगर जैसी औद्योगिक और कृषि प्रधान नई सीट का उदय होना इस पूरे क्षेत्र के लिए एक क्रांतिकारी बदलाव साबित होगा, क्योंकि इससे वहां के व्यापारियों, किसानों और आम जनता की समस्याओं को केंद्र की मेज पर सीधे और बिना किसी देरी के रखा जा सकेगा।

मैदानी क्षेत्रों की राजनीतिक महत्ता और वहां तेजी से बढ़ती जनसंख्या के दबाव को देखते हुए हरिद्वार जिले में भी एक बहुत बड़ी और चौंकाने वाली हलचल देखने को मिल सकती है। चर्चा यह है कि हरिद्वार जिले की जनसंख्या और वहां की ग्यारह विधानसभा सीटों के विशाल आधार को देखते हुए, यहाँ रुड़की के नाम से एक अतिरिक्त और नई लोकसभा सीट बनाई जा सकती है। यदि परिसीमन का आधार केवल जनसंख्या और भौगोलिक घनत्व को बनाया जाता है, तो हरिद्वार जैसे बड़े जिले में दो लोकसभा सीटें होना अब समय की मांग और न्यायसंगत भी प्रतीत होता है। रुड़की अपनी विशिष्ट शैक्षणिक, तकनीकी और औद्योगिक पहचान के कारण लंबे समय से एक स्वतंत्र राजनीतिक वजूद की मांग करता रहा है, और इस नए बिल के पारित होने से यह सपना अब वास्तविकता के धरातल पर उतर सकता है। हरिद्वार और रुड़की की ये दो अलग-अलग सीटें पश्चिमी उत्तराखंड की राजनीति के ध्रुवीकरण को और भी अधिक गहरा और प्रभावी बना देंगी, जिससे राज्य की कुल आठ सीटों में मैदानी इलाकों का प्रतिनिधित्व और दबदबा काफी हद तक बढ़ जाएगा।
पहाड़ी क्षेत्रों के लिए भी यह संशोधन बिल और सीटों का नया फार्मूला एक नई उम्मीद और संजीवनी के रूप में देखा जा रहा है। सरकार के भीतर इस बात पर गहन मंथन चल रहा है कि यदि केवल जनसंख्या को ही आधार बनाया गया, तो पहाड़ों का प्रतिनिधित्व मैदानों के मुकाबले कमजोर पड़ सकता है। इसीलिए, भौगोलिक दुर्गमता, सामरिक महत्व और पहाड़ों की विशिष्ट पहचान को ध्यान में रखते हुए, उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में भी एक अतिरिक्त लोकसभा सीट की बढ़ोतरी की जा सकती है। इसका सीधा मतलब यह है कि जहाँ मैदानों में रुड़की और उधम सिंह नगर के रूप में दो नई सीटें बढ़ेंगी, वहीं पहाड़ों की आवाज को संतुलित करने के लिए एक और सीट का सृजन किया जाएगा। इससे उत्तराखंड के उन सुदूरवर्ती और सीमांत गाँवों की समस्याएं भी अब दिल्ली की बड़ी पंचायतों में और अधिक प्रखरता और अधिकार के साथ गूँज सकेंगी, जिन्हें अब तक बड़े लोकसभा क्षेत्रों के कारण अक्सर दरकिनार कर दिया जाता था। यह संतुलन उत्तराखंड की समग्र प्रगति के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा, जहाँ हर क्षेत्र को समान सम्मान और भागीदारी मिलेगी।
लोकसभा की सीटों में होने वाली यह संभावित और ऐतिहासिक वृद्धि केवल संसद तक ही सीमित नहीं रहने वाली है, बल्कि इसका एक बहुत बड़ा और प्रत्यक्ष असर प्रदेश की विधानसभा सीटों की संख्या पर भी पड़ेगा। जैसे ही लोकसभा की सीटें पांच से बढ़कर आठ होंगी, वैसे ही उत्तराखंड विधानसभा की सीटों का आंकड़ा भी परिसीमन के नियमों के अनुसार 70 से बढ़कर काफी ऊपर चला जाएगा। इसका सीधा परिणाम यह होगा कि राज्य में नेताओं की फौज बढ़ेगी, हर छोटी-बड़ी सीट पर दावेदारियां और अधिक आक्रामक होंगी और पूरे प्रदेश की प्रशासनिक और राजनीतिक कार्यप्रणाली अधिक व्यापक, गहरी और समावेशी हो जाएगी। यह बदलाव उन युवाओं और नए कार्यकर्ताओं के लिए एक स्वर्णिम युग की शुरुआत जैसा होगा, जो अब तक बड़े और पुराने नेताओं के साये में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। आठ लोकसभा सीटों का मतलब है कि उत्तराखंड के पास अब दिल्ली में आठ ऐसे सांसद होंगे जो राज्य की वकालत करेंगे, जिससे बजट आवंटन और केंद्र की योजनाओं के क्रियान्वयन में प्रदेश को पहले से कहीं अधिक लाभ मिल सकेगा।
कुल मिलाकर, केंद्र की मोदी सरकार का यह महिला आरक्षण संशोधन बिल उत्तराखंड के लिए एक ऐसे राजनीतिक सूर्योदय की तरह है, जो अपने साथ असीम संभावनाएं और चुनौतियां दोनों लेकर आएगा। जहाँ एक तरफ देहरादून, उधम सिंह नगर और रुड़की जैसी नई सीटों के बनने से विकास की रफ्तार तेज होने की उम्मीद है, वहीं दूसरी तरफ पुराने राजनीतिक दिग्गजों के बीच अपनी जमीन बचाने की जंग और भी ज्यादा तीखी और दिलचस्प हो जाएगी। सांसद चाहे दिल्ली में बैठकर उत्तराखंड की आवाज़ उठाएं या न उठाएं, लेकिन नए चुनावी मैदानों में उतरने के लिए जो उत्साह और गहमागहमी अभी से शुरू हुई है, उसने उत्तराखंड के चुनावी तापमान को अभी से सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है। आने वाला बजट सत्र केवल बिलों का सत्र नहीं होगा, बल्कि यह उत्तराखंड के सुनहरे भविष्य और उसकी राजनीतिक संप्रभुता को एक नई ऊंचाई देने वाला महा-अध्याय साबित होने जा रहा है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस बिल को किस रूप में पेश करती है और उत्तराखंड के आठ सांसदों वाला यह नया सपना कब हकीकत की जमीन पर उतरता है।





